अनुक्रम
प्रयोग विविध सामाजिक विज्ञानों में कई दशकों से होता आया है। अनेकों विद्धानों ने अपने
अध्ययनों में इस पद्धति का प्रयोग किया है। यह पद्धति किसी भी सामाजिक इकाई का उसकी
सम्पूर्णता एवं गहनता में अध्ययन करती है। इसके द्वारा किया गया अध्ययन इतना गहन होता
है कि इसे ‘सामाजिक सूक्ष्मदर्शक यन्त्र‘ तक की संज्ञा दी गई है। जिस प्रकार सूक्ष्मदर्शक यन्त्र
से ऐसे कीटाणुओं को भी देखा जा सकता है जिन्हें हम अपनी नंगी आंखों से नहीं देख पाते
हैं। वैसे ही इस पद्धति के द्वारा हम उन सामाजिक तथ्यों को भी उद्घाटित कर लेते हैं जो
किसी अन्य विधि द्वारा सम्भव नहीं हो सकता है।
प्रस्तुत इकाई में हम आपको इस पद्धति के प्रारम्भिक विकास, परिभाषाओं, मान्यताओं,
कार्यविधियों/चरणों, सूचनाओं के स्रोत इत्यादि से अवगत करवाते हुए इसके महत्व और
सीमाओं को भी बतलायेगें। इकाई के अध्ययन के उपरान्त आपके लिए भी यह सम्भव होगा कि
भविष्य में सामाजिक शोधों में इसका प्रयोग कर सकें।
वैयक्तिक अध्ययन एक पद्धति के रूप में
वैयक्तिक अध्ययन सामाजिक शोध की एक महत्वपूर्ण पद्धति/विधि है। जिसका विकास
विशेषत: अमेरिका में हुआ। इस पद्धति का गहन एवं विस्तारपूर्वक प्रयोग मनोविज्ञान, शिक्षाशास्त्र,
अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र तथा राजनीतिशास्त्र जैसी विधाओं में किया गया। शनै: शनै: किसी
सामाजिक समस्या के विभिन्न पहलुओं के उद्विकास एवं वृद्धि को रेखांकित करने की एक
अत्यधिक सुविधाजनक पद्धति के रूप में इसे मान्यता प्रदान की गयी। यह पद्धति एक
अर्द्धविकसित अथवा विकासशील राष्ट्र के अन्तर्गत विशेष रूप से उपयोगी समझी जाती रही है,
जहाँ विभिन्न प्रकार की सामाजिक संस्थाएँ पारस्परिक अन्त:क्रिया करती हैं।
पी.वी. यंग (1977 : 247) का कहना है कि, ‘‘किसी एक सामाजिक इकाई चाहे वह इकाई एक
व्यक्ति, एक समूह, एक संस्था, एक जिला अथवा एक समुदाय ही हो, का विस्तृत अध्ययन
वैयक्तिक अध्ययन कहलाता है।’’ सरलतम शब्दों में हम कह सकते हैं कि इसमें किसी भी
सामाजिक इकाई को सम्पूर्णता की दृष्टि से देखा जाता है। ऐसा ही विचार गुडे और हाट (1952
: 331) ने भी व्यक्त किया है।
में लिखा है कि, ‘‘वैयक्तिक अध्ययन गुणात्मक विश्लेषण का एक विशेष स्वरूप है जिसके
अन्तर्गत किसी व्यक्ति, परिस्थिति अथवा संस्था का अत्यधिक सावधानीपूर्वक और पूर्ण अवलोकन
किया जाता है।’’
सिन पाओ येंग ने अपनी पुस्तक, ‘फैक्ट फाईडिंग विद रूरल पीपुल (1971)’ में लिखा है कि,
‘‘वैयक्तिक अध्ययन पद्धति को किसी एक छोटे, सम्पूर्ण तथा गहन अध्ययन के रूप में परिभाषित
किया जा सकता है, जिसके अन्तर्गत अनुसंधानकर्ता किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में पर्याप्त
सूचनाओं का व्यवस्थित संकलन करने के लिए अपनी समस्त क्षमताओं और विधियों का उपयोग
करता है, जिससे यह ज्ञात हो सके कि एक स्त्री अथवा पुरुष समाज की एक इकाई के रूप में
किस प्रकार कार्य करता है।’’
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि, वैयक्तिक अध्ययन से अभिप्राय सामाजिक शोध में
प्रयुक्त एक विधि (पद्धति) से है, जो एक व्यक्ति, परिवार, संस्था अथवा समुदाय के रूप में एक
सामाजिक इकाई से सम्बन्धित गुणात्मक सामग्री के संग्रह को सम्भव बनाती है।
इस विधि की प्रकृति को समुचित रूप से समझने के लिए यह आवश्यक है कि इस प्रत्यय से
सम्बन्धित प्रमुख विशेषताओं को स्पष्ट किया जाये।
- यह सापेक्षतया अधिक गुणात्मक है।
- यह विधि एक विशिष्ट सामाजिक इकाई का सम्पूर्ण अध्ययन है।
- इस विधि द्वारा किया जाने वाला अध्ययन अत्यधिक सूक्ष्म एवं गहन होता है।
- इस विधि में अतीत एवं वर्तमान दोनों का समन्वय होता है। इस विधि में अध्ययनकर्ता
किसी इकाई से सम्बन्धित अतीत के तथ्यों को जानने के साथ ही उनका वर्तमान स्थिति से
सह-सम्बन्ध ज्ञात करने का प्रयत्न करता है। - इस विधि के द्वारा अध्ययन की इकाई के विभिन्न तत्वों के एकीकरण एवं समग्रता की
स्थिति को स्वीकार करते हुए विभिन्न सूचनाओं को एकत्रित करने का प्रयास किया जाता
है। - इस विधि का प्रमुख उद्देश्य किसी चयनित इकाई की विभिन्न परिस्थितियों के बीच
कार्य-कारण के सम्बन्धों को ज्ञात करना है। इस विधि के माध्यम से चयनित इकाई के
व्यवहार को प्रेरणा अथवा प्रोत्साहन देने वाले कारकों के विषय में जानकारी प्राप्त की जाती
