अनुक्रम
जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत
पर पहुँचने के तरीके का उल्लेख आवश्यक है, जो कि सामाजिक सिद्धांत की संविदावादी
परम्परा में देखा जाता है। परन्तु साथ ही, राॅल्स का सिद्धांत यह आवश्यक बनाता है कि
नैतिक विवेचन के निष्कर्ष हमेशा सहज ज्ञान द्वारा अनुभूत नैतिक धारणाओं के मुकाबले
जाँचे व पुनर्व्यवस्थित किए जाए, और यह बात संविदावादी परम्परा में उन दूसरे लोगों के
विपरीत है जो यह दावा करते हैं, कि न्याय के नियम वो होते हैं जिन पर एक परिकल्पित
परिवेश में सहमति होती है।
राॅल्स मनुष्य को एक परिकल्पित मलू व्यवस्था में ‘अज्ञानता के परदे’ के पीछे रखते हैं, जहाँ
व्यक्तिजन अपनी आवश्यकताओं, हितों, कौशलों, योग्यताओं संबंधी एवं उन वस्तुओं संबंधी,
जो वर्तमान समाजों में विवाद पैदा करती हैं, बुनियादी जानकारी से वंचित रहते हैं। परन्तु
उनके पास एक चीज़ ज़रूर होगी, जिसे राॅल्स ‘न्याय.बोध’ कहते हैं।
इन परिस्थितियों के तहत, राॅल्स का दावा है, लोग शाब्दिक क्रम में न्याय संबंधी दो सिद्धांतों
को सहर्ष स्वीकार करेंगे। पहला है ‘समानता सिद्धांत’, जिसमें हर व्यक्ति को दूसरों की
सदृश स्वतंत्रता के अनुरूप ही सर्वाधिक व्यापक स्वतंत्रता का समान अधिकार होगा। यहाँ
समान स्वतंत्रता को उदारवादी लोकतांत्रिक शासन.प्रणालियों के सुविदित अधिकारों के रूप
में साकार किया जा सकता है। इनमें शामिल हैं – राजनीतिक भागीदारी हेतु समान
अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता, कानून के समक्ष स्वतंत्रता, इत्यादि।
दसू रे सिद्धातं को ‘भिन्नता सिद्धातं ’ कहा जाता है, जिसमें राॅल्स का तर्क है कि असमानताओं
को कवे ल तभी सही ठहराया जा सकता है, यदि उनसे निम्नतम लाभांवितां े को लाभ पहुँचता
हो।
न्याय संबंधी जाॅन राॅल्स की अवधारणा के दो पहलू हैं। प्रथम, वह एक ‘‘संवैधानिक
लोकतंत्र ’’ की माँग करती है, यानी कानून की सरकार और वो ऐसी हो जो वश में हो,
जवाबदेह हो और जिम्मेवार हो। दूसरे, वह ‘‘एक निश्चित रीति से’’ मुक्त अर्थव्यवस्था
केनियमन में विश्वास करती है। ‘‘यदि कानून व सरकार’’, राॅल्स लिखते हैं, ‘‘बाज़ार को
प्रतिस्पर्धात्मक रखने, संसाधनों को पूरी तरह नियोजित रखने, सम्पत्ति व समृद्धि व्यापक रूप
से समयोपरि वितरित कर देने एवं उचित सामाजिक न्यूनातिन्यून को कायम रखने हेतु
प्रभावी रूप से काम करते हैं, तब यदि सभी के लिए शिक्षा द्वारा दायित्व-स्वीकृत अवसर की
समानता हो, तो परिणामित वितरण न्यायपूर्ण होगा’’।
‘‘पुनर्वितरणवादी’’ भी अपनी समालाचे नाएँ प्रस्तुत करत े ह।ैं तदनुसार, म्यरै एफ. प्लटै नरन्याय.
संबंधी दृष्टिकोण के खिलाफ़ दो दावे पेश करते हैं। पहला, उनका विश्वास है कि यद्यपि
समानता एक स्नेह-पालित मूल्य है, इसे सामथ्र्य की कीमत पर हासिल करना संभव नहीं
हो सकता। प्लैटनर के अनुसार, यह समानता बनाम बढ़ी समृद्धि की समस्या राॅल्स को एक
परस्पर विरोध में डाल देती है। इस प्रकार, एक ओर राॅल्स ‘‘उनको इस बात को स्वीकार
करने से एकदम इंकार करते हैं कि वे जो ज़्यादा आर्थिक योगदान देते हैं, ज़्यादा आर्थिक
अवधारणाएँ प्रतिफल का हक रखते हैं’’।
निर्दिष्ट करता है कि ‘‘सामाजिक व आर्थिक असमानताओं को व्यवस्थित किया जानाहै,
ताकि वे न्यूनतम लाभांवितों के अधिकतम लाभ हेतु हों’’) फिर भी दृढ़तापूर्वक कहता हैकि
उन्हें अधिक आर्थिक पारितोषिक प्रदान करना न्याय संगत है, जहाँ तक कि वे उन तरीकों
से अपने योगदान में वृद्धि करने हेतु प्रोत्साहनों के रूप में काम करते हों जो अन्तोगत्वा
अलाभांवितों को लाभ पहुँचाते हों।
खरे परिश्रम’’ के पारितोषिक से इंकार कर दिया जाए, और उसकी बजाय वह सारे उत्पादन
को समग्र समान की ‘‘सार्वजनिक सम्पत्ति’’ के रूप में मानते हैं। साथ ही, प्लैटनर हमें
विश्वास दिलाना चाहते हैं कि यह ‘‘निजी सम्पत्ति संबंधी नैतिक आधारों और उसके साथ
ही उदारवादी समाज’’ को गुप्त रूप से क्षति पहुँचाता है।
इस अवधारणा को नए ढंग से पेश किया है। न्याय की समस्या का इतिहास काफी पुराना
है। मानव चिन्तनशील प्राणी होने के नाते राजनीतिक समाज के प्रादुर्भाव से ही अपने लिए
न्याय की मांग करता आया है। न्याय की समस्या मुख्यता यह निर्णय करने की समस्या है
कि समाज के विभिन्न वर्गों व्यक्तियों और समूहों के बीच विभिन्न वस्तुओं, सेवाओं, अवसरो, लाभों आदि को आबंटित करने का नैतिक व न्यायसंगत आधार क्या हो। इसी कारण अनेक
