अनुक्रम
संगठन के आशय व्यक्तियों के ऐसे समूह से है जो अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु संगठन के संसाधनों एवं मानवीय प्रयासों में एक ऐसा सम्बन्ध स्थापित करता है। ‘‘संगठन व्यक्तियों का एक समूह या तंत्र है जो एक व्यक्ति के नेतृत्व में पूर्व निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मिलकर समन्वित रूप से कार्य करते हैं।’’
संगठन एक प्रक्रिया है जिसके अन्तर्गत संगठन की सम्पूर्ण क्रियाओं को निश्चित एवं वर्गीकृत किया जाता है, विभिन्न व्यक्तियों के मध्य अधिकारी एवं दायित्वों को आवंटित किया जाता है तथा उनके बीच परस्पर सम्बन्धों की स्थापना की जाती है।
हमारे समाज में धार्मिक संगठन (जैसे – विश्व हिन्दू परिषद, जमायते
इस्लामी, कैथोलिक क्रिश्चियन सोसाइटी), राजनीतिक संगठन (कांग्रेस, भारतीय
जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी) आध्
यात्मिक संगठन। राधास्वामी सत्संग, ओशो इंटरनेशनल, जूना अखाड़ा,
निरंजनी अखाड़ा), आतंकवादी संगठन (लश्करे तैयबा, जैश ए मोहम्मद,
तालिबान) वैधानिक संगठन (रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया, योजना आयोग) हैं।
इस्लामी, कैथोलिक क्रिश्चियन सोसाइटी), राजनीतिक संगठन (कांग्रेस, भारतीय
जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टी) आध्
यात्मिक संगठन। राधास्वामी सत्संग, ओशो इंटरनेशनल, जूना अखाड़ा,
निरंजनी अखाड़ा), आतंकवादी संगठन (लश्करे तैयबा, जैश ए मोहम्मद,
तालिबान) वैधानिक संगठन (रिजर्व बैंक ऑफ इण्डिया, योजना आयोग) हैं।
संगठन की परिभाषा
1. चेस्टर आई बर्नार्ड के अनुसार, ‘‘संगठन दो या दो से अधिक
व्यक्तियों द्वारा सोच समझ कर की गई समन्वित क्रियाओं का तंत्र है।
व्यक्तियों द्वारा सोच समझ कर की गई समन्वित क्रियाओं का तंत्र है।
2. मैक फालैड के अनुसार, ‘‘संगठन से तात्पर्य व्यक्तियों के एक
विशेष समूह से है जो पूर्व निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मिलकर कार्य
करते हैं।’’
विशेष समूह से है जो पूर्व निश्चित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए मिलकर कार्य
करते हैं।’’
3. इटजियोनि के अनुसार, ‘‘संगठन विशिष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति के
लिये, स्वेच्छा से निर्मित एवं पूर्वनिर्मित सामाजिक इकाइयाँ हैं।’’
लिये, स्वेच्छा से निर्मित एवं पूर्वनिर्मित सामाजिक इकाइयाँ हैं।’’
4. आर. सी. डेविस के अनुसार, ‘‘संगठन व्यक्तियों का एक समूह है जो
अपने नेता के निर्देशन में सामान्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु सहयोग प्रदान करता
हैं।’’
अपने नेता के निर्देशन में सामान्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु सहयोग प्रदान करता
हैं।’’
5. किम्बाल एव किम्बाल के अनुसार, ‘‘संगठन के अन्तगर्त उन सभी
कर्तव्यों का समावेश किया जाता है जो विभागों तथा उनके कर्मचारियों को
तैयार करने, उनके प्रकार्यों की व्यवस्था करने तथा विभाग व व्यक्तियों के
