अनुक्रम

बारह वर्ष की अवस्था में उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। अग्रज शंभुरतन का ध्यान व्यवसाय की ओर अधिक न था। देवी प्रसाद की मृत्यु के बाद गृहकलह ने जन्म लिया। मकान बिक गया। कॉलेज की पढ़ाई छूट गई। आठवीं कक्षा तक ही पढ़ सके। उपनिषद्, पुराण, वेद एवं भारतीय दर्शन का अध्ययन घर पर चलता रहा। जयशंकर प्रसाद जी कसरत किया करते थे। दुकान बही पर बैठे-बैठे कविता लिखा करते थे।
जयशंकर प्रसाद का व्यक्तित्व
मुख गोल था। उनकी हँसी बड़ी स्वाभाविक और मधुर थी। जवानी में वे ढाका की मलमल का कुरता
और बढ़िया धाते ी पहनते थे। परन्तु बाद में खद्दर का उपयोग करने लगे थे। श्री रामनाथ ‘सुमन’
प्रसाद जी के निकट सम्पर्क में रहे। उन्होंने ‘प्रसाद’ जी के व्यक्तित्व के सम्बंध में लिखा है- ‘‘व्यक्ति
की दृष्टि से जयशंकर प्रसाद एक उच्चकोटि के महापुरुष थे। वे कवि होने के कारण उदार व्यापारी
होने के कारण व्यवहारशील, पुराण शास्त्र, संस्कृत.काव्य आदि के विशेष अध्ययन के कारण प्राचीनता
की ओर झुके हुए, भारतीय आचारों एवं भारतीय सभ्यता के प्रति ममता रखने वाले तथा एक सीमा
तक पाश्चात्य सभ्यता के गुणों के प्रशसंक थे।
घटनाओं के बाह्य या तथ्यात्मक रूप से ही सन्तुष्ट होने वाले प्राणी नहीं थे, अपितु उन घटनाओं के
भीतर प्रविष्ट होकर तत्त्व चिन्तन से उनके मर्म का उद्घाटन करने में लगे रहते थे। यही कारण है
कि उनके ऐतिहासिक नाटक अन्तर्द्वन्द्व प्रधान है। उनके कथानकों का आधार सांस्कृतिक संघर्ष है।
वे संस्कृति, सभ्यता, धर्म दर्शन और नीति के माध्यम से इतिहास का मूल्यांकन करते थे। उनका
ऐतिहासिक और शास्त्रीय .ज्ञान असाधारण था। यह एक आश्चर्य की बात थी कि वे दार्शनिक चिन्तन
और ऐतिहासिक अध्ययन मनन के लिए कम अवकाश निकाल पाते थे।
और साहित्य.साधना का प्रथम और प्रमुख स्थान प्राप्त था। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर साहित्य सर्जन में लीन
हो जाना उनका अभ्यास ही हो गया था। जब अध्ययन और साहित्य सृजन हो जाता था, तब वे
बेनिया बाग में टहलने के लिए निकल पड़ते थे। वहाँ भी साहित्यिक मित्रों के साथ वार्तालाप किया
करते थे।
जयशंकर प्रसाद अन्तर्मुखी व्यक्ति थे। आत्म विज्ञापन करना वे अच्छा नहीं समझते थे। समारोह में
जाना, सभापति बनना और भाषण देना उन्हें अच्छा नहीं लगता था। प्रात: काल के भ्रमण के बाद वे
दो घण्टे तक अपने व्यवसाय की देखभाल करते, दोपहर को 12 बजे भोजन करके दो घण्टे नित्य
विश्राम करते और तीन बजे पुन: अपने कारोबार की देख रेख करते तथा व्यावसायिक पत्रों का उत्तर
लिखते थे। रात्रि के नौ बजे तक वे अपनी दूकान पर बैठे रहते और साहित्यक बन्धुओं के साथ विविध
विषयों पर चर्चा करते थे।
जयशंकर प्रसाद की प्रमुख रचनाएं