है तथा यह जानने का भी प्रयत्न किया जाता है कि, वर्तमान परिस्थितियाँ अतीत की
परिस्थितियों से किस प्रकार प्रभावित अथवा अप्रभावित हैं।
संक्षेप में, वैयक्तिक अध्ययन विधि की उपर्युक्त विशेषताओं के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है
कि, इस विधि का प्रयोग करते हुए यह ज्ञात होता है कि, प्रमुख रूप से किसी चयनित इकाई
के आन्तरिक संरचना सम्बन्धित पहलू क्या है तथा इस आन्तरिक संरचना के अतीत एवं वाºय
वातावरण के बीच क्या सम्बन्ध हैं इसी आधार पर वैयक्तिक अध्ययन विधि को बर्गेस
(1949रू25.26) ने ‘सामाजिक सूक्ष्म-दर्शक यंत्र‘ (सोशल माइक्रोस्कोप) नाम से सम्बोधित किया
है।
हो जाता है कि, सामाजिक विज्ञानों के अन्तर्गत इस विधि के उद्विकास पर प्रकाश डाला जाये।
विचार इस प्रकार व्यक्त किए हैं, ‘‘वास्तव में सामाजिक विज्ञानों के अन्तर्गत वैयक्तिक विधि के
सबसे पहले प्रयोग इतिहासकारों के व्यक्तियों एवं राष्ट्रों के विवरण थे, जिनका अनुगमन बाद में
अधिक छोटे समूहों, गुटों एवं व्यक्तियों के विस्तृत अध्ययनों द्वारा किया गया।’’
फ्रेडरिक लीप्ले (1806.1882) ने सामाजिक विज्ञान में वैयक्तिक अध्ययन विधि का प्रयोग
पारिवारिक बजट के अपने अध्ययनों के अन्तर्गत किया। तत्पश्चात् हरबर्ट स्पेन्सर (1820.1903)
ने नृशास्त्रीय अध्ययनों में वैयक्तिक अध्ययन का प्रयोग किया । बाद में
बाल अपराधियों के अध्ययन में मनोचिकित्सक विलियम हीली ने इस पद्धति को अपनाया।
डाला है। थामस और नैनिकी की पुस्तक ‘दी पोलिश पीजेन्ट इन यूरोप एण्ड अमेरिका’
के प्रकाशन होने के बाद ही इस अध्ययन विधि को एक व्यवस्थित समाजशास्त्रीय क्षेत्र शोध के
वास्तविक प्रयोग एवं स्वीकृति मिल पायी। इस पुस्तक में वैयक्तिक दस्तावेजों- डायरियाँ, पत्रों,
आत्मकथाओं का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया गया था। इस विषय पर बेन्जामिन पाल की पुस्तक
‘वेल्थ, कल्चर एण्ड कम्युनिटी’ महत्वपूर्ण है, जिसने विश्व के विभिन्न भागों में सामुदायिक स्तर
पर किए गये वैयक्तिक अध्ययनों को सम्मिलित कर विश्व समुदाय के समक्ष इस विधि को
प्रकाशित किया।
प्रत्यय सामाजिक शोध के अन्तर्गत प्रयोग में आते रहें हैं। प्रचलन के तौर पर यह कहा जा
सकता है कि जहाँ ‘वैयक्तिक अध्ययन’ किसी एक विशेष इकाई के गहन अन्वेषण के रूप में
स्थापित है, वहीं ‘वैयक्तिक कार्य’ विकासात्मक एवं समायोजनात्मक प्रक्रियाएँं जो निदान का
अनुगमन करती हैं, के सन्दर्भ में प्रयुक्त होता रहा है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि, ये दोनों
विधियाँ एक सामाजिक अथवा वैयक्तिक समस्या के प्रति समान अभिगम/उपागम का स्वरूप हैं,
तथा अन्तर्सम्बन्धित एवं अनिवार्यत: दोनों एक-दूसरे के सम्पूरक हैं।
समय-समय पर किसी चयनित इकाई के परिदृश्य में आँकड़ों को संगठित करने के ढंग के रूप
में परिभाषित होता रहा है। यह भी समझा जाता रहा है कि वैयक्तिक अध्ययन पद्धति का
तात्पर्य अध्ययन के एक ऐसे तरीके से है, जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के क्रियाकलापों,
मनोवृत्तियों और जीवन-इतिहास का गहन अध्ययन किया जाता है। परन्तु यह भी मत व्यक्त
किया जाता रहा है कि, इस विधि के द्वारा केवल एक व्यक्ति का ही गहन अध्ययन नहीं किया
जाता है, बल्कि किसी भी एक सामाजिक इकाई जैसे व्यक्ति, परिवार, समूह, संस्था अथवा
समुदाय को केन्द्र मानते हुए प्रयोग किया जा सकता है। यहाँ यह कहना उचित होगा कि,
‘‘समग्र रूप में वैयक्तिक अध्ययन सामाजिक शोध के अन्तर्गत प्रयोग में लाया जाने वाला एक
ऐसा ढंग है जो अनुसंधानकर्ता को तीव्र एवं सूक्ष्म अन्तदृष्टि प्रदान करने, इकाईयों का अधिक
गहराई में पैठकर अध्ययन करने, समस्याओं का मनो-सामाजिक अध्ययन करने, निदान करने
एवं समाधान के उपाय प्रस्तुत करने, अन्य ढंगों तथा पर्यवेक्षण अत्यादि की सहायता लेते हुए
निष्कर्षों को अधिक से अधिक यथार्थ एवं पूर्ण बनाने तथा नवीन परिकल्पनाओं को प्रतिपादित
करने के लिए उपयुक्त आधार प्रदान करने में सहायक सिद्ध होता है।’’
सामाजिक शोध में किया जाता है। आधुनिक समाज की जटिल समस्याओं की गहनता के
सन्दर्भ में, वैयक्तिक अध्ययन पद्धति का प्रयोग ‘‘मनोचिकित्सा के अन्तर्गत मानसिक बीमारियों
का उपचार करने हेतु मनो-सामाजिक अध्ययन करने एवं निदान प्रस्तुत करने के लिए तथा
सामाजिक अनुसंधान के अन्तर्गत समस्या समाधान प्रस्तुत करने हेतु आवश्यक सूचना का संग्रह
