रिपोर्ट (प्रतिवेदन) शब्द भी पर्याप्त व्यापक है। कार्यालयों के संदर्भ में यह रिपोर्ट (प्रतिवेदन)
है तो पुलिस में यही रिपार्टे ‘रपट’ बन जाती है जिसका पूरा रूप है ‘First Information
Report’। यही शब्द पत्रकारिता के क्षेत्र में समाचार भेजने के अर्थ में ‘रिपोटिग’ है। जब
किसी व्यक्ति से अत्यधिक कहना-सुनना हो जाता है और मारपीट तक की स्थिति उत्पन्न
हो जाती है तो उस क्षेत्र में स्थित चौकी/थाना में जाकर रिपोर्ट लिखानी होती है। चोरी-डकैत ी में भी रपट लिखायी जाती है।
इस संबंध में सारा विवरण तैयार कर प्रकाशन के लिए पत्र के कार्यालय को भेजता है तो
उसको ‘रिपोटिग’ कहते हैं। पत्रकारिता में भी समस्या प्रधान रिपोर्ट (प्रतिवेदन) तैयार होती
हे जिसमें समस्याओं का समाधान भी सुझाया जाता है। जब साहित्यकार किसी स्थिति/घटना
का यथातथ्य विवरण-वर्णन तैयार करता है जो कलात्मक व संवेगात्मक होता है तो वही
‘रिपोर्ताज’ विधा बन जाता है।
रिपार्ट (प्रतिवेदन) में तथ्यों का ब्यौरा भी होता है और विवरण भी जिनकी पुष्टि आँकड़ों द्वारा
की जाती है। रिपार्टे में कार्य की प्रगति (कार्यालय के विविध कार्यकलापों की) का यथातथ्य
विवरण रहता है। कभी-कभी पिछली प्रगति से तुलना भी की जाती है और कभी अगामी
योजना को सुझाव के रूप में रखा जाता है।
करते हुए लिखा है: ‘‘प्रत्येक प्रतिवेदन (रिपोर्ट) का प्रयोजन यह होता है कि जिस व्यक्ति या जिन व्यक्तियों का
किसी विषय से सरोकार हो और जो उसके सारे तथ्यों से अवगत न हों, उसके लिए
यथावश्यक सूचना प्रस्तुत कर दी जाए।’’
प्रतिवेदन वस्तुत: एक औपचारिक आरै अधिकृत वक्तव्य है जिसमें किसी व्यक्ति या समूह
के निष्कर्षों और संस्तुतियों का उल्लेख किया जाता है जिन्हें किसी प्रस्ताव या प्रस्तावों पर
विचार करने के लिए अधिकृत किया गया है।
प्रतिवेदन किसी संस्थान द्वारा किसी मामले पर की गई जाँच का ब्यौरा भी हो सकता है,
जिसे किसी अधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों, जिन्हें कि यह काम सौंपा गया है, द्वारा तैयार
किया जाता है।
प्रतिवेदन के प्रकार
- जब किसी व्यक्ति को कोई कार्य सुपुर्द किया जाए और कार्य की समाप्ति पर उससे
प्रतिवेदन माँगा जाए। इसी प्रकार किसी संस्था/संस्थान की प्रगति रिपोर्ट तैयार की
जाए। - समिति/आयोग का प्रतिवेदन, किसी छानबीन के लिए नियुक्त आयोग/समिति को
संपूर्ण बैठकों के अंत में प्रतिवेदन प्रस्तुत करना पड़ता है। समिति/आयोग का गठन
जिन विषयों को लेकर किया जाता है उनके अनुसार रिपोर्ट प्रस्तुत करनी पड़ती हैं। प्रशासनिक रिपोर्ट हिन्दी-अंग्रेजी दोनों में तैयार की जाती है।
प्रथम प्रकार की रिपोर्ट के अनेक प्रकार भी संभव हैं:
- व्यक्ति विशेष : ऐसा प्रतिवेदन जो किसी व्यक्ति विशेष द्वारा तैयार किया जाता है
जिसे कि इस काम के लिए अधिकृत किया गया है और जो कार्य की समाप्ति पर