- कामायनी
- आँसू
- झरना
- लहर
- महाराणा का महत्त्व
- प्रेम पथिक
- कानन कुसुम
- चित्राधार
- करुणालय।
- राज्यश्री
- विशाख
- अजातशत्रु
- जनमेजय का नाग यज्ञ
- कामना
- स्कन्दगुप्त
- एक घूंट
- चन्द्रगुप्त
- ध्रुवस्वामिनी
- कल्याणी-परिणय
- सज्जन।
- कंकाल
- तितली
- इरावती (इसे वे पूरा नहीं कर पाए, क्योंकि इसके प्रणयन में संलग्न
रहते हुए वे अकाल काल-कवलित हो गए।)
4.कहानी – जयशंकर प्रसाद जी के कहानी संग्रहों के नाम हैं-
- आकाशदीप
- इन्द्रजाल
- प्रतिध्वनि
- आँधी
- छाया।
तथापि उनके आलोचनात्मक निबन्ध ही उनकी गवेषणात्मक, प्रज्ञा, विश्लेषण, मनीषा और
विचाराभिव्यक्ति के परिवाचक हैं। काव्य कला तथा अन्य निबन्ध में इनके आलोचनात्मक निबन्ध संग्रहीत हैं।
उर्वशी। इसके साथ ही इन्होंनें एक काव्य कहानी भी लिखी है जो प्रेम राज्य के नाम से
प्रसिद्ध है।
गद्य एवं पद्य साहित्य की समस्त विद्याओं में लिखा तथा साहित्य के सर्वांगीण विकास में
महत्वपूर्ण योगदान दिया।
जयशंकर प्रसाद की साहित्यिक विशेषताएं
गया। ‘झरना’ के पूर्व की सभी रचनाएं द्विवेदी युग में लिखी गई थीं। जयशंकर प्रसाद की आरंभिक शैली संस्कृत गर्भित है। ‘झरना’
में कवि ने आंतरिक कल्पना द्वारा सूक्ष्म भावनाओं को व्यक्त किया है। बाह्य सौंदर्य का चित्रण करते समय भी उन्होंने सूक्ष्म
और मानसिक पक्ष को व्यक्त करने की ओर ध्यान दिया है। ‘आंसू’ का आरंभ कवि की विरह-वेदना से हुआ है। अंत में ‘आंसू’
को विश्व-कल्याण की भावना से संबंधित कर दिया है। अंत तक आते-आते कवि अपने व्यक्तिगत जीवन की निराशा और
विषाद से ऊपर उठकर अपनी पीड़ा को करुणा का रूप देकर विश्व प्रेम में बदल देता है। ‘लहर’ गीत कला का सुंदर उदाहरण
है। कल्पना की मनोरमता, भावुकता तथा भाषा शैली की प्रौढ़ता सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। ‘कामायनी’ अंतिम कृति है। इसके
द्वारा मानव सभ्यता दिखलाई गई है।
व्यापक आदर्श व्यवस्था का प्रयत्न किया है। पात्रों के चरित्रांकन में मनुष्य की अनुभूतियों, कामनाओं और आकांक्षाओं की अनेक
रूपता वर्णित है। यह कामायनी की चेतना का मनोवैज्ञानिक पक्ष है। मनु श्रद्धा, इड़ा एवं मानव के द्वारा मानव मात्रा के मनोजगत
के विविध पक्षों का चित्राण चिंता, आशा, वासना, ईर्ष्या, संघर्ष एवं आनंद आदि सर्गों में किया गया है।
भी अद्भुत सम्मिश्रण हो गया है। पात्रों के ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ सांकेतिक अर्थ भी है। मनु-मन, श्रद्धा-हृदय तथा
इड़ा-मस्तिष्क का प्रतीक है। बुद्धिवाद के विरोध में हृदय पक्ष की प्रधानता दिखलाई गई है। शैव दर्शन के आनंदवाद को जीवन
के पूर्ण उत्कर्ष का साधन स्वीकारा गया है। ‘कामायनी’ गौरवशाली उपलब्धि है।