भारत का विभाजन कैसे हुआ? पाकिस्तान की मांग सर्वप्रथम किसने की?

भारत का विभाजन

पाकिस्तान की मांग 

1939 में कांग्रेस ने मुस्लिम लीग और जिन्ना को साथ लेने की असफल कौशिश की
पर जिन्ना के मन में कुछ और ही था उन्होंने कांग्रेस को हिन्दुवादी संगठन कहकर उस पर बहुत सारे आरोप लगाये और उससे छुटकारा पाने के लिए मुक्ति दिवस भी बनाने की घोषणा
कर दी। मुस्लिम लीग प्रशासन से अपनी जायज और नाजायज मांग मनवाती आ रही थी
इसी क्रम में उसकी अंतिम परिणिति भारत विभाजन की मांग को लेकर दिखाई देती है। 1938
में उन्होंने देश के विभाजन की मांग की। 1940 के लाहौर अधिवेशन में उसने पाकिस्तान
प्रस्ताव पास किया और मुस्लिम बहुसख्यक प्रांत को भारत से अलग करने को कहा। 

भारत का विभाजन कैसे हुआ

1941
के मद्रास अधिवेशन में अध्यक्ष पद से भाषण करते हुये श्री जिन्ना ने कहा कि मुस्लिम लीग
का उद्देश्य उत्तर-पश्चिम तथा पूर्वी प्रदेशों में स्वतंत्र राज्य की स्थापना है। यद्यपि अलग
मुस्लिम बहुल राष्ट्र बनना ये संकल्पना थोड़ी और पुरानी है जब 1930 में इकबाल ने एडवर्ड
थाम्पसन से कहा कि ‘‘पाकिस्तान की योजना ब्रिटिश सरकार, हिन्दु जाति तथा मुस्लिम जाति
के लिए घातक होगी।’’ हालांकि इसी विचार से प्रभावित होकर चौधरी रहमत अली पाकिस्तान बनाने की मांग गोलमेज सम्मेलन के दौरान मि. जिन्ना
और जफरूल्ला खां के सामने प्रस्तुत की थी पर इन्हीं नेताओं ने इसे कोरी कल्पना मानते
हुये ठुकरा दिया था। लेकिन धीरे-धीरे जिन्ना में भी सांप्रदायिकता का विष चढ़ने लगा और
अपने अधिकारों को सुरक्षित रखने के चक्कर में धर्म को आधार बनाकर वे कूटनीतिक चाले
चलने लगे। इसी के अंतर्गत उन्होंने द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त भी धर्म के आधार पर प्रतिपादित
किया था। 
जिन्ना का मानना था की जब दो धर्मों में इतनी विभिन्नता है, तो वे साथ में रहते हुये
अपने अपने हितों की रक्षित नही कर सकते है इसलिए उत्तर पश्चिमी तथा पूर्वी प्रदेशों को
मिलाकर स्वतंत्र मुस्लिम राज्य का निर्माण किया जाना चाहिए। इसी उद्देश्य को पाने के लिए
मुस्लिम लीग ने अंग्रेजी सरकार व कांग्रेस के सामने ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी की
मुसलमानों के लिये एक अलग देश का निर्माण होना ही चाहिये।

महायुद्ध के शुरूआत में मित्र राष्ट्रों को प्रतिक्रियावादी राष्ट्रों के हाथों हार का
सामना करना पड़ रहा था, जिससे ब्रिटिश सरकार भारत के अपने औपनिवेशिक साम्राज्य को
लेकर चिंतित हो गई। इसी चिंता का समाधान करने के लिए और महायुद्ध के दौरान
कौमनवेल्थ और मित्र राष्ट्रों का सहयोग करने के लिए आवश्यक था भारतीय राजनीतिज्ञों एवं
भारतीय जनमानस को अपने पक्ष में किया जाये। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए सरकार ने
अपना रवैया नरम करना शुरू किया एवं प्रमुख काँग्रेसी नेताओं को जेल से रिहा करना शुरू
कर दिया। ब्रिटिश सरकार ने अपने उद्देश्य की पूर्ति करने के लिए सर स्टैफर्ड क्रिप्स को
क्रिप्स प्रस्ताव लेकर भारत भेजा।

