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स्ट्राबेरी (Strawberry) स्वादिष्ट, लाल गुलाबी, पौष्टिक फल है।
इसका वानस्पतिक नाम फ्रेगेरिया अनानासा (Fragria ananassa) है। स्ट्राॅबेरी के वर्तमान किस्मों का विकास दो जंगली
प्रजातियों चिलियोनसिस (Fragaria Chilionensis) एवं फ्रेगेरिया वर्जियाना (Fragria vergiana) के संकरण से हुआ है। इसका पौधा छोटा, कोमल होता
है जिसमे तना बहुत ही छोटा तथा पूर्ण का तना विकसित त्रिपत्री पत्तियाॅ होती है। स्ट्राबेरी के प्रमुख
उत्पादक देश हैं उत्तर अमेरिका, यूरोपीय देश, दक्षिण अमेरिका, कनाडा, जापान आदि। कुल उत्पादन का लगभग 30% फल उत्तर अमेरिका में होता है। भारत मे इसकी पारम्परिक खेती मुख्यतः ठंड े प्रदेशों जगहों जैसे उत्तरांचल के
नैनीताल, देहरादून, हिमाचल में सोलन, शिमला, कुल्लू, जम्मू कश्मीर में श्रीनगर, जम्मू, पश्चिम बंगाल में कलिंमपोंग,
दार्जिलींग, आदि जगहों पर की जाती रही है।
1.1% रेशा, 1.8% काबर्¨हाइड्रेट, 0.3% कैल्सियम, 1.8% आयरन पाया जाता है। इसके अलावा इसमें लगभग
40-50 मि० ग्रा० विटामिन सी० तथा लगभग 30 कैलोरी उर्जा प्राप्त होती है। स्ट्राॅबेरी का उपयोग जैम, जेली,
केंडी, आइसक्रीम, केक तथा कई प्रकार के पेय बनाने में किया जाता है।
स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए जलवायु तथा मिट्टी
दिनों तक 8 घंटे से कम सूर्य की रोशनी प्राप्त होना आवश्यक है। स्ट्राॅबेरी फल उत्पादन हेतु तापक्रम
15-35 डिग्री से० ग्रे० है। 14 से 18 डिग्री से० ग्रे० तापमान होना चाहिए।
जीवाशयुक्त हल्की दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी की समुचित सुविधा है तथा जिसका पी० एच० मान 5.5
से 6.5 के मध्य है स्ट्राॅबेरी की खेती के लिए उत्तम मानी जाती है।
स्ट्रॉबेरी की प्रमुख किस्में
स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए उवर्रक एवं खाद
दर से सम्पूर्ण सफल चक्र में दी जानी चाहिए। यह उवर्रक फर्टिगेशन विधि द्वारा 15 दिनों के अन्तराल 4-5 भागों
में बांट कर दी जानी चाहिए। मल्टीप्लेक्स तथा मल्टी- पोटाश का छिड़काव भी 15 दिनों के अंतराल पर करना
चाहिए। इसके फलन अच्छा होता है तथा फलो की गुणवत्ता कायम रहती है। फल लगने के उपरान्त कैल्शियम
नाइट्रेट का छिड़काव प्रति सप्ताह 2 किलो प्रति एकड़ की दर की से की जानी चाहिए जिससे अच्छी गुणवता वाले
फल आ सकें।
स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए सिंचाई
सिंचाई पौधे लगाने के तुरन्त बाद की जानी चाहिए। उसके उपरान्त 3-4 दिनों के अन्तराल पर सिंचाई करनी
चाहिए।उचित सिंचाई से फल बड़ा तथा रसीला होता है। सूक्ष्म तत्व की कमी होने पर माईक्रोन्यूट्रीयेन्ट का छिड़काव
करना आवश्यक है।
स्ट्रॉबेरी के प्रमुख व्याधि एवं कीट
लाही के नियंत्रण के लिए मेटासिस्टाॅक्स, थ्रिप्स के नियंत्रण के लिए इमिडाक्लोरोप्रिड, माइट के नियंत्रण के लिए तथा
पत्र छेदक कीट के लिए मेथोमाइल का छिड़काव किया जाना चाहिए। ध्यान रहे कि फलन अवस्था में किसी तरह का
छिड़काव न करें।
स्ट्राॅबेरी में लगने वाली प्रमुख व्याधियाँ है गे्र मोल्ड, एन्थ्रेकनोज, पत्र धब्बा एवं उकठा रोग। इसमें से उकठा रोग
एवं एन्थ्रेक नोज इसे काफी नुकसान पहुंचाते है। व्याधियों का ससमय उपयुक्त नियंत्रण किया जाना चाहिए अन्यथा
उपज एवं फल की गुणवत्ता में काफी गिरावट आती है। उकठा रोग अत्यधिक प्रकोप से बचने के लिए नई भूमि का
चयन किया जाना चाहिए जिसमें पूर्व में उसके जीवाणु न हो।