अथवा किसी कार्य के हिस्से विशेष के पूरे होने पर इसे तैयार करता है। - विभाग/मंत्रालय : विभाग या मंत्रालयों में तैयार हाने वाले प्रतिवेदन इनकी अवधि
मासिक, त्रैमासिक, छमाही या वार्षिक हो सकती है। - संस्था/संस्थान : संस्था या संस्थानों में वहाँ होने वाली गतिविधियों से संबंधित
प्रतिवेदन। ये भी अलग-अलग अवधि के लिए तैयार किए जाते हैं।
प्रतिवेदन में तथ्यों के आधार पर किसी विषय का विश्लेषण किया जाता हैं। सर्वेक्षण/
साक्षात्कार द्वारा प्राप्त तथ्यों को प्रस्तुत किया जाता है, जिसमें यथासंभव आँकड़े भी दिए
जाने चाहिए। एकत्रित सूचनाओं का वर्गीकरण तथा विश्लेषण प्रस्तुत किया जाता है।
प्रतिवेदन का उद्देश्य मात्र विवरण देना नहीं है, वरन् समस्याओं के समाधान की दिशा भी
खोजनी होती है। प्रतिवेदन तैयार करने की प्रक्रिया विकसित हो गई है। वार्षिक प्रतिवेदन
का प्रारूप पहले से वितरित कर दिया जाता है जिसमें यथास्थान आँकड़े भरकर विवरण व
विवेचन देना होता है।
समिति/आयोग की रिपोर्ट : इनके प्रतिवेदन में यह ध्यान रखना होता है कि –
- समिति/आयोग का गठन किन-किन कार्यों को संपन्न करने के लिए किया गया है।
- किस-किस तथ्य की जाँच की गई।
- किस-किस से साक्ष्य लिया गया। साक्ष्यों को परिशिष्ट में दिया जा सकता है।
- निष्कर्ष के रूप में की गई संस्तुतियाँ।
- क्या सिफारिशें/संस्तुतियाँ सर्वसम्मति से प्रस्तुत की गई हैं? अगर किसी का भिन्न
मत या असहमति है तो उसको भी शामिल किया जाए। सभी सदस्य प्रतिवेदन के अंत
में हस्ताक्षर करते हैं। किन्ही विशेष परिस्थितियों में सदस्य सचिव और अध्यक्ष के
हस्ताक्षरों के साथ प्रतिवेदन को पेश किया जाता है। - प्रारंभ में क्या-क्या कार्य सौंपा गया और बाद में क्या कार्य और बढ़ा लिया गया?
प्रतिवेदन की विशेषताएं
प्रतिवेदन की विशेषताओं को प्रतिवेदन तैयार करते समय ध्यान रखें:
-
किसी घटना की जानकारी अथवा निरीक्षण/सर्वेक्षण के बाद तथ्यों के अनुसार
प्रतिवेदन तैयार किया जाना चाहिए। - प्रतिवेदन में उद्देश्य के अनुरूप सर्वेक्षण कार्य का विवरण व विश्लेषण किया जाना
चाहिए। - मुख्य-मुख्य बातों के अतिरिक्त जरूरी हो तो अनुषंगी जानकारियाँ भी दी जाती हैं।
- विषयानुरूप, उद्देश्य की पूर्ति वाला विवरण देना अपेक्षित है।
- सभी सामग्री तथ्यों पर आधारित हो। अनुमान या अटकलों पर आधारित बातों का
उल्लेख प्रतिवेदन के लिए उपयुक्त नहीं है। - भाषा स्पष्ट, सहज व सरल होनी चाहिए। प्रतिवेदन में आलंकारिक भाषा से बचना
चाहिए। भाषा में प्रथम पुरुष का प्रयोग यथासंभव नहीं हो। यह शैली निर्वैयक्तिक होनी
चाहिए। अत्यधिक तकनीकी शब्दावली से बचना चाहिए। शैली संक्षिप्त होते हुए भी
सारगर्भित हो। - भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रतिवेदनों की लेखन प्रक्रिया भिन्न-भिन्न हो सकती है।