22 मार्च को क्रिप्स महोदय ने सभी शीर्षस्थ नेताओं से
विचार-विमर्श शुरू किया। 23 मार्च 1942 को इन प्रस्तावों को समस्याओं के छूटकारा पाने  के लिए
प्रस्तुत किया जिसकी प्रमुख बातें थी – 

  1. सरकार भारत को स्वतंत्र औपनिवेशिक राज्य का
    दर्जा देना चाहती है। 
  2. यह स्वतंत्र उपनिवेश अपने सभी देशी विदेशी मामलों में स्वतंत्र होगा
    एवं उसे ब्रिटिश काॅमनवेल्थ से अलग होने का भी अधिकार रहेगा।
  3. युद्ध के बाद संविधान का
    निर्माण किया जायेगा जिसमें सभी ब्रिटिश भारत और देशी रियासतों के प्रतिनिधि भाग ले
    सकेंगे।
  4. संविधान को क्रियान्वित करने की ज़िम्मेदारी ब्रिटिश सरकार अपने हाथ में लेगी
    लेकिन उसकी शर्तें होंगी – 
    1. यदि कोई प्रांत इस संविधान को नहीं मानता है तो
      उसे अपनी वर्तमान स्थिति में रहने का अधिकार रहेगा। 
    2. देशी रियासतों को संविधान मानने
      या ना मानने का अधिकार दिया जायेगा इसके अलावा वह भारतीय संघ में रहने या ना रहने
      का भी निर्णय ले सकेंगे। 
    3. इन सबके अलावा ब्रिटिश सरकार एवं भारतीय संविधान सभा
      के बीच एक संधी की जायेगी। अंग्रेजी सरकार अल्पसंख्यक जातियों को दिए आश्वासनों को
      पूरा करेगी और उनके हितों की रक्षा करेगी। 
    4. युद्ध जब तक समाप्त नहीं होता भारत की
      रक्षा का भार ब्रिटिश सरकार उठायेगी और भारतीय जनमानस एवं नेताओं से इस दौरान
      सहयोग की अपेक्षा रखी जायेगी।

क्रिप्स प्रस्ताव को लेकर कांग्रेस ने छानबीन किया और आशानुरूप न पाकर उसे
असंतुष्ट करार दिया और महात्मा गाँधी ने इसके लिए कहा ‘‘यह एक भविष्य की तिथि
का एक एक ऐसे बैंक के ऊपर चैक था स्पष्टतया जिसकी दशा खराब होती जा रही थी’’।
इधर क्रिप्स प्रस्तावों को मुस्लिम लीग ने इसीलिए अस्वीकार कर दिया क्योंकि इसमें
साम्प्रदायिक आधार पर देश विभाजन की माँग नहीं मानी गयी थी। इस तरह क्रिप्स प्रस्तावों
को विभिन्न पार्टियों एवं भारतीय लोकमत के प्रत्येक वर्ग ने भी अस्वीकार कर दिया क्योंकि
यह एक ऐसा प्रस्ताव था जो भविष्य में अनगिनत पाकिस्तान खड़ा कर सकता था।