विचारकों ने स्वतन्त्रता तथा समानता के विरोधी दावों को हल करने के लिए अपने न्याय
सिद्धांतों का प्रतिपादन किया है। उन्हीं विचारकों में से एक जॉन रॉल्स हैं।
जॉन रॉल्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘A Theory of Justice’ में अपना न्याय का सिद्धांत प्रस्तुत करते
हुए उपयोगितवादियों के विचारों का खण्डन किया है। उसने हेयक के उस विचार का भी
खण्डन किया है जो हेयक ने समकालीन उदारवादी चिन्तक होने के बावजूद भी ‘प्रगति बनाम
न्याय’ के विवाद में न्याय की अवहेलना करके प्रगति का पक्ष लिया है। जॉन रॉल्स ने अपने न्याय
सिद्धांत की शुरूआत में ही न्याय के बारे में यह तर्क दिया है कि अच्छे समाज में अनेक
सद्गुण अपेक्षित होते हैं और उनमें न्याय का भी महत्वपूर्ण सथान है। न्याय उत्तम समाज की
आवश्यक शर्त हैं, परन्तुयह उसके लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि किसी समाज में न्याय के
अतिरिक्त भी दूसरे नैतिक गुणों की प्रधानता हो सकती है। परन्तु जो समाज अन्यायपूर्ण है
उसकी कभी प्रशंसा नहीं की जानी चाहिए। जो विचारक यह मांग करते हैं कि सामाजिक
उन्नति के लिए न्याय के विचार को बाधा के रूप में खड़ा नहीं करना चाहिए, उनका ध्येय
समाज को नैतिक पतन की तरफ ले जाने वाला होता है। न्याय के बिना समाज की उन्नति
और उत्तम समाज की स्थापना दोनों ही असम्भव है।
‘न्याय उचितता के रूप में’ नामक लेख में अपने न्याय सम्बन्धी विचार प्रस्तुत किए। 1963 तथा
1968 में उसने अपने विचारों को फिर से आगे प्रस्तुत किया और वितरणात्मक न्याय की
अवधारणा प्रस्तुत की। 1971 में जॉन रॉल्स ने जिस पुस्तक का प्रतिपादन किया, उसमें वितरणात्मक
न्याय के ही दर्शन होते हैं। जॉन रॉल्स का वितरणात्मक न्याय समझौतावादी सिद्धांत पर आधारित
है। जॉन रॉल्स ने अपने न्याय सिद्धांत को पेश करते हुए सबसे पहले उपयोगितावादी विचारों का
खण्डन किया है और अपने न्याय सिद्धांत को प्रकार्यात्मक आधार प्रदान किया है।
सामाजिक सहयोग में न्याय की भूमिका को स्पष्ट करते हुए न्याय का सरलीकरण किया है
और अपने न्याय सिद्धांत को प्रकार्यातमक आधार प्रदान किया है। जॉन रॉल्स ने न्याय को उचितता
के रूप में परिभाषित करके न्याय के सिद्धांत की परम्परागत समझौतावादी अवधारणा को उच्च
स्तर पर अमूर्त रूप प्रदान किया है। उसने अपने न्याय सिद्धांत की तुलना उपयोगितावादी
तथा अन्त:प्रज्ञावादी न्याय के सिद्धांत से करके वितरणात्मक या सामाजिक न्याय सिद्धांत की
श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयास किया है। जॉन रॉल्स के सामाजिक न्याय सिद्धांत का अध्ययन
इन शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है-
इस समस्या से करता है कि न्याय क्या है? इस समस्या का समाधान जॉन रॉल्स इस बात
में तलाश करता है कि न्याय की समस्या प्राथमिक वस्तुओं और सेवाओं के न्यायपूर्ण
व उचित वितरण की समस्या है। ये प्राथमिक वस्तुएं-अधिकार और स्वतन्त्रताएं,
शक्तियां व अवसर, आय और सम्पत्ति तथा आत्मसम्मान के साधन हैं। जॉन रॉल्स ने इन्हें
शुद्ध प्रक्रियात्मक न्याय का नाम दिया है। जॉन रॉल्स का कहना है कि जब तक वस्तुओं
और सेवाओं आदि प्राथमिक वस्तुओं का न्यायपूर्ण वितरण नहीं होगा तब तक
सामाजिक न्याय की कल्पना करना निरर्थक है।
उपयोगितावाद का सिद्धांत अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख (Greatest Happiness
of the Greatest Number) के अनुसार प्राथमिक वस्तुओं के न्यायपूर्ण वितरण में बाधा
डालता है। वह अधिकतम लोगों को अधिकतम सुख पहुंचाने के चक्कर में यह देखना
भूल जाता है कि इससे व्यक्ति विशेष को कितनी हानि हो रही है। जॉन रॉल्स ने
उपयोगितावाद के विचार की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है-’’सुखी लोगों के सुख
को कितना ही क्यों न बढ़ा दिया, उससे दु:खी लोगों के दु:ख का हिसाब बराबर नहीं
किया जा सकता।’’ जॉन रॉल्स ने उपयोगितावाद का खण्डन करके स्थान पर ‘न्याय
उतिचतता’ के रूप में’ सिद्धांत प्रस्तुत किया है। जॉन रॉल्स ने उपयोगिता की ओर अधिक
आलोचना इसलिए की है कि उपयोगितावाद का सिद्धांत सम्पूर्ण की खुशी की अपेक्षा
अधिकांश की खुशी का समर्थक है। यह सिद्धांत सामाजिक न्याय के विरूद्ध इसलिए
भी जाता है, क्योंकि इसमें अल्पसंख्यकों के दावे को बहुमत द्वारा कुचल दिया जाता
है।
यह समाज में प्रत्येक सदस्य की भूमिका को अस्वीकार करता है। जॉन रॉल्स ने कहा है
