अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या

आधुनिक राज्य कल्याणकारी राज्य है जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों का अधिकतम कल्याण करना है। सरकार की राजकोशीय व बजटीय गतिविधियां संपूर्ण अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित करती है। इसलिए सार्वजनिक वित्त लगाते समय सार्वजनिक वित्त के कार्यों के लिए कुछ ऐसे कारक स्थापित किए जाए जिससे अधिकतम सामाजिक कल्याण प्राप्त किया जा सके। इसी कारण इस सिद्धांत …

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सार्वजनिक व्यय क्या है सार्वजनिक व्यय के महत्वपूर्ण सिद्धांत क्या है?

सार्वजनिक व्यय सार्वजनिक प्राधिकरणों अर्थात् केंन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा स्थानीय निकायों द्वारा किए जाने वाले उस व्यय से है जिन्हें वे लोगों की उन सामूहिक आवश्यकताओं की संतुष्टि हेतु करते हैं, जिन्हें लोग व्यक्तिगत रूप से संतुष्टि नहीं कर सकते। ये व्यय नागरिकों की सुरक्षा तथा उनके कल्याण को प्रोत्साहित करने के लिए होते हैं। …

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से का बाजार नियम क्या है? ‘से’ के बाजार नियम की मान्यताएं और आलोचना

जे.बी। से ने अपनी पुस्तक ‘ट्रेट डी एकनोमिक पोल्टिक’ (Traite d’ Economic Politique) में बाजार सम्बन्धी जिस संक्षिप्त नियम का प्रतिपादन किया उसी नियम को ‘से’ के बाजार नियम कहा जाता है। ‘से’ के बाजार नियम के अनुसार, “पूर्ति अपनी मांग का स्वयं निर्माण करती है।” (Supply creates its own demand.) ‘से’ के अनुसार जिस अनुपात …

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रोजगार का परम्परावादी सिद्धांत का अर्थ, परिभाषा, मान्यताएं, आलोचनाएं

रोजगार का परंपरावादी सिद्धांत के अनुसार पूर्ण रोजगार एक ऐसी स्थिति है जिसमें उन सब लोगों को रोजगार मिल जाता है जो प्रचलित मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं। यह अर्थव्यवस्था की एक ऐसी स्थिति है जिसमें अनैच्छिक बेरोजगारी नहीं पाई जाती। रोजगार का परंपरावादी सिद्धांत का अर्थ व परिभाषा रोजगार का परंपरावादी सिद्धांत विभिन्न …

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कीन्स के रोजगार सिद्धांत की व्याख्या। इस सिद्धांत की क्या आलोचनाएं है?

कीन्स ने अपने रोजगार सिद्धांत को अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘The General Theory of Employment, Interest and Money (1936) में प्रतिपादित किया है। कीन्स के अनुसार पूर्ण रोजगार की स्थिति एक पूंजीवादी विकसित अर्थव्यवस्था की सामान्य नहीं स्थिति है। वास्तव में, प्रत्येक अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी पाई जाती है। कीन्स के अनुसार बेरोजगारी का मुख्य कारण प्रभावपूर्ण मांग …

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उपभोग फलन किसे कहते हैं? उपभोग प्रवृत्ति को प्रभावित करने वाले तत्वों की व्याख्या

किसी अर्थव्यवस्था में उपभोग पर किये जाने वाले कुल व्यय को उपभोग व्यय कहा जाता है। कुल आय में से लोग अपनी आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष सन्तुश्टि के लिए वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए जो राशि खर्च करते है उसे कुल उपभोग व्यय या उपभोग कहते है। उपभोग और आय में पाए जाने वाले सम्बन्ध …

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प्रबंध के सिद्धांत की प्रकृति एवं महत्व

प्रबंध के सिद्धांत प्रबंध के सिद्धांत आधारभूत सत्य का कथन होते हैं जो प्रबंधकीय निर्णय एवं कार्यों हेतु मार्गदर्शन करते हैं। ये उन घटनाओं के अवलोकन एवं विश्लेषण के आधार पर बनाये जाते हैं निका प्रबंधकों द्वारा वास्तविक कार्य व्यवहार में सामना किया जाता है। ये मानवीय व्यवहारों से सम्बन्धित होते हैं अत: ये विज्ञान के …

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टेलर का वैज्ञानिक प्रबंध के सिद्धांत

एफ. डब्लू. टेलर (1856-1915) मिडवेल स्टील वक्र्स में कम समय में ही एक मशीनमैन से मुख्य अभियन्ता के पद तक पहुँचे (1878-1884)। उन्होंने यह जाना कि कर्मचारी अपनी क्षमता से कम कार्य कर रहे हैं तथा दोनों पक्षों प्रबंधकों एवं श्रमिकों की एक-दूसरे के प्रति नकारात्मक सोच है। इसलिए विभिन्न प्रयोगों के आधार पर उन्होंने ‘‘वैज्ञानिक …

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मुद्रास्फीति के कौन से कारण है तथा इसको कैसे नियंत्रित कर सकते है?

मुद्रा स्फीति का अर्थ यह होता है कि जब किसी अर्थव्यवस्था में सामान्य कीमत स्तर लगातार बढ़े और मुद्रा का मूल्य कम हो जाए। अगर अर्थव्यवस्था में कीमत कुछ समय के लिए बढ़ती है और फिर कम हो जाती है और फिर दुबारा बढ़ती है तो हम इसे मुद्रास्फीति नहीं कहेगें। मुद्रास्फीति में तो सामान्य कीमत …

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व्यापार चक्र की सामान्य अवस्थाएं

कसी भी देश में आर्थिक क्रियाकलापों में उतार-चढ़ाव आते ही रहते है – जहाँ कुछ अवधियों में संवृद्धि दर ऊंची होती है, वहीं कुछ अन्य अवधियों में यह गिर जाती है। यह आमतौर पर देखा जाता है कि ऊंची और नीची संवृद्धि दरों के बारी-बारी से अनेक दौर होते हैं। संवृद्धि के ऐसे ही दौर ‘व्यापार चक्र‘ कहलाते …

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