सांप्रदायिक समस्या का उन्माद दिन पे दिन बढ़ता जा रहा था। अतः इस उन्माद को
समाप्त करने के लिये श्री राजगोपालाचारी ने अप्रत्यक्ष रूप से द्वि-राष्ट्र के सिद्धान्त को
मानते हुए एक योजना प्रस्तुत की। इसके अनुसार पाकिस्तान को उन प्रदेशों के लिये
स्वीकार कर लिया गया जिन प्रदेशों में मुसलमान बहुमत में निवास करते थे किन्तु उसकी
एक शर्त यह भी थी कि भारत का विभाजन उसी समय होगा जब उसके समस्त निवासी
अपने वोट द्वारा उसकी स्थापना के पक्ष में निर्णय कर देते है। इसी आधार पर गांधी ने
मोहम्मद अली जिन्ना से बातचीत को शुरू किया पर जिन्ना इस योजना को भी मानने को
तैयार ना हुये। राजगोपालाचारी का मानना था की लीग पाकिस्तान की मांग पर डटी हुई है
तथा उसे अंग्रेजों का भी समर्थन प्राप्त है। अतः भारत की स्वाधीनता को प्राप्त करने के लिए
लीग की मांग को स्वीकार करने के अतिरिक्त काँग्रेस के पास अन्य कोई विकल्प नहीं था।

जापान के कतिपय आक्रमण के भय से ब्रिटिश सरकार भारतीय जनमानस का
सहयोग चाहती थी। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए लार्ड वैवल ने भारत आते ही 25 जून
1945 को शिमला में एक सर्वदलीय सम्मेलन का आयोजन किया। जिसमें सभी राजनीतिक
दलों के नेताओं को आमंत्रित किया गया।इस योजना के मुख्य उद्देश्य थे – 

  1. सरकार भारतीयों को स्वशासन का अधिकार देना चाहती है। 
  2. सरकार सभी धर्मों की
    इच्छाओं का अनुसरण करने के लिये उनके प्रतिनिधियों से विचार विमर्श करेगी।
  3.  गर्वनर
    जनरल की कौंसिल का गठन किया जाएगा जिसमें गर्वनर जनरल और कमांडर इन चीफ
    के अतिरिक्त कौंसिल के अन्य सदस्यों के तौर पर भारतीयों को लिया जायेगा। 
  4. कार्यकारिणी कौंसिल में हिन्दुओं और मुसलमानों की सीटों को बराबर रखा जायेगा। 
  5. सीमांत और कबायली विवादों को छोड़कर शेष सभी देशी-विदेशी मामले भारत मंत्री की
    देखरेख में रहेगे। 
  6. भारत में ब्रिटिश उच्चायुक्त के नये पद का सृजन किया जायेगा जो
    ब्रिटिश व्यापार और हितों की देखभाल करेगा।
  7. इस दौरान शासन का संचालन गर्वमेन्ट
    आफ इण्डिया एक्ट 1935 के माध्यम से किया जायेगा। 
  8. युद्धोपरांत भारतीयों को संविधान
    बनाने का कार्यभार सौंप दिया जायेगा।। 
  9. प्रांतों में उत्तरदायी शासन की स्थापना की
    जायेगी और गर्वनरी राज्य को खत्म किया जायेगा।

वैवल योजना पर विचार करने वाला शिमला सम्मेलन एक तरह से ब्रिटिश सरकार
की मनोवृत्ति स्पष्ट करता है कि, उसकी नीति में भारतीयों के लिये कोई परिवर्तन नहीं आया
है। वैवल योजना की एक और असंगत बात यह थी की उसने बहुसंख्यक हिन्दुओं और
अल्पसंख्यक मुसलमानों को बराबर ठहराया था। इतने पर शिमला सम्मेलन के प्रति स्वतंत्रता
की लालसा में आकर काँग्रेस ने अपना रवैया नरम व सहयोगी बनाये रखा। पर मुस्लिम लीग
के नेता मोहम्मद अली जिन्ना अपने अडि़यल रवैये में यह कहते रहे की मुस्लिम लीग को ही
मुसलमानों का एक मात्र प्रतिनिधि संगठन माना जाये। इस घोर अन्यायपूर्ण व अनैतिक मांग
को काँग्रेस और अन्य राजनैतिक दल नहीं मान पाये चूँकि यह बात राष्ट्रीयता के विरूद्ध थी।
इसलिए वैवल योजना पर एकमत ना होने के कारण लार्ड वैवल ने इसे असफल करार देते
हुए रद्द कर दिया। इस तरह मुस्लिम लीग की अनैतिक और विघटनकारी मांगों ने राष्ट्रीयता
के विचारों को एक बार फिर से धूल में मिला दिया और स्पष्ट कर दिया कि उसकी राह
विभाजन ही है।

मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन की योजना को अस्वीकार कर दिया और सीधी लड़ाई
शुरू करने का निश्चय किया, चूंकि लीग संवैधानिक उपायो से भी अपने लक्ष्य को प्राप्त ना
कर सकी तो उसने अपने अंतिम हथियार सीधी कार्यवाही को अंजाम देना शुरू कर दिया।
इधर 14 अगस्त 1946 को पं. जवाहरलाल नेहरू को वायसराय ने अंतरिम सरकार बनाने के
लिये आमंत्रित किया तो इस बात से मुस्लिम लीग अत्याधिक अवसाद में आ गई और उसने
सांम्प्रदायिक दंगो को हवा देना शुरू कर दिया। 

16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में भीषण
रक्तपात हुआ। और पूरे देश में जहां-तहां उपद्रव शुरू हो गये। इन उपद्रवों में मुसलमानों
ने हिन्दुओं को लुटना उनकी स्त्रियों के साथ ज्यादतियां करना शुरू कर दिया। इन मुस्लिम
अत्याचारों का बदला लेने का काम हिन्दुओं ने शुरू कर दिया इस तरह हिंदु-मुस्लिम दंगो
ने अत्यन्त व्यापक व भयंकर रूप धारण कर लिया। इन दंगों के समय भी पंजाब और बगाल
की सरकार ने सहयोग नहीं किया और दंगों को दबाने में भी रूची नहीं दिखलाई। लीग इस
प्रत्यक्ष कार्यवाही द्वारा बतलाना चाहती थी अगर उसकी बात नहीं मानी गई तो हालात और
बेकाबू हो सकते हैं। 
अतः लार्ड वैवल के प्रत्यनों से लीग को भी अंतरिम सरकार में शामिल
कर लिया गया। लीग की ओर से पांच सदस्यों को नामित करने का निश्चय किया गया।
लीग के नेता लियाकत अली को अर्थ जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौपा गया। इतना सब मिलने
के बाद भी लीग अपनी आदतो से बाज नहीं आई और इसकी विभाजन की मांग इतना पाने
के बाद भी बरकरार रही।

1945-46 के काल में इंगलैड में चुनावों का दौर चल रहा था एवं भारत के भाग्य
से इन चुनावों में ब्रिटिश लेबर पार्टी की विजय हुई। जिसका चुनावी घोषणा पत्र का प्रमुख
मुद्दा भारत को स्वतंत्रता प्रदान करना था। लेबर पार्टी के नेता एटली ने पद ग्रहण करते
ही भारतीय नेताओं से समझौता करने का निश्चय किया। इस निश्चय के बाद 1946 में
3 सदस्यों का एक मिशन बनाकर भारत भेजा गया जिसके सदस्थ थे – लार्ड पेथिक लैरेन्स,
सर स्टैफर्ड क्रित्स और मि. वी अलैकजैण्डर दिल्ली पहुंचकर इस मिशन ने भारत की विभिन्न
राजनैतिक पार्टियों से बातचीत शुरू कर दी। पर इस बातचीत से कोई सर्वमान्य फार्मूला
सामने नहीं आया। इसलिए मिशन को अपने द्वारा बनाई गई एक योजना प्रस्तुत करनी पड़ी।
इसकी मुख्य बाते थी – संपूर्ण भारत का एक केन्द्रीय संघ होगा जिसके पास केवल प्रतिरक्षा,
वैदेशिक मामले और संचार के साधन होगे और अन्य विभाग प्रांन्तो के पास होगे, और
पाकिस्तान संबंधी मांग के विषय में मिशन का सोचना यह था की, सांप्रदायिक समस्या का
हल पाकिस्तान का निर्माण नहीं है। लेकिन मुस्लिम लीग को संतुष्ट करने हेतु प्रांतो के
सामुहीकरण की व्यवस्था की गयी। मिशन की इस सामूहीकरण की बात को ही ध्यान में रखते
हुए लीग ने केबिनेट मिशन को स्वीकार कर लिया। 