करने के लिए किया जाता है।’’ (सुरेन्द्र सिंह, 1975 : 402)
वैयक्तिक अध्ययन के प्रत्यय को प्रमुख रूप से दो दृष्टिकोणों से समझा जा सकता है : पहला,
पद्धति (विधि) के रूप में और दूसरा, उपागम के रूप में।
सामाजिक शोध के अन्तर्गत गुणात्मक सामग्री के संग्रह में सहायता प्रदान करता है और जो
इसी सन्दर्भ में गणनात्मक एकत्रीकरण को सम्भव बनाने वाली विधियों जैसे प्रश्नावली तथा
साक्षात्कार से भिन्न है। उपागम के रूप में, वैयक्तिक अध्ययन एक अधिक विस्तृत क्षेत्र का
प्रतिनिधित्व करने वाले एक सूक्ष्म एवं सीमित क्षेत्र का अध्ययन करने से सम्बन्धित होता है। एक
उपागम के रूप में स्वीकार करने पर किसी भी जटिल परिस्थिति तथा उससे समिश्रित कारकों
का अध्ययन करना तथा उसे निदानात्मक स्वरूप प्रदान करने में वैयक्तिक अध्ययन को प्रयोग
में लाना सम्भव हो जाता है।
तथा दोनों को विरोधी की संज्ञा भी प्रदान की जाती रही है, क्योंकि वैयक्तिक अध्ययन को
प्रमुखतया शोध की गैर-सांख्यिकीय प्रणाली के रूप में स्वीकार किया जाता है। एक
सांख्यिकीविद विशेषतया गुणात्मक/परिमाणात्मक सूक्ष्मता उपागम से अभिप्रेरित रहता है। वह
समाज के समस्तर दृश्य लेते हुए आँकड़ों के एक विस्तृत क्षेत्र को प्रकट करता है। वह एक दी
हुई परिस्थिति के अन्तर्गत विभिन्न कारकों के घटित होने तथा अन्तर्सम्बन्धित सामान्यीकरणों के
आकार को दर्शाता है। इसके विपरीत, वैयक्तिक अध्ययन सामाजिक प्रक्रियाओं का निर्धारण
करता है तथा विभिन्न कारकों की जटिलता को स्पष्ट करते हुए निदानात्मक अभिव्यक्ति हेतु
कार्यक्रमों एवं हस्तक्षेप-युक्त कार्यप्रणाली को प्रदर्शित करता है। सामाजिक प्रक्रियाओं के
निर्धारण में एकरूपता प्रदान करने हेतु वैयक्तिक अध्ययनों की एक कड़ी विशिष्ट एवं सामान्य
भिन्नताओं की तुलना करने तथा उनमें विभेद स्थापित करने के उद्देश्य से समानताओं एवं
विभिन्नताओं की खोज करती है।
तुलना करता है, जो किसी भी सामाजिक समस्या पर सूक्ष्म दृष्टि प्रदान करने में सुविधाजनक
प्रतीत नही होते हैं। किन्तु यह भी सत्य है कि एक सांख्यिकीविद् साहचर्य की मात्रा, बारम्बारता
तथा सीमा को समझते हुए सामाजिक परिस्थिति को अधिक गहराई के साथ समझने का प्रयास
करता है। इस रूप में सांख्यिकीय उपागम वैयक्तिक अध्ययन के लिए शोधकर्ता को
उत्तरदाताओं के चुनाव में मार्गदर्शन प्रदान कर सकता है, तथा विशिष्ट एवं अधिक पूर्ण अध्ययन
की आवश्यकता रखने वाले कारकों को सामने लाने में सहायक हो सकता है। दूसरी तरफ,
वैयक्तिक अध्ययन सांख्यिकीय विश्लेषण के लिए आधारभूत सामग्री प्रदान कर सकते हैं।
वैयक्तिक अध्ययन की आधारभूत मान्यताएँ
वैयक्तिक अध्ययन विधि, जिसका प्रमुख प्रयोजन एक अथवा कुछ इकाइयों का सर्वांगीण
अध्ययन के आधार पर सम्पूर्ण समूह अथवा क्षेत्र की विशेषताओं के विषय में अवगत होना होता
है, वाºय रूप से कुछ त्रुटिपूर्ण प्रतीत हो सकता है, परन्तु यह विधि कुछ ऐसी मान्यताओं पर
आधारित है जिनको समझकर इस प्रकार की आशंकाओं का निराकरण किया जा सकता है।
इस दृष्टि से वैयक्तिक अध्ययन की आधारभूत मान्यताओं पर दृष्टिपात कर लेना आवश्यक
प्रतीत होता है, जो निम्नलिखित है :-
उनकी विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार भिन्नता होने के बाद भी मानव स्वभाव में कुछ
मौलिक एकता विद्यमान रहती है, जिसके माध्यम से सभी व्यक्तियों के व्यवहारों को समझा
जा सकता है। इस विषय पर आल्पोर्ट (1942) के विचार महत्वपूर्ण हैं, जिसने यह
प्रतिपादित किया कि मानव प्रकृति से सम्बन्धित कुछ विशेषताएँ ऐसी होती हैं जिन्हें सभी
व्यक्तियों तथा एक समूह के प्रत्येक सदस्य पर लागू किया जा सकता है। इस आधार पर
वैयक्तिक अध्ययन विधि के माध्यम से किसी इकाई अथवा एक विशेष समूह की विशेषताओं
को समझना एक वैज्ञानिक विधि कहा जा सकता है।
व्यवहार कुछ विशेष परिस्थितियों से प्रभावित होता है। अत: यदि एक विशेष परिस्थिति के
अन्तर्गत किसी व्यक्ति अथवा समूह के सदस्य के व्यवहार को समझ लिया जाये तो उसी
परिस्थिति में अन्य व्यक्ति एवं समूह भी उसी प्रकार का व्यवहार करते हुए पाये जायेंगे। इस
सन्दर्भ में यह भी सत्य है कि परिस्थितियों में पुनरावृत्ति होती रहती है। इस अर्थ में, विभिन्न
स्थानों एवं विभिन्न समय पर उत्पन्न होने वाले मानव व्यवहारों का अनुमान लगाया जा
सकता है।
