त्वचा की संरचना तथा कार्य

स्पर्शेन्द्रिय (Sense of touch) का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है, जबकि शरीर की अन्य समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ स्थानीय होती हैं, तथा एक निश्चित क्षेत्र में कार्य करती हैं। स्पर्श के अतिरिक्त ताप, शीत, दाब, पीड़ा, वेदना, हल्का, भारी, सूखा, चिकना आदि संवेदनाओं का ज्ञान इसी के द्वारा होता है। समस्त शरीर की त्वचा में तन्त्रिका तन्तुओं के …

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जीभ की संरचना एवं कार्य

जीभ या जिहृा का मुख्य कार्य किसी वस्तु को चखकर उसके स्वाद को ज्ञात करना है क्योंकि स्वाद के रिसेप्टर्स (Receptors) इसी में स्थित होते हैं। स्वाद के कुछ रिसेप्टर्स कोमल तालू (Soft palate), टॉन्सिल्स एवं कंठच्छद (Epiglottis) आदि की म्यूकस मेम्ब्रेन में भी होते हैं। जीभ एक अत्यधिक गतिशील अंग है, जो स्वाद-संवेदन के अतिरिक्त …

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एड्रीनल / अधिवृक्क ग्रंथि की संरचना एवं कार्य

हमारे शरीर में दो अधिवृक्क ग्रन्थियाँ होती हैं तथा दोनों गुर्दों की चोटी पर स्थित होती है। यह कनेक्टिव टिश्यू कैप्सूल (connective tissue capsule) से घिरी होती हैं और आंशिक रूप से वसा के एक द्वीप में दबी रहती हैं। अधिवृक्क ग्रन्थि को सुपरारीनल ग्रन्थि (Suprarenal Glands) भी कहा जाता है । एड्रीनल कॉर्टेक्स एड्रीनल मैड्यूला …

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थायराइड ग्रंथि की संरचना एवं कार्य

थाइरॉइड ग्रन्थि ग्रीवा में श्वास प्रणाल (Trachea) के सामने निचले सर्वाइकल और प्रथम थोरेसिक वर्टिब्रा के स्तर पर स्थित रहती है। यह दो खण्डों में विभक्त रहती है जो लेरिक्स (स्वर यंत्र) और ट्रेकिया (श्वास प्रणाल) के मध्य जोड़ के दोनों तरफ स्थित रहती है। एक सामान्य वयस्क में थाइरॉइड ग्रन्थि का वजन लगभग 25-40 ग्राम …

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पैराथायराइड ग्रंथि की संरचना एवं कार्य

पैराथाइरॉइड ग्रन्थि मसूर के दाने के आकार की चार छोटी-छोटी ग्रन्थियों का समूह है, जिनमें से प्राय: दो-दो थाइरॉइड ग्रन्थि के प्रत्येक खण्ड की पोस्टीरियर (पिछली सतह) में स्थित रहती है। ये लगभग 3-4 मि0मी0 व्यास की होती है और पीले भूरे रंग की होती है। जिन कोशिकाओं से ये बनी होती है, वे spherical होती …

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प्राकृतिक चिकित्सा का अर्थ एवं परिभाषा

प्राकृतिक चिकित्सा का अर्थ- हमारे पूर्वज एवं ऋषि-मुनियों के द्वारा आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व वर्तमान में उत्पन्न होने वाली परिस्थितियों से परिचित हो गये थे। इसी कारण उन्होंने विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों की खोज की थी जिससे शरीर में रोग के लक्षण न उत्पन्न हो, और यदि किसी भूल के कारण रोग हो जाए तो प्राकृतिक …

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प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास

भारत में प्राकृतिक चिकित्सा का इतिहास- प्राकृतिक चिकित्सा उतनी ही पुरानी है जितनी की प्रकृति स्वयं है और उनके आधार भूत तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश। प्रकृति के तत्व जिनसें जीवन की उत्पित्त होती है सदैव वही तत्व रोगों को दूर करने में सहायक रहे। प्राचीन काल से ही तीर्थ स्नान पर घूमना, उपवास रखना, …

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प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त

मनुष्य प्रकृति का एक हिस्सा है। उसका शरीर इन्हीं प्रकृति तत्व से बना है। प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्त नितान्त मौलिक है इनके अनुसार प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने से रोग पैदा होते है तथा प्राकृतिक नियमों का पालन करते हुए पुन: निरोग हो सकते है। मनुष्य शरीर में स्वाभाविक रूप एक ऐसी प्रकृति प्रदत्त्ा पायी …

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आकाश तत्व क्या है ?

संसार में पंच महा भूतो में आकाश तत्व प्रधान होता है। यह सबसे अधिक उपयोगी एवं प्रथम तत्व हैै। जिस प्रकार परमात्मा असीम एंव निराकार है उसी प्रकार आकाश तत्व का असीम एवं निराकार है। आकाश तत्व का उसी प्रकार नाश नही हो सकता जिस प्रकार र्इश्वर को कभी नश्ट नहीं किया जा सकता। भारतीय मान्यताओं …

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असामान्य मनोविज्ञान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

असामान्य व्यवहार के बारे में अध्ययन करना अपने आप में कोर्इ नया कार्य नहीं है, क्योंकि यह कार्य बहुत प्राचीन समय से किया जाता रहा है। असामान्य मनोविज्ञान की एक लम्बी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। मनोरोगों के अध्ययन का प्रारंभ मानवजाति के अभिलिखित इतिहास से ही होता है। अत्यधिक प्राचीन समय में मानसिक विकृतियों का कोर्इ ऐतिहासिक …

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