बीच सम्बन्धों के निश्चित करने से सम्बन्धित हैं।’’
कर्तव्यों का समावेश किया जाता है जो विभागों तथा उनके कर्मचारियों को
तैयार करने, उनके प्रकार्यों की व्यवस्था करने तथा विभाग व व्यक्तियों के
बीच सम्बन्धों के निश्चित करने से सम्बन्धित हैं।’’
6. कूष्टज एवं आडेानेल के अनुसार, ‘‘संगठन एक साभिप्राय एवं विन्धिसंगत भूमिकाओं अथवा अवस्थितियों की संरचना है।’’
7. हरबर्ट ए. साइमन के अनुसार, ‘‘किसी मानव समूह से संचार एवं
अन्य सम्बन्धों के जटिल कलेवर को संगठन कहते हैं।’’
अन्य सम्बन्धों के जटिल कलेवर को संगठन कहते हैं।’’
8. हॉज व जॉॅनसन के अनुसार, ‘‘संगठन मानवीय एवं भाैितक तंत्र के
अन्तर्जाल या ढांचे के रूप में बनाया जाता है।’’
अन्तर्जाल या ढांचे के रूप में बनाया जाता है।’’
थियो हैमेन के अनुसार, ‘‘संगठन का तात्पर्य व्यक्तियों के कर्तव्यों के
निर्धारण, उनके आवंटन एवं वर्गीकृत क्रियाओं के मध्य अधिकार सत्ता सम्बन्ध ाो की स्थापना तथा उनके अनुरक्षण से है।’’
निर्धारण, उनके आवंटन एवं वर्गीकृत क्रियाओं के मध्य अधिकार सत्ता सम्बन्ध ाो की स्थापना तथा उनके अनुरक्षण से है।’’
उर्विक के अनुसार, ‘‘किसी कार्य को पूरा करने के लिए जिन जिन
क्रियाओं को किया जाय, उनका निर्धारण करना एवं उन क्रियाओं को
व्यक्तियों के व्यक्तियों के मध्य वितरित करना ही संगठन कहलाता है।
क्रियाओं को किया जाय, उनका निर्धारण करना एवं उन क्रियाओं को
व्यक्तियों के व्यक्तियों के मध्य वितरित करना ही संगठन कहलाता है।
एफ.एल. के अनुसार, ‘‘संगठन प्रबन्ध की कार्य संरचना है क्याेिंक
वह अधिक सार्थक कार्य सम्पादन के लिए कुल दायित्वों को ठीक ठीक
विभक्त कर वितरित करता है।
वह अधिक सार्थक कार्य सम्पादन के लिए कुल दायित्वों को ठीक ठीक
विभक्त कर वितरित करता है।
एलेन के अनुसार, ‘‘संगठन कार्यो को निश्चित एव श्रेणीबद्ध करने
दायित्वों एवं अधिकारों को परिभाषित एवं प्रत्यायोजित करने तथा उद्देश्यों
की प्राप्ति हेतु व्यक्तियों को श्रेष्ठतम विधि से काम करने के लिए सम्बन्ध
स्थापित करने की प्रक्रिया है।
दायित्वों एवं अधिकारों को परिभाषित एवं प्रत्यायोजित करने तथा उद्देश्यों
की प्राप्ति हेतु व्यक्तियों को श्रेष्ठतम विधि से काम करने के लिए सम्बन्ध
स्थापित करने की प्रक्रिया है।
संगठन की विशेषताएँ
संगठन
की विशेषताएँ दृष्टिगोचर होती हैं –
1. व्यक्तियो का समूह – व्यक्ति एक निश्चित उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही एक दूसरे की ओर
आकर्षित होते हैं और एक संगठन का निर्माण करते हैं। यह उद्देश्य पर
निर्भर करता है कि किसे संगठन का सदस्य बनाया जाना चाहिए। और किसे
संगठन का सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकता ही
व्यक्तियों को संगठन निर्माण के लिये प्रेरित करती है।
आकर्षित होते हैं और एक संगठन का निर्माण करते हैं। यह उद्देश्य पर
निर्भर करता है कि किसे संगठन का सदस्य बनाया जाना चाहिए। और किसे
संगठन का सदस्य नहीं बनाया जाना चाहिए। इस प्रकार आवश्यकता ही
