अनुक्रम
आस्ट्रिया, प्रषा, तथा रूस को पराजित करने के बाद फ्रांस के शत्रुओं में इंग्लैण्ड ही शेष
था। ट्राफल्गर की पराजय के बाद नेपोलियन यह समक्ष गया था कि युद्ध में अंगे्रजों को हराना
मुश्किल की बात है। अतः यह समझता था कि इंग्लिश चैनल शैतानी है, जिसे पार करना नेपोलियन
के बस की बात नहीं है। नेपोलियन अंग्रेजी नौसेना की शक्ति से परिचित था, उसने स्वयं कहा
था- ‘‘हमारे लिए पेरिस से दिल्ली सेना भेजना सरल है किन्तु फ्रांस से इंग्लैण्ड भेजना बहुत कठिन
है।’’ इस प्रकार अब नेपोलियन ने स्थल मार्ग से इंग्लैण्ड को जीतने की कोशिश की। इंग्लैण्ड को
जीतने के लिए उसने जिस नीति को अपनाया वह महाद्वीपीय अवरोध की नीति कहलाती है।
कारखाने तथा अन्य साधन उपलब्ध थे। जिनके माध्यम से वह विश्व बाजार में अपनी पैठ बनाए हुए
था। माण्ट गैलार्थ ने नेपोलियन को सुझाव दिया कि इंग्लैण्ड को जीतने के लिए उसके व्यापार को
नष्ट कर उसके हृदय को चोट पहुॅचाई जा सकती है। नेपोलियन ने उसकी यह योजना स्वीकार
की और बाजारों को बंद कर उसकी समृद्धि के विनाश की योजना तैयार की। वह सोचता था कि
इंग्लैण्ड की जनता भूखों मर जाएगी, निर्माण शालाएं बंद हो जाएगी, लोग विद्रोह पर उतारू हो
जाएगें। अंततः इंग्लैण्ड को घुटने टेकने पड़ेगें।
महाद्वीपीय अवरोध संबंधी घोषणाएं
1. वर्लिन आदेश – 21 नवम्बर 1806 में वर्लिन की घोषणा की गई। वर्लिन आदेश के द्वारा
ब्रिट्रिश द्वीप समूह के खिलाफ नाकाबंदी की घोषणा की गई, अन्य उपनिवेशों के साथ व्यापार
निषिद्ध कर दिया गया। बंदरगाहों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। बंदरगाहों का उल्लंघन करने पर
जहाजों को माल सहित जप्त करने को कहा गया।
2. वारसा आदेश- 25 जनवरी 1807 को नेपोलियन द्वारा वर्साय आदेश जारी कर प्रषा तथा
हैनोवर के समुद्र तटों पर भी अंग्रेजी व्यापार को प्रतिबंधित कर दिया। इस आदेश का उल्लंघन
करने वाले देशों को युद्ध की धमकी दी गई।
3. मिलान आदेश- 17 दिसम्बर 1807 में नेपोलियन ने मिलान आदेश जारी किया। इस
आदेश में कहा गया कि जो जहाज इंग्लैण्ड के बंदरगाहों पर तलासी देगा तथा उन बंदरगाहों पर
उपस्थित होगा उन सभी बाहरी जहाजों को जप्त कर लिया जाएगा।
4. फाउन्टेन्ेन्ेन्ब्लू आदेश्ेश्ेश – 18 अक्टूबर 1810 में कहा गया कि अंग्रेजी माल को जप्त किया
जाए तथा उसे खुले आम जलाया जाए तथा इसमें लिप्त लोगों को कठोर दण्ड दिया जाए। यह
एक कठोर आदेश था।
नेपोलियन के इन आदेशों के उपरान्त इंग्लैण्ड ने अपनी जबावी कार्यवाही प्रस्तुत की।
इसके प्रयुत्तर में इंग्लैण्ड ने ‘‘आर्डर इन कौंसिल’’ जारी किया। इंग्लैण्ड ने कहा कि फ्रांस तथा
उसके उपनिवेशों का कोई भी जहाज इंग्लैण्ड तथा उसके प्रभाव क्षेत्र में से एक स्थान से दूसरे
स्थान तक नहीं जा सकेगा अगर ऐसा हुआ तो उसको माल सहित जप्त कर लिया जाएगा।
