हिंदी साहित्य क्षेत्र में नए प्रयोग के प्रवर्तक रूप में सर्व परिचित रहे अज्ञेय जी मूलतः एक कवि रह चुके हैं। उनका पूरा नाम सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ है । अज्ञेय का जन्म (7 मार्च 1911-1987 ई.) ग्राम कसया जनपद देवरिया में हुआ था। अज्ञेय के पिता का नाम हीरानंद था। अज्ञेय जी के पिता पंडित हीरानन्द वात्स्यायन अपने जमाने के संस्कृत के बड़े विद्वान थे
सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की प्रमुख रचनाएं
1. काव्य- ‘आंगन के पार द्वार’, ‘अरी ओ करुणा प्रभामय’, ‘हरी घास पर क्षण भर’, ‘इन्द्र धनु रौंदे हुए ये’।
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय की साहित्यिक विशेषताएं
कवि हैं। इस धारा के कवियों में इनका काव्य सबसे अधिक वैविध्यपूर्ण है। उनका स्वर अहं – समाज, प्रेम-दर्शन, आदिम
गंध – विज्ञान चेतना, यंत्रा-सभ्यता – लोक परिवेश, यातना – बोध – विद्रोह की ललकार, प्रकृति सौंदर्य – मानव सौंदर्य तक
विस्तृत है। इस व्याप्ति में संवेदनशीलता या अनुभूति सर्वत्रा साथ नहीं देती है। कहीं कहीं कोरा बुद्धिवाद या नीरसता उभर
आती है।
‘तारसप्तक’ की कविताओं के साथ अज्ञेय की नई कविता यात्रा का आरंभ होता है। जो बाद में ‘इत्यलम्’ में संग्रहीत दृष्टिगोचर
होती है। अज्ञेय में संवेदना के साथ सजगता एवं बुद्धिवाद की प्रधानता है। बुद्धिवाद उनकी संवेदना को नियंत्रित करता है साथ
ही कभी सूक्तियों के रूप में कभी व्यंग्य के रूप में, कभी युग चिंतन और युग बोध के बिंब विधान के रूप में व्यक्त होता है
जो संवेदना या अनुभूति से अंतरंग भाव से जुड़ा न होने के कारण बिंब रचना के होते हुए भी बहुत दूर तक प्रभावविहीन हो
जाता है।
रोमानी परंपरा को तोड़कर नए सौंदर्यबोध से सम्पन्न स्वस्थ काव्य की सृष्टि करती है वहीं बुद्धिवादिता का अतिरेक शुष्क, दुरूह
और नव रहस्यवादी कविता को जन्म देता है।
एवं सक्षम हैं – वे चाहे व्यंग्य करती हों, चाहे कोई सौंदर्य का अनुभव जगाती हों, चाहे रूप की अभिव्यक्ति करती हों।