रजिया सुल्तान, इल्तुतमिश की योग्य पुत्री थी। अल्तमश ने अपने किसी भी पुत्र को गद्दी के उपयुक्त नहीं समझा था । इसलिए उसने अपनी पुत्री रजिया को मनोनीत किया । अल्तमश की मृत्यु के बाद कुछ अमीरों ने उसके सबसे बड़े बेटे रूकनुद्दीन को गद्दी पर बैठाया । तथापि रजिया ने दिल्ली की जनता और कुछ नायकों की सहायता से गद्दी प्राप्त कर ली ।
रजिया की कठिनाइयां एवं सफलताएं
गद्दी पर बैठते ही रजिया के सामने कठिनाइयों का अंबार लग गया। कुछ तुर्क
सरदार रजिया को पसंद नहीं करते थे और उसे सुल्तान मानने को तैयार नहीं थे। सल्तनत का
वजीर निजामुद्दीन जुनैदी, रजिया के विरोधियों से जा मिला था। रजिया स्त्री थी, स्त्री शासक की
अधीनता में रहना तुर्क अमीर अपना अपमान समझते थे।
रजिया यह अच्छी तरह समझती थी कि शक्ति के बल पर ही सुल्तान की गद्दी की
रक्षा की जा सकती है। उसने अपने विरोधियों एवं विद्रोहियों को कूटनीति एवं युद्ध द्वारा पराजित
करने की नीति अपनाई। इस नीति के कारण महत्वपूर्ण तुर्क सरदार रजिया के साथ मिल गये और
उन्होंने विद्रोही सरदारों की शक्ति कुचलने में रजिया का साथ दिया। लखनौती से देवल तक सभी
मलिक तथा अमीर उसके आज्ञाकारी बन गये।
रजिया की सफलता के कारण तुर्क अमीरो ं एव ं मलिक उससे ईष्र्या करने लग े और
कुछ समय बाद ही रजिया के विरूद्ध विद्रोह, असंतोष बढ़ने लगा। रजिया की निरंकुशता तुर्क
अमीरों को सहन नहीं हुई, क्योंकि वे स्वयं को राज्य का स्तंभ समझते थे। दूसरी ओर कट्टर
धार्मिक मुसलमान एक स्त्री शासिका और उसके बेपर्दा रहने, पुरुषों के वस्त्र धारण से क्रुद्ध रहने
लगे और उसे गद्दी से उतारने के लिए षड़यंत्र करने लगे। एक हब्शी को अमीर पद के साथ-साथ
उससे विशेष स्नेह अन्य तुर्क सरदारों के लिए असंतोष का बड़ा कारण बन गया।
रजिया के पतन के कारण
जिसने रूकनुद्दीन के समय की बिगड़ी स्थिति को संभाला। तुर्क सरदारों के विद्रोह को कुचलने,
सुल्तान पद की प्रतिष्ठा बढ़ाने, सल्तनत के प्रति अमीरों को आज्ञाकारी बनाने जैसे कठिन कार्यों में
सफलता हासिल की।
1238 ई. के पश्चात उसका विरोध उग्र होने लगा। अन्ततः तुर्क सरदारों को उसे
गद्दी से हटाने में सफलता मिली। एसे ा माना जाता ह ै कि रजिया के पतन में उसका स्त्री होना
उत्तरदायी था।
उसके लिये लाभप्रद हो सकते थे।’’ रजिया के पतन में एक कारण यह माना जाता है कि याकूत
के प्रति उसका विशेष अनुराग अन्य तुर्क अमीरों को पसन्द नहीं आया। यह उसकी अक्षम्य भूल थी।
वास्तव में तुर्की अमीरों की स्वार्थपरता तथा महत्वाकाक्ष्ं ाा ही उसके पतन का मुख्य कारण थी।