यूरोप में धर्म सुधार आंदोलन के कारण

महात्मा ईसा द्वारा संस्थापित ईसाई धर्म के विभाजन की कहानी बहुत पुरानी है। उनकी मृत्यु के तीन-चार सौ वर्षों के बाद ही ईसाई धर्म दो शाखाओं-रोमन कैथोलिक चर्च और ग्रीक ओर्थोडक्स चर्च में विभाजित हो गया था। यूरोप में रूस तथा बाल्कन क्षेत्र के अलावा अन्य सभी राज्यों में रोमन कैथोलिक चर्च का वर्चस्व कायम रहा। उसका …

Read more

यूरोप में पुनर्जागरण के इन कारणों को इसके लिए उत्तरदायी माना जा सकता है –

पुनर्जागरण एक फ़्रेंच शब्द (रेनेसां) है, पुनर्जागरण का शाब्दिक अर्थ है – ‘फिर से जागना’। इसे ‘नया जन्म’ अथवा ‘पुनर्जन्म’ भी कह सकते हैं। परन्तु व्यावहारिक दृष्टि से इसे मानव समाज की बौद्धिक चेतना और तर्कशक्ति का पुनर्जन्म कहना ज्यादा उचित होगा। प्राचीन यूनान और रोमन युग में यूरोप में सांस्कृतिक मूल्यों का उत्कर्ष हुआ था। …

Read more

यूरोप में सामंतवाद के पतन के कारणों की विवेचना

सामंतवाद एक ऐसी मध्ययुगीन प्रशासकीय प्रणाली और सामाजिक व्यवस्था थी, जिसमें स्थानीय शासक उन शक्तियों और अधिकारों का उपयोग करते थे जो सम्राट, राजा अथवा किसी केन्द्रीय शक्ति को प्राप्त होते हैं। सामाजिक दृष्टि से समाज प्रमुखता दो वर्गों में विभक्त था- सत्ता ओर अधिकारों से युक्त राजा और उसके सामंत तथा अधिकारों से वंचित कृषक …

Read more

इतिहास का अर्थ, परिभाषा, विषय क्षेत्र, अध्ययन का महत्व

इतिहास न केवल भूतकाल से सम्बन्धित है वर्तमान और भविष्य से भी इसका सम्बन्ध है। अतीत (भूतकाल) की घटनाओं से हम वर्तमान में प्रेरणा लेकर भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं या भविष्य के प्रति सजग रहते हैं। इतिहास पृथ्वी के धरातल पर घटित सभी घटनाओं का द्योतक है जो चाहे राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक अथवा …

Read more

उपनिषदों की संख्या प्रमुख उपनिषदों का परिचय

उपनिषद् शब्द ‘उप’ एवं ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक सद् (सदृलृ) धातु में ‘क्विप्’ प्रत्यय लगकर बनता है, जिसका अर्थ होता है ‘समीप में बैठना’ अर्थात् गुरु के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करना। धातुपाठ में सद् (सद्लृ) धातु के तीन अर्थ निर्दिष्ट हैं – विशरण, (विनाश होना), गति (प्रगति), अवसादन (शिथिल होना)। इस प्रकार जो विद्या समस्त अनर्थों …

Read more

अथर्ववेद का अर्थ, स्वरूप, शाखाएं

‘अथर्व’ शब्द का अर्थ है अकुटिलता तथा अंहिसा वृत्ति से मन की स्थिरता प्राप्त करने वाला व्यक्ति। इस व्युत्पत्ति की पुष्टि में योग के प्रतिपादक अनेक प्रसंग स्वयं इस वेद में मिलते है। होता वेद आदि नामों की तुलना पर ब्रह्मकर्म के प्रतिपादक होने से अथर्ववेद ‘ब्रह्मवेद’ कहलाता है ब्रह्मवेद नाम का यही मुख्य कारण है।  …

Read more

सामवेद की सम्पूर्ण जानकारी/ Complete details about samveda

अथर्ववेद के अनेक स्थलों पर साम की विशिष्ट स्तुति ही नहीं की गई है, प्रत्युत परमात्मभूत ‘उच्छिष्ट’ (परब्रह्म) तथा ‘स्कम्भ’ से इसके आविर्भाव का भी उल्लेख किया गया मिलता है। एक ऋषि पूछ रहा है जिस स्कम्भ के साम लोभ हैं वह स्कम्भ कौन सा है? दूसरे मन्त्र में ऋक् साथ साम का भी आविर्भाव ‘उच्छिकष्ट’ …

Read more

यजुर्वेद की शाखाएं एवं भेद

यजुर्वेद की शाखाएं काण्यसंहिता कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता  मैत्रात्रणी संहिता  1. काण्यसंहिता-  शुक्ल यजुर्वेद की प्रधान शाखायें माध्यन्दिन तथा काण्व है। काण्व शाखा का प्रचार आज कल महाराष्ट्र प्रान् तमें ही है और माध्यन्दिन शाखा का उतर भारत में, परन्तु प्राचीन काल में काण्य शाखा का अपना प्रदेश उत्तर भारत ही था, क्योंकि एक मन्त्र में …

Read more

गीता का दार्शनिक तत्वविवेचन की दृष्टि से महत्व

श्रीमदभगवदगीता विश्व के सबसे बडे महाकाव्य महाभारत के “भीष्मपर्व” का एक अंश है। भगवदगीता भगवान कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र युद्ध में दिया गया दिव्य उपदेश है जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर किंकर्तव्यविमूढ़ कि स्थिति में पहुंच चुके थे। इस प्रकार अर्जुन को केन्द्र में रखकर दिया गया यह भगवान का गीता अमृत रूपी वाणी से समन्वित उपदेश है। …

Read more

श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय || Bhagavad Gita ka parichay

गीता संस्कृत साहित्य काल में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व का अमूल्य ग्रन्थ है। यह भगवान श्री कृष्ण के मुखारबिन्द से निकली दिव्य वाणी है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसके संकलन कर्ता महर्षि वेद ब्यास को माना जाता है। आज गीता का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। गीता में …

Read more