अनुक्रम
नेपोलियन की गणना विश्व के महान विजेताओं में की जाती है। नेपोलियन अपने युग का
यूरोप का समुद्रगुप्त था। नेपोलियन ने फ्रांस में अराजकता का दौर खत्म कर उसे व्यवस्था और
स्थिरता प्रदान की। उसके समय फ्रांस ने वे सीमाएं प्राप्त की जिसे लुई चैदहवें जैसे सम्राटों ने भी
प्राप्त नहीं की थी। फ्रांस में तो आज भी नेपोलियन के नाम पर रोमांच बरकरार है, शेष यूरोप भी उसका
कम एहसानमंद नहीं है जहां-जहां नेपोलियन विजयी हुआ जाने अनजाने में वहाँ राष्ट्रीय भावनाओं
का विकास जरूर हुआ। सांमतवाद, दासप्रथा आदि व्यवस्थाएं प्रायः समाप्त हो गई। अतः कहा जा सकता है कि जो गौरव या यश नेपोलियन ने प्राप्त किया उसका राज द्रढ़ निश्चय उच्च कोटि की
संगठन शक्ति और कठिन परिश्रम था।
नेपोलियन के पतन के कारण
1. स्पेन का युद्ध
2. स्थायी योजना का अभाव –
बनायी वे अस्थायी थी। फिशर के अनुसार – ‘‘नेपोलियन ने अपनी योजनाओं को बच्चों के घरोंदो
की भांति बनाया और मिटा दिया। आगे फिशर ने नेपोलियन की असफलता के तीन सूत्रों का जिक्र
किया है- मास्को, लिपजिंग, तथा फाउन्टेनब्लू इसके साथ ही वाटरलू की लड़ाई इसका उपसंहर
है।
3. मास्को अभियान –
4. क्रान्ति की भावना का अंतर –
आक्रमण को फ्रांसवासी एक जुट होकर निष्फल कर देगें। परन्तु यह उसका भ्रम मात्र था। फ्रांस
की जनता फ्रांस की सुरक्षा हेतु लड़ सकती थी। नेपोलियन की महत्वाकांक्षा के लिए वह अपने प्राण
निछावर करने को तैयार नहीं थी। उसका कारण यह था कि जनता निरन्तर युद्धों से तंग आ चुकी
थी और शान्ति चाहती थी। क्रान्ति की पुरानी भावना का अन्त हो चुका था। नेपोलियन की अनिवार्य
सैनिक सेवा से बचने के लिए नवयुवकों ने अपने दांत तोड़ डाले और हाथ के अंगूठे काटे। यह
सिद्ध करता है कि नेपोलियन की निरंकुशता से लोग परेशान थे।
5. नेपोलियन की हठधर्मिता-
दिया। पराजित होने पर भी मित्र राष्ट्र उसको फ्रांस की प्राकृतिक सीमाओं में रखने को तैयार थे।
परन्तु उसने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।
6. उग्र सैनिकवादी-
उवतबीमे ूपजी जीम इपहहमेज इमजंजजपंदष् परन्तु वह यह नहीं समझ सका कि मात्र सेनाओं के बल
पर राज्य अधिक दिन तक नहीं टिक सकते थे।
7. सेना की आंतरिक दुर्बलता-
सेना में विभिन्न राष्ट्रीयताओं के लोग थे। जिनमें राष्ट्रीयता की भावना का अभाव था। और जिनके
लिए जय-पराजय का कोई महत्व नहीं था। विदेशी खर्चो पर पलने वाली सेनाएं क्रमशः अलोकप्रिय
होती चली गई।
8. असीमित महत्वाकांक्षा-
दावा करने वाला यह व्यक्ति अपनी महत्वकांक्षाओं की पूर्ति राष्ट्रीयता की भावनाओं का तिरस्कार
करने में संकोच नहीं करता था। यूरोप का अधिपति बनने के लिए उसने अनेक गलत कार्य किये।
9. शक्ति पर आधारित शासन –
बात को भंली-भांति जानता था। उसने कहा था ‘‘वंशानुगत राज्य 20 वार पराजित होने पर भी
अपना सिंहासन पुनः प्राप्त कर सकते है। परन्तु मेरे लिए यह असंभव नहीं है। क्योंकि मेरा उत्कर्ष
शक्ति के आधार पर हुआ है।
10. महाद्वीपीय नीति-
उसने इंग्लैण्ड को जीतने के लिए वस्तुओं पर प्रतिबंध लगा दिया। बाजारों तथा आयात-निर्यात
