अनुक्रम
राज्य वित्त आयोग का हर पाँचवें वर्ष की समाप्ति पर गठन किया जाना आवश्यक है। संविधान के अंतर्गत आयोग को सौंपी गयी ज़िम्मेदारियों का मूल रूप से अनुच्छेद 280 में वर्णन किया गया है, वित्तीय आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वे राष्ट्रपति को निम्नलिखित के संबंध में सिफारिशें देगा:
- करों की शुद्ध आय का संघ और राज्यों के बीच वितरण, जो कि उनके बीच विभाजित किया जा सकता है या हो सकता है, और इस तरह की आय से संबंधित शेयरों के राज्यों के बीच आबंटन के लिए;
- वह सिद्धांत, जिनके आधार पर भारत के समेकित कोष से राज्यों के राजस्व सहायता में अनुदान की मात्रा को नियंत्रित किया जाना चाहिए; तथा
- सुदृढ़ वित्त व्यवस्था के हित में राष्ट्रपति द्वारा आयोग को संदर्भित कोई अन्य मामला।
हालांकि, राज्य-स्थानीय संबंधों के क्षेत्र में, लम्बे समय से, इसी तरह की व्यवस्था वांछित थी। इस संदर्भ में, 1990 के दशक के आरम्भिक वर्षों में प्रभावी स्थानीय शासन प्रणाली द्वारा प्रजा के सशक्तीकरण के लिए विकेन्द्रीकृत शासन में कुछ आधारभूत सुधार किये गये। अन्य उपायों और सुधारों के अतिरिक्त, 73वें और 74वें संवैधानिक संशोधनों के अंतर्गत, राज्य वित्त आयोग के आवधिक गठन के माध्यम से इन निकायों को वित्तीय संसाधनों का हस्तांतरण सुनिश्चित किया गया था।
राज्य वित्त आयोग की उत्पत्ति
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विकास में ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों की उपयोगी भूमिका को स्वीकारा जा चुका है। हालांकि, विभिन्न कारणों जैसे तीव्र गति से जनसंख्या में वृद्धि, शहरीकरण, गरीबी तथा वित्तीय संसाधनों के अपर्याप्त हस्तांतरण के कारण स्थानीय सरकारें वित्तीय तनाव का सामना कर रही हैं। स्थानीय निकाय, अनुदान के मामले में, राज्य सरकारों पर बहुत अधिक निर्भर रहते है।
74वें संवैधानिक संशोधन के उद्देश्यों की उद्घोषणा में यह दर्शाया गया है कि ‘‘कई राज्यों में, स्थानीय निकाय कई कारणों से कमज़ोर और अप्रभावी हो जाते हैं, जिनमें अनियमित चुनाव , विलम्बित अधिशोषण, शक्तियों और कार्यों का अपर्याप्त हस्तांतरण शामिल हैं। परिणामस्वरूप, शहरी स्थानीय स्व-शासन की जीवंत लोकतांत्रिक इकाइयों के प्रभावी रूप का प्रदर्शन करने में सक्षम नहीं है।” इसमें यह भी कहा कि भारत के संविधान में स्थानीय निकायों से संबंधित प्रावधानों को शामिल किया, जिसमें विशेष रूप से कार्यों और वित्तीय कर-निर्धारण शक्तियों के संबध मं;े और राजस्व साझेदारी के लिए व्यवस्था है। तदनुसार, कई आवश्यक प्रावधान जोड़े गये और 1990 के शुरुआती दशक में, लम्बे समय से चली आ रही मांग को स्वीकार कर लिया गया और 1992 में यह संवैधानिक संशोधन का हिस्सा बन गया।
वित्त आयोग की संरचना
अधिकतम राज्य, वर्ष 2019 तक, चार से पाँच वित्त आयोग गठित कर चुके हैं। प्रावधान के अनुसार, वित्त आयोग का गठन प्रत्येक पाँच वर्षों के पश्चात् किया जाएगा। वैसे इसका कोई स्थायी कार्यकाल निश्चित नहीं है; और जैसे ही आयोग अपनी रिपाटेर् प्रस्तुत कर देता है तो इसकी कार्यावधि समाप्त हो जाती है। अधिकतर राज्यों के अनुभव, इस बात को दर्शाते हैं कि वित्त आयोग सामान्यत: एक से डेढ वर्षों के लिए ही क्रियाशील रहते हैं।
प्रत्येक राज्य में वित्त आयोग का गठन राज्यपाल की घोषणा के आधार पर किया जाता है; और इसके अध्यक्ष और सदस्यों के पदभार ग्रहण के बाद यह अस्तित्व में आता है।
