जॉन लॉक की प्राकृतिक अवस्था की अवधारणा

जॉन लॉक की प्राकृतिक अवस्था की अवधारणा  हॉब्स की तरह जॉन लॉक भी अपने राजनीति दर्शन का प्रारम्भ प्राकृतिक अवस्था से करता है। जॉन लॉक की प्राकृतिक अवस्था की अवधारणा हॉब्स की प्राकृतिक दशा की धारणा से बिल्कुल विपरीत है। जॉन लॉक का विश्वास है कि मनुष्य एक बुद्धियुक्त प्राणी है और वह नैतिक अवस्था को …

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द्विवेदी युग के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएं

द्विवेदी युग के प्रमुख कवि आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मैथिली शरण गुप्त, पं. रामचरित उपाध्याय, पं. लोचन प्रसाद पांडेय, राय देवी प्रसाद ‘पूर्ण’, पं. नाथू राम शर्मा, पं. गया प्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, पं. राम नरेश त्रिपाठी, लाला भगवानदीन ‘दीन’ पं. रूप नारायण पांडेय, पं. सत्य नारायण ‘कविरत्न’, वियोगी हरि, अयोध्या सिंह उपाध्याय, गिरिधर शर्मा ‘नवरत्न’, सैयद …

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लोक अदालत क्या है? What is Lok Adalat?

लोक अदालतें वर्ष 1976 में 42वें संशोधन के द्वारा भारत के संविधान में अनुच्छेद 39 क जोड़ा गया।’’ जिसके द्वारा शासन से अपेक्षा की गई कि वह सुनिश्चित करें कि भारत को कोई भी नागरिक, आर्थिक या किसी अन्य अक्षमताओं के कारण न्याय पाने से वंचित न रह जाए। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए सबसे …

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जॉन लॉक का सामाजिक समझौता सिद्धांत

जॉन लॉक का सामाजिक समझौता सिद्धांत लॉज के राजनीतिक चिन्तन का सर्वाधिक प्रमुख भाग सामाजिक समझौता सिद्धांत है जिसके द्वारा लॉक ने इंगलैण्ड में हुई 1688 की गौरवपूर्ण क्रान्ति के औचित्य को ठीक ठहराया है। सामाजिक समझौता सिद्धांत सबसे पहले हॉब्स ने प्रतिपादित किया, परन्तु लॉक ने उसे उदारवादी आधार प्रदान करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका …

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पंडित बालकृष्ण भट्ट का जीवन परिचय, रचित नाटक, साहित्यिक विशेषताएँ

पंडित बाल कृष्ण भट्ट (सन् 1844 – 1914 ई0) भारतेंदु मंडल के साहित्यकारों में प्रमुख रहे हैं। संवत् 1933 वि. में पंडित बाल कृष्ण भट्ट ने गद्य साहित्य का मार्ग प्रशस्त करने हेतु हिन्दी प्रदीप का संपादन प्रारंभ किया। सामाजिक, साहित्यिक, राजनीतिक एवं नैतिक आदि विभिन्न विषयों पर लिखे गए लघु निबंधों – जिनकी संख्या लगभग …

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जनहित याचिका क्या होती है? जनहित याचिका का मानव जीवन पर प्रभाव?

भारत में जनहित याचिका की शुरूआत भांगलपुर बिहार की जेल में बंदी रखे गये विचाराधीन कैदियों के मामले से हुई। भारत में लोकहित वाद शुरू करने का श्रेय उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश पी0एन0भगवती तथा न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर को जाता है।  पी0एन0 भगवती ने इसका उल्लेख निम्न प्रकार से किया- यदि कोई व्यक्ति या समाज का वर्ग …

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बेंथम के राजनीतिक विचार

इतिहास में यह एक विवादास्पद मुद्दा रहा है कि क्या बेंथम को एक राजनीतिक दार्शनिक माना जाए या नहीं। कई लेखक उसको राजनीतिक दार्शनिक की बजाय एक राजनीतिक सुधारक मानते हैं। उनके अनुसार बेंथम का ध्येय किसी राजनीतिक सिद्धान्त का प्रतिपादन करना नहीं था बल्कि अपने सुधारवादी कार्यक्रम की पृष्ठभूमि के लिए राज्य के सम्बन्ध में …

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प्रताप नारायण मिश्र की प्रमुख रचनाएं और साहित्यिक विशेषताएं

प्रतापनारायण मिश्र का जन्म २४ सितम्बर १९५६ को इन्नाव, उत्तर प्रदेश में हुआ था । इनके पिता ज्योतिषी थे, इनके पिता भी इन्हें ज्योतिष बनाना चाहते थे, किन्तु इनका मन पढ़ाई में अधिक लग रहा था । इन्होंने अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, संस्कृत, हिन्दी और बंगला भाषा पर प्रभुत्व प्राप्त कर लिया था । प्रतापनारायण मिश्र प्रतिभा …

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सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार क्या है ?

सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार  भारत का सर्वोच्च न्यायालय विश्व के सर्वाधिक शक्तिशाली न्यायालयों में से एक है लेकिन वह संविधान द्वारा तय की गई सीमा के अंदर ही कार्य करता है इस आधार पर सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार हैं-  सर्वोच्च न्यायालय के मूल क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय के अपीलीय क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय के रिट/आदेश संबंधी क्षेत्राधिकार सर्वोच्च न्यायालय के सलाह सम्बन्धी …

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बेन्थम उपयोगितावाद का सिद्धांत, #जेरेमी बेन्थम

बेन्थम के उपयोगितावाद का सिद्धांत बेंथम की सबसे महत्त्वपूर्ण एवं अमूल्य देन है। उसके अन्य सभी राजनीतिक विचार उसके उपयोगितावाद पर ही आधारित हैं। लेकिन उसे इसका प्रवर्तक नहीं माना जा सकता। रोचक बात यह है कि बेंथम ने कहीं भी उपयोगितावाद शब्द का प्रयोग नहीं किया।  बेन्थम के उपयोगितावाद का सिद्धांत बेंथम के उपयोगितावादी दर्शन …

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