संप्रेषण किसे कहते हैं | संप्रेषण के प्रकार

संप्रेषण
दो या दो से अधिक व्यक्तियों के मध्य शब्द, संकेत, हावभाव तथा व्यवहार के द्वारा अपने विचार,
तथ्यों, सूचना तथा प्रभावों का आदान-प्रदान को संप्रेषण कहते है।

संप्रेषण वह प्रक्रिया है जो संकेतों को व्यवस्थित, चयनित तथा प्रसारित करके ग्रहणकर्ता के लिए संदेश को
अर्थपूर्ण बनाता है। संप्रेषण शब्द अंग्रेजी के कम्यूनिकेशन का हिन्दी पर्यायवाची शब्द है। इस शब्द की
उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द कम्यूनिस से हुई। कम्यूनिस शब्द का अभिप्राय है कॉमन या सामान्य। 

सरल
भाषा में संप्रेषण का अर्थ है – परस्पर सूचनाओं तथा विचारों का सामान्य आदान-प्रदान करना। संप्रेषण इस प्रकार का होना चाहिए कि संचार प्राप्त करने वाला व्यक्ति उसके अर्थ एवं मनोभावों
को समझ सके। 

संप्रेषण के प्रकार

संप्रेषण को प्रमुख रूप से दो भागों में बांटा गया है – 
  1. शाब्दिक संप्रेषण 
  2. अशाब्दिक संप्रेषण

1. शाब्दिक संप्रेषण

जब कोई संप्रेषण केवल शब्दों के माध्यम से दिया जाता है तो इसे शाब्दिक संप्रेषण कहते
हैं। शाब्दिक संप्रेषण भी दो प्रकार का होता है – 

अ) मौखिक शाब्दिक संप्रेषण – मौखिक संप्रेषण आमने-सामने, टेलीफोन पर वीडियो कॉन्फे्रन्स के
द्वारा, सूचना प्रसारण यंत्रों द्वारा, सम्मेलन, गोष्ठियों आदि द्वारा भी दिया जा सकता है।


ब) शाब्दिक लिखित संप्रेषण –
इस प्रकार के संप्रेषण के सन्देश लिखित शाब्दिक रूप से होता है।

इसमें सन्देश ग्रहण करने वाला तथा सन्देश दाता का आपने सामने होना कोई आवश्यक नहीं होता
लेकिन सन्देशों को ग्रहण करने वाला आसानी से समझना चाहिए अर्थात् सन्देशों की भाषा सरल
होनी चाहिए।

2. अशाब्दिक संप्रेषण

इस प्रकार के संप्रेषण में संदेश में शब्दों का उपयोग न करके सन्देश वाणी संकेत, चक्षु,
मुख मुद्राओं, स्पर्श संकेतों आदि के द्वारा किया जाता है, लेकिन यह ध्यान रखा जाता है कि सन्देश ग्रहण
करने वाला उपरोक्त सभी संकेतों को आसानी से समझ सके।


अ) मौखिक अशाब्दिक संप्रेषण –
वाणी अशाब्दिक संप्रेषण में वाणी के द्वारा ऐसे संकेत दिए जाते हैं जिनमें
कोई शब्दों का उपयोग नहीं किया जाता है लेि कन उन अशाब्दिक संकेतों के द्वारा ग्रहण करने वाला
अनुक्रिया करता है जैसे – हां, हूं,उंहूं, चीखना, ठहाके लगाना आदि का वार्ता के मध्य उपयोग करना।


ब) चक्षु सम्पर्क एवं मुख मुद्राएं –
अशाब्दिक संप्रेषण में आंखों के द्वारा संकेत दिया जाता है जैसे आंखें
निकालना तथा मुख मुद्राओं में मुस्कराना। 


स) स्पर्श सम्पर्क –
इसके द्वारा जब उनके सिर पर हाथ रखकर, पीठ थपथपाकर
देता है तो बहुत प्रसन्न होते हैं।

संप्रेषण की सीमाएं

संप्रेषण में आने वाली बहुत सारी बाधाएं होती हैं जो संप्रेषण को अप्रभावी बनाती हैं जिनमें प्रमुख
निम्नानुसार हैं- 

1. अत्यधिक मौखिक वार्ता – जब संप्रेषणदाता आवश्यकता से अधिक विषयवस्तु को मौखिक रूप से
प्रस्तुत करता है तो संप्रेषण ग्रहणकर्ता समस्त सामग्री को ग्रहण नहीं कर पाता।

2. अनुपयुक्त भाषा – जब उपयुक्त भाषा का उपयोग नहीं किया जाता है तो
संप्रेषण उचित नहीं हो पाता।

3. शारीरिक असुविधा – जब संप्रेषण के किसी भी पक्ष को कोई शारीरिक कष्ट
या असुविधा होती है तो संप्रेषण उचित नहीं हो पाता अर्थात वह संप्रेषण सफलता को प्राप्त नहीं
कर पाता है।

