वाणिज्य क्या है ?

वाणिज्य व्यवसाय के दो अंग हैं-  उद्योग और वाणिज्य। उद्योगों का कार्य जहां समाप्त होता है, वहीं वाणिज्य का कार्य आरम्भ होता है। उद्योगों में वस्तुओं का उत्पादन होता है। इन वस्तुओं को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की क्रिया वाणिज्य है। इस प्रकार वाणिज्य के अन्तर्गत उत्पादन स्थल से निर्मित वस्तु प्राप्त करके उपभोक्ता तक पहुंचाने की समस्त …

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परिवहन का अर्थ, महत्व एवं प्रकार

परिवहन का अर्थ वर्तमान अर्थव्यवस्था में परिवहन या यातायात सेवा का अत्यधिक महत्व है। परिवहन सेवाएं आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक प्रगति की सूचक हैं। आप जानते है कि माल का उत्पादन एक स्थान पर होता है और उपयोग विभिन्न स्थानों पर। आजकल माल का बाजार न केवल प्रदेश और देश वरन पूरे विश्व में फैला हुआ …

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सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम

निजी कम्पनियां ऐसे क्षेत्रों में उद्योग लगाने हेतु रूचि नहीं लेते थे जिसमें, भारी पूंजी निवेश हो लाभ कम हो, सगर्भता की अवधि (जेस्टेशन पीरियड) लम्बी हो जैसे-मशीन निर्माण, आधारभूत ढ़ांचा, तेल अन्वेषण आदि इसी तरह निजी उद्यमी उन क्षेत्रों को ही प्राथमिकता देते हैं जहां संसाधन सुलभता से उपलब्ध हों जैस-कच्चे माल, श्रमिक, विद्युत, बाजार …

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विपणन का अर्थ, परिभाषा, विशेषताएँ, प्रकृति, कार्य और महत्व

विपणन का अर्थ एवं परिभाषाएं प्रारंभिक समय में विपणन से तात्पर्य वस्तुओं के क्रय-विक्रय से था। दूसरे शब्दों में माल को उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचाने वाली सभी क्रियाओं को विपणन में सम्मिलित किया जाता था। उत्पादन बाहुल्य एवं विविधता के फलस्वरूप विपणन के क्षैत्र में आमूल-चूल परिवर्तन हुए तथा विपणन का केन्द्र बिन्दु उपभोक्ता बन …

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योग का अर्थ, परिभाषा महत्व और उद्देश्य

ज्ञान का मूल वेदों में निहित है। दार्शनिक चिन्तन तथा वैदिक ज्ञान का निचोड आत्म तत्व की प्राप्ति है। आत्मतत्व की प्राप्ति का साधन योग विद्या के रूप में इनमें (वेद) उपलब्ध है। योगसाधना का लक्ष्य कैवल्य प्राप्ति है। वैदिक ग्रन्थ, उपनिषद्, पुराण और दर्शन आदि में यत्र-तत्र योग का वर्णन मिलता है। जिससे यह पुष्टि …

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योग का उद्भव एवं विकास

योग भारतीय संस्कृति का एक आधार स्तम्भ हैं । जो प्राचिन काल से आधुनिक काल तक हमारे काल से जुडा हुआ है । इस योग का महत्व प्राचिन काल से भी था तथा आधुनिक काल में भी इसका महत्व और अधिक बडा है। प्रिय पाठको योग एक ऐसी विद्या है जिसके द्वारा मन को अविद्या,अस्मिता आदि …

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योग में साधक एवं बाधक तत्व

योग शब्द का अर्थ संस्कृत भाषा के युज् धातु से निश्पन्न होने के साथ विभिन्न ग्रन्थों के अनुसार योग की परिभाषाओं का अध्ययन किया गया। योग साधना के मार्ग में साधक के लिए साधना में सफलता हेतु सहायक तत्वों तथा साधना में बाधक तत्वों की चर्चा विभन्न ग्रन्थों के अनुसार की गर्इ है। वास्तविकता में योग …

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योगवशिष्ठ में योग का स्वरूप

योगवशिष्ठ में योग का स्वरूप  योग वशिष्ठ योग का एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। अन्य योग ग्रन्थों की भाँति योग वशिष्ठ में भी योग के विभिन्न स्वरूप जैसे- चित्तवृत्ति, यम-स्वरूप, नियम-स्वरूप, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, समाधि, मोक्ष आदि का वर्णन वृहद् रूप में किया गया है। योग वशिष्ठ के निर्वाण-प्रकरण में वशिष्ठ मुनि श्री राम जी को …

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जैन दर्शन में योग का स्वरूप

जैन दर्शन में योग का स्वरूप  भारतवर्ष में जिस समय बौद्ध दर्शन का विकास हो रहा था उसी समय जैन दर्शन भी विकसित हो रहा था। दोनों दर्शन छठी शताब्दी में विकसित होने के कारण समकालीन दर्शन कहे जा सकते हैं। जैन मत के विकास और प्रचार का श्रेय अन्तिम तीर्थंकर महावीर को दिया जाता है। …

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सांख्य दर्शन का परिचय एवं योग

सांख्य दर्शन परिचय-  सॉख्य दर्शन के प्रणेता कपिल है यहॉ पर सांख्य शब्द अथवा ज्ञान के अर्थ में लिया गया है सांख्य दर्शन में प्रकृति पुरूष सृष्टि क्रम बन्धनों व मोक्ष कार्य कारण सिद्धान्त का सविस्तार वर्णन किया गया है इसका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है। 1. प्रकृति-  साख्य दर्शन में प्रकृति को त्रिगुण को …

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