प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास- प्राकृतिक चिकित्सा उतनी ही पुरानी है जितनी की प्रकृति स्वयं है और उनके आधार भूत तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। प्रकृति के तत्व जिनसें जीवन की उत्पित्त होती है सदैव वही तत्व रोगों को दूर करने में सहायक रहे। प्राचीन काल से ही तीर्थ स्नान पर घूमना, उपवास रखना, …

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रक्त परिसंचरण तंत्र क्या है ?

रक्त परिसंचरण तंत्र शरीर के भीतर जो एक लाल रंग का द्रव-पदार्थ भरा हुआ है, उसी को रक्त (Blood) कहते हैं। रक्त का एक नाम रुधिर भी है रुधिर को जीवन का रस भी कहा जा सकता है। यह संपूर्ण शरीर में निरन्तर भ्रमण करता तथा अंग-प्रत्यंग को पुष्टि प्रदान करता रहता है। जब तक शरीर …

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प्राकृतिक चिकित्सा का अर्थ एवं परिभाषा

प्राकृतिक चिकित्सा का अर्थ- हमारे पूर्वज एवं ऋषि-मुनियों के द्वारा आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व वर्तमान में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से परिचित हो गये थे। इसी कारण उन्होंने विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की खोज की थी जिससे शरीर में रोग के लक्षण न उत्पन्न हो, और यदि किसी भूल के कारण रोग हो जाए तो प्राकृतिक …

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पेशी तंत्र के कार्य, प्रकार एवं शरीर की मुख्य पेशियाँ

अनेकों कोशिकाओं एवं उनके समूह ऊतकों द्वारा ही शरीर के विभिन्न अंगों का निर्माण होता है। इन्हीं कोशिकाओं से ही मांसपेशी की उत्पत्ति होती है। मांसपेशी के प्रत्येक तन्तु में अनेक कोशिकाएं होती है। मनुष्य शरीर का अधिकांश वाह्य व आन्तरिक भाग मांसपेशियेां से ढका रहता है। शरीर का ऊपरी हिस्सा पूर्ण रूपेण मांसाच्छादित होने के …

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पैराथायराइड ग्रंथि की संरचना एवं कार्य

पैराथाइरॉइड ग्रन्थि मसूर के दाने के आकार की चार छोटी-छोटी ग्रन्थियों का समूह है, जिनमें से प्राय: दो-दो थाइरॉइड ग्रन्थि के प्रत्येक खण्ड की पोस्टीरियर (पिछली सतह) में स्थित रहती है। ये लगभग 3-4 मि0मी0 व्यास की होती है और पीले भूरे रंग की होती है। जिन कोशिकाओं से ये बनी होती है, वे spherical होती …

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अस्थियों की रचना, कार्य, प्रकार एवं अस्थियों की संख्या

अस्थि संस्थान का एक परिचय  मानव शरीर का आधारभूत ढाँचा अस्थियों से बना है। शरीर की स्थिरता, आकार, आदि का मूल कारण अस्थियाँ ही है। मूल रूप से अस्थियाँ नियमित रूप से बढ़ने वाली, अपने आकार को नियमिति करने वाली अपने अन्दर होने वाली किसी भी प्रकार की टूट – फूट को ठीक करने में सक्षम है। मनुष्य …

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थायराइड ग्रंथि की संरचना एवं कार्य

थाइरॉइड ग्रन्थि ग्रीवा में श्वास प्रणाल (Trachea) के सामने निचले सर्वाइकल और प्रथम थोरेसिक वर्टिब्रा के स्तर पर स्थित रहती है। यह दो खण्डों में विभक्त रहती है जो लेरिक्स (स्वर यंत्र) और ट्रेकिया (श्वास प्रणाल) के मध्य जोड़ के दोनों तरफ स्थित रहती है। एक सामान्य वयस्क में थाइरॉइड ग्रन्थि का वजन लगभग 25-40 ग्राम …

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ऊतक की रचना एवं क्रिया

समान स्वरूप एवं समान कार्य वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक कहते है। कुछ ऊतक विशेष स्थानों पर पाए जाते हैं और कुछ सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहते है। ऊतकों के समूह मिलकर शरीर के अंगों का निर्माण करते है। उतकों के प्रमुख प्रकार है – उपकलीय तन्त्र ऊतक – यह शरीर के भीतरी और बाहरी …

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एड्रीनल / अधिवृक्क ग्रंथि की संरचना एवं कार्य

हमारे शरीर में दो अधिवृक्क ग्रन्थियाँ होती हैं तथा दोनों गुर्दों की चोटी पर स्थित होती है। यह कनेक्टिव टिश्यू कैप्सूल (connective tissue capsule) से घिरी होती हैं और आंशिक रूप से वसा के एक द्वीप में दबी रहती हैं। अधिवृक्क ग्रन्थि को सुपरारीनल ग्रन्थि (Suprarenal Glands) भी कहा जाता है । एड्रीनल कॉर्टेक्स एड्रीनल मैड्यूला …

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निरोगी व्यक्ति के लक्षण

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार मानव शरीर के सभी तंत्रों का सुव्यवस्थित रुप में अपने कार्यों को करना एक शारीरिक निरोगी व्यक्ति के लक्षण है अर्थात वह व्यक्ति जिसके शरीर के सभी तंत्र अपने कार्यों को भलि भांति सम्पादित कर रहे हैं, एक शारीरिक निरोगी व्यक्ति है। इसके साथ- साथ कुछ निम्न लिखित लक्षणों को भी …

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