‘समय तत्व’ का भाव अनिवार्य रूप से परिलक्षित होता है। इस सन्दर्भ में यह समझना
आवश्यक है कि जो घटना आज वर्तमान में घटित हो रही है, उसका बीजारोपण आज
काफी समय पूर्व किसी न किसी कारक के प्रभाव से हो चुका होता है। अत: वैयक्तिक
अध्ययन विधि के माध्यम से किसी विशेष घटना को प्रभावित करने वाले कारकों को एक
विशेष अवधि अथवा समय के सन्दर्भ में समझा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर यह
कहा जा सकता है कि किसी समााजिक समस्या, क्रान्ति अथवा युद्ध की स्थिति केवल
तात्कालिक दशाओं से उत्पन्न नहीं होती बल्कि इनका बीजारोपण काफी पहले हो चुका
होता है।
सम्यक् अध्ययन उसे सर्वांगीण रूप से देखकर ही प्राप्त किया जा सकता है, न कि उसके
किसी एक अथवा कुछ अन्यत्र पहलुओं के आधार पर। यहाँ यह समझना आवश्यक प्रतीत
होगा कि बहुत सी इकाईयों के एक अथवा दो पक्षों का अध्ययन करने से अधिक अच्छा है
कि एक या दो इकाइयों के सभी पहलुओं का समग्र रूप में अध्ययन कर निष्कर्ष प्राप्त कर
लिया जाये।
एवं सामाजिक क्रियायें इतनी जटिल होती हैं कि उन्हें केवल अवलोकन अथवा साक्षात्कार
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के माध्यम से समुचित रूप से समझा नही जा सकता, अपितु किसी सामाजिक इकाई के
व्यवहारों, मनोवृत्तियों, प्रेरणाओं एवं प्रक्रियाओं पर सम्यक् दृष्टि प्राप्त करने हेतु उनका
वैयक्तिक एवं समग्र अध्ययन करना आवश्यक होता है। इसी सन्दर्भ में जैसा कि पहले
उल्लेख किया गया है कि वैयक्तिक अध्ययन को एक ‘सामाजिक सूक्ष्मदर्शक यंत्र‘ की संज्ञा
भी प्रदान की गई है।
वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत प्रयुक्त चरण/कार्य-विधि
वैयक्तिक अध्ययन की विषय वस्तु सामाजिक इकाइयों की आन्तरिक संरचना तथा उसके वाºय
वातावरण से सम्बन्धित रहती है, जो स्वभावतया इतनी जटिल एवं अव्यवस्थित होती है कि
उनका सम्यक् अध्ययन करने के लिए एक व्यवस्थित कार्य-प्रणाली को उपयोग में लाना
आवश्यक हो जाता है। वास्तव में वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत सामाजिक इकाइयों का
सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्षों का इस प्रकार अध्ययन करना होता है जिससे कि उनकी
आन्तरिक संरचना एवं वाºय परिवेश की मौलिक विशेषताओं को समझा जा सके।
में, वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत प्रयोग में लाए जाने वाले चरणों एवं सोपानों को समझ लेना
आवश्यक प्रतीत होता है जिससे कि इस विधि का व्यवस्थित रूप से उपयोग किया जा सके-
वैयक्तिक अध्ययन पद्धति के प्रमुख चरण अथवा उसकी कार्य-विधि के मुख्य पक्ष निम्नलिखित
हैं।
1. समस्या के पक्षों का निर्धारण
सर्वप्रथम वैयक्तिक अध्ययन के लिए अध्ययन की इकाई अथवा समस्या की प्रकृति का समुचित
स्पष्टीकरण करना, इकाइयों का निर्धारण करना तथा अध्ययन क्षेत्र से पूर्णतया अवगत होना
आवश्यक होता है। वास्तव में, वैयक्तिक अध्ययन की सफलता भी इसी प्रारम्भिक सोपान पर
अत्यधिक आधारित होती है। अत: इस परिदृश्य में, अनुसंधानकर्ता को सामाजिक इकाई अथवा
समस्या के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित निम्नलिखित तथ्यों पर ध्यान देना विशेष रूप से महत्वपूर्ण
होता है।
विषय का चयन करना अति आवश्यक होता है। वास्तव में, इसी चयनित समस्या के आधार पर
ही किसी भी अनुसंधान को व्यवस्थित रूप से सम्पन्न किया जा सकता है। उदाहरण के तौर
पर, यह समस्या बाल-अपराध, मद्यपान, अनुशासन हीनता, पारिवारिक विघटन, सामाजिक
तनाव, इत्यादि किसी विषय से सम्बन्धित हो सकती है।
का निर्धारण करना आवश्यक हो जाता है। उदाहरण के लिए यदि अध्ययन मादक द्रव्यों के
उपयोग से सम्बन्धित है, तो इस तथ्य का निर्धारण करना आवश्यक होता है कि मादक द्रव्य
व्यसन के अध्ययन हेतु उससे सम्बन्धित कौन सी इकाई का चयन किया जाना है। इसके
अन्तर्गत ये इकाइयाँ कोई भी व्यक्ति, समूह अथवा विशेष संस्थाएँ, इत्यादि हो सकती हैं।
करना आवश्यक प्रतीत होता है कि, अध्ययन की जाने वाली इकाइयों की संख्या क्या होगी।
इस संख्या का निर्धारण अनुसंधानकर्ता के पास उपलब्ध साधनों और समय पर आधारित होता
है। यहाँ यह ध्यान देने योग्य है कि, यह संख्या इतनी कम नहीं होनी चाहिए कि अध्ययन से
सम्बन्धित सभी प्रकार के तथ्यों का संकलन न किया जा सके और न ही इतनी अधिक होनी
चाहिए कि उनका गहन अध्ययन करना सम्भव न हो सके।
2. अध्ययन के क्षेत्र का निर्धारण
