करते
सरकार ने झा समीति की सिफारिशों को मानते हुए 1965 में ‘कृषि मूल्य आयोग‘ का गठन
किया। 1980 में इस आयोग का नाम बदलकर ‘कृषि लागत तथा मूल्य आयोग रख दिया गया। आयोग में एक अध्यक्ष, एक सदस्य सचिव, दो सरकारी सदस्यों सहित
तीन गैर सरकारी सदस्य होते हैं गैर सरकारी सदस्यों में कृषक समुदाय के प्रतिनिधि होते
हैं। जिन्हें लम्बा कृषि अनुभव हो और जो कृषक समुदाय का सक्रीय सहयोग करते हैं।
कृषि लागत और मूल्य आयोग के कार्य
आयोग किसानों, उपभोक्ता और
सरकार के लिए निम्न कार्य सम्पादित करता है-
सरकार के लिए निम्न कार्य सम्पादित करता है-
(1)- सरकार को कृषि उत्पादों के मून्यों के बारे में विशेषतया गेहूँ, चावल, ज्वार, मक्की,
चना दालें, गन्ना, तिलहन, पटसन तथा कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्यों के बारे में सुझाव
देना। आयोग को ये सुझाव देते समय, न केवल उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं के हितो को
ध्यान में रखना था, अपितु इन मूल्यों के समूची अर्थव्यवस्था के विकास पर पड़ने वाले
प्रभाव को भी सामने रखना था। इसके साथ ही आयेग को यह भी सुनिश्चित करना था,
कि सुझाये गये मूल्यों का आपस में परिस्थिति के अनुसार पूरा सन्तुलन तथा समन्वय है।
चना दालें, गन्ना, तिलहन, पटसन तथा कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्यों के बारे में सुझाव
देना। आयोग को ये सुझाव देते समय, न केवल उत्पादकों तथा उपभोक्ताओं के हितो को
ध्यान में रखना था, अपितु इन मूल्यों के समूची अर्थव्यवस्था के विकास पर पड़ने वाले
प्रभाव को भी सामने रखना था। इसके साथ ही आयेग को यह भी सुनिश्चित करना था,
कि सुझाये गये मूल्यों का आपस में परिस्थिति के अनुसार पूरा सन्तुलन तथा समन्वय है।
(2)- देश के विभिन्न खण्डों में, विभिन्न कृषि उत्पादों को बाजार में बेचने के तरीकों तथा
बेचने में आने वाली लागतों का अध्ययन करना। आयोग को इन उत्पादों की बिक्री पर आने
वाली लागत को कम करने के सुझाव देने थे। साथ ही, इसने बिक्री की प्रक्रिया के विभिन्न
चरणों के लिए उपयुक्त लाभों के बारे में भी बताना था।
बेचने में आने वाली लागतों का अध्ययन करना। आयोग को इन उत्पादों की बिक्री पर आने
वाली लागत को कम करने के सुझाव देने थे। साथ ही, इसने बिक्री की प्रक्रिया के विभिन्न
चरणों के लिए उपयुक्त लाभों के बारे में भी बताना था।
(3)- कृषि मूल्य नीति के सम्बन्ध में हो रहे अध्ययनों पर निगाह रखनी, कृषि मूल्यों तथा
अन्य सम्बन्धित आंकड़ो के बारे में सूचना एकत्रित करने के तरीकों पर ध्यान रखना तथा
इनमें सुधार के बारे में सुझाव देना।
अन्य सम्बन्धित आंकड़ो के बारे में सूचना एकत्रित करने के तरीकों पर ध्यान रखना तथा
इनमें सुधार के बारे में सुझाव देना।
(4)- अर्थव्यवस्था में बदलती हुई परिस्थितियों का ध्यान रखना तथा इनके अनुसार समूची
मूल्य नीति के लिए आवश्यक सुझाव देना।
मूल्य नीति के लिए आवश्यक सुझाव देना।
(5)- उन उत्पादों के बारे में मूल्य नीति को, प्रभावशाली ढंग से लागू करने के लिए सुझाव
देने।
देने।
(6)- सरकार को कृषि उत्पादन तथा कृषि मूल्यों से जुड़ी हुई प्रत्येक उस समस्या के बारे
में परामर्श देना, जो कि सरकार समय-समय पर इसके सामने लाये।
आयोग लगातार ऐसी संस्थाओं से सम्पर्क बनाए रखता है, जो कृषि मूल्यों और कृषि
उत्पादन से जुड़े हुए विषयों के बारे में जानकारी रखती है।
में परामर्श देना, जो कि सरकार समय-समय पर इसके सामने लाये।
आयोग लगातार ऐसी संस्थाओं से सम्पर्क बनाए रखता है, जो कृषि मूल्यों और कृषि
उत्पादन से जुड़े हुए विषयों के बारे में जानकारी रखती है।
आयोग के कृषि मूल्य नीति के उद्देश्य
कृषि लागत और मूल्य आयोग ने कृषि मूल्य नीति बनाते समय निम्न उद्देश्यों को सामने
रखा है-
रखा है-
- विभिन्न कृषि उत्पादों के मूल्यों में मौसमी उतार-चढ़ाव को कम करना।
- कृषि उत्पादकों को उनके उत्पादों के उचित दाम दिलवाना।
- कृषि उत्पादकों को कृषि उत्पादन में वृद्धि करने के लिए प्रोत्साहित करना।
- उपभोक्ताओं के लिए खाद्यान्न की आपूर्ति उचित मूल्य व मात्रा में सुनिश्चित करना।
- औद्योगिक क्षेत्र के लिए कच्चेमाल को उचित मात्रा में उपलब्ध कराना।
- विभिन्न कृषि उत्पादों के मूल्य इस प्रकार निर्धारित किये जाये कि सभी कृषि उत्पादों
को ऐच्छिक दिशा में परिवर्तित किया जा सके। - मूल्यों को ऐसा निर्धारित करना कि ये समूची अर्थव्यवस्था के व्यवस्थित विकास में
सहायता करें। - विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के बाद, आयोग के लिए यह अनिवार्य हो गया है
कि कृषि उत्पादों के मूल्य इस प्रकार निर्धारित कियो जायें, कि वह अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में
प्रतियोगिता करने में समर्थ हो।