जिन्ना की 14 सूत्री मांग या शर्ते
मुस्लिम लीग द्वारा (नेहरू रिपोर्ट) को अस्वीकार कर दिये जाने के उपरांत। जिन्ना
अपनी 14 शर्तो के लेकर राजनीति के मंच पर अवतरित होते है जिसकी 14 सूत्री मांग या शर्ते निम्नलिखित
थी:
- भावी संविधान का ढांचा संघात्मक हो, जिसमें अवशिष्ट शक्तियां प्रांतो में निहित हो।
- अल्पसंख्यकों को सभी प्रतिनिधित्व संस्थाओं में उचित और पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिया
जाय। - सभी प्रान्तों को एक समान स्वशासन प्राप्त हो
- केन्द्रीय विधानमण्डल में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 1/3 से कम न हो।
- सांप्रदायिक वर्गो का प्रतिनिधित्व पृथक निर्वाचन पद्धति से हो
- किसी भी प्रादेशिक पुनःविभाजन द्वारा पंजाब बंगाल और पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में
मुसलमानो के बहुमत पर कोई प्रभाव न पड़ना चाहिए। - सभी संप्रदायो को विश्वास, धर्म तथा उपासना की स्वतंत्रता हो।
- किसी भी विधानसभा या लोक प्रतिनिधि संस्था में कोई विधेयक स्वीकृत नहीं होना
चाहिए, जैसे की किसी भी 3/4 सदस्य अपने हितों के विरूद्ध बताते हुए विरोध
करे। - सिंध को बंबई प्रेसीडेन्सी से पृथक कर दिया जाए।
- अन्य प्रान्तों में जिस प्रकार के सुधार किए जाएॅ उसी प्रकार के सुधार सीमा प्रांत और
बलोचिस्तान में किए जाए - सरकारी नौकरियों में मुसलमानों को उचित स्थान दिया जाय
- मुस्लिम संस्कृति भाषा आदि के संरक्षण की उचित व्यवस्था हो
- केन्द्रीय तथा प्रांतीय मंत्रीमण्डल में कम से कम 1/3 मंत्री मुसलमान हो
- संविधान में तभी परिवर्तन किया जाए जबकि संघ में आबद्ध सभी इकाई उसे स्वीकार
कर ले।
इस 14 सूत्री मांगो को जिन्ना ने 1924 के मुस्लिम लीग एवं कांग्रेस के सम्मिलित
सम्मेलन में रखा। यहां यह विचारणीय है की जिन्ना की इन शर्तो को मुस्लिम लीग के राष्ट्रीय
दल ने स्वीकार नहीं किया। मुस्लिम नेता चाहते थे की जिन्ना की 14 शर्तो को ध्यान में रखते
हुए भारत का भावी संविधान बनाया जाना चाहिए। इस तरह निरंतर मुस्लिम लीग सांप्रदायिकता
की ज्वाला भड़का रही थी। जिससे दोनों वर्गो को आग की लपट में झुलसना पड़ रहा था।
दूसरी तरफ ब्रिटिश सरकार ने जिन्ना की 14 सूत्रीय मांगो का विरोध नहीं किया बल्कि इन
शर्तो को मैकडोनेल्ड के सांप्रदायिक पंचाट में सम्मिलित कर लिया
गया।