‘ग’ के माध्यम से वर्णित किया गया है, के पश्चात् अनुसंधानकर्ता द्वारा उस स्थान अथवा क्षेत्र
का निर्धारण करना भी आवश्यक होता है, जहाँ विभिन्न इकाइयों का अध्ययन किया जाना है।
उदाहरण के तौर पर, मादक द्रव्य व्यसन सम्बन्धित समस्या के अन्तर्गत इस समस्या से पीड़ित
व्यक्ति, समूह किन संस्थाओं, सुधार-गृहों, चिकित्सालयों में रह रहें हैं, उनमें से किस स्थान पर
वैयक्तिक अध्ययन करना है, इसका निर्धारण करना आवश्यक होता है।
3. विश्लेषण क्षेत्र का निर्धारण
इकाई के विश्लेषण-क्षेत्र को पूर्णतया स्पष्ट कर लेना आवश्यक होता है। विश्लेषण क्षेत्र से
अभिप्राय है अध्ययन की जाने वाली इकाई से सम्बन्धित वे कौन से पक्ष महत्वपूर्ण हैं तथा कौन
से पक्ष उपयोगी नही हैं। इस प्रकार विश्लेषण क्षेत्रों की उपयोगिता एवं अनुपयोगिता दोनों का
निर्धारण करना वैयक्तिक अध्ययन को व्यवस्थित करने से सम्बन्धित हैं।
4. समय या अवधि के अन्तर्गत घटनाओं के अनुक्रम का वर्णन
अथवा इकाई को एक विशेष समय या अवधि के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करना आवश्यक
होता है, अर्थात् इस तथ्य को समझना कि सामाजिक इकाई की कुछ विशेष घटनायें किस
अवधि में घटित हुई तथा उन घटनाओं से सम्बन्धित विभिन्न समय/अवधि में कौन-कौन सी
विशेषताएँ सम्बद्ध रही हैं, तथा भविष्य में इकाई से सम्बन्धित कौन-सी घटनाओं के घटित होने
की सम्भावना की जा सकती है, इत्यादि।
5. निर्धारक अथवा प्रेरक
वैयक्तिक अध्ययन की यह प्रमुख मान्यता रही है कि, कोई भी घटना शून्य में नही घटती,
अर्थात् प्रत्येक घटना अथवा समस्या को उत्पन्न करने वाले कुछ-न-कुछ निर्धारक या प्रेरक
तत्व विद्यमान रहते हैं। अत: घटनाओं के क्रम को स्पष्ट कर लेने के पश्चात अध्ययन के लिए
समस्या अथवा इकाई के अन्तर्गत घटनाओं के निर्धारक तत्वों को ज्ञात कर लेना आवश्यक होता
है। उदाहरणार्थ, मादक-द्रव्य व्यसन को प्रेरणा देने वाले अनेक कारक हो सकते हैं, जैसे
पारिवारिक स्थिति, पड़ोस, मित्र की संगति, इत्यादि। वैयक्तिक अध्ययन के लिए ऐसे सभी प्रेरक
तत्वों का ज्ञान वास्तविक अध्ययन को व्यवस्थित विधि से सम्पन्न करने हेतु आवश्यक होता है।
6. विश्लेषण एवं निष्कर्ष
वर्गीकरण एवं उनका विश्लेषण कर निष्कर्ष प्राप्त करना होता है। इस विश्लेषण एवं निष्कर्ष का
प्रमुख अभिप्राय है, एक विशेष अवधि अथवा वास्तविकता के अन्तर्गत होने वाली चयनित
इकाई/इकाइयों के व्यवहार के स्वभाव से पूर्णतया अवगत होना तथा उन दशाओं अथवा
कारकों से परिचय प्राप्त करना जो चयनित समस्या या मानव व्यवहार के लिए उत्तरदायी होते
हैं।
अपनाकर कार्य करते हुए अनुसंधानकर्ता चयनात्मक प्रत्यक्ष ज्ञान के माध्यम से अध्ययन प्रारम्भ
करता है। वह एक सम्पूर्ण विश्लेषक की भूमिका में वैज्ञानिक वस्तुओं, तथ्यों एवं घटनाओं को
एक विशिष्ट दृष्टिकोण तथा एक विशिष्ट प्रकार की अभिरुचि की दृष्टि से समझता है तथा
उनका संग्रह, संकलन, अभिलेखन एवं निर्वचन करता है। वह यहाँ पर यद्यपि एक जटिल
सामाजिक परिस्थिति/ वास्तविकता में पाये जाने वाले तत्वों की आत्मनिर्भरता को ध्यान में
रखते हुए, किन्तु फिर भी इन सभी तत्वों का विवरण एक साथ प्रस्तुत न कर एक-एक करके
उनका विश्लेषण एवं विवेचन करता है।
गुणों जैसे अध्ययन विषय का समुचित ज्ञान, सूक्ष्म अवलोकन की क्षमता, विश्लेषण की क्षमता,
तार्किक व्याख्या की कुशलता तथा प्रतिवेदन में वस्तुनिष्ठता इत्यादि के माध्यम से वैयक्तिक
अध्ययन के विभिन्न चरणों/सोपानों को पार करता है।
वैयक्तिक अध्ययन में सूचनाओं के स्रोत
वैयक्तिक अध्ययन में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा विविध प्रकार के स्रोतों एवं प्रविधियों का उपयोग
किया गया है। इस दृष्टिकोण से, इसे बहमुखी प्रकृति वाली विधि की संज्ञा प्रदान की जा
सकती है। नेल्स एण्डरसन (1923) ने ‘होबों’ लोगों के जीवन पद्धति की आन्तरिक संरचना का
अध्ययन हेतु सर्वप्रथम उनके समूह में गाये जाने वाले लोक गीतों, गाथाओं तथा उनकी
कविताओं का उपयोग किया। तत्पश्चात् विभिन्न संस्थाओं द्वारा ‘होबो लोगों’ के जीवन के बारे
में ज्ञान प्राप्त करने हेतु प्रकाशित सांख्यकीय तथ्य एकत्र किये गये। इसी क्रम में, उनकी
वंशावलियाँ, फोटो तथा निकटवर्ती व्यक्तियों से भी विविध प्रकार की सूचनाओं का संग्रह किया
गया।
उनके सामाजिक संगठन के बारे में व्यावहारिक नियमों के स्थापना में सफल हो पाया।
