जीभ की संरचना एवं कार्य

जीभ या जिहृा का मुख्य कार्य किसी वस्तु को चखकर उसके स्वाद को ज्ञात करना है क्योंकि स्वाद के रिसेप्टर्स (Receptors) इसी में स्थित होते हैं। स्वाद के कुछ रिसेप्टर्स कोमल तालू (Soft palate), टॉन्सिल्स एवं कंठच्छद (Epiglottis) आदि की म्यूकस मेम्ब्रेन में भी होते हैं। जीभ एक अत्यधिक गतिशील अंग है, जो स्वाद-संवेदन के अतिरिक्त …

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रोगी व्यक्ति के लक्षण

एक रोगी व्यक्ति शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर अपने सामान्य कार्यों को भली- भांति नही कर पाता है अर्थात उस व्यक्ति के शारीरिक कार्य जैसे भोजन का पाचन, श्वसन, उत्र्सजन व रक्त परिभ्रमण आदि कार्य अव्यवस्थित हो जाते हैं। मानसिक स्तर पर उसे निरसता, उदासी, तनाव, क्रोध, र्इष्या, घबराहट एवं बैचेनी आदि उद्वेगों की अनुभूति …

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त्वचा की संरचना तथा कार्य

स्पर्शेन्द्रिय (Sense of touch) का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है, जबकि शरीर की अन्य समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ स्थानीय होती हैं, तथा एक निश्चित क्षेत्र में कार्य करती हैं। स्पर्श के अतिरिक्त ताप, शीत, दाब, पीड़ा, वेदना, हल्का, भारी, सूखा, चिकना आदि संवेदनाओं का ज्ञान इसी के द्वारा होता है। समस्त शरीर की त्वचा में तन्त्रिका तन्तुओं के …

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किशोरावस्था में मानसिक विकास

किशोरावस्था बचपन एवं वयस्कावस्था के बीच की अतिमहत्वपूर्ण अवस्था होती है, एवं प्रत्येक व्यक्ति को इस अवस्था से गुजरना पड़ता है। संज्ञानात्मक विकास के पियाजे द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त की चतुर्थ अवस्था से यह ज्ञात होता है कि किशोरावस्था में किशारों में तर्कपूर्ण विचार करने की क्षमता विकसित हो जाती है। लेकिन किशोर द्वारा विचार करने की …

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नेत्र की संरचना एवं कार्य

आँखों या नेत्रों के द्वारा हमें वस्तु का ‘दुश्टिज्ञान’ होता है। दृष्टि वह संवेदन है, जिस पर मनुष्य सर्वाधिक निर्भर करता है। दृष्टि (Vision) एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें प्रकाश किरणों के प्रति संवेदिता, स्वरूप, दूरी, रंग आदि सभी का प्रत्यक्ष ज्ञान सन्निहित है। आँखें अत्यन्त जटिल ज्ञानेन्द्रियाँ हैं, जो दायीं-बायीं दोनों ओर एक-एक नेत्रकोटरीय गुहा …

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बाल्यावस्था में मानसिक विकास

शैशवावस्था एवं बचपन में मानसिक  विकास मानसिक विकास को संज्ञानात्मक विकास के अध्ययन द्वारा भली प्रकार समझा जा सकता है। तकनीकी रूप में संज्ञानात्मक विकास ही मानसिक विकास है। संप्रत्यय निर्माण, सोचना, तर्क करना, याद रखना, विश्लेषण करना, निर्णय करना यह सब संज्ञानात्मक विकास की ही प्रक्रियाये हैं। इन प्रक्रियाओं को भली प्रकार समझने हेतु मनोवैज्ञानिकों …

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अधिगम असमर्थता के प्रकार एवं कारण

अधिगम विकृति का संबंध सीखने में होने वाली अक्षमता से होता है यह अक्षमता कर्इ प्रकार के कौशलों एवं संज्ञानात्मक विकास से संबंधित हो सकती है। जब किसी बालक को अन्य हमउम्र बालकों की तुलना में पढ़ार्इ लिखार्इ अथवा गणित आदि विषयों में पिछड़ा हुआ पाया जाता है। और उसका यह पिछड़ना सामान्य नहीं होता बल्कि …

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कान या कर्ण की संरचना एवं कार्य

कान या कर्ण शरीर का एक आवश्यक अंग है, जिसका कार्य सुनना (Hearing) एवं शरीर का सन्तुलन (Equilibrium) बनाये रखना है तथा इसी से ध्वनि (Sound) की संज्ञा का ज्ञान होता है। कान की रचना अत्यन्त जटिल होती है, अत: अध्ययन की दृष्टि से इसे  तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जाता है- बाह्य कर्ण (External …

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शारीरिक विकास : शैशवावस्था, बाल्यावस्था तथा किशोरावस्था

मानव जीवन के विकास का अध्ययन विकासात्मक मनोविज्ञान के अन्तर्गत किया जाता है। विकासात्मक मनोविज्ञान मानव के पूरे जीवन भर होने वाले वर्धन, विकास एवं बदलावों का अध्ययन करता है। इसमें शैशवावस्था से लेकर वयस्कावस्था के अंतिम स्तर तक के विकास का अध्ययन सम्मिलित होता है। सारणी में इसे आयु के आधार पर क्रम से प्रदर्शित …

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मानसिक दुर्बलता के कारण एवं प्रकार

‘मानसिक मंदता कासंबंध वर्तमान क्रियाव्यवहार में पर्याप्त कमी से होती हैं इसमें सार्थक रूप से निम्न औसत बौद्धिक क्रिया होती है तथा निम्नांकित उपयुक्त समायोजी कौशल क्षेत्रों में दो या दो से अधिक में संबंधित कमियॉं साथ-साथ होती हैं – संचार, स्वयं की देखभाल, घरेलू जीवन, सामाजिक कुशलता, सामुदायिक उपयोगिता, दिषा-बोध, स्वास्थ्य, सुरक्षा, कार्यात्मक शिक्षा, अवकाश …

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