4. उचित वातावरण का अभाव – बैठक व्यवस्था उचित नहीं होना, संचार साधनों का उचित उपयोग
नहीं होना, सक्रियता का अभाव आदि भी संप्रेषण को प्रभावित करता है।

5. आवश्यकता से अधिक संदेश की आवृत्ति – संप्रेषण के समय संदेश को आवश्यकता से अधिक
आवृत्ति भी संप्रेषण को बाधित करती है।

6. बिना ध्यानाकर्षण किए – ध्यान आकर्षण किए बिना जब संप्रेषण किया जाता है तो सम्पूर्ण
विषयवस्तु का अधिगम नहीं होता अर्थात् आदेश व्यावहारिक रूप नहीं ले पाते।

7. सन्देश की पर्याप्तता का नहीं होना – संप्रेषण में आधी अधूरी सूचना, आधा अधूरा संदेश देना भी
संप्रेषण की सफलता में बाधा उत्पन्न करता है क्योंकि उससे पूर्ण अर्थ स्पष्ट नहीं होता और व्यक्ति
भटक जाता है।

8. संप्रेषण में सहजता का अभाव – संप्रेषण को जब सहज तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जाता है तो
वह भी अधिगम में बाधा उत्पन्न करता है अर्थात् कार्य को सम्पन्न करने में बाधा उत्पन्न होती है।

संप्रेषण की आवश्यकता

उचित संप्रेषण सदेंश देने वाले तथा संदेश प्राप्त करने वाले दोनों ही व्यक्तियों को सन्तुष्ट करता है
तथा अपने उद्देश्यों में सफलता दिलाता है। संप्रेषण अपने व्यवसाय एवं कार्य को सुव्यवस्थित एवं संचालन
के लिए भी मदद करता है। इसकी आवश्यकता निम्न कारणों से स्पष्ट होती है।

1. न्यूनतम समय में अधिकतम कार्य – एक सम्पे्रषण प्राप्तकर्ता बिना स्पष्ट संदेश के अपने कार्य को बिना
समय बर्बाद किए सही तरीके से सम्पन्न करने में सफल नहीं हो सकता क्योंकि बिना स्पष्ट आदेश के वही
भटकता रहेगा तथा कार्य धीमी गति से सम्पन्न कर पायेगा। अत: संप्रेषण समय की बचत के लिए आवश्यक
है।

2. पारस्परिक सहयोग में वृद्धि के लिए – एक दूसरे की समस्याओं को समझने तथा निदान के लिए परस्पर
उचित संप्रेषण होना बहुत जरूरी है। संप्रेषण के माध्यम से ही सहयोग मिल सकता है।

3. प्रभावी नेतृत्व की स्थापना के लिए – अच्छी संचार व्यवस्था प्रभावशाली नेतृत्व के लिए बहुत आवश्यक है
क्योंकि नेतृत्व करने वाले, अपने सभी सहयोगियों से तुरन्त उनके कार्यों की प्रगति की जानकारी प्राप्त कर
उन्हें आवश्यक सुझाव प्रदान कर सकता है अर्थात् सभी के कार्यों पर ध्यान देने के लिए एवं कार्यों को
समझने के लिए उपयुक्त संप्रेषण अति महत्वपूर्ण है।

4. मनोबल में वृद्धि के लिए – सम्पे्रषण तथा संदेश ग्रहणकर्ता में सटीक सम्पे्रषण समन्वय से कार्य को गति
मिलती है तथा सही कार्य सम्पादन से दोनों का मनोबल बढ़ता है।

5. शिक्षण अधिगम के लिए – उपयुक्त संप्रेषण माध्यम से अधिगम को सरल तथा आसान बनाया जा सकता
है। जब तक संप्रेषण प्रभावशाली नहीं होगा तब तक अधिगम नहीं हो सकता। अत: अधिगम के लिए उचित
संप्रेषण का होना अति आवश्यक है। संप्रेषण का माध्यम उचित होगा तो अधिगम को सरल तथा आसान
बनाया जा सकता है।]

6. व्यावसायिक विस्तार की प्रेरणा के लिए – वर्तमान युग में व्यावसायिक उपक्रम की शाखाए एवं उपशाखाएं
राष्ट्रीय स्तर पर नहीं वरन् अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित हो रही है। व्यावसायिक विस्तार में तीव्रता संप्रेषण
के द्वारा ही सम्भव है।

7. कार्यों के शीघ्र क्रियान्वयन के लिए – किसी भी विद्यालय, महाविद्यालय, कम्पनी तथा प्रशासनिक क्षेत्र के
कायोर्ं के निर्णयों का शीघ्र क्रियान्वयन करने के लिए संप्रेषण का होना अति आवश्यक है।

