1885 का तृतीय सुधार अधिनियम की विशेषताएं, महत्व एवं समीक्षा

इंग्लैंड में सन् 1884 में तृतीय सुधार अधिनियम को पारित किया गया। इसमें दो
अधिनियम मुख्य थे – 1. मताधिकार अधिनियम 2. स्थान पुनर्वितरण अधिनियम। 1867 में जो
द्वितीय सुधार अधिनियम पारित किया गया था। उसके अनुसार इंग्लैंड की जनसंख्या में 12
व्यक्तियों में से एक व्यक्ति को मताधिकार प्राप्त हुआ था। इस प्रकार अब भी 11 व्यक्ति ऐसे
थे जिनको मताधिकार प्राप्त नहीं था। ग्लेडस्टन ने इसमें सुधार कर मताधिकार का विस्तार
करने के लिए मताधिकार विधेयक को संसद के समक्ष पारित होने के लिए प्रस्तुत किया।
फलस्वरूप 1884 में मताधिकार-अधिनियम और 1885 में स्थान पुनर्वितरण अधिनियम को पारित
किया गया।

1885 का तृतीय सुधार अधिनियम की विशेषताएं 

तृतीय सुधार अधिनियम की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित थीं – 
  1. बौरों और काउन्टियों को मताधिकार का समान अधिकार। 
  2. दोनों स्थानों के मकान मालिकों और 10 पौंड वार्षिक किराया देने वालों को मताधिकार। 
  3. 50,000 से 1,65,000 तक की जनसंख्या वाले बौरों को दो प्रतिनिधि निर्वाचित करने का
    अधिकार। 
  4. 1,65,000 से अधिक जनसंख्या वाले बौरों को प्रति 50,000 पर एक और प्रतिनिधि भेजने
    का अधिकार। 
  5. निर्वाचन-क्षेत्रों का एक सदस्य के आधार पर विभाजन। 
  6. बड़े नगरों के प्रतिनिधियों की संख्या में वृद्धि होने के कारण लंदन को 22 के स्थान पर
    62 प्रतिनिधि को भेजने का अधिकार मिलना।
  7. काॅमन्स-सभा के कुल सदस्यों की संख्या में वृद्धि करके 670 कर दी गयी, जब कि इसके
    पूर्व 658 सदस्य ही होते थे।

1885 का तृतीय सुधार अधिनियम का महत्व एवं समीक्षा 

तृतीय सुधार अधिनियम 1885 ई. बहुत महत्वपूर्ण था; क्योंकि इसके द्वारा निर्वाचन-पद्धति
के आधार को व्यापक रूप देकर और भी प्रजातांत्रिक बनाने का प्रयास किया गया। इसके महत्व
पर प्रकाश डालते हुए इतिहासकार रेम्जे म्योर ने लिखा है कि 1884 का अधिनियम सबसे
अधिक महत्वपूर्ण था; क्योंकि इसने प्रजातंत्र को लगभग स्थापित कर दिया। वास्तव में इसने
प्रत्येक गृहस्वामी को मताधिकार प्रदान कर दिया और खेतों में काम करने वाले मजदूरों को
प्रथम बार राजनैतिक शक्तियों से सम्पन्न किया।

ग्लेडस्टन का द्वितीय प्रशासन उसके प्रथम प्रशासन से बहुत भिन्न था अपने द्वितीय
प्रशासन में उसने सुधार संबंधी बहुत से कार्य किये पर उसकी विदेश नीति और आयरिश नीति
की असफलता के कारण जनता ने उसके कार्यों को कोई महत्व नहीं दिया। फिर भी यह
स्वीकार करना होगा कि उसने इंग्लैंड के चर्च को न मानने वालों, भूमि शिकार अधिनियम और
कृषि भूमि अधिनियम के द्वारा कृषकों को और मालिक-उत्तरदायित्व अधिनियम द्वारा मजदूरों
को प्रसन्न और संतुष्ट किया। इसके अतिरिक्त तृतीय सुधार अधिनियम द्वारा इंग्लैंड के
प्रजातांत्रिक आधार को और अधिक सुदृढ़ बनाया। उसके इन सब महान कार्यों पर उसकी
विदेश नीति और आयरलैंड में उसकी असफलताओं ने पानी फेर दिया। इसलिए ग्लेडस्टन के
द्वितीय प्रशासन की अपेक्षा प्रथम प्रशासन को महत्वपूर्ण माना जाता है। इसकी पुष्टि ट्रेवेलियन
के विचारों से की जा सकती है।

ट्रेवेलियन के मतानुसार – ‘‘ग्लेडस्टन का द्वितीय मंत्रिमंडल
उतना सफल नहीं हुआ जितना कि प्रथम मंत्रिमंडल। 1868 के समान 1880 के उदार दल का
न तो अपना स्वयं का कोई राजनैतिक दर्शन था और न सम्मिलित राजनैतिक कार्यक्रम।’’

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