नेपोलियन द्वारा महाद्वीपीय व्यवस्था को सफल बनाने के प्रयास
महाद्वीपीय व्यवस्था को सफल बनाने के लिए नेपोलियन को आवश्यक था कि वह इंग्लैण्ड
के आस-पास के द्वीप तथा ऐसे देश जो उसके प्रभाव क्षेत्र में नहीं थे उन पर दबाव डालकर
इंग्लैण्ड के व्यापार व्यवसाय को रोका जाए। और उन देशों का समर्थन लिया जाए। उनमें स्वीडन,
डनमार्क, स्पेन, पुर्तगाल, पोप का राज्य आदि देश थे जिन पर दबाव डालना आवश्यक था।
स्वीकार कर लें, प्रषा- प्रषा को भी इस योजना में सहयोग देने हेतु नेपोलियन ने संधि कर ली।
2. हालैण्ड- यहाँ नेपोलियन का भाई लुई वोनापार्ट राज्य कर रहा था। महाद्वीपीय योजना को वह
पूरी तरह लागू नहीं कर पाया दोनों भाईयों में मतभेद होने के कारण नेपेालियन ने उसके राज्य को
फ्रांस में मिला लिया।
फलस्वरूप ब्रिट्रिश जहाजों को स्केवेन्डिया के सारे बंदरगाहों में घुसना बंद कर दिया।
में पहुंच जाने का डर था। डेनमार्क ने इंकार कर दिया डेनमार्क के इंकार करने पर इंग्लैण्ड ने यह
वेड़ा जर्बदस्ती छीन लिया इससे डेनमार्क इंग्लैण्ड के विरूद्ध हो गया। और नेपोलियन की सहायता
करने लगा।
किया था।
दे ब्रिट्रिशों को पकड़कर उनकी सम्पत्ति जब्त कर ले पुर्तगाल के इंकार करने पर फ्रांसीसी सेना
स्पेन होती हुई पुर्तगाल में जा पहुंची वहाँ फ्रांसीसी सेनाओं का अधिकार हो गया।
इन सब देशों की सहायता आदि के बाबजूद नेपोलियन की महाद्वीपीय व्यवस्था सफल न
हो सकी।
महाद्वीपीय व्यवस्था के असफलता के कारण
यह योजना कुछ हद तक तो सफल हुई परन्तु असंभव प्रतीत होने वाली योजना का दुखद
अंत हुआ।
- देशों से यह आशा करना व्यर्थ था कि देश इस योजना का पालन सफलतापूर्वक करेगें।
- जहाजी बेड़े के अभाव में हजारों मील समुद्र तट की रक्षा करना फ्रांस के लिए असम्भव था।
- नेपोलियन ब्रिट्रिशों की चोर बाजारी को समाप्त करने में असफल रहा।
- नेपोलियन ने जिन राज्यों पर जर्बदस्ती दवाब डालकर इस योजना को स्वीकार करवाया
उन देशों ने अवसर पाते ही इसका परित्याग कर दिया। - नाकेवन्दी को सफल बनाने के लिए नेपोलियन को लगातार आक्रमण करने पड़े हालैण्ड
स्पेन तथा रूस एवं पोप इसके विरोधी बन गये।
इस प्रकार और भी कई कारण थे, जिसके फलस्वरूप यह योजना असफल हो गई।
महाद्वीपीय व्यवस्था के परिणाम
- देशों में भ्रष्टाचार तथा कालाबाजारी आदि फैलने लगी।
रु देशों में आर्थिक संकट छा गया, देशों को अपनी आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए जनता
पर अधिक से अधिक कर लगाये गये। - महाद्वीपीय व्यवस्था से निरंतर चलने वाले युद्धों से भयंकर नरसंहार हुआ। फ्रांस में भी
असंतोष फैल गया। इस योजना से 1812 में रूस तथा फ्रांस संबंध बिगड़ गये।
जिसके
परिणाम स्वरूप नेपोलियन के लिए घातक सिद्ध हुए और उसके पराभव का युग आरंभ
हुआ।