कि हम किसी अन्य के लोक कल्याण के दावे को रद्द नहीं कर सकते और बहुसंख्ययक
की अधिकतम सन्तुष्टि को प्राप्त करने के चक्कर में किसी अन्य की स्वतन्त्रता का
हनन नहीं कर सकते। उपयोगितावादी विचारक सदैव इस बात पर अधिक जोर देता
रहा है कि सामाजिक नीति-निर्माताओं का प्राथिमिक र्का यह है कि वे सामाजिक
उपयोगिता में वृद्धि करें। लेकिन कुछ प्रज्ञावादी कार्य यह है कि वे सामाजिक
उपयोगिता में वृद्धि करें। लेकिन कुछ प्रज्ञावादी उपयोगितावाद की इस आधार पर
प्रशंसा भी करते हैं कि इससे सामाजिक उपयोगिता में वृद्धि होती है, लेकिन
प्रज्ञावादियों का यह भी मानना है कि किसी का दमन करके और निर्दोषों को सजा
देकर सामाजिक उपयोगिता में की गई वृद्धि अन्यायपूर्ण ही होती है। इस तरह
उपयोगितावादियों और प्रज्ञावादियों में तनाव उत्पन्न होता है। इसलिए जॉन रॉल्स ने
उपयोगितावाद का खण्डन करके प्रज्ञावादियों के साथ थोड़ी बहुत सहमति प्रकट की
है। जॉन रॉल्स ने स्वीकार किया है कि उपयोगिवादियों और प्रज्ञावादियों के बीच तनाव
को प्रज्ञा द्वारा कुछ कम किया जाना चाहिए ताकि सामाजिक न्याय की अवधारणा
के पास पहुंचा जा सके। इसके लिए हमें प्राथमिकता के नियमों का ही पालन करना
चाहिए।
सिद्धांत समझौतावादी विचारों पर आधारित किया है। इसी कारण उसके इस न्याय
सिद्धांत का समझौतावादी न्याय सिद्धांत भी कहा जाता है। जॉन रॉल्स का कहना है कि
‘‘मेरा सामाजिक अनुबन्ध किसी विशेष प्रकार के समाज से सम्बन्धित नहीं है। मेरा
मुख्य विचार तो समाज की मुख्य संरचना की स्थापना के लिए आवश्यक न्याय
सिद्धांतों का निर्माण करना है। ये ऐसे सिद्धांत हैं जिन्हें स्वतन्त्र विवेकी व्यक्ति अपने
हितों का संवर्धन करने के लिए प्रारम्भिक अवस्था में स्वीकार करते हैं। ये सिद्धांत
बाद वाले सभी समझौतों का नियमन करके सामाजिक सहयोग के नियम बनाते हैं
और न्यायप्रिय सरकारों की स्थापना करते हैं।’’
उपयोगितावादी सिद्धांत का सर्वोत्तम विकल्प सामाजिक समझौता का सिद्धांत ही है।
यह समझौता मुक्त तथा स्वतन्त्र व्यक्तियों के बीच सहमति पर आधारित होता है।
यह सहमति ‘समानता की मूल स्थिति’ में ही सम्भव है। मूल स्थिति से हमारा तात्पर्य
उस स्थिति एवं अवस्था से है जिससे स्त्री-पुरुष एक सामाजिक समझौता करने के
लिए एक साथ मिलते हैं। यद्यपि यह मूल स्थिति हॉब्स, लॉक व रुसो की प्राकृतिक
अवस्था के अर्थ में ही प्रयुक्त की जा सकती है, लेकिन प्राकृतिक अवस्था के व्यक्ति
असभ्य या जंगली थे, जबकि मूल स्थिति के व्यक्ति विवेकी तथा समानता के सिद्धांत
पर जीवन संचालित करने वाले हैं। इस स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति समाज में अपने स्थान,
अपनी वर्ग स्थिति तथा सामाजिक प्रतिष्ठा को नहीं जानता है। इस अवस्था में व्यक्तियों
का आग्रह स्वार्थ सिद्धि की बजाय प्राथमिक सामाजिक वस्तुओं-सम्पत्ति, आय, शक्ति,
आत्म सम्मान तथा स्वतन्त्रत में अपनी हिस्सेदारी पर होता है।
कि व्यक्ति को मूल स्थिति में स्वार्थों को दूर रखने वाला प्रमुख कारण ‘अज्ञान का
आवरण’ है। इस ‘अज्ञान के पर्दे’ (Veil of Ignorance) के कारण व्यक्ति परिस्थितियों
को अपने पक्ष में करने क ेलिए किसी भी सौदेबाजी से दूर ही रहता है। जॉन रॉल्स ने
कहा है-’’इस अवस्था मे व्यक्ति न तो यह जानता है कि समाज में उसकी स्थिति
क्या है, न ही उसको प्राकृतिक क्षमताओं और प्रतिभाओं में अपना स्थान मालूम है।
यह अनभिज्ञता का आवरण प्रत्येक व्यक्ति को उस विशिष्ट सामाजिक वर्ग के अवसरों
तथा स्थितियों से लाभान्वित या अलाभान्वित होने से रोकता है।’’ यह स्थिति ही न्याय
के निष्पक्ष सिद्धांतों के निर्माण में सहायक हो सकती है, क्योंकि जानकारी से युक्त
सर्व सम्मति के आधार पर, पूर्वाग्रहों से युक्त होने के कारण, कोई भी सौदेबाजी या
समझौता नहीं कर सकते।
जॉन रॉल्स का कहना है कि मूल स्थिति के व्यक्ति एक-दूसरे की उपस्थिति मात्र से ही
स्वेच्छाचारी नहीं बन सके, क्योंकि इस स्थिति में लोगों को उन बातों की जानकारी
नहीं होती जो उनके मन में पूर्वाग्रह या परस्पर विभेद उत्पन्न कर सकते हैं। जॉन रॉल्स
के अनुसार मूल स्थिति के व्यक्ति विवेकशील कर्ता हैं जो न्याय के नियमों का पता
लगाने के लिए परस्पर सहमति के स्तर तक पहुंचने के लिए एकत्रित हुए हैं। नैतिक
नियमों से बंधे होने के कारण वे अहम्वादी नहीं हैं। उनकी स्वार्थ भवना पर उनकी
