मजदूरी भुगतान अधिनियम, 1936 प्रारंभ में यह अधिनियम कारखानों और रेलवे-प्रशासन में काम करने वाले
ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू था, जिनकी मजदूरी 200 रुपये प्रतिमाह से अधिक नहीं
थी। बाद में इसे कई अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा नियोजनों में लागू किया गया।
इनमें मुख्य हैं –
ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू था, जिनकी मजदूरी 200 रुपये प्रतिमाह से अधिक नहीं
थी। बाद में इसे कई अन्य औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा नियोजनों में लागू किया गया।
इनमें मुख्य हैं –
- ट्राम पथ सेवा या मोटर परिवहन-सेवा,
- संघ की सेना या
वायुसेना या भारत सरकार के सिविल विमानन विभाग में लगी हुई वायु-परिवहन सेवा
के अतिरिक्त अन्य वायु परिवहन सेवा, - गोदी, घाट तथा जेटी
- यांत्रिक रूप से
चालित अंतर्देशीय जलयान - खान, पत्थर-खान या तेल-क्षेत्र,
- कर्मशाला या
प्रतिष्ठान, जिसमें प्रयोग, वहन या विक्रय के लिए वस्तुएं उत्पादित, अनुकूलित तथा
विनिर्मित होती है, तथा - ऐसा प्रतिष्ठान, जिसमें भवनों, सड़कों, पुलों, नहरों या जल
के निर्माण, विकास या अनुरक्षण से संबद्ध कोई कार्य या बिजली या किसी अन्य प्रकार
की शक्ति के उत्पादन, प्रसारण या वितरण से संबद्ध कोई कार्य किया जा रहा हो।
श्रमिकों के लिए केवल मजदूरी की मात्रा ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि उसकी अदायगी के तरीके, मजदूरी-भुगतान के अंतराल, उससे कटौतियां तथा उसके संरक्षण से संबद्ध अन्य कई बातें भी महत्वपूर्ण होती है।जो न्यूनतम मजदूरी अधिनियम के दायरे में आते हैं। इस शक्ति का प्रयोग कर कई
राज्य सरकारों ने इस अधिनियम को कृषि तथा कुछ अन्य असंगठित नियोजनों में भी
लागू किया है।
राज्य सरकारों ने इस अधिनियम को कृषि तथा कुछ अन्य असंगठित नियोजनों में भी
लागू किया है।
इस तरह, आज मजदूरी भुगतान अधिनियम देश के कई उद्योगों,
नियोजनों और प्रतिष्ठानों में लागू है। यह अधिनियम उपर्युक्त प्रतिष्ठानों या उद्योगों में
नियोजनों और प्रतिष्ठानों में लागू है। यह अधिनियम उपर्युक्त प्रतिष्ठानों या उद्योगों में
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ऐसे कर्मचारियों के साथ लागू है, जिनकी मजदूरी 6500 रु0 प्रतिमाह से अधिक नहीं है।
मजदूरी की परिभाषा
मजदूरी भुगतान अधिनियम में ‘मजदूरी’ की परिभाषा निम्नांकित प्रकार से दी गई है-
मजदूरी का अभिप्राय उन सभी पारिश्रमिक (चाहे वेतन, भत्ते या अन्य रूप में) से है,
जिन्हें मुद्रा के रूप में अभिव्यक्त किया गया है या किया जा सकता है और जो
नियोजन की अभिव्यक्त या विवक्षित शर्तो के पूरी किए जाने पर नियोजित व्यक्ति को
उसके नियोजन या नियोजन के दौरान किए गए काम के लिए देय होता है। ‘मजदूरी’
के अंतर्गत निम्नलिखित सम्मिलित होते हैं –
- किसी अधिनिर्णय या पक्षकारों के बीच किए गए समझौते या न्यायालय के आदेश
के अधीन देय पारिश्रमिक; - ऐसा पारिश्रमिक जिसके लिए नियोजित व्यक्ति अतिकाल कार्य या छुट्टी के
दिनों या अवधि के लिए हकदार है; - ऐसा कोई पारिश्रमिक (चाहे उसे बोनस या किसी अन्य नाम से पुकारा जाए) जो
नियोजन की शर्तो के अधीन देय होता है; - ऐसी कोई राशि जो नियोजित व्यक्ति को उसकी सेवा की समाप्ति पर किसी
कानून, संविदा या लिखित के अधीन कटौतियों के साथ या कटौतियों के बिना
देय होती है तथा उसकी अदायगी के लिए अवधि की व्याख्या नही की गई है;
या - ऐसी कोई राशि जिसके लिए नियोजित व्यक्ति किसी लागू कानून के अधीन
बनाई गई योजना के अंतर्गत हकदार होता है।
अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ‘मजदूरी’ की परिभाषा के अंतर्गत निम्नलिखित को
सम्मिलित नहीं किया जाता –
- ऐसा बोनस, जो नियोजन की शर्तो, अधिनिर्णय, पक्षकारों के बीच समझोते या
न्यायालय के आदेश के अधीन देय नहीं है; - आवास-स्थान, प्रकाश, जल, चिकित्सकीय परिचर्या, अन्य सुख-सुविधा का मूल्य,
ऐसी सेवा का मूल्य जिसे राज्य सरकार के सामान्य या विशेष आदेश द्वारा
मजदूरी की गणना से अपवर्जित कर दिया गया हो; - नियोजक द्वारा किसी पेंशन या भविष्य निधि के अंशदान के रूप में दी गई तथा
उस पर प्राप्त किया जाने वाला सूद; - यात्रा-भत्ता या यात्रा-संबंधी रियायत का मूल्य;
- किसी नियोजित व्यक्ति को उसके नियोजन की प्रकृति के कारण उस पर पड़े
विशेष व्यय को चुकाने के लिए दी गई धनराशि; या - ऊपर के भाग (4) में वर्णित राशि को छोड़कर नियोजन की समाप्ति पर दिया
जाने वाला उपादान।
