वित्त के स्रोत

किसी भी संगठन में वित्त के साधनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है जिसके आधार पर एक संगठन अथवा संस्था का जन्म होता है। दीर्घकालीन, मध्यकालीन एवं अल्पकालीन वित्त के साधन संगठन के जीवन क्रम में अपरिहार्य है। प्रस्तुत इकार्इ में इनकी क्रमानुसार व्याख्या की गर्इ है जो एक कम्पनी के जीवन चक्र को निश्चित करते हैं …

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पूंजी बजटन क्या है ?

पूंजी बजटन का आशय के विभिन्न स्त्रोतों से पूंजी प्राप्त करने केलिए बजट बनाने से नहीं है, बल्कि यह एक विनियोजन निर्णय है। इसलिए कि पूंजी बजटन पूंजी के दीर्घकालीन नियोजन से सम्बन्धित एक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत पूंजीगत विनियोग की भावी लाभोत्पादकता का अध्ययन करना, उसकी पूंजी लागत की गणना करके अर्जन और लागत की …

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जोखिम एवं आय विश्लेषण

जोखिम एवं आय की प्रारम्भिक विचारधारा यह है कि आधुनिक व्यवसाय में आय का सम्बन्ध जोखिम से सम्बन्धित है। वर्तमान समय में व्यवसाय में लाभ कमाना जोखिम के ऊपर निर्भर करता है। जिस व्यवसाय या पेशें में जितना अधिक जोखिम होता है, उस व्यवसाय एवं पेशा में उतना अन्धिाक लाभ की सम्भावना अधिक होती है। किसी …

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जातिवाद क्या है ?

वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग रही है। जिसने सामाजिक और राजनीतिक जीवन के सभी पक्षो को प्रभावित किया है। वर्तमान युग में भी व्यक्ति की जाति जन्म से ही निर्धारित होती है न कि कर्म से। इस प्रकार प्राचीन वर्ण व्यवस्था की विकृति के परिणामस्वरूप उत्पन्न हुर्इ जाति व्यवस्था ने ही जातिवाद को …

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अधीनस्थ न्यायालय क्या है ?

भारत के प्रत्येक जिले में उच्च न्यायालय के नीचे अधीनस्थ या निम्नस्तरीय न्यायालय है। अधीनस्थ न्यायालय तीन श्रेणीयो के होते है। इनमें क्रमश: दीवानी आपराधिक एवं राजस्व सबंधीं मामलो की सुनवार्इ होती है। 1. दीवानी न्यायालय –  दीवानी न्यायालय माल संबंधी मुकदमों की सुनवार्इ करते है और उन पर अपना निर्णय देते है। दीवानी न्यायालयों की  …

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उच्च न्यायालय का गठन, कार्य एवं शक्तियाँ

‘‘भारतीय संविधान के अन्तर्गत एकीकृत न्याय व्यवस्था अपनाये जाने के कारण राज्यो के उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय के अधीन है। संयुक्त राज्य अमेरिका के समान भारत में दो प्रकार की न्याय व्यवस्था नही है। सर्वोच्च न्यायालय से नीचे राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय सबसे बडी इकार्इ होती हैं। ये उच्च न्यायालय भारतीय न्यायिक प्रणाली का एक …

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सर्वोच्च न्यायालय का गठन, कार्य व शक्तियाँ

‘‘कोर्इ भी समाज बिना विधायी व्यवस्था के रह सकता है यह बात तो समझ में आ एकता है, परन्तु किसी ऐसे समय राज्य की कल्पना नहीं की जा सकती, जिसमें न्यायापालिका या न्यायाधिकरण की कोर्इ व्यवस्था न हो ।’’ भारत का सर्वोच्च न्यायालय देश का उच्चतम् न्यायालय है, यह भारतीय न्याय व्यवस्था की शीर्षक संख्या है। …

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स्थानीय स्वशासन क्या है ?

‘‘स्थानीय स्वशासन एक ऐसा शासन है, जो अपने सीमित क्षेत्र में प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करता हो।’’ भारत एक विशाल जनसंख्या वाला लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र की मूल भूत मान्यता है कि सर्वोच्च शक्ति जनता में होनी चाहिए । सभी ब्यिकृ इस व्यवस्था से प्रत्यक्षत: जुडंकर शासन कार्य से सम्बद्ध हो सकें इस प्रकार का अवसर …

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भारतीय संघ व्यवस्था में आपातकालीन प्रावधान (व्यवस्था)

आपातकालीन प्रावधान (व्यवस्था)  भारतीय संविधान द्वारा आकस्मिक आपातो तथा संकटकालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए राष्ट्रपति को अपरिमित शक्तियां दी गयी हैं। संविधान के अनुच्छेद 352 से 360 तक तीनप्रकार के संकटों का अनुमान किया गया है 1. युद्ध बाह्य आक्रमण या आंतरिक संकट –  संविधान के अनुच्छेद 352 में लिखा है कि यदि राष्ट्रपति …

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भारतीय संघ व्यवस्था में केन्द्र राज्य संबंध

भारतीय संघ व्यवस्था में केन्द्र राज्य संबंध – केन्द्र एवं राज्यों के बीच सरकारों के बीच सामन्जस्य पूर्ण संबंधों की स्थापना करने वाली संघ प्रणाली को सहकारी संघवाद की संज्ञा दी जाती है। दोनों ही सरकारों की एक दूसरों पर निर्भरिता इस व्यवस्था का मुख्य लक्षण होता है। भारत से संविधान ने केन्द्र तथा राज्यों के …

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