दूसरी और कांग्रेस के कुछ प्रमुख नेता
प्रान्तो के सामूहीकरण को एक ऐच्छिक बात मानते थे। इसलिये कांग्रेस ने प्रान्तों के अनिवार्य
सामूहीकरण को नहीं माना। केबिनेट मिशन की अनुशंसाओं का मुख्य सिद्धान्त मुस्लिम
समुदाय की मांगो को कुछ सुविधाएं देते हुए भारतीय एकता को बनाये रखना था पर मुस्लिम
लीग प्रांतो के सामूहीकरण के मुद्दे को लेकर अड़ी रही और उसने संविधान सभा की बैठको
में भाग नहीं लिया। इस तरह केबिनेट मिशन लीग की हठधर्मिता के कारण विफल हो गया। 

भारत का विभाजन और पाकिस्तान की स्वीकृति

साइमन क्रिप्स और कैबीनिट मिशन भी
इन समस्याओं का समाधान न कर पाये। भारत की इस भयानक दशा को देखकर ब्रिटिश
प्रधानमंत्री ने अपनी सरकार की नीति स्पष्ट करते हुये 1947 को अपनी ऐतिहासिक घोषणा की
इसके अनुसार – 1. ‘‘ब्रिटिश सरकार जून 1948 तक उत्तरदायी भारतीयो के हाथ में शक्ति
सौप देने का कार्य संपन कर देगी। 2. सम्राट की सरकार ऐसी भारतीय सरकार को अपना
दायित्व सौंपने को उत्सुक है जो जनता के सहयोग की दृढ़ नींव पर स्थिर होकर भारत में
न्याय व शांतिपूर्वक शासन कर सके। इसलिए यह आवश्यक है कि भारत के सब लोग अपने
मतभेदो को भुलाकर अगले वर्ष उन पर डाले जाने वाले भारी उत्तरदायित्व को संभालने के
लिए तैयार हो जाए……..वैसे तो अंतिम अधिकार का हस्तांतरण जून 1948 तक संभव न होगा
पर इसके लिये तैयारी प्रारंभ कर दी जायेगी। इस घोषणा में लार्ड वैवल के स्थान पर लार्ड
माऊण्ट बेटन को भारत के वाइसराय हेतु नांमकित किया गया।

जिन्ना ने कहा ‘‘ मुस्लिम लीग अपनी पाकिस्तान की मांग से इकइंच भी पीछे नहीं हटेगी।’’ ऐसी स्थिति
में जब कांग्रेस और लीग की कटुता चरमसीमा पर पहुंच गई थी 24 मार्च को माउण्ट बेटन
ने अपना पदभार संभाल लिया। इस समय तक यह स्पष्ट हो चुका था कि भारत गृहयुद्ध की
कगार पर पहुंच गया है। और पाकिस्तान की मांग को स्वीकार किए बिना शांति कायम करना
नामुमकिन है। माउण्टबेटन ने स्थिति का विश्लेषण किया
और उन्होंने सबसे पहले गांधीजी से विचार विर्मश करके शीघ्र ही अन्य नेताओं जैसे सरदार
पटैल, मौलाना आजाद, जवाहरलाल नेहरू एवं अन्य नेताओं से भी विचार विमर्श कर लिया।
कांग्रेस और लीग एक दूसरे के दुश्मन बन गए थे अंत मे  विभाजन ही एकमात्र विकल्प शेष
रह गया। 18 मई 1947 की माऊंटबेटन इग्लैण्ड गए तथा 8 जून 1947 को वहां से लौटकर
उन्होंने अपनी योजना प्रकाशित की। इसके मुख्य प्रस्ताव थे-