जहां तक वित्त आयोग की संरचना का सवाल है, इसमें कोई एकरूपता नहीं है और बहुत अधिक भिन्नता भी नहीं है। इसमें एक अध्यक्ष और कुछ सदस्य होते हैं। कुछ राज्यों में उसकी सदस्यों की संख्या राज्य विधान द्वारा निर्दिष्ट होती है। उदाहरण के लिए, पंजाब के वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और चार अन्य सदस्य हाते हैं। इसी तरह तमिलनाडु में एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं। हरियाणा में, तीसरे वित्त आयोग में एक अध्यक्ष और तीन सदस्य थे, जबकि पाँचवें वित्त आयोग में सात सदस्य थे, जिनमें एक अध्यक्ष और एक सदस्य सचिव भी शामिल थे।
की नियुक्ति के लिए योग्यता/शतोर्ं को निर्दिष्ट किया है, जबकि अन्य राज्यों में ऐसा कोई विनिर्देश नहीं है। इसके सदस्यों के रूप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों में निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिए:
- वित्तीय और आर्थिक मामलों में पंचायत से संबंधित विशेष ज्ञान और अनुभव; अथवा
- वित्तीय और आर्थिक मामलों में नगरपालिकाओं से संबंधित विशेष ज्ञान और अनुभव; अथवा
- वित्तीय मामलों और प्रशासन में व्यापक अनुभव; अथवा
- अर्थशास्त्र का विशेष ज्ञान।
किसी भी व्यक्ति को वित्त आयोग का सदस्य या अध्यक्ष नियुक्त करने से पहले, राज्यपाल का इस संदर्भ में संतुष्ट होना आवश्यक है कि वह व्यक्ति का वित्तीय अथवा किसी भी प्रकार का काइेर् हित न हो जिसका उसके कार्य पर प्रतिकूल प्रभाव हो; और न ही उस व्यक्ति का कोई हित, वित्त आयोग के अन्य सदस्यों के किसी कार्य में कोई बाधा डालता हो। नियुक्ति के पश्चात भी राज्यपाल को समय-समय पर अध्यक्ष और सदस्यों के संबंध में समय-समय पर स्वयं को संतुष्ट करना पड़ता है कि उनके पास कोई वित्तीय या कोई अन्य हित नहीं है, जो उनके कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सके। इस उद्देश्य से राज्यपाल अध्यक्ष और सदस्यों को ऐसी जानकारी उपलब्ध करवाने को कह सकता है जो उसकी संतुष्टि के लिए आवश्यक हो कि अध्यक्ष अथवा किसी भी सदस्य का कोई निजी हित नहीं है।
अयोग्यताएं – निम्नलिखित कारणों के आधार पर कोई भी व्यक्ति वित्त आयोग का
सदस्य बनने से अयोग्य घोषित किया जा सकता है :
- यदि वह अस्वस्थ मन का हो
- यदि वह दिवालिया हो
- यदि उस पर किसी नैतिक अद्यमता का दोष सिद्ध हो चुका हो अथवा
- राज्य वित्त आयोग के सदस्य के रूप में, यदि उसके वित्तीय अथवा कोई अन्य हित से उसके कार्यों पर प्रतिकूल प्रभाव की संभावना हो
वित्त आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य राज्य वित्त आयोग को अपनी
पूर्णकालिक अथवा अल्पकालिक सेवा प्रदान कर सकते हैं, जैसे राज्यपाल प्रत्येक मामले में निर्देश दें; और उन्हें राज्य सरकार की आज्ञा के अनुसार शुल्क अथवा वेतन एवं भत्ते दिए जाएंगे।
राज्य वित्त आयोग की शक्तियां
जैसा कि पहले भी वर्णन किया गया है कि राज्य स्तर पर वित्त आयोग का गठन नगरपालिकाओं और पंचायतों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करने तथा सिफारिश करने के लिए होता है। प्रत्येक राज्य में, राज्य वित्त आयोग के गठन से पहले एक अधिसूचना जारी की जाती है, और इसमें सामान्यत: विचारार्थ विषय होता है।
- राज्य द्वारा लगाया गया और एकत्रित कर और राजस्व की कुल प्राप्ति का राज्य और स्थानीय निकायों के बीच वितरण,
- करो शुल्कों और फीस का निर्धारण, जिसे स्थानीय निकायों को सौंपा जा सकता है अथवा स्थानीय निकायों द्वारा विनियोजित किया जा सकता है; तथा
- राज्य की समेकित निधि से स्थानीय निकायों को सहायता में अनुदान।
• पंचायतों और नगरपालिकाओं की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए आवश्यक उपाय।
राज्य वित्त आयोग निम्नलिखित के संबंध में भी ध्यान केंद्रित कर, सिफारिशें करेगा :