नैतिक भावना का अंकुख रहता है। वे केवल सम्पत्ति, आय, शक्ति, सत्ता, आत्म-सम्मान
तथा स्वतन्त्रता जैसी प्राथमिक वस्तुओं की अधिकतम वृद्धि से सरोकार रखते हैं। उनका
इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि दूसरों को कितना मिलता है। इस स्थिति में
एक व्यक्ति की इच्छा सम्पूर्ण समाज की इच्छा होती है। इस स्थिति में मनुष्य कोई
भी जोखिम उठाने को तैयार नहीं होते, क्योंकि उनके साथ आान का पर्दा लगा हुआ
है। वे किसी भी जोखिम भरे कार्य के परिणाम को अनिश्चितता को जानने के कारण
कम खतरनाक रास्ता ही ग्रहण करते हैं। यही न्याय का आधार है।
इस तरह जॉन रॉल्स ने मूल स्थिति के विचार की कल्पना करके न्याय को न्याय उचितता
के रूप में स्वीकार किया है। इस मूल स्थित में अज्ञान के पर्दे के कारण सभी व्यति
सहमति के उस स्तर पर पहुंच सकते हैं जो न्याय के सिद्धांतों की प्रस्थापना करता
है। उचितता के रूप में न्याय का सम्बन्ध नैतिकता से जुड़ जाता है और न्याय एक
सद्गुण का रूप ले लेता है। यही सद्गुण सामाजिक संस्थाओं के व्यवहार की
प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि सामाजिक न्याय की प्राप्ति हो सके।
में मूल स्थिति (Original Position) की कल्पना करके न्याय के सिद्धांतों को बनाने
की उचित प्रक्रिया की व्यवस्था की है। सामाजिक समझौते से न्याय के सिद्धांतों के
विचार को ऐसे प्रतिपादित किया जा सकता है कि वे विवेकी व्यक्तियों द्वारा चुने गए
हैं और इसतरह से न्याय की अवधारणा की व्याख्या की जा सकती है। इस तरह
जॉन रॉल्स का सिद्धांत चुनाव के सिद्धांत के रूप में ‘न्याय उचितता का सिद्धांत’ है।
जॉन रॉल्स का मानना है कि न्याय के सिद्धांतों का चयन मूल:स्थिति के विवेकी एवं
एक-दूसरे के प्रति अनासक्त व्यक्तियों द्वारा किया जाता है और इससे उन्हीं सिद्धांतों
का चयन होता है जिनमें व्यक्तियों का मूल अधिकार और कर्त्तव्य दिए जाते हैं एवं
सामाजिक लाभों का बंटवारा हो सकता है।
विचारों में जॉन रॉल्स ने मूल स्थिति की कल्पना करते हुए, इस अवस्था के लोगों की
विवेकशील तथा ईष्र्या से हीन प्राणी माना है। इसी कारण न्याय उचितता के रूप
में केवल मूल स्थिति में ही सम्भव है। जॉन रॉल्स का मानना है कि मूल स्थिति में ही वे
मान्यताएं और मापदण्ड निहित हैं जो न्याय के उचित सिद्धांत का निर्माण कर सकते
हैं। मूल स्थिति का वातावरण ही शुभ की अवधारणा ओर प्राथमिकता के सिद्धांतों
कीे समेटे हुए है। मूल स्थिति ही न्याय के सिद्धांतों का तर्कपूर्ण आधार प्रदान करती
है। मूल स्थिति ही व्यक्तियों के मध्य समानता को प्रदर्शित करती है। इसमें व्यक्ति
अज्ञान के पर्दे के पीछे रहकर न्याय के उन सिद्धांतों की स्थापना करता है जो उसके
हितों में वृद्धि करते हैं। मूल स्थिति के बिना न्याय के किसी भी सिद्धांत की कल्पना
करना बेकार है।
व्याख्या करते हुए उसमें विवेकशील व्यक्ति का लक्ष्य न्याय के सिद्धांतों को चुनना
बताया है। यही चुनाव व्यक्ति के हित में है। अपने को हीनतम की स्थिति से बचाने
के लिए सभी व्यक्ति अज्ञान के पर्दे के पीछे कार्य करते हुए अधिकतम लाभ की व्यवस्था
करने के प्रयास करते रहते हैं, क्योंकि वे विवेकी हैं और शुभ में उनका विश्वास होता
है। जॉन रॉल्स ने लिखा है कि मूल स्थिति के वातावरण में प्रत्येक व्यक्ति अपने को हीनतम
स्थिति से बचाने के लिए अधिकतम लाभ की व्यवस्था की मांग करेगा। इससे सामाजिक
न्याय के सिद्धांत की स्थापना में दो नियमों से होगी।
- प्रत्येक व्यक्ति को सर्वाधिक मूल स्वतन्त्रता का समान अधिकार हो और यही
अधिकर दूसरों को भी हो। - सामाजिक तथ आर्थिक असमानताओं को इस रूप में व्यवस्थित करना चाहिए
कि (क) न्यूनतम सुविधा प्राप्त व्यक्तियों को सर्वाधिक लाभ मिले (ख) ये विषमताएं
इस तरह से व्यवस्थित हों कि अवसर को उचित समानता के अन्तर्गत सभी के
लिए पद और स्थितियां खुली हों।
जॉन रॉल्स का कहना है कि प्रथम नियम स्थान स्वतन्त्रता के सिद्धांत की तरफ जाता
है और दूसरा नियम दो सिद्धांतों को अंगीकार कर लेता है, जिसमें से एक प्रत्येक
के लिए लाभ और दूसरा सबके लिए खुले लाभ या अवसर की उचित समानता है।
स्वतन्त्रताओं को मत देने की स्वतन्त्रता, सार्वजनिक पद ग्रहण की योग्यता, भाषण
देने की स्वतन्त्रता, सम्पत्ति रखने की स्वतन्त्रता, कानून के समक्ष समानता आदि
से सम्बन्ध रख्ता है। जॉन रॉल्स का कहना है कि सभी स्वतन्त्रताएं प्रत्येक व्यक्ति
