उर्दू साहित्य का इतिहास और उर्दू साहित्य का विकास

आगरा तथा दिल्ली के आस-पास की हिंदी अरबी-फारसी तथा अन्य विदेशी शब्दों के सम्मिश्रण से विकसित हुई है। इसका दूसरा नाम ‘उर्दू’ भी है। मुसलमानी राज्य में यह अंतरप्रांतीय व्यवहार की भाषा थी। 19वीं शताब्दी में ‘हिंदुस्तानी’ का शब्द उर्दू का वाचक बन गया था। इसी को पुराने ‘एंग्लो इंडियन’, मूर भी कहते थे। स्पेन तथा …

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रिपोर्ताज किसे कहते हैं? – अर्थ, परिभाषा

यह गद्य में लेखन की एक विशिष्ट शैली है। रिपोर्ताज से आशय इस तरह की रचनाओं से है जो पाठकों को किसी स्थान, समारोह, प्रतियोगिता, आयोजन अथवा किसी विशेष अवसर का सजीव अनुभव कराती हैं। गद्य में पद्य की सी तरलता और प्रवाह रिपोर्ताज की विशेषता है। अच्छा रिपोर्ताज वह है जो पाठक को विषय की …

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निबंध का अर्थ, परिभाषा, उद्भव और विकास

साहित्य की प्रमुख दो विधाएँ ‘गद्य-पद्य’ हैं। गद्य आधुनिक काल की प्रमुख देन है। गद्य की अनेक विधाओं में निबंध विशेष विधा है। मुद्रण कला के विकास ने पत्र-पत्रिकाओं के प्रचार-प्रसार को अत्यधिक बढ़ा दिया जिसके परिणामस्वरूप निबंध की लोकप्रियता एवं वैविध्य में वृद्धि होती गई। उन्नीसवीं सदी के छठे दशक में भारतेंदु युग में निबंध …

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हिंदी का प्रथम संस्मरण और हिंदी संस्मरण का विकास

हिंदी साहित्य में संस्मरणों का अभाव नहीं है। हिंदी संस्मरण के विकास में सरस्वती, सुधा, माधुरी, चांद तथा विशाल भारत आदि पत्रिकाओं का विशेष योगदान है। हिंदी का प्रथम संस्मरण सन् 1907 ई. में बाबू बाल मुकुंद गुप्त ने पं. प्रतापनारायण मिश्र एक संस्मरण लिखा जिसे हिंदी का प्रथम संस्मरण स्वीकारा गया। कुछ आलोचकों का कहना …

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हिन्दी नाटक उद्भव एवं विकास

नाटक शब्द की व्युत्पत्ति संण् नट् (नाचना) + घ´ से हुई है जिसका अर्थ नच्च, नाच, नृत, नृत्य, नकल या स्वांग होता है। नाटक से पूर्व नट् से नाट शब्द व्युत्पन्न हुआ है। इसलिए नाटक से नाट की व्युत्पत्ति देखी। नाटक शब्द की व्युत्पत्ति नाटक- संण् नट् + ण्वुल् – अक प्रत्यय से नाटक की व्युत्पत्ति हुई …

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हिंदी कहानी का उद्भव एवं विकास

मानव के आदि काल से कहानी कहने, सुनने, सुनाने की प्रवृत्ति चली आ रही है। विश्व के प्राचीनतम ग्रंथों में कहानी का महत्व प्राय: देशों में है। भारतीय वांगमय में वैदिक संस्कृत, लौकिक संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश तथा पुरानी हिंदी में किसी न किसी स्वरूप में कहानी विद्यमान है, इसके अतिरिक्त पुराणों, उपनिषदों, ब्राह्मणों, रामायण, महाभारत, …

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गिरिजाकुमार माथुर का जीवन परिचय एवं साहित्यिक विशेषताएं

गिरिजाकुमार माथुर का जन्म सन् 1918 ई. को मध्य प्रदेश के एक कस्बे में हुआ था। अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. तथा एल.एल.बी. परीक्षा उत्तीर्ण कर वकालत प्रारंभ की। कुछ समय पश्चात दिल्ली सेक्रेटियेट में सेवा की । अंत में आल इंडिया रेडियो में कार्य करने लगे। गिरिजाकुमार माथुर की प्रमुख रचनाएं नाश और निर्माण  धूप के …

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सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का जीवन परिचय, प्रमुख रचनाएं, साहित्यिक विशेषताएं

हिंदी साहित्य क्षेत्र में नए प्रयोग के प्रवर्तक रूप में सर्व परिचित रहे अज्ञेय जी मूलतः एक कवि रह चुके हैं। उनका पूरा नाम सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ है । अज्ञेय का जन्म (7 मार्च 1911-1987 ई.) ग्राम कसया जनपद देवरिया में हुआ था। अज्ञेय के पिता का नाम हीरानंद था।  अज्ञेय जी के पिता पंडित …

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मैक्स वेबर का नौकरशाही सिद्धांत क्या है?

नौकरशाही के बारे में मार्क्स, लेनिन, ट्राटस्की, लौराट, रिजी, वर्नहम, मिलोवन पिलास, मैक्स स्बैकटमैन, जैसिक कुरुन मैक्स वेबर आदि ने अपने अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। इन सभी सिद्धान्तों में वेबर का सिद्धांत अधिक तर्कपूर्ण व व्यवस्थित है। इसी कारण नौकरशाही का व्यवस्थित अध्ययन जर्मनी के समाजशास्त्री मैक्स वेबर से ही प्रारम्भ माना जाता है। …

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द्विसदनीय विधायिका क्या है? || द्विसदनीय विधायिका के पक्ष और विपक्ष में तर्क

द्विसदनीय विधायिका की परम्परा ब्रिटेन की देन है। सबसे पहले ब्रिटेन में संसद के दो सदन विकसित हुए थे। बाद में सभी प्रजातन्त्रीय देशों ने ब्रिटिश प्रतिमान का ही अनुसरण किया है और उनमें द्विसदनीय विधायिकाएं हैं। प्रत्येक देश में निम्न सदन जन साधारण का प्रतिनिधित्व करता है और उच्च सदन जनता के कुछ विशिष्ट वर्गों का …

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