वाचन किसे कहते हैं ? वाचन की परिभाषा और भेद

जब हम कोई पुस्तक, पत्र या लिखित
सामग्री आदि को पढ़ते है, उसी को वाचन कहते है। वाचन में शब्द के साथ ध्वनि एवं
अर्थ दोनों ही निहित होते है। 

वाचन की परिभाषा

1- वाचन वह जटिल अधिगम (सीखने) की प्रक्रिया है, जिसमें दृश्य, श्रव्य एवं गति
सर्किटों को मस्तिष्क के अधिगम से संबंध होता है।
– कैथरीन

2- वाचन वह प्रक्रिया है, जिसमें प्रतीक, ध्वनि और अर्थ साथ-साथ चलते है।
– डाॅ.रामशक्ल
3- शिक्षा के क्षेत्र में वाचन से तात्पर्य सार्थक प्रतीक लिपि चिन्हों को पहचानना मात्र न
होकर उनके अर्थ ग्रहण करने से है।
– डाॅ.बी.एम.सक्सेना 

वाचन की विशेषताएं

एक सुरूचिपूर्ण और सुन्दर वाचन की निम्नांकित विशेषताएं है –

  1. अच्छा वाचन आरोह – अवरोह के साथ प्रभावोत्पादक ढगं से किया जाता है। 
  2. प्रत्येक शब्द को अन्य शब्दों से अलग करके उचित बल और विराम के साथ पढ़ना,
    अच्छे वाचन का दूसरा गुण है। 
  3. यह वाचन में सुस्वरता के साथ प्रवाह बनाये रखता है।
    अत्यन्त सुन्दर शैली में लिखी गयी वाचन सामग्री साधारण तथा पाठक के मुख से
    निकल कर नीरस और निरर्थक प्रतीत होती है। इसके विपरीत साधारण-सी वाचन
    सामग्री को भी एक अच्छा वाचक प्रभावोत्पादक ढंग से प्रस्तुत कर श्रोताओं का मन मोह
    लेता है।

वाचन के प्रकार

वाचन के प्रकार – मुख्यतः वाचन के दो प्रकार ही हैं – 

  1. सस्वर वाचन
  2. मौन वाचन
1) सस्वर वाचन:- स्वर सहित वाचन को सस्वर वाचन कहा जाता है। इसमें छात्र पढ़ने के साथ-साथ बोलता भी जाता है।। इसमें चार प्रपिक्रियायें सम्मिलित है- लिपिबद्ध अक्षरों को देखना, पहचानना, शब्दों को समझना एवं उच्चारण करना तथा अर्थ ग्रहण करना।
2) मौन वाचनः- मौन वाचन का स्थूल रूप में अर्थ है बिना होठ हिलाये चुपचाप, पढ़ना पुस्तक सूक्ष्म वाचन का अर्थ चुपचाप पढ़ते हुए अधिक से अधिक अर्थ ग्रहण करना है।

वाचन का आधार

वाचन के अंतर्गत मुख के अवयवों की क्रियाशीलता अधिक होती है। जिनका विवरण ध्वनि विज्ञान के अंतर्गत विस्तार में क्रिया गया है। जो ध्वनि उत्पन्न होती है उसमें मुख के किन अवयवों को कियाशील रहना पड़ता ळै, उनका प्रशिक्षण तथा अभ्यास किया जाता है। जिससे शब्दों का सही उच्चारण किया जा सके। वाचन के प्रमुख दो आधार होते है –

अ) वाचन मुद्रा – बैठने खड़े होने का ढंग, वाचन सामग्री हाथ में ग्रहण करने की रीति तथा भावानुसार हाथ, नेत्र। मुख मुद्राये आदि अंगो का संचालन।
ब) वाचन शैली:- भावानुसार स्वर के उचित आरोह-अवरोहके साथ पढ़ना। वाचन में भावों की गहनता के अनुसार उतार- चढ़ाव हो।

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