विभिन्न आयोगों एवं समितियों के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

विभिन्न आयोगों एवं समितियों के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

राधाकृष्णन कमीशन के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

स्वतंत्र भारत में विश्व विद्यालयी शिक्षा का स्वरूप स्थापित करने के लिए केन्द्रीय शिक्षा सलाह कार बोर्ड और अन्त: विश्वविद्यालय शिक्षा परिषद के सिफारिश पर 1948 में डॉ० राधाकृष्णन के अध्यक्षता में विश्वविदयालय शिक्षा आयोग का गठन किया गया । जिसमें विश्वविद्यालयों शिक्षा के निम्न उद्देश्य बतायें हैं ।

1. विश्वविद्यालयी छात्रों का सर्वांगीण विकास मानसिक व शारीरिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संवेगात्मक करना चाहिए ।
2. ज्ञान व संस्कृति का संरक्षण व उन्नति करनी चाहिए ।
3. व्यक्तियों में जन्मजात गुणों की खोज एवं प्रशिक्षण द्वारा उनका विकास करना चाहिए।
4. दूरदर्शी, बुद्धिमान एवं साहसी नेताओं के निर्माण द्वारा समाज सुधार को बल दिया जाना चाहिए ।
5. ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना जो राजनैतिक, प्रशासकीय एवं व्यवसायिक क्षेत्रों में नेतृत्व कर सकें ।
6. सफल प्रजातंत्र के लिए योग्य नागरिकों का निर्माण करना ।
7. ऐसे विवेकी व्यक्तियों का निर्माण करना जो प्रजातंत्र की सफलता के लिए शिक्षा का प्रसार कर सके ।
8. छात्रों का चरित्र निर्माण करना ।
9. छात्रों में विश्व बन्धुत्व की भावना का विकास करना ।

माध्यमिक शिक्षा आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

1952 में डॉ० ए. लक्ष्मी स्वामी मुदालियर की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग की नियुक्ति की गई आयोग के अनुसार शिक्षा के निम्नलिखित लक्ष्य बताये गये हैं

1. प्रजातान्त्रिक नागरिकता का विकास
2. कुशल जीवनयापन की कला में प्रशिक्षण
3. व्यक्तित्व का विकास
4. व्यावसायिक कुशलता की उन्नति
5. नेतृत्व के लिए शिक्षा
6. चरित्र निर्माण
7. देश प्रेम की भावना का विकास

कोठारी आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

भारत सरकार ने शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर व्यापक विचार विमर्श कर सलाह देने के लिए 1964 में डॉ० डी.एस. कोठारी के नेतृत्व में आयोग की नियुक्ति की जिसने राष्ट्रीय पुर्न:निर्माण हेतु शिक्षा के निम्न उद्देश्यों की स्थापना की हैं –

1. उत्पादन में वृद्धि करना ।
2. सामाजिक एवं राष्ट्रीय एकता का विभाजन करना ।
3. प्रजातंत्र को सुदृढ़ करना ।
4. देश का आधुनिकीकरण करना ।
5. सामाजिक, नैतिक व आध्यात्मिक मूल्यों का विकास करना ।

नई शिक्षा नीति 1986 के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

नई शिक्षा नीति 1986 में शिक्षा को एक व्यापक चुनौती मानकर तकनीकी युग में प्रवेश करने के लिए शिक्षा के निम्न उद्देश्य सुझाये हैं –

1. प्रजातान्त्रिक नागरिकता का विकास
2. जीवन जीने की योग्यता का विकास
3. व्यक्तित्व का विकास
4. व्यावसायिक कौशल का विकास
5. नेतृत्व का विकास
6. संवेगात्मक एवं राष्ट्रीय एकता का विकास
7. अन्तरसांस्कृतिक समझ का विकास
8. अन्र्तराष्ट्रीय सद्भावना का विकास

डेलर्स आयोग के अनुसार शिक्षा के लक्ष्य

यूनेस्को की रिपोर्ट जिसे ‘Learning Treassure within’ कहा गया हैं में शिक्षा के चार स्तंभ बताये गये हैं जिन्हें शिक्षा के चार आधार भूत उद्देश्य कहा जाता हैं ।

1. जानने का अधिगम (Learning to know):- जानने के अधिगम का अर्थ है शिक्षा द्वारा लोगों में नवीन ज्ञान ग्रहण करने की योग्यता का विकास करना जिससे वे जीवन भर अपने ज्ञान की वृद्धि करते रहे । विद्यालयों, विश्वविद्यालय द्वारा संक्षिप्त समय के लिए शिक्षा दी जाती है और विद्यालयी शिक्षा के बाद व्यक्ति सीखना बन्द कर देता हैं । यदि विद्यालयों, विश्वविद्यालयों द्वारा थोड़े समय में संक्षिप्त विषयों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता का विकास कर दिया जाये तो व्यक्ति आजीवन अपने को शिक्षित करता रह सकता हैं ।

2. करने का अधिगम (Learning to Do):- इसका अर्थ केवल व्यावसायिक शिक्षा में निहित कौशलों के विकास से नहीं हैं बल्कि जीवन की विभिन्न स्थितियों से निपटने की क्षमता के विकास से हैं, शिक्षा द्वारा व्यक्ति में करने के अधिगम के विकास द्वारा व्यक्तिगत सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक क्षेत्रों के विभिन्न कार्यों के सफलतापूर्वक करने की योग्यता के विकास से है | अतः शिक्षा के विभिन्न अवयवों को व्यक्ति में करने के अधिगम अर्थात उद्यमशीलता के विकास पर जोर दिया जाना चाहिए ।

3. इकट्ठा रहने का अधिगम (Learning to live together):- जीवन का अस्तित्व ही समूह में है एकाकी जीवन असंभव है | यदि इकट्टे रहने की कला का विकास शिक्षा द्वारा किया जा सके तो शिक्षा के कई उद्देश्य प्राप्त हो जाते हैं ।

4. बनने का अधिगम (Learn to be):- शिक्षा द्वारा स्वयं के परिष्कार की योग्यता का विकास किया जाना चाहिए, जिससे वह अपने व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों का बेहतर विकास का सके इससे उत्तरदायित्व सहित दूसरे के व्यक्तित्व का सम्मान, शारीरिक विकास, स्मरण शक्ति, तर्क शक्ति, सौन्दर्य बोध आदि का विकास संभव होगा ।

उपरोक्त स्तंभों पर आधारित शिक्षा जीवन पर्यान्त चलने वाली शिक्षा होगी । जिसमें उक्त अधिगम प्रत्यय सम्पूर्ण शिक्षा की कुंजी का कार्य करेंगे । अतः शिक्षा द्वारा प्रत्येक अधिगम से व्यक्ति इस लायक बन सके कि वह समाज द्वारा प्रदान किये गये सभी अवसरों का लाभ उठा सके ।

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