को समान रूप से मिलनी चाहिए। न्याय के सिद्धांतों की व्यवस्था ऐसी होनी
चाहिए कि प्रथम सिद्धांत को ही सबसे ऊपर रखा जाना चाहिए। इसके लिए
संविधान-निर्मात्री संस्थाओं को या व्यवस्थापिका को इस तरह से स्वतन्त्रताओं
की व्यवस्था करनी चाहिए कि प्रथम सिद्धांत को ही महत्व मिले। जॉन रॉल्स का
कहना है कि समान स्वतन्त्रता के सिद्धांत को ही सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी
चाहिए। व्यवस्थापकों या संविधान निर्माताओं को विशिष्ट स्वतन्त्रता पर जोर
देने की अपेक्षा स्वतन्त्रताओं की पूर्ण व्यवस्था को ही अपनी दृष्टि प्रदान करनी
चाहिए ताकि स्वतन्त्रताओं में संतुलन बना रह सके। इस तरह जॉन रॉल्स का आग्रह
प्रथम सिद्धांत के रूप में समान स्वतन्त्रता और प्राथमिकता के सिद्धांत के रूप
में ही रहता है। लेकिन जॉन रॉल्स का यह भी कहना है कि प्रथम सिद्धांत या समान
स्वतन्त्रता के सिद्धांत के अन्तर्गत आने वाली मूल स्वतन्त्रता को केवल स्वतन्त्रता
के लिए ही सीमित किया जा सकता है अर्थात् इसे केवल तभी सीमित किया
जा सकता है, जब यह बात निश्चित हो कि समान स्वतन्त्रता या दूसरी मूल
स्वतन्त्रता उचित रूप से सुरक्षित रहेगी या समान स्वतन्त्रता सम्भव होगी। इस
तरह जॉन रॉल्स ने समानता और स्वतन्त्रता का सह-अस्तित्व करके स्वतन्त्रता के
सिद्धांत को प्राथमिकता प्रदान की है।
सिद्धांत का मानते हुए इसे सर्वोच्चता प्रदान की है। उसका कहना है कि इस
प्राथमिकता को प्राप्त किए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता है। सामाजिक न्याय
के लिए समान स्वतन्त्रताओं को व्याक बनाना चाहिए और समान स्वतन्त्रताओं
का असंतुलन समाप्त करना चाहिए ताकि कम स्वतन्त्रता प्राप्त व्यक्तियों को भी
उचित रूप से स्वतन्त्रताओं का लाभ मिलना चाहिए ताकि कालान्तर में सुविधाहीन
वर्ग भी स्वतन्त्रता के समान लाभ प्राप्त कर सके। जॉन रॉल्स का कहना है कि समान
स्वतन्त्रताओं की अस्वीकृति को केवल तभी स्वीकार किया जा सकता है जब
वह सभ्यता के गुणों में वृद्धि करने में अनिवार्य हो ताकि समय आने पर सभी
व्यक्ति समान स्वतन्त्रताओं का उपभोग कर सके। भौतिक साधनों की अधिकता
तथा पद की सुख-सुविधाओं के लिए समान स्वतन्त्रता को कम करना न्याय
संगत नहीं हो सकता। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को समान मूल स्वतन्त्रताओं की
अधिकतम प्राप्ति का समान अधिकार होना चाहिए। इसके लिए कम विस्तृत
स्वतन्त्रताओं का विस्तार करना चाहिए और समान से कम स्वतन्त्रताओं को उन
व्यक्तियों के लिए स्वीकार करना चाहिए जो स्वतन्त्रता की कमी से ग्रस्त हैं।
व आय को पुनर्वितरण से है। जॉन रॉल्स ने इस सिद्धांत में भेदमूलक सिद्धांत
तथा अवसर की उचित समानता का सिद्धांत, दो सिद्धांत जोड़े हैं। जॉन रॉल्स
का कहना है कि सम्पत्ति तथा आय का बंटवारा समान हो, यह आवश्यक नहीं
है, लेकिन यह असमान वितरण ऐसा होना चाहिए कि कम सुविधा प्राप्त व्यक्तियों
को भी अधिक-से- अधिक लाभ प्राप्त हो। इसी तरह अवसर की समानता के
बारे में जॉन रॉल्स ने कहा है कि पद और सत्ता सभी व्यक्तियों के लिए खुली हो
ताकि आम आदमी की भी उस तक पहुंच सुनिश्चित हो सके। भेदमूलक सिद्धांत
यह मांग करता है कि प्राथमिक वस्तुओं के समान वितरण में किसी तरह की
छूट को तभी मान्य ठहराया जा सकता है जब यह सिद्ध हो जाए कि इससे
हीनतम स्थिति वाले लोगों को अधिकतम लाभ होगा। किसी व्यक्ति को असाधारण
योग्यता और परिश्रम का लाभ तभी न्याय संगत होगा जब उससे समाज के
दीन हीन व्यक्तियों को अधिक लाभ हो। इसलिए ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना
चाहिए जिससे प्राथमिक वस्तुओं का समान बंटवारा हो। परन्तु इन प्राथमिक
वस्तुओं की अदला-बदली या विनिमय से बचना चाहिए। इसी तरह प्राथमिक
वस्तुओं के असमान वितरण को केवल उसी परिस्थिति में मान्यता दी जाए जिससे
कमजोर वर्ग को लाभ मिलता हो। विभेदमूलक सिद्धांत की व्याख्या करने के
बाद जॉन रॉल्स अवसर की समानता के सिद्धांत की व्याख्या करता है। जॉन रॉल्स का
कहना है कि अवसर की निष्पक्ष समानता यह मांग करता है कि सामाजिक और
आर्थिक असमानताओं को इस तरह व्यवस्थित किया जाए कि सबसे कम
लाभान्वित व्यक्ति को अधिकतम लाभ मिले और सभी व्यक्तियों की विभिन्न प्रकार
के पदों तक समान पहुंच हों।
तथा क्षमात का स्तर समान है तथा जो पद प्राप्ति की समान इच्छा रखते हैं,
