अथर्ववेद का अर्थ, स्वरूप, शाखाएं

‘अथर्व’ शब्द का अर्थ है अकुटिलता तथा अंहिसा वृत्ति से मन की स्थिरता प्राप्त करने वाला व्यक्ति। इस व्युत्पत्ति की पुष्टि में योग के प्रतिपादक अनेक प्रसंग स्वयं इस वेद में मिलते है। होता वेद आदि नामों की तुलना पर ब्रह्मकर्म के प्रतिपादक होने से अथर्ववेद ‘ब्रह्मवेद’ कहलाता है ब्रह्मवेद नाम का यही मुख्य कारण है।  …

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सामवेद की सम्पूर्ण जानकारी/ Complete details about samveda

अथर्ववेद के अनेक स्थलों पर साम की विशिष्ट स्तुति ही नहीं की गई है, प्रत्युत परमात्मभूत ‘उच्छिष्ट’ (परब्रह्म) तथा ‘स्कम्भ’ से इसके आविर्भाव का भी उल्लेख किया गया मिलता है। एक ऋषि पूछ रहा है जिस स्कम्भ के साम लोभ हैं वह स्कम्भ कौन सा है? दूसरे मन्त्र में ऋक् साथ साम का भी आविर्भाव ‘उच्छिकष्ट’ …

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यजुर्वेद की शाखाएं एवं भेद

यजुर्वेद की शाखाएं काण्यसंहिता कृष्ण यजुर्वेद तैत्तिरीय संहिता  मैत्रात्रणी संहिता  1. काण्यसंहिता-  शुक्ल यजुर्वेद की प्रधान शाखायें माध्यन्दिन तथा काण्व है। काण्व शाखा का प्रचार आज कल महाराष्ट्र प्रान् तमें ही है और माध्यन्दिन शाखा का उतर भारत में, परन्तु प्राचीन काल में काण्य शाखा का अपना प्रदेश उत्तर भारत ही था, क्योंकि एक मन्त्र में …

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गीता का दार्शनिक तत्वविवेचन की दृष्टि से महत्व

श्रीमदभगवदगीता विश्व के सबसे बडे महाकाव्य महाभारत के “भीष्मपर्व” का एक अंश है। भगवदगीता भगवान कृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र युद्ध में दिया गया दिव्य उपदेश है जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर किंकर्तव्यविमूढ़ कि स्थिति में पहुंच चुके थे। इस प्रकार अर्जुन को केन्द्र में रखकर दिया गया यह भगवान का गीता अमृत रूपी वाणी से समन्वित उपदेश है। …

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श्रीमद्भगवद्गीता का परिचय || Bhagavad Gita ka parichay

गीता संस्कृत साहित्य काल में ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व का अमूल्य ग्रन्थ है। यह भगवान श्री कृष्ण के मुखारबिन्द से निकली दिव्य वाणी है। इसमें 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। इसके संकलन कर्ता महर्षि वेद ब्यास को माना जाता है। आज गीता का विश्व की कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। गीता में …

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व्यसन किसे कहते हैं ? नशीले पदार्थों का मानव पर क्या प्रभाव पड़ता है ?

व्यसन एक द्रव्य सम्बन्धी विकृति है, जिसमें व्यक्ति अत्यधिक मात्रा में विभिन्न प्रकार के रसायन द्रव्यों का सेवन करता है और इन द्रव्यों पर इतनी अधिक निर्भरता बढ़ जाती है कि इनके दुष्प्रभावों से परिचत होते हुए भी वह इनको लेने के लिये विवश हो जाता है, क्योंकि न लेने पर उसके शरीर और मन को …

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चिंता क्या है इसके कारण एवं लक्षणों का विस्तृत वर्णन

चिन्ता अपने आप में एक ऐसा मानसिक रोग है जो व्यक्ति के विचारों में लगकर भीतर ही भीतर उसे खोखला करता जाता है। चिन्ता सामान्यतः अज्ञात, अमूर्त एवं व्यक्तिनिष्ठ परिस्थितियों से सम्बन्धित होती है। जो प्रायः इच्छित वस्तु के न प्राप्त होने की दशा में या फिर उसको प्राप्त करने के मार्ग में आने वाले अवरोधों …

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स्मृति किसे कहते हैं? परिभाषा सहित स्मृति का अर्थ

प्राय: हम यह सुनते हैं कि अमुक व्यक्ति की स्मृति बहुत अच्छी है। अमुक व्यक्ति बार-बार भूल जाता है। कई व्यक्ति अपनी स्मृति में कई सूचनाओं को एक साथ रख लेते हैं। कई बार हम बचपन की बातों को स्मृति में ले आते हैं तो कई बार हम वर्तमान की बातों को भी भूल जाते हैं। …

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मनोवैज्ञानिक परीक्षण की विभिन्न विधियाँ

क्या आप जानते हैं कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण कितने प्रकार के होते हैं?  मनोवैज्ञानिक परीक्षण एक मानवीकृत यन्त्र होता है, जिसमें प्रश्नों अथवा चित्रों या अन्य माध्यमों के द्वारा मनुष्य की विभिन्न मानसिक योग्यताओं जैसे कि बुद्धि, समायोजन क्षमता, स्मृति, अभिवृत्ति, अभिरूचि इत्यादि का मात्रात्मक मापन किया जाता है।  कहने का आशय यह है कि मनोवैज्ञानिक परीक्षण …

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एरिक्सन का मनोसामाजिक सिद्धांत, मनोसामाजिक विकास की 8 अवस्थाएं

एरिक एरिक्सन एक प्रसिद्ध मनोविष्लेशक थे जिसने मानव के सम्पूर्ण जीवनकाल के सामान्य विकास का मनोसामाजिक सिद्धान्त प्रतिपादित किया । एरिक्सन ने व्यक्तित्व विकास के लिए सामाजिक कारकों के महत्व पर बल दिया । उसने विकास के विभिन्न अवस्थाओं के नियत निर्धारकों को स्थिरता और स्थायित्व में भिन्न है , का सम्प्रत्यय विकसित किया । एरिक्सन …

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