व्यक्तियों को संगठन निर्माण के लिये प्रेरित करती है।
2. लक्ष्य का होना – लक्ष्यों को ध्यान में रखकर ही संगठनों का निर्माण किया जाना एवं
उसके सदस्य बनाये जाते हैं। लक्ष्य ही संगठनों को एक दिशा देते हैं। लक्ष्य
ही कार्य पथ के चयन में सहायता प्रदान करते हैं।
उसके सदस्य बनाये जाते हैं। लक्ष्य ही संगठनों को एक दिशा देते हैं। लक्ष्य
ही कार्य पथ के चयन में सहायता प्रदान करते हैं।
3. एकीकृत प्रणाली – एकीकृत प्रणाली के अभाव में संगठन छिन्न भिन्न हो जायेगा और निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति असम्भव हो जायेगी। किसी भी संगठन के लिए
एकीकृत प्रणाली इसलिये आवश्यक है क्योंकि संगठन के लक्ष्यों की प्राप्ति
सामूहिक प्रयास से ही सम्भव है और इस प्रयास के लिये आवश्यक है कि
संगठन में एक बेहतर संदेशवाहन तंत्र विकसित स्वरूप में हो और तभी
संगठन एकीकृत प्रणाली के रूप में कार्य कर सकेंगे और निर्धारित लक्ष्यों को
प्राप्त कर सकेंगें।
एकीकृत प्रणाली इसलिये आवश्यक है क्योंकि संगठन के लक्ष्यों की प्राप्ति
सामूहिक प्रयास से ही सम्भव है और इस प्रयास के लिये आवश्यक है कि
संगठन में एक बेहतर संदेशवाहन तंत्र विकसित स्वरूप में हो और तभी
संगठन एकीकृत प्रणाली के रूप में कार्य कर सकेंगे और निर्धारित लक्ष्यों को
प्राप्त कर सकेंगें।
4. साधन – संगठन का एक साधन के रूप में सफल प्रयोग तभी सम्भव होगा
जबकि संगठन स्वयं में सुव्यवस्थित, सुगठित एवं कार्यक्षम हो क्योंकि जब तक
साधन श्रेष्ठ न हो और साधनों का प्रयोग श्रेष्ठतम ढंग से न किया जाय तब
तक वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति सम्भव नहीं है। संगठन को साधन के रूप में
प्रयोग कर ही हम अपने सामाजिक, आर्थिक , धार्मिक, राजनीतिक उद्देश्यों
की पूर्ति करते हैं।
जबकि संगठन स्वयं में सुव्यवस्थित, सुगठित एवं कार्यक्षम हो क्योंकि जब तक
साधन श्रेष्ठ न हो और साधनों का प्रयोग श्रेष्ठतम ढंग से न किया जाय तब
तक वांछित लक्ष्यों की प्राप्ति सम्भव नहीं है। संगठन को साधन के रूप में
प्रयोग कर ही हम अपने सामाजिक, आर्थिक , धार्मिक, राजनीतिक उद्देश्यों
की पूर्ति करते हैं।
5. प्रन्धकीय व्यवस्था – संगठन के संसाधनों का समन्वय, संगठन का एक साधन के रूप में
प्रयोग या संगठन को एकीकृत प्रणाली के रूप में प्रयोग करना आदि एक
कुशल प्रबन्धन द्वारा ही सम्भव है इसीलिए संगठन को एक महत्वपूर्ण प्रबन्ध्
ाकीय व्यवस्था माना जाता है जो निहित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु सतत रूप से
कार्यरत रहती है।
6. प्रक्रिया – संगठन एक प्रक्रिया के रूप में निरन्तर गतिशील रहता है। संगठन
एक निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति करता हैं। संगठन के सभी कार्य एक
चरणबद्ध तरीके से तथा सुनियोजित होते हैं। संगठन एक प्रक्रिया के रूप में
भी विकसित किये जाते हैं।
एक निर्धारित उद्देश्यों की प्राप्ति करता हैं। संगठन के सभी कार्य एक
चरणबद्ध तरीके से तथा सुनियोजित होते हैं। संगठन एक प्रक्रिया के रूप में