यदि हम वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत प्रयोग में लाये जाने वाले स्रोतों की प्रकृति का ज्ञान
प्राप्त करना चाहते हैं, तो उन्हें दो भागों में विभाजित कर उनका अध्ययन किया जा सकता है :
वैयक्तिक अध्ययन के प्राथमिक स्रोत एवं वैयक्तिक अध्ययन के द्वैतियक स्रोत।
1. प्राथमिक स्रोत
तथ्यों का संग्रह प्राथमिक सूचनाओं के माध्यम से करता है। इस दृष्टिकोण से वह व्यक्तिगत
स्तर पर अवलोकन एवं साक्षात्कार प्रणालियों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से आवश्यक सूचनाओं को एकत्र
करता है। तत्पश्चात अन्य प्रकार के तथ्य प्राप्त करने तथा संकलित सूचनाओं का सत्यापन
करने के उद्देश्य से उसके द्वारा अध्ययन की इकाई से सम्बन्धित व्यक्ति के मित्रों, पड़ोसियों,
पारिवारिक सदस्यों तथा अन्य सम्बन्धियों से सम्पर्क स्थापित किया जाता है।
माध्यम से न केवल विविध प्रकार की आवश्यक सूचनाओं को संग्रह किया जाता है बल्कि
उनकी विश्वसनीयता भी स्थापित की जाती है। प्राथमिक स्रोतों द्वारा प्राप्य तथ्य अनोपचारिक
तथा आन्तरिक प्रकृति दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
2. द्वितीयक स्रोत
संकलन के लिए द्वैतियक स्रोत भी महत्वपूर्ण होते हैं। सामान्य तौर पर ये द्वितीयक स्रोत अनेक
प्रकार के वैयक्तिक प्रलेखों जैसे डायरी, वैयक्तिक पत्र एवं लेख इत्यादि के रूप में होते हैं जो
व्यक्तियों, समूहों, समुदायों से सम्बन्धित महत्वपूर्ण सूचनायें प्रदान करते हैं। ये वैयक्तिक प्रलेख
इच्छित अथवा अनिच्छित रूप से रचनाकार की मानसिक विशेषताओं तथा वाºय परिवेश से
सम्बन्धित विविध प्रकार के तथ्य प्रस्तुत करते हैं, जो वैयक्तिक अध्ययन के विभिन्न सोपानों के
दौरान उपयोगी सूचनायें प्रदान करते हैं।
उपयोग किया जा सकता है, उनमें डायरियाँ, पत्र, जीवन इतिहास, लेख, वंशावली प्रलेख, जीवन
गाथा तथा विभिन्न संगठनों द्वारा सुरक्षित रिकार्ड इत्यादि हैं।
स्रोत से प्राप्त वैयक्तिक आंकड़ों को अधिक पूर्ण बनाती हैं। दैनन्दिनियाँ व्यक्ति द्वारा स्वयं लिखी
जाती हैं तथा इसमें व्यक्ति अत्यधिक स्वाभाविक रूप से अपने जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं एवं
संस्मरणों को लेखबद्ध करता रहता है। ये व्यक्ति के नये सम्पर्कों तथा उसके द्वारा आवश्यक
समझे गये अनुभवों पर प्रकाश डालती हैं, तथा उसके व्यक्तिगत अनुभवों को स्पष्ट करने वाली
टीकाएँ प्रदान करती हैं। इनकी प्रकृति गोपनीय होती है अत: इसमें व्यक्ति के जीवन सम्बन्धी
अनेक महत्वपूर्ण सूचनाओं और रहस्यों का उल्लेख होता है। चूँकि यह प्रतिदिन लिखी जाती है,
अत: इसमें व्यक्ति के जीवन से सम्बन्धित छोटी सी छोटी बातों का समावेश होता रहता है।
असफलताओं को बहुत स्वाभाविक रूप से समझा जा सकता है। दैनन्दिनियाँ द्वितीयक स्रोत में
महत्वपूर्ण इसलिए भी हैं, क्योंकि इसके माध्यम से उन अनेक तथ्यों से अवगत हुआ जा सकता
है जिन्हें साक्षात्कार अथवा अवलोकन के द्वारा नहीं समझा जा सकता।
मनोवृत्तियों, संदेशों, संवेगात्मक प्रतिक्रियाओं तथा निजी अभिरूचियों को स्पष्ट करते हैं, जिन्हें
अन्य दस्तावेज स्पष्ट करने में असमर्थ होते हैं। थामस और नैनकी ने अपने शोध अध्ययनों में
विस्तृत स्तर पर पत्रों का प्रयोग किया। उनकी आधारभूत मान्यता यह थी कि व्यक्ति का विश्व
के प्रति अभिमुखीकरण जानने के लिए भावनात्मक कारकों का अध्ययन करना आवश्यक है।
मनोवृत्तियों जो पूर्ण जीवित एवं वास्तविक सामाजिक वास्तविकता का निर्माण करते हैं, तक
पहुँचा जा सकता है।
जानकारी प्राप्त होती है। वैयक्तिक जीवन इतिहास को सामान्यतया ‘अन्य पुरुष’ में लिखा जाता है। इसमें लेखक स्वयं अपने जीवन की भावनाओं एवं अनुभवों के बारे
में अपनी ही भाषा में लिखता है। थामस और नैनकी ने जीवन इतिहास दस्तावेजों का व्यापक
प्रयोग किया है। इनका उद्देश्य सम्पूर्ण जीवन चक्र अथवा उसकी किसी एक विशिष्ट प्रक्रिया का
अध्ययन करना होता है। यह जीवन चक्र किसी एक व्यक्ति, परिवार, संस्था, संगठन, सामाजिक
समूह अथवा समुदाय के रूप में किसी एक वैयक्तिक इकाई से सम्बन्धित हो सकता है।
जीवन-इतिहास के अतिरिक्त अन्य वैयक्तिक दस्तावेज, जैसे आत्मकथायें, स्वीकारोक्तियां भी
वैयक्तिक अध्ययन में सहायक हो सकते हैं। आल्पोर्ट (1942 रू 12) ने इन्हें आत्म-प्रकटन करने
वाले अभिलेख कहा है, ‘‘जो इरादे के बिना अथवा इरादे के साथ लेखक के मानसिक जीवन
