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ध्वनियों के मेल से बने सार्थक वर्ण-समुदाय को शब्द कहते हैं। दूसरे शब्दों में, एक या अधिक वर्णों से बनी
स्वतंत्र सार्थक ध्वनि को शब्द कहा जाता है। प्रयोग विषय अथवा प्रयोग क्षेत्र के आधार पर शब्द को तीन
वर्गोें में विभक्त किया जा सकता है:
- सामान्य शब्द,
- अर्द्धपारिभाषिक शब्द और
- पारिभाषिक शब्द।
आदि। ऐसे शब्दों को अपारिभाषिक शब्द भी कहते हैं।
कभी तो पारिभाषिक शब्द के रूप में प्रयुक्त होते हैं और कभी सामान्य रूप में। रस, क्रिया, माया आदि ऐसे
ही शब्द हैं जो सन्दर्भानुसार कभी पारिभाषिक और कभी सामान्य अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, अतः से
अर्द्धपारिभाषिक शब्द हैं।
शास्त्र के प्रसंग में जिसकी परिभाषा दी जा सके उसे पारिभाषिक शब्द कहा जाता है, जैसे ग्रेविटेशन,
प्रतिजैविक, परजीवी आदि ।
पारिभाषिक शब्द या पारिभाषिक शब्दावली किसे कहते हैं
पारिभाषिक शब्दावली का स्वरूप
मनुष्य के पास ज्ञान का असीमित भण्डार है जिसका निरन्तर वृद्धि और विकास होता रहता है। ज्ञान-वृद्धि
का क्षेत्र विविधतापूर्ण होता है। ज्ञान के विकास की प्रक्रिया में अभिव्यक्ति और प्रतिपादन के लिए सामान्य
और प्रचलित भाषा धीरे-धीरे असमर्थ होने लगती है, तब विषय की माँग के अनुसार नये शब्दों की
आवश्यकता अनुभव होने लगती है । ‘पारिभाषिक शब्दों’ का निर्माण इसी उद्देश्य की संपूर्ति के क्रम में होता
है।
पारिभाषिक शब्द की विशेषताएं
- पारिभाषिक शब्द का अर्थ स्पष्ट और सुनिश्चित होता है।
- एक विषय में उनका एक ही अर्थ होता है।
- एक विषय में एक धारणा या वस्तु के लिए एक ही पारिभाषिक शब्द होता है।
- पारिभाषिक शब्द छोटा होना चाहिये ताकि प्रयोग में सुविधा हो।
- पारिभाषिक शब्द मूल या रूढ़ होना चाहिये, व्याख्यात्मक नहीं। उदाहरण के लिए जीव-विज्ञान में ‘दीमक’
शब्द ठीक है। उसी के लिए दूसरा शब्द ‘सफेद चींटी’ नहीं, जो व्याख्यात्मक है। ऐसे ही ‘अहिंसा’ पारिभाषिक
शब्द है, इसके स्थान पर ‘किसी के प्रति हिंसा का भाव न रखना’ नहीं हो सकता क्योंकि यह पारिभाषिक
शब्द ‘अहिंसा’ की व्याख्या है। - एक ही विषय से सम्बद्ध पारिभाषिक शब्दों के रूप की दृष्टि से सादृश्य हो तो संगत लगता है । जैसे
विज्ञान के विषय में ‘आक्सीडेशन’, ‘रिडक्शन’, ‘हायड्रोजिनेशन’ आदि शब्दों के अपने विशिष्ट अर्थ तो हैं ही
साथ ही इनके रूपों में एक सादृश्य भी है। - पारिभाषिक शब्द ऐसा हो, जिससे उसके अर्थ से सम्बद्ध छायाओं को प्रकट करने वाले शब्द बनाये जा
सकें। जैसे भाषा-विज्ञान में पारिभाषिक शब्द ‘स्वन’ से ‘स्वनिम’, ‘स्वनिमिकी’, ‘सहस्वन’ आदि शब्दों का
निर्माण हुआ। ये सभी ‘स्वन’ से सम्बन्ध रखने वाली विविध धारणाओं को प्रकट करने में भी सक्षम हैं।
इस प्रकार पारिभाषिक शब्दों की विशेषताएँ होंगीं: 1. सुनिश्चितता, 2. स्पष्टता, 3. विषय सम्बद्धता,
4. संकल्पनात्मकता, 5. एकार्थकता और 6. एकरूपता ।
पारिभाषिक शब्द के प्रकार
प्रयोग की दृष्टि से पारिभाषिक शब्दों को दो वर्गों में बाँटा जा सकता है:
- अपूर्ण पारिभाषिक शब्द और
- पूर्ण पारिभाषिक शब्द
अपूर्ण पारिभाषिक शब्द ऐसे शब्द हैं जो विषय विशेष से सम्बद्ध प्रोक्ति में तो विशेष अर्थ देते हैं,
परन्तु उस विशेष विषय क्षेत्र से बाहर जब उनका प्रयोग होता है तो उनका पारिभाषिक अर्थ नहीं रहता,