भी विकसित किये जाते हैं।
संगठन की प्रक्रिया
संगठन की प्रक्रिया से आशय, संगठन द्वारा उठाये गये उन आवश्यक
कदमों से है जिससे संगठन प्रभावशाली ढंग से गतिशील रह सके। इसके
लिए इन बिन्दु विचारणीय हैं।
1. क्रियाओं का वर्गीकरण – प्रत्येक सगंठन से क्रियाओ का उचित
वर्गीकरण किया जाना चाहिए। संगठन के प्रत्येक विभाग, विभाग के उपविभागों
और उपविभागों से कार्यरत व्यक्तियों में कार्यों का स्पष्ट रूप से वर्गीकरण
किया जाना चाहिए। क्रियाओं के वर्गीकरण में यह सदैव ध्यान में रखना
चाहिए कि कार्यभार का वितरण समान रूप से तथा व्यक्ति या विभाग को
अतिभार की अनुभूति। इससे संगठन के कार्य संचालन में संतुलन और समता
बनी रहती है। संगठन के सफलतापूर्वक कार्य संचालन के लिये यह
आवश्यक है कि विभिन्न विभागों के कार्यभार का समय समय पर मूल्यांकन
करते रहना चाहिये।
वर्गीकरण किया जाना चाहिए। संगठन के प्रत्येक विभाग, विभाग के उपविभागों
और उपविभागों से कार्यरत व्यक्तियों में कार्यों का स्पष्ट रूप से वर्गीकरण
किया जाना चाहिए। क्रियाओं के वर्गीकरण में यह सदैव ध्यान में रखना
चाहिए कि कार्यभार का वितरण समान रूप से तथा व्यक्ति या विभाग को
अतिभार की अनुभूति। इससे संगठन के कार्य संचालन में संतुलन और समता
बनी रहती है। संगठन के सफलतापूर्वक कार्य संचालन के लिये यह
आवश्यक है कि विभिन्न विभागों के कार्यभार का समय समय पर मूल्यांकन
करते रहना चाहिये।
2. व्यक्तियों में कार्य आवटंन – कार्मिकों में कार्य आवटंन के समय
सतर्कता बरतनी चाहिए। काम का वितरण उचित आधारों पर किया जाना
चाहिए। इसके लिए सम्बन्धित कार्मिक की योग्यता, अनुभव, कार्यचातुर्य आदि
को ध्यान में रखा जा सकता है। कार्य के उचित आवंटन से व्यक्ति विशेष को
उत्तरदायी ठहराया जा सकता है तथा इससे कार्य के प्रति व्यक्ति पर्याप्त रूप
से सजग रहते हैं।
सतर्कता बरतनी चाहिए। काम का वितरण उचित आधारों पर किया जाना
चाहिए। इसके लिए सम्बन्धित कार्मिक की योग्यता, अनुभव, कार्यचातुर्य आदि
को ध्यान में रखा जा सकता है। कार्य के उचित आवंटन से व्यक्ति विशेष को
उत्तरदायी ठहराया जा सकता है तथा इससे कार्य के प्रति व्यक्ति पर्याप्त रूप
से सजग रहते हैं।
3 निश्चितता – एक सगंठन का गठन एक निश्चित लक्ष्या ें की पा्र प्ति
के लिये किया जाता है, संगठन एक निश्चित क्रियाविधि अपनाते हैं, एक
निश्चित पथ का चयन करते हैं, निश्चित संसाधनों का प्रयोग करते हैं एवं एक
निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करते हैं,। जब निश्चितता का अभाव हो जाता है
तो असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और लक्ष्यों को प्राप्त करना
दुरूह हो जाता हैं ।
के लिये किया जाता है, संगठन एक निश्चित क्रियाविधि अपनाते हैं, एक
निश्चित पथ का चयन करते हैं, निश्चित संसाधनों का प्रयोग करते हैं एवं एक
निश्चित उद्देश्यों को प्राप्त करते हैं,। जब निश्चितता का अभाव हो जाता है
तो असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और लक्ष्यों को प्राप्त करना