की संरचना, गतिकी तथा क्रिया से सम्बन्धित सूचना प्रदान करते हैं।’’ वैयक्तिक दस्तावेज
जीवन की उन परिस्थितियों में अनुभव की निरन्तरता का प्रतिनिधित्व करते हैं जो उसके
व्यक्तित्व, सामाजिक व्यवहार तथा जीवन दर्शन पर प्रकाश डालते हं ै और जो सामाजिक
वास्तविकता से सम्बन्ध बनाते हुए सम्पूर्ण जीवन परिस्थिति तथा वैयक्तिक संगठन के सम्बन्ध में
अन्तदर्ृष्टि प्रदान करते हैं।
वैयक्तिक अध्ययन का महत्व
सामाजिक घटनाओं तथा समस्याओं के अत्यधिक सूक्ष्म एवं गहन अध्ययन में वैयक्तिक अध्ययन
पद्धति अत्यधिक व्यावहारिक एवं उपयोगी सिद्ध हुई है। वर्तमान में यह तथ्य प्रमुख रूप से
स्वीकार किया जाने लगा है कि, अधिकांश सामाजिक समस्याओं की प्रकृति व्यक्तिगत होती है
तथा वैयक्तिक अध्ययन के आधार पर ही उनके समाधान के व्यावहारिक आधारों को ढूढ़ा जा
सकता है।
प्रयोग से ही सम्बन्धित रहा है। वास्तव में, वैयक्तिक अध्ययन-विधि सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक
दोनों दृष्टियों से उपयोगी समझी गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में इस विधि के गुणों एवं उपयोगिता को
निम्नांकित रूप से समझा जा सकता है :
- वैयक्तिक अध्ययन के द्वारा किसी भी सामाजिक इकाई अथवा इकाईयों का अत्यधिक सूक्ष्म
एवं गहन अध्ययन किया जा सकता है। - वैयक्तिक अध्ययन के द्वारा विभिन्न इकाईयों केा सूक्ष्म एवं गहन अध्ययन की सहायता से
अनेक उपयोगी तथा व्यवस्थित परिकल्पनाओं का निर्माण किया जा सकता है, जो इस अध्ययन
के साथ-साथ नये अध्ययनों के लिए आधार के रूप में काम कर सकती है। - वैयक्तिक अध्ययन के अन्तर्गत अनेक महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी प्राप्त होने के बाद
उस अध्ययन अथवा अन्य सम्बन्धित अध्ययन के परिप्रेक्ष्य में प्रयोग लाये जाने वाले प्रपत्रों जैसे,
प्रश्नावली अथवा साक्षात्कार-अनूसूची में सुधार करने का समुचित अवसर प्राप्त हो जाता है। - वैयक्तिक अध्ययन के द्वारा ही यह सम्भव हो सकता है कि अध्ययन से सम्बन्धित क्षेत्र,
विभिन्न विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली इकाइयों तथा एक ही श्रेणी की इकाइयों में से
किस प्रकार सर्वोत्तम निदर्शन प्राप्त किया जा सकता है। - सामाजिक सर्वेक्षण तथा अनुसंधान में केवल विषय से सम्बन्धित इकाइयों का अध्ययन
करना ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि प्राय: जो इकाईयाँ सर्वप्रथम ऊपर से अध्ययन की विरोधी
अथवा निरर्थक प्रतीत होती हैं, उनके द्वारा भी कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों का ज्ञान प्राप्त किया जा
सकता है। ऐसी विरोधी अथवा निरर्थक इकाइयों का ज्ञान वैयक्तिक अध्ययन के अतिरिक्त अन्य
विधि से प्राप्त नहीं किया जा सकता। - वैयक्तिक अध्ययन विधि के द्वारा चयनित सामाजिक इकाई से सम्बद्ध प्रलेखों का विस्तार
से अध्ययन करते-करते अनुसंधानकर्ता के ज्ञान में ही वृद्धि नहीं होती बल्कि अध्ययन के प्रति
उसकी रूचि में भी वृद्धि हो जाती है, जिससे उसे अध्ययन के विभिन्न पक्षों का विश्लेषण करने
की स्वयं ही एक अन्र्तदृष्टि प्राप्त हो जाती है। विषय के प्रति अनुसंधानकर्ता में रूचि एवं ज्ञान
बहुत बड़ी सीमा तक अध्ययन की सफलता का परिचायक होता है। - चूँकि सामाजिक तथ्य प्रकृति से गुणात्मक होते हैं, वैयक्तिक अध्ययन सामाजिक
इकाई/इकाइयों से सम्बन्धी व्यक्तियों की रूचियों, मनोवृत्तियों, सामाजिक मूल्यों तथा विशेष
परिस्थितियों में उनकी प्रतिक्रियाओं से भली-भाँति सम्बन्धित होने के बाद वैज्ञानिक हो जाता
है। इस दृष्टि से, मनोवृत्तियों से सम्बन्धी गुणात्मक विशेषताओं का अध्ययन करने में वैयक्तिक
अध्ययन विधि ही सबसे उपयोगी है। - वैयक्तिक अध्ययन एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा चयनित इकाई के अतीत, वर्तमान
तथा भविष्य को समझकर एवं उनका समन्वय करके निष्कर्ष प्राप्त करना सम्भव होता है। - वैयक्तिक अध्ययन विधि के माध्यम से प्रारम्भिक स्तर पर समस्या से सम्बद्ध इकाईयों की
जानकारी प्राप्त कर लेने के पश्चात् किसी भी बड़े अध्ययन को प्रारम्भ करने के लिए उसके
समग्र का निर्धारण, निदर्शन की प्राप्ति तथा उपकरणों के निर्माण में सहायता मिलती है।
सारांश में, वैयक्तिक अध्ययन से प्राप्त निष्कर्ष उस समय अत्यधिक उपयोगी हो सकते हैं जब