सामान्य अर्थ ही होता है। उदाहरण के तौर पर ‘साधारणीकरण’, ‘असंगति’, ‘गति’ आदि ऐसे ही शब्द हैं।
पूर्ण पारिभाषिक शब्द ऐसे शब्द हैं जिनका पारिभाषिक शब्द के रूप में ही प्रयोग होता है, सामान्य रूप में
नहीं, जैसे ‘दशमलव’, ‘प्रकरी’, ‘क्रिया विशेषण’, ‘अद्वैत’ आदि।
पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकता एवं महत्व
कि किसी भी भाषा के लिए शब्दावली का स्थान पहला है और साहित्य का दूसरा। संभवतः इसीलिए वे यह भी
स्वीकारते हैं कि हिन्दी और दूसरी भाषाओं में वैज्ञानिक तथा शिल्प-विज्ञान संबंधी उच्च कोटि का साहित्य और उस
साहित्य के लिए उपर्युक्त पारिभाषिक शब्दावली तैयार करने का काम अत्यन्त आवश्यक है। वैज्ञानिक साहित्य और
वैज्ञानिक पारिभाषिक शब्दावली का आपस में गहरा संबंध है।
डाॅ. शन्तिस्वरूप भटनागर का भी मानना था कि समस्त भारत के शिक्षाशास्त्राी इस बात से सहमत हैं कि देश
में आधुनिक विज्ञानों के ज्ञान के प्रचार में सबसे बड़ी बाध समुचित पारिभाषिक शब्दावली का अभाव है। कुल
मिलाकर यह कि उक्त उद्धरण इस बात के कयास और शहादत के लिए पर्याप्त हैं कि किसी भी भाषा के लिए
पारिभाषिक शब्दावली कितनी आवश्यक है।
दरअसल, प्रौद्योगिकी और विज्ञान-संबंधी विचारों का प्रकटीकरण प्रामाणिक और जीवंत पारिभाषिक शब्दावली के
अभाव में कठिन काम है। उदाहरण के लिए यूरोपीय राष्ट्रों की सभी भाषाओं की शब्दावली में आज तक एकरूपता
नहीं लायी जा सकी है। हर राष्ट्र के लोगों की अपनी-अपनी प्रकृति ने एक ही शब्द ऐसे अलग-अलग रूपों में
बदल दिया है कि साधारण व्यक्ति उन्हें पहचान ही नहीं सकता। यह सोचकर चलना कि विश्व में किसी युग में
विज्ञान की कभी एक भाषा बन सकेगी, मात्र एक कल्पना है, जिसे कभी भी साकार नहीं किया जा सकेगा। इसलिए
यह जरूरी है कि भारतीय भाषाओं की अपनी पारिभाषिक शब्दावली हो, जिसमें हम अपने संचित एवं सवलित ज्ञान
को लिपिबद्ध कर सकें।
पारिभाषिक शब्द बड़े ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। शास्त्रीय विषयों में यह बहुत आवश्यक होता है कि वक्ता या लेखक
जो कहना या लिखना चाहे, श्रोता या पाठक तक वह बात ठीक उसी रूप में बिना अर्थ-विस्तार या अर्थ-संकोच
के स्पष्ट एवं असंदिग्ध रूप में पहुँच जाये। ऐसा तभी हो सकता है जब उस विषय के संकल्पना सूचक या वस्तुसूचक
पारिभाषिक शब्द सुनिश्चित हों। यह सुनिश्चित दो दिशाओं में होता है- एक तो यह कि उस शब्द का अर्थ पूर्णतः
निश्चित हो, दूसरे उस भाषा के उस विषय के सभी विद्वान उस शब्द का उसी अर्थ में प्रयोग न करेंगे तो उस विद्वानों
में उस विषय में आपसी यथातथ्य विचार-विनिमय संभव न होगा। यदि एक उसका अर्थ अलग ले और दूसरा उसका
दूसरा अर्थ ले, तो एक अलग बात कहेगा और दूसरा अलग बात समझेगा। इस प्रकार एक कालिक विचार-विनिमय
में स्पष्ट और अपेक्षित अभिव्यक्ति के लिए पारिभाषिक शब्दों का महत्व असंदिग्ध है।
की दृष्टि से भी इसका महत्व कम नहीं है। सुनिश्चित पारिभाषिक शब्दों के प्रयोग से ही यह संभव होगा कि आज
किसी विषय पर कोई लेखक कोई बात लिखे। 10, 20, 25, 50, 100 वर्ष बाद लेखन काल के पारिभाषिक अर्थ
के आधार पर लोग मूल लेखक की बात को ठीक रूप में समझ लें। कुल मिलाकर कोई भी भाषा ऐसे विशिष्ट
शब्दों का पृथक से विवेचन नहीं करती, वरन् ये शब्द भी भाषा की संपन्नता में विशेष महत्त्व रखते हैं।