उन्हें यह देखे बिना कि किस जाति या आर्थिक वर्ग में पैदा हुए हैं, सफलता
के समान अवसर प्राप्त होने चाहिए।’’ जॉन रॉल्स का यह आग्रह है कि हमें अवसर
को उचित समानता में बुद्धिमान व्यक्तियों को पद-प्राप्ति के विचार से भ्रमित
नहीं करना चाहिए। अवसर की समानता का सम्बन्ध कमजोर वर्ग को सौभाग्यशाली
बनाना ही होना चाहिए ताकि समाज का सुविधाहीन वर्ग भी असुरक्षित महसूस
न करे। जॉन रॉल्स का कहना है कि पदों को खुला रखने पर कम लाभान्वित व्यक्ति
भी उन लाभों तक पहुंच सकते हैं जिनसे उनको विशेष अधिकारों से युक्त
व्यवस्था में वंचित रखा गया था। कमजोर वर्ग योग्यता प्राप्त अधिकारियों द्वारा
उनके लिए बनाए गए निर्णय-लाभों से उतना सुरक्षित महसूस नहीं करता जितना
वह स्वयं प्रतिनिधित्व प्राप्त करके करता है।
इस तरह राूल्स वितरण की समस्या को उठाकर अपने न्याय सिद्धांत को
वितरणात्मक न्याय बना देता है जैसा अरस्तु द्वारा भी जिक्र किया गया था।
यह वितरण की समस्या ही आधुनिक युग में न्याय की समस्या है जो न्याय
के सिद्धांतों का आधार है।
प्रक्रियात्मक न्याय से है। इसका अर्थ यह है कि एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था का
निर्माण किया जाए जो सामाजिक नीतियों के द्वारा न्याय प्रदान करे। इस प्रक्रियात्मक
न्याय के लिए प्रक्रिया की उचितता की स्थापना हो। इसके लिए न केवल संस्थाओं की
न्यायिक व्यवस्था की स्थापना आवश्यक है बल्कि उन्हें लागू करने के लिए निष्पक्ष रूप
से प्रशासित भी होना चाहिए। न्यायिक मूल संरचना ही न्यायिक प्रक्रिया का आधार
होती है और यह सरंचना एक न्यायपूर्ण राजनीतिक संविधान तथा आर्थिक एवं सामाजिक
संस्थाओं की न्यायपूर्ण व्यवस्था से ही निर्मित होती है। इस प्रक्रियात्मक न्याय को प्राप्त
किए बिना वितरणात्मक न्याय की बात करना बेईमानी है। इसके लिए मूल सरंचना पर
विचार करना जरूरी हो जाता है। जॉन रॉल्स का मानना है कि न्याय के सिद्धांत की
अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक परिस्थितियों का होना जरूरी है और ये आवश्यक
परिस्थितियां ही मूल सरंचना ही न्याय का प्राथमिक विषय है।
आवश्यकता पड़ती है। इन पृष्ठभूमियों के बिना न्याय के किसी भी सिद्धांत की कल्पना
करना बेकार है। जॉन रॉल्स के अनुसार ये दशाएं हैं-
- न्यायसंगत संविधान,
- राजनीतिक
प्रक्रिया का उचित रूप से संचालन, - अवसर की समानता, प्टण् न्यूनतम सामाजिक
आवश्यकताओं की गारन्टी।
जॉन रॉल्स ने कहा है कि सभी नागरिकों को समान स्वतन्त्रताएं
प्राप्त होनी चाहिएं, सरकारों का चयन और निर्माण उचित राजनीतिक प्रक्रिया द्वारा
ही होना चाहिए, सभी कीे समान शैक्षिक, आर्थिक व राजनीतिक सुविधाएं प्रापत रहें
तथा लोगों को समान न्यूनतम सामाजिक आवश्यकताओं की गारन्टी मिले अर्थात
परिवार भत्ता, बेरोजगारी भत्ता आदि की समुचित व्यवस्था हो। इन व्यवस्थाओं को
बनाए रखने के लिए आबंटन, स्थिरीकरण, हस्तांतरण तथा वितरणात्मक संस्थाओं का
विकास किया जा सकता है।
इस प्रकार जॉन रॉल्स ने न्याय सिद्धांत में कुछ महत्वपूर्ण समस्याओं पर विचार किया है, जिनमें
से प्राथमिक वस्तुओं, सेवाओं और लाभों की समस्या प्रमुख है। जॉन रॉल्स का न्याय शुद्ध प्रक्रियात्मक
व वितरणात्मक स्वरूप रखता है। जॉन रॉल्स ने प्रक्रियात्मक तथा वितरणात्मक न्याय के द्वारा अपने
सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास किया है। उसने सामाजिक न्याय को
प्राप्त करने के लिए न्याय की प्रक्रिया को सुदृढ़ करने पर बल दिया है और न्याय की प्रक्रिया
निर्धारित करते समय सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राथमिकता दी है। जॉन रॉल्स ने प्रक्रियात्मक
न्याय को सामाजिक न्याय का उपकरण बनाने का प्रयास किया हैं इसी कारण जॉन रॉल्स ने कहा
है-’’समाज रूपी कड़ी को मजबूत बनाने के लिए इसकी सबसे कमजोर कड़ी को ही तलाश
करके बार-बार सुदृढ़ बनाने की प्रक्रिया अपनाने पर ही जॉन रॉल्स का अधिक जोर रहा है। अत:
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत ‘सामाजिक न्याय’ का महत्वपूर्ण
सिद्धांत है और जॉन रॉल्स व उसकी पुस्तक ‘A Theory of Justice’ बीसवीं सदी के साथ-साथ
आधुनिक युग में भी महत्व रखते हैं।
जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत के निहितार्थ
उपरोक्त विवेचन के बाद जॉन रॉल्स के न्याय-सिद्धांत के अन्तर्निहित परिणाम निकलते
हैं-