हम विशिष्ट क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट स्रोत एवं प्रविधियों के प्रयोग से अध्ययन कार्य से प्राप्त
परिणामों (निष्कर्षों) में एकीकरण करने का प्रयास करें। यह एकीकरण विभिन्न विधा विषयों के
स्तर भी किया जाना चाहिए। आज सामाजिक अनुसंधान के क्षेत्र में प्रयोग किये जाने वाले सभी
अभिगम अन्तर्विषयी है, और हम विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्ध ज्ञान का अधिक से अधिक उपयोग
करते हुए सामाजिक अनुसंधान की सभी विधियों, जिसमें वैयक्तिक अध्ययन विधि भी सम्मिलित
है, को संचालित करना चाहते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हम आधुनिक नागरिक औद्योगिक
समाज की जटिलता तथा उसके परिप्रेक्ष्य में किसी भी घटना के घटित होने के लिए उत्तरदायी
कारकों की बहुलता को स्वीकार करते हैं। अत: अन्तर्विषयी केन्द्रित वैयक्तिक अध्ययन
सामाजिक वास्तविकता को उसकी अधिक पूर्णता में तथा अधिक वस्तुनिष्ठ ढंग से देखने का
अवसर प्रदान कर सकते हैं।
वैयक्तिक अध्ययन की सीमाएँ
इसमें कोई संदेह नहीं है कि वैयक्तिक अध्ययन अपने गुणात्मक प्रकृति के कारण बहुत
महत्वपूर्ण विधि प्रमाणित हुई है। परन्तु साथ-साथ यह भी स्वीकार किया गया है कि इसकी
कुछ अंतनिर्हित सीमाएँ हैं, जो इसे दोष रहित स्थापित नहीं कर पाती। ब्लूमर ;1939द्ध ने तो
यहाँ तक कह दिया कि वैयक्तिक अध्ययन-विधि स्वतन्त्र रूप से अपर्याप्त और अवैज्ञानिक होने
के साथ ही सिद्धान्तों के निर्माण में अव्यवहारिक सिद्ध हुआ है। ब्लूमर का यह कथन वैयक्तिक
अध्ययन को केवल एक पूरक विधि के रूप में ही उपयोगी मानता है।
वैयक्तिक अध्ययन विधि के अन्तर्गत तैयार किये गये अभिलेखों द्वारा प्रत्यक्षीकरण, स्मृति, निर्णय,
असामान्य घटनाओं इत्यादि पर आवश्यकता से अधिक बल दिये जाने की विशेष प्रवृत्ति के
कारण अचेतन रूप से पूर्वाग्रह की त्रुटियाँ हो जाती हैं। आंकड़ों की प्रकृति भावानात्मक होने के
कारण इनकी वस्तुनिष्ठ रूप से जाँच नहीं की जा सकती है। निदर्शन का प्रयोग न किये जाने
के कारण प्रतिनिधित्वपूर्णता की कमी होती है तथा किये जाने वाले सामान्यीकरण विश्वसनीय
नहीं होते क्योंकि ये कुछ विशेष प्रकार के व्यक्तियों से प्राप्त की गई सूचना पर आधारित होते
हैं। इस विधि के अन्तर्गत कोई ऐसी तकनीक नहीं होती जिसके द्वारा वैयक्तिक दस्तावेजों की
प्रमाणिकता की जाँच हो सके। अध्ययन के लिए जिन इकाइयों का चुनाव किया जाता है उनका
प्रतिचयन किसी वैज्ञानिक प्रणाली द्वारा न करके सुविधापूर्वक रूप से कर लिया जाता है।
रीड बेन (1929:156.161) ने सामाजिक अनुसंधानों में वैयक्तिक अध्ययनों द्वारा सार्थक वैज्ञानिक
सामग्री उपलब्ध कराने में सन्देह व्यक्त करते हुए कहा कि, अवैयक्तिकता, सार्वभौमिकता,
गैरनैतिकता, गैर-व्यावहारिक तथा घटनाओं की पुनरावृत्ति की दृष्टि से जीवन अभिलेख
महत्वपूर्ण नहीं होते।’ रीड बेन ने इसकी निम्नांकित सीमाओं/कमियों का उल्लेख किया है :-
- जितना अधिक तारतम्य स्थापित होगा उतना ही ज्यादा सम्पूर्ण प्रक्रिया वस्तुगत होगी।
- विषय स्व-न्याय प्रतिपादक हो जाता है न कि तथ्यात्मक।
- उत्तरदाता की साहित्यिक चाह उसे बहका सकती है।
- उत्तरदाता वास्तविकता की तुलना में आत्म-औचित्य पर अधिक बल दे सकता है।
- अनुसंधानकर्ता स्वयं यह देखना चाहता है कि उसके उद्देश्यों की पूर्ति हो रही है अथवा
नहीं। - जीवन दस्तावेज प्रदान करने वाले अधिकतर उत्तरदाता समस्याग्रस्त होते हैं।
- अनुसंधानकर्ता प्राय: उत्तरदाता की सहायता करता है।
- बहुसंख्यक चरों के समग्र में वैयक्तिक परिस्थितियाँ प्राय: अतुलनीय होती हैं।
- जीवन दस्तावेजों के लिए वैज्ञानिक शब्दावली का विकास किया जाना होता है।
उपरोक्त सीमाओं के होते हुए भी, वैयक्तिक अघ्ययन की कमियों पर अनुसंधानकर्ताओं को
विशेष रूप से प्रशिक्षित कर विजय प्राप्त की जा सकती है। इस विशेष प्रशिक्षण का यह प्रमुख
उत्तरदायित्व होना चाहिए कि, सुप्रशिक्षित व्यक्ति किसी-न-किसी स्रोत का प्रयोग करते हुए
आंकड़ों को एकत्रित करें, उनकी जाँच करें, उन्हें प्रतिदर्शित एवं विश्लेषित करें। सुप्रशिक्षित
व्यक्तियों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे इस विशेष प्रशिक्षण के माध्यम से वैयक्तिक
अध्ययन के अन्तर्गत अन्वेषण एवं अभिलेखन के क्रमबद्ध ढंगों को विकसित करते हुए उनका
अधिक से अधिक उपयोग करने में सक्षम होंगे।