संप्रेषण के विभिन्न माध्यम

संप्रेषण माध्यमों को
उनके प्रयोग और उपयोगिता को लेकर एक ओर अलग प्रकार से भी विभाजित करने की चेष्टा की
जा सकती है। इस प्रकार के विभाजन का निम्न रूप हो सकता है।


1. श्रव्य माध्यम –
संप्रेषणकर्ता और ग्राहक दोनों ही इस अवस्था में श्रव्य माध्यम (जिसकी सहायता से
सुनाकर तथा सुनकर संप्रेषण प्रक्रिया सम्पन्न हो सके।) की सहायता से संप्रेषण प्रक्रिया चालू रखते
हैं। रेडियो, टेप रिकॉर्डर इत्यादि श्रव्य संसाधनों से सम्पन्न संप्रेषण भी इसी श्रेणी में आता है।


2. दृश्य माध्यम –
चार्ट, चित्र,
मानचित्र, ग्राफ आदि चित्रात्मक सामग्री, मॉडल, नमूने, प्रयोग आदि के रूप में दिखाई जाने वाली
दृश्य सामग्री तथा फिल्म, समाचार पत्र, पत्रिकाओं तथा पुस्तकों के रूप में उपलब्ध सामग्री संप्रेषण
प्रक्रिया में दृश्य माध्यम के रूप में काम में लाई जा सकती है।


3. दृश्य- श्रव्य माध्यम –
इसी रूप में केवल रेडियो, टेपरिकार्डर या फिल्म आदि
श्रव्य या दृश्य साधनों का प्रयोग करते हुए संप्रेषण करने से टेलीफोन, वीडियो आदि दृश्य-श्रव्य
साधनों से संप्रेषण करना अधिक उपयुक्त सिद्ध हो सकता है।


5. जनसपंर्क माध्यम –
जब संप्रेषण प्रक्रिया में बहुत अधिक व्यक्तियों को शामिल करने का प्रश्न हो
तो जनसंपर्क माध्यम जैसे रेडियो, टेलीविजन, सिनेमा, फिल्म, मुद्रित सामग्री, पुस्तक पत्र पत्रिकाएं
तथा इन्टरनेट और वेबसाइट पर आधारित अति आधुनिक माध्यमों की सहायता लेना आवश्यकता सा
हो जाता है। 

संप्रेषण की विशेषताएं

संप्रेषण की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएं हैं – 
  1. संप्रेषण एक दूसरे में सम्बन्ध स्थापित करने की प्रक्रिया है। 
  2. इसमें दो प्रमुख पक्ष होते हैं – एक संदेश भेजने वाला, दूसरा संदेश ग्रहण करने वाला।
  3. संप्रेषण में दोनों पक्षों का सक्रिय होना आवश्यक है।
  4. संप्रेषण एक गत्यात्मक प्रक्रिया है।
  5. संप्रेषण में शिष्टता व नम्रता का प्रयोग किया जाना आवश्यक है।
  6. संदेश वाहक की भाषा विषय-सामग्री प्रभावशाली होनी चाहिए।
  7. इसमें विचारों, भावनाओं तथा तथ्यों का पारस्परिक आदान-प्रदान होता है।
  8. संप्रेषण मानवीय तथा सामाजिक वातावरण को बनाए रखने का कार्य करता है।
  9. संप्रेषण प्रक्रिया में परस्पर अन्त:क्रिया तथा पृष्ठपोषण होना आवश्यक होता है।

संप्रेषण के लाभ

  1. प्रभावशाली संप्रेषण से समय एवं धन की बचत होती है।
  2. संदेश प्रदान करने पर व्यक्त की जाने वाली प्रक्रिया का ज्ञान शीघ्र ही हो जाता है।
  3. लिखित संप्रेषण में प्रत्यक्ष सम्पर्क आवश्यक नहीं होता है।
  4. पक्षकारों के मध्य दूरी होने पर भी लिखित संप्रेषण भ्रम नहीं फैलाता है।
  5. लिखित संप्रेषण भविष्य के लिए एक प्रमाण का कार्य भी करता है।
  6. शीघ्र निर्णय एवं क्रियान्वयन में सहयोग प्राप्त होता है।
  7. प्रभावशाली संप्रेषण प्रबन्धकों को इस योग्य बनाता है कि कर्मचारियों के मनोबल में वृद्धि कर सके। उपक्रम के बारे में प्रत्येक प्रकार की सूचना मिलते रहने से कर्मचारी अपने प्रबन्धक वर्ग में विश्वास करने लगते हैं तथा कार्य उत्सुकतापूर्वक करते हैं।
  8. विभिन्न विभागों में समन्वय- सम्पे्रषण के द्वारा यह मालूम होता है कि कब क्या होने वाला है व क्या कार्य शेष है तथा किस कर्मचारी का प्रगति में क्या योगदान है।

Leave a Comment