- न्याय का अर्थ है न्यायसंगत।
- न्याय की समस्या का संबंध प्राथमिक वस्तुओं और सेवाओं के न्यायपूर्ण वितरण से
है। - उपयोगितावाद सामाजिक न्याय का विरोधी है।
- जॉन रॉल्स का न्याय समझौतावादी है।
- न्याय की स्थापना मूल स्थिति में ही संभव है, क्योंकि यह अज्ञान के पर्दे को समेटे
हुए है। - न्याय के लिए उचित प्रक्रिया का होना आवश्यक है।
- न्याय का ध्येय कमजोर वर्ग को उन लाभों से परिपूर्ण करना है, जो उसे अब तक
नहीं मिले हैं। - समान स्वतन्त्रता व अवससर की समानता न्याय सिद्धांत के मेरुदण्ड हैं। इनके बिना
न्याय की कल्पना करना बेकार है। - प्रक्रियात्मक नय ही वितरणात्मक न्याय व सामाजिक न्याय का आधार है।
- न्याय की प्राप्ति के लिए सा0आ0व0रा0 संस्थाओं का न्यायसंगत होना जरूरी है।
- न्यायसंगत संविधान ही न्याय की प्राप्ति का साधन है।
जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत का मूल्यांकन
जॉन रॉल्स का न्याय-सिद्धांत अवसर की समानता, समान स्वतन्त्रताओं, प्राथमिक वस्तुओं का
न्यायपूर्ण वितरण, आय की समानता, संविधानिक लोकतन्त्र का समर्थन, समाज के सद्गुण के
रूप में न्याय की सर्वोच्चता, सामाजिक कल्याण में वृद्धि आदि बातों पर विचार करके उदारवादी
दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। जॉन रॉल्स ही ऐसा प्रथम उदारवादी विचारक है जिसने न्याय की
परिभाषा में समाजवादी गुणों अर्थात् आर्थिक असमानता, अवसरों की समानता आदि पर विचार
किया है। जॉन रॉल्स का यह कथन कि जिस तरह सत्य चिन्तन का प्रथम सद्गुण होता है, उसी
तरह न्याय सामाजिक- राजनीतिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण होता है, राजनीतिक चिन्तन
में काफी महत्व रख्ता है। जॉन रॉल्स ने अपने न्याय सिद्धांत में स्वतन्त्रता और समानता को काफी
महत्व देकर स्वतन्त्रता व समानता के अधिकारों का संरक्षण किया है। भारत के सन्दर्भ में जॉन रॉल्स
की सामाजिक न्याय की अवधारणा काफी महत्व रखती है। 1990 के बाद भारत में पिछड़े
वर्गों को दिया गया आरक्षण सामाजिक न्याय की प्रक्रिया का ही एक प्रमुख भाग है। पिछले
दशक से सामाजिक न्याय का विचार भारतीय राजनीतिक समाज का प्रमुख अंग बन चुका
है। जॉन रॉल्स की सामाजिक न्याय की अवधारणा भारतीय समाजवादी दर्शन और सर्वोदय के विचार
के काफी निकट है। अत: जॉन रॉल्स का न्याय का सिद्धांत सामाजिक न्याय की दृष्टि से काफी
महत्वपूर्ण है।
जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत की आलोचना
जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत की आलोचना के प्रमुख आधार हैं-
किया है कि न्याय सामाजिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण है। भ्रातृत्व का गुण न्याय
से अधिक या समान महत्वपूर्ण होता है। जहां भ्रातृत्व तथा परोपकारिता का भाव होगा
वहां व्यक्तियों में संघर्ष नहीं होगा। वहां पर न्याय की कोई अपील नहीं होगी, भ्रातृत्व
की उपस्थिति न्याय की अनिवार्यता को सीमित कर देती है। इसी कारण सैण्डल ने
लिखा है-’’न्याय सामाजिक संस्थाओं का प्रथम सद्गुण पूर्ण रूप से नहीं है जैसा कि
सत्य सिद्धांतों का बोध होता है। अपितु यह सशर्त है कि जैसे कि युद्ध क्षेत्र में
शारीरिक साहस होता है।’’
आवश्यकता के वितरणात्मक सिद्धांत को नहीं अपनाता जो कि न्याय के साधारण
सिद्धांत का अविभाज्य अंग है। जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत में स्रोत का वितरण इस
तरीके से किया जाता है कि इससे सबसे कम लाभान्वित व्यक्ति को ही अधिकतम
लाभ मिलता है। इस तरह आवश्यकता के वितरण का सिद्धांत अपनी सर्वव्यापकता
खो देता है।
मूल स्थिति की जो कल्पना की है, वह मानव-स्वभाव का अपूर्ण चित्रण करती है।
जॉन रॉल्स ने मूल स्थिति में व्यक्ति को विवेकी माना है। जबकि सत्य तो यह है कि मानव
ने स्वाभाविक प्रवृत्तियां होती हैं जिनमें अच्छी और बुरी दोनों का अस्तित्व रहता है।
जॉन रॉल्स ने अज्ञान के पर्दे का जिक्र करके न्याय सिद्धांत को ही अविवेकी व भ्रामक
दिया है।
कौन सी हैं। किसी भी विवेकी निर्णय के साथ अविवेकी प्रवृत्तियां भी स्वत: ही जुड़ी
होती हैं। इस तरह जॉन रॉल्स ने हॉब्स की तरह ही मानव स्वभव का एकाकी वर्णन किया
है जो न्यायसंगत नहीं हो सकता। इसी तरह जॉन रॉल्स ने समान स्वतन्त्रता की बात करके
भी राजनीतिक स्वतन्त्रता पर ही अधिक जोर दिया है। इसी कारण जॉन रॉल्स का न्याय