  1. भारत का विभाजन कर दिया जाए। 
  2. बंगाल पंजाब और असम के विवाद ग्रस्त प्रांतों का भी विभाजन किया जाएगा।
  3. सिंध की विधायिका संपूर्ण रूप से मुक्त विशेष बैठक में यह निश्चय करेगी कि दिल्ली
    की संविधान सभा में सम्मिलित हुआ जाय या नई संविधान सभा में। 
  4. असम के सिलहट जिले में मुस्लिम बहुसंख्यक होने से जनमत संग्रह द्वारा इस बात
    का निर्णय होगा कि वहां के लोग पाकिस्तान में मिलना चाहते या भारत में। 
  5. पंजाब व बंगाल की विधान सभाएं पृथक-पृथक दो भागों में बनेगी। एक में मुस्लिम
    प्रधान जिलो के और दूसरे में गैर मुस्लिम जिलों के प्रतिनिधि होगे। तीनो भांगो को
    यह फैसला करने का अधिकार होगा कि वे भारतीय संघ में रहना चाहते अथवा
    पाकिस्तान में। 
  6. ब्रिटिश बलुचिस्तान को भी ऐसा ही उचित अवसर प्रदान करने की बात विचारधीन
    थी 
  7. देश के विभाजन के पश्चात् भारतीय उपमहाद्वीप में जो भारत और पाकिस्तान के
    राज्य स्थापित होगे उन्हें औपनिवेशिक दर्जा प्राप्त होगा किंतु दोनों को राष्ट्रमण्डल से
    पृथक होने पर अपनी पूर्ण स्वाधीनता घोषित करने का अधिकार होगा। 

माऊण्टबेटन योजना को भारत के लगभग सभी राजनीतिक दलो ने स्वीकार कर
लिया। इस तरह 3 जून 1947 को भारत को दो अधिराज्यों में बांट दिया गया।
जिसका बड़ा टुकड़ा भारत ही बना रहा। और छोटा टुकड़ा पाकिस्तान के रूप में उभर के
सामने आया।

संदर्भ –

  1. भारत के राष्ट्रीय आंदोलन का इतिहास, सत्यकेतु विद्यालंकार, श्री सरस्वती सदन,
    नई दिल्ली 
  2. आधुनिक भारतीय इतिहास का अध्ययन, जी.एस. छाबड़ा, अनुवादक एस.डी. द्विवेदी,
    स्टर्लिंग पब्लिशर्स, नई दिल्ली 
  3. भारत में स्वतंत्रता आंदोलन, सी.के. सक्सेना, साहित्य भवन, आगरा
    4. भारत में विभाजन की कहानी, एलन कैम्पबैल-जान्सन, अनुवादक रनवीर सक्सेना,
    सस्ता साहित्य मण्डल प्रकाशन, नई दिल्ली
    32 
  4. भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन: शासन एवं राजनीति, डाॅ. के.पी. सिंह, मध्यप्रदेश हिन्दी
    ग्रंथ अकादमी, भोपाल
  5.  आधुनिक भारत का इतिहास: द्वितीय खण्ड (1857-1947), डाॅ. धनपति पांडेय,
    मीनाक्षी प्रकाशन, नई दिल्ली 
  6. भारत का स्वतंत्रता संघर्ष, विपिन चन्द्र, हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, दिल्ली
    विश्वविद्यालय 
  7. भारत का मुक्ति संग्राम, अयोध्या सिंह, दि मैकमिलन कंपनी आॅफ इंडिया, नई दिल्ली 
  8. आधुनिक भारत में सम्प्रदायवाद, विपिन चन्द्र, नई दिल्ली 
  9. भारतीय मुसलमानों का राजनीतिक इतिहास, राम गोपाल, मेरठ 
  10. आधुनिक भारत का इतिहास, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली 
  11. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन: शासन एवं राजनीति, डाॅ. पुखराज जैन, साहित्य भवन,
    आगरा

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