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है। हिन्दी साहित्य के भक्तिकालीन साहित्य के प्रमुख स्तम्भों में से एक हैं। हिन्दी साहित्य में भक्ति आन्दोलन को प्रसारित करने में भी योगदान सर्वाधिक है। उनकी भक्ति का मूल आधार व्यक्ति की गरिमा को सुरक्षित रखकर एकता का
प्रतिपादन करना है। कबीर की भक्ति भावना में नाम स्मरण को अत्यधिक दिया गया
है।
है। कबीर रहस्यवादी है, उनका रहस्यवाद भौतिक न होकर आध्यात्मिक है, भावनात्मक
न होकर साधनात्मक है।
को दूर करके जनसाधारण को सरल जीवन, सत्याचरण, पारस्परिक एकता, समानता
आदि की ओर उन्मुख करने का सराहनीय कार्य किया है।
कबीर दास का जीवन परिचय
कबीर की जन्मतिथि के सम्बन्ध में कई मत प्रचलित है, पर अधिक मान्य मत – डाॅ.
श्यामसुन्दर दास और आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का है। इन विद्वानों ने कबीर का जन्म सम्वत्
1456 वि. (सन्1389 ई.) माना है। इनके जन्म के सम्बध में कहा जाता है कि कबीर
काशी की एक ब्राह्मणी विधवा की सन्तान थे। समाज के डर से ब्राह्मणों ने अपने नवजात
पुत्र को एक तालाग के किनारे छोड दिया था, जो नीरू जुलाहे और उसकी पत्नी नीमा को
जलाशय के पास प्राप्त हुआ। विद्वानों के मतानुसार कबीर का अवसान मगहर में सम्वत्
1575 वि.(सन् 1518 ई.) में है
कबीर की जितनी भी रचनाएँ मिलती हैं उनकें शिष्यों ने इन्हें बीजक नामक ग्रन्थ में
संकलित किया है। इसी बीजक के तीन भाग हैं – साख, शबर और रमैनी । साखी में
संग्रहित साखियों की संख्या 809 है। सबद के अन्तर्गत 350 पद संकलित है। साखी शब्द
का प्रयोग कबीर ने संसार की समस्याओं को सुलझाने के लिए किया है। सबद कबीर के
गेय पद है। रमैनी के ईश्वर सम्बन्धी, शरीर एवं आत्मा उद्धार सम्बन्धी विचारों का संकलन
है। कबीर के निर्गुण भक्ति मार्ग के अनुयायी थे और वैष्णव भक्त थे।
धार्मिक पाखण्डों, सामाजिक कुरीतियों, अनाचारों, पारस्परिक विरोधों आदि को दूर करने का
सराहनीय कार्य किया है। कबीर की भाषा में सरलता एवं सादगी है, उसमें नूतन प्रकाश
देने की अद्भुत शक्ति है। उनका साहित्य जन-जीवन को उन्नत बनाने वाला, मानवतावाद
का पोषाक, विश्व -बन्धुत्व की भावना जाग्रत करने वाला है। इसी कारण हिन्दी सन्त
काव्यधारा में उनका स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
कबीर की भाषा
इसलिए सभी भाषाओं से शब्द ग्रहण करना उनका स्वभाव था। मूलतः वे काशी के रहने
वाले थे और काशी में मुख्यताः भोजपुरी बोली जाती है। कबीर की भाषा पूर्वी हिन्दी है।
कबीर की भाषा मे बंगला, बिहारी, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, ब्रज, खडी, राजस्थानी,
पंजाबी, सिन्धी, गुजराती, लहँदा, अरबी, फारसी, आदि सभी बोलियों को शब्दों का प्रयोग
मिलता है। कबीर की भाषा में सरलता एवं सादगी है, उसमें अपनी बात लोगों तक
पहुँचाने की क्षमता है।
कबीर का समाज सुधारक रूप
1. हिन्दु-मुस्लिम एकता पर बल
2. बाहृयाडम्बरो का विरोध
‘‘पाहन पूजै हरि मिलै तो मैं पूजूँ पहार।तावे यह चाकी भली पीस खाय संसार।।’’
‘‘काकर पाथर जोरि है मस्जिद लई बनाय।ता चढे मुल्ला बांगदे, क्या बहिरा हुआ खुदाय।।’’
3. जांति- पाति का खण्डन
जाति न पूछो साधु की पूछो उसका ज्ञान।मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान।।
4. कथनी-करनी में एकरूपता
कथनि ताजि करनी करे, विष से अमृत होय।
5. कबीर का साहित्य के क्षेत्र में
- उपदेश और धर्म की नीरस चर्चा, उलट-बासियां तथा सुनी -सुनाई बातों का पिष्टपोषण।
- श्रृंखलाबद्ध सुव्यवस्थित दार्शनिक विचार धारा का अभाव तथा विभिन्न विचारधाराओं का असंगत मिश्रण
- आषा और शैली का अव्यवस्थित रूप।
- आर. एन. गौड – हिन्दी साहित्य का सरल इतिहास , राजहंस प्रकाशन मंदिर , मेरठ (उ.प्र) 1961
- डाँ. श्रीनिवासन शर्मा – हिन्दी साहित्य का इतिहास , तक्षशिला प्रकाशन , नई दिल्ल,1978
- डाँ. हरिमोहन बुधौलिया, डाँ. शकुतंला सिंह, डाँ. मृदुला शर्मा – म0.प्र0 हिन्दी ग्रन्थ अकादमभ्, भोपाल, 2002
- डाँ. नगेन्द्र हिन्दी साहित्य का इतिहास, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्लभ्,2006
- डाँ. द्वारिका प्रसाद सक्सेना – हिन्दी के प्राचीन प्रतिनिधी कवि, अग्रवाल पब्लिकेशन्स, आगरा 2 , 2009-10