आदि पर प्रतिबंध से यूरोप की जनता क्रोधित हो गई। दूसरी उसे अनगिनत संघर्षो से उलझना
पड़ा इस नीति के कारण ही 1812 से 1814 ई. के वर्षो में नेपोलियन की राजनीति और राजनय
का ढांचा गिरकर बालू की दीवार की भांति ढह गया।
11. पोप से संघर्ष –
नीति का पालन न करने का दोषी मानते हुए उसे बन्दी बना लिया। यह उसकी भयंकर भूल थी।
क्योंकि इससे समस्त कैथोलिक जगत उसका विरोधी हो गया।
12. राष्ट्रीयता की लहर –
रही थी और नेपालियन राष्ट्रीयता की इन विद्युतीय तरंगों का सामना करने में असमर्थ सिद्ध हुआ।
13. प्रशा से युद्ध –
जागृति अभियान प्रारंभ हो गया। नेपोलियन की मास्को यात्रा की असफलता से प्रेरित होकर प्रषा
और जर्मनी के कुछ राज्यों में मार्च 1813 में फ्रांस के विरूद्ध युद्ध शुरू कर दिया। मई 1813 में दो
युद्धों में प्रषा और रूस की सम्मिलित सेनाओं को नेपोलियन ने हरा दिया।
राष्ट्रों का युद्ध (1813-1814) अगस्त 1813 तक नेपोलियन के विरूद्ध चैथा यूरोपीय गुट
तैयार हो गया इस गुट में इंग्लैण्ड, आस्ट्रिया, रूस, प्रषा और स्वीडन सम्मिलित थे। सब देशों की
सेना मिलकर 5 लाख से अधिक थी। 16 अक्टूबर से 18 अक्टूबर तक लीपजिंग में नेपोलियन के
विरूद्ध गुट राष्ट्रों का भीषण युद्ध हुआ। यूरोप के इतिहास में इसे राष्ट्रों का युद्ध (बेटिल आफ
नेशनस्) कहा जाता है। प्रषा की सेना का नेतृत्व इसमें मार्शल ब्लूचर ने किया। नेपोलियन इस युद्ध
में पराजित हो गया। युद्ध में सभी पक्षों के एक लाख तीस हजार सैनिक मारे गये। नेपोलियन राइन
नदी के पीछे हट गया।
मित्र राष्ट्रों ने तीन ओर से फ्रांस पर आक्रमण किया। किन्तु उन्हें मुंह की खानी पड़ी।
नेपोलियन ने रूस और आस्ट्रिया की सेना को हरा दिया। मार्च 1814 में गुट राष्ट्रों की दो लाख
सेना का पेरिस पर अधिकार हो गया। 11 अप्रैल 1815 की फाउन्टेनब्लू की संधि द्वारा नेपोलियन
ने फ्रांस का सिंहासन छोड़ दिया। उसे एल्वा नामक छोटे से द्वीप का राजा बनाकर निर्वासित कर
दिया।
14. वाटरलू –
पुर्नव्यवस्था के लिए यूरोपीय राष्ट्रों के प्रतिनिधि आस्ट्रिया की राजधानी वियना में एकत्रित हुए।
वियेना में मित्र राष्ट्रों के मतभेदों की सूचना पाकर मार्च 1815 में नेपोलियन एल्वा से भाग आया
बिना खून खराबे के उसने फ्रांस के सिंहासन पर पुनः अधिकार कर लिया। लुई 18 वां भाग गया।
मित्र राष्ट्र अपने मतभेदों को भूलकर नेपोलियन के विरूद्ध युद्ध के लिए एकत्रित हो गये। नेपोलियन
ने भी करीब दो लाख सैनिक इकट्ठे कर लिए मित्र राष्ट्रों की दो सेनाओं में एक का कमाण्डर
वेलिंगटन का डयूक तथा दूसरी का ब्लूचर था। 18 जून 1815 को वेल्जियम के वाटरलू नामक
स्थान पर वेलिंगटन की सेना के साथ सात घण्टे तक नेपोलियन का भीषण युद्ध हुआ। नेपोलियन
की कोशिश थी कि किसी तरह ब्लूचर की सेना वाटरलू न पहुंच सके। लेकिन ब्लूचर के 4 बजे
वाटरलू में पहुँचते ही युद्ध का पांसा पलट गया। आखिर वाटरलू में नेपोलियन हार गया। और कैद
कर लिया गया। दूसरी बार नेपोलियन ने सौ दिन तक राज्य किया। अंटलांटिक, महासागर के एक
निर्जन द्वीप सेंट हेलेना में निर्वासित कर दिया गया। 6 वर्ष बाद 5 मई 1821 को सैंट हेलेना में ही
नेपोलियन की मृत्यु हो गई।