का सिद्धांत अतार्किक व असंगत है। इनमें कल्पना और आदर्शवाद की पुट अधिक
है।
स्थान प्राप्त है। मैकफरसन ने कहा है कि जॉन रॉल्स पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का पोषक
है। उसने मिल्स की तरह निजी स्वामित्व वाली व्यवस्था का समर्थन किया है, क्योंकि
उसकी दृष्टि में निजी स्वामित्व वाली व्यवस्था ही व्यक्तिगत स्वतन्त्रताओं की अधिक
संरक्षण है। जबकि सच्चाई तो इसके विपरीत है। एक पूंजीवादी बाजार समाज में
स्वतन्त्रता तथा व्यक्तिगत अधिकारों का सार्थक समानता के साथ मेल करना
असातत्यपूर्ण है। पूंजीवाद में किसी भी अवस्था में व्यक्ति के अधिकार और स्वतन्त्रताओं
का समान बना रहना सम्भव नहीं है। मैकफरसन की तरह ही अन्य माक्र्सवदियों ने
भी जॉन रॉल्स के सिद्धांत की आलोचना की है।
अनुसार जॉन रॉल्स का सिद्धांत वर्ग संघर्ष का समर्थ नहीं है। यह पूंजीवाद के विशेषाधिकारों
का ही रक्षक है। पूंजीवादी समाज में सुविधा सम्पन्न वर्ग सुविधाहीन वर्ग का ख्याल
रखेगा, इस बात की कोई गारन्टी नहीं है। इसी तरह अन्य माक्र्सवादियों का भी कहना
है कि आर्थिक व सामाजिक तथ्यों को समझे बिना व न्याय के सिद्धांत का निर्धारण
करना तर्क संगत नहीं है।
अज्ञान के पर्दे में विचरणों के कारण उसको सामाजिक-आर्थिक तथ्यों का ज्ञान नहीं
होता। किसी भी नैतिक व्यवस्था को वर्ग-संघर्ष और उत्पादन प्रणालियों के बिना
समझना न्यायसंगत नहीं हो सकता।
को अतर्कसंगत, काल्पनिक और पूंजीवाद का पोषक कहा है।
स्थिति में अज्ञान के पर्दे की बात को गलत करार दिया है। जॉन रॉल्स ने उदारवाद को
जिस रूप में से संशोधित करने का प्रयास किया है। नोजिक ने जॉन रॉल्स के ‘न्याय
उचितता के सिद्धांत’ राज्य के कार्यक्षेत्र के बाह नैतिक प्रतिमानों पर ही आधारित
हो सकता है। राज्य के कार्य क्षेत्र में वृद्धिन्याय की अवधारणा के सर्वथा विपरीत होती
है। इसी तरह कम लाभान्वित व्यक्तियों के लिए लाभान्वित व्यक्तियों को भी साधन
की तरह प्रयुक्त करना न्यायसंगत नहीं है।
मनुष्य की स्वतन्त्रता का भी बलिदान दे दिया है। ऐसे में समाज की उन्नति की कल्पना
बेकार है। इसलिए जॉन रॉल्स का न्याय का सिद्धांत व्यक्ति की गरिमा के विरूद्ध और
अबुद्धिसंगत है।
विचारकों-अलासदैर मेकण्टायर, चाल्र्स टेलर, माइकल वाल्जर ने भी आलोचना की
है। अलासदैर मेकण्टायर का कहना है कि जॉन रॉल्स ने योग्यता की मान्यता की उपेक्षा
की है। इसी तरह जॉन रॉल्स व्यक्तिवादी मान्यता से अपने को अलग नहीं कर सका है
तथा जॉन रॉल्स ने नैतिक तटस्थता की नीति अपनाकर सामान्य शुभ (Common Good)
को समर्पित जीवन प्रणाली अपनाने का अवसर खो दिया है।
मनुष्य की कल्पना सर्वथा स्वायत और स्वार्थपरायण मनुष्य के रूप की है। सार में
तो सत्य यह है कि जॉन रॉल्स के न्याय सिद्धांत में ‘समुदाय की अवधारणा’ का ही लोप
है।
न्याय-सिद्धांत परम्परागत उदारवादी पूंजीवादी व्यवस्था के औचित्य की ही पुष्टि
करता है जिसमें यह माना जाता हे कि धनवान लोगों को धन संग्रह करने की स्वतन्त्रता
प्राप्त होने पर निर्धन लोगों को भी लाभ मिलता है। इससे पूंजीपति वर्ग के
विशेषाधिकारों का ही संरक्षण होता है। जॉन रॉल्स का अवसर की समानता का सिद्धांत
चाहे लाख प्रयास कर ले, वह अमीर-गरीब की खाई को नहीं पाट सकता। इसी तरह
जॉन रॉल्स का न्याय-सिद्धांत यह पहचानने में भी असफल है कि हीनतम स्थिति वाले
लोग कौन हैं।
व्यक्तियों या समूहों को किस-किस आधार पर हीनतम माना जाएगा। यदि केवल
आर्थिक आधार पर ही इसकी पहचान की गई तो इससे व्यक्ति की प्रतिभा या
योग्यता का उल्लंघन होगा यह व्यक्ति की भावात्मक सुरक्षा को ठेस पहुंच
सकती है।
इस प्रकार मार्क्सवादियों, सामुदायिकवादियो, समष्टिवादियों, व उदारवादियों द्वारा जॉन रॉल्स के
न्याय सिद्धांत की काफी आलोचना की गई है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जॉन रॉल्स
का न्याय-सिद्धांत महत्वहीन है। सत्य तो यह है कि जॉन रॉल्स का न्याय सिद्धांत अपने पूर्ववर्ती
न्याय-सिद्धांतों में से सबसे अधिक महत्व का है। जॉन रॉल्स ने सामाजिक न्याय की अवधारणा
का प्रतिपादन करके आधुनिक सरकारों के कल्याणकारी स्वरूप की तरफ अपना संकेत दिया
है।
के लिए ही सभी सरकारें अपने कल्याणकारी कार्यक्रम चलाती हैं, अत: जॉन रॉल्स का न्याय-सिद्धांत
सामाजिक न्याय और उदारवादी प्रजातन्त्र की आधारशिला रखता है। इसलिए वह राजनीतिक
चिन्तन के इतिहास में शाश्वत् महत्व रखता है।