दुरूह हो जाता हैं ।
4. सत्ता का हस्तान्तरण – किसी सगंठन में कार्यो का आवटंन एवं
उत्तरदायित्व के निर्धारण के साथ साथ यह परम आवश्यक है कि सम्बन्धित
व्यक्ति को आवश्यक अधिकार दिये जायें जिससे वह निर्दिष्ट कार्य कर
सकें। एक व्यक्ति सभी कार्य को सम्पन्न नहीं कर सकता है। करने/कराने
हेतु आवश्यक अधिकार भी दिये जायें अर्थात सत्ता का समुचित हस्तान्तरण
भी किया जाय।
उत्तरदायित्व के निर्धारण के साथ साथ यह परम आवश्यक है कि सम्बन्धित
व्यक्ति को आवश्यक अधिकार दिये जायें जिससे वह निर्दिष्ट कार्य कर
सकें। एक व्यक्ति सभी कार्य को सम्पन्न नहीं कर सकता है। करने/कराने
हेतु आवश्यक अधिकार भी दिये जायें अर्थात सत्ता का समुचित हस्तान्तरण
भी किया जाय।
5. कुशलता – सगंठन में उपलब्ध ससांधनों का प्रयोग कुशलता पूर्वक
एवं सर्वोत्तम ढंग से किया जाना चाहिये जिससे संसाधनों की अधिकतम
क्षमता का दोहन किया जा सके। इसके लिये उदारवादी कार्मिक नीति होनी
चाहिए जिसमें ष्र्या, द्वेष संघर्ष, भेद भाव, दबाव एवं शोषणवादी प्रवृत्ति का
सर्वथा अभाव होना चाहिए। जिसके परिणाम स्वरूप संगठन के सभी व्यक्ति
तन्मय होकर सफलतापूर्वक कार्य करते हैं।
एवं सर्वोत्तम ढंग से किया जाना चाहिये जिससे संसाधनों की अधिकतम
क्षमता का दोहन किया जा सके। इसके लिये उदारवादी कार्मिक नीति होनी
चाहिए जिसमें ष्र्या, द्वेष संघर्ष, भेद भाव, दबाव एवं शोषणवादी प्रवृत्ति का
सर्वथा अभाव होना चाहिए। जिसके परिणाम स्वरूप संगठन के सभी व्यक्ति
तन्मय होकर सफलतापूर्वक कार्य करते हैं।
6. समन्वय एव संतुलन – सगंठन के उद्देश्यों एवं कार्यों में समन्वय
होना चाहिए। संगठन संरचना का कलेवर सुस्पष्ट होने पर ही बेहतर ढंग से
समन्वय किया जा सकता है। संगठन के प्रत्येक कार्य, विभाग, व्यक्तियों में
परस्पर समन्वय एवं संतुलन होना चाहिए। जिससे संसाधनों का अनुकूलतम
प्रयोग सम्भव हो सके तथा श्रेष्ठतम परिणाम प्राप्त किये जा सकें।
होना चाहिए। संगठन संरचना का कलेवर सुस्पष्ट होने पर ही बेहतर ढंग से
समन्वय किया जा सकता है। संगठन के प्रत्येक कार्य, विभाग, व्यक्तियों में
परस्पर समन्वय एवं संतुलन होना चाहिए। जिससे संसाधनों का अनुकूलतम
प्रयोग सम्भव हो सके तथा श्रेष्ठतम परिणाम प्राप्त किये जा सकें।
7. लोचपूर्णता – सगंठन के कलेवर का विकास एव विस्तार सुदढृ आधारों पर किया जाना चाहिये जो दीर्घकाल तक गतिशील रह सके परन्तु
आज के परिवर्तनशील युग में इस बात की भी आवश्यकता है कि इसके
कलेवर में लोचपूर्णता का गुण भी अवश्य होनी चाहिये जिससे आवश्यकता
पड़ने पर समुचित परिवर्तन कियेजा सकें। इन परिवर्तनों के कारण संगठन के
कार्यों में किसी प्रकार अस्त व्यस्त नहीं होने चाहिए।
आज के परिवर्तनशील युग में इस बात की भी आवश्यकता है कि इसके
कलेवर में लोचपूर्णता का गुण भी अवश्य होनी चाहिये जिससे आवश्यकता
पड़ने पर समुचित परिवर्तन कियेजा सकें। इन परिवर्तनों के कारण संगठन के
कार्यों में किसी प्रकार अस्त व्यस्त नहीं होने चाहिए।