सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत (सामाजिक डार्विनवादी, चक्रीय सिद्धांत, पारसंस का उद्विकास सिद्धांत)

सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या समाजशास्त्रियों ने कतिपय सिद्धांतों के संदर्भ में की है। महत्वपूर्ण बात यह है कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया को हम किस उपागम से देखते है। यह उपागम ही सामाजिक परिवर्तन का सिद्धांत है। उदाहरण के लिये इतिहासकार टोयनबी या समाशास्त्री सोरोकनी जब सामाजिक परिवर्तन की व्याख्या करते है तो उन्हें लगता है …

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द्वितीयक समूह का अर्थ एवं परिभाषा

एन्थेनी गिडेन्स ने आज के समाज में द्वितीयक समूह के महत्व को महत्वपूर्ण स्थान दिया है। उनका कहना है कि हमारा दैनिक जीवन – सुबह से लेकर शाम तक – द्वितीयक समूहों के बीच में गुजरता है। एक तरह से हमारी श्वास दर श्वास द्वितीयक समूहों के सदस्यों के साथ निकलती है। सही है गिडेन्स के …

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सामाजिक समूह की परिभाषा उसका अर्थ और विशेषताएँ

सामाजिक समूह की अवधारणा का अंतर हमें इससे मिलती-जुलती दो और धारणाओं से करना चाहिए। ये धारणाएँ है : (1) समुच्चय, और (2) सामाजिक कोटियाँ। समुच्चय और सामाजिक कोटियाँ निश्चित रूप से व्यक्तियों का जोड़ है। सामाजिक समूह की परिभाषा  सामाजिक समूह न तो अनेक व्यक्तियों का समुच्चय है और न ही यह एक सामाजिक कोटि …

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कृषि विपणन क्या है विपणन व्यवस्था में इन विशेषताओं का होना आवश्यक हैं

कृषि विपणन से तात्पर्य उन सभी क्रियाओं से लगाया जाता है, जिनका सम्बन्ध कृषि उत्पादन का किसान के यहां से अन्तिम उपभोक्ता तक पहुंचाने में किया जाता है।  प्रो0 अबाॅट के अनुसार ‘‘ कृषि विपणन के अंतर्गत उन समस्त कार्यों को सम्मिलित किया जाता है जिनके द्वारा खाद्य पदार्थ एवं कच्चा माल फार्म से उपभोक्ता तक …

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कृषि वित्त या कृषि साख क्या है किसानों की आवश्यकताओं के आधार पर कृषि वित्त के प्रकार

कृषि वित्त (कृषि साख) से अभिप्राय ग्रामीण क्षेत्र में किसानों को ऋण सुविधाएं उपलब्ध कराने से है। ग्रामीण साख सर्वेक्षण के अनुसार ‘‘कृषि की वह साख जिसकी कृषको को कृषि कार्यों को पूर्ण करने में आवश्यकता होती है, कृषि वित्त या साख के अन्तर्गत आती है।‘‘ दूसरे शब्दों में कृषि वित्त या साख से तात्पर्य उस …

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कौटिल्य का अर्थशास्त्र

आचार्य कौटिल्य द्वारा विरचित अर्थशास्त्र नामक ग्रन्थ राजनीति और अर्थशास्त्र का ऐसा महत्वपूर्ण ग्रन्थ है जिसमें ईसा से तीन शताब्दी पूर्व के एतद्विषयक भारतीय चिन्तन की पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं। हमारे प्राचीन चिन्तन के बारे में पाश्चात्त्य विद्वानों का सामान्यत: यही मानना था कि भारत ने विचार क्षेत्र में तो प्रगति की है, लेकिन क्रिया …

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रामायण का रचनाकाल कब माना जाता है?

रामायण के रचना के सम्बंध में विद्वान एक मत नहीं है। आदि काव्य रामायण की रचना राम के राज्यकाल में हुई थी । निर्वासन के बाद गर्भवती सीता वाल्मीकि के ही आश्रम में रही और वही लव और कुश का जन्म तथा पालन हुआ था। इस दृष्टि से रामायण की रचना त्रेता युग में हुई थी …

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रामायण के विभिन्न संस्करण

वाल्मीकि रामायण के उपलब्ध होने वाले पाठ एकरूप नहीं मिलते हैं, उसके चार संस्करण मुख्य रूप से उपलब्ध होते है। इन चारों के अतिरिक्त बड़ौदा से प्रकाशित रामायण का ‘आलोचनात्मक संस्करण’ आजकल विशेष रूप से प्रचलित है।  रामायण के विभिन्न संस्करण रामायण के विभिन्न संस्करण हैं- औदीच्य संस्करण  गौड़ीय संस्करण  दाक्षिणात्य संस्करण  पश्चिमोत्तरीय संस्करण  आलोचनात्मक संस्करण  …

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महाभारत के 18 पर्व ‘महाभारत’ का प्रणयन 18 पर्वों या खण्डों में हुआ है, जिनके नाम इस प्रकार हैं

महाभारत के 18 पर्व ‘महाभारत’ का प्रणयन 18 पर्वों या खण्डों में हुआ है, जिनके नाम इस प्रकार हैं-  प्रत्येक पर्व में वर्णित विषयों की सूची इस प्रकार है-  महाभारत में कितने पर्व है और उनके नाम महाभारत के 18 पर्व ‘महाभारत’ का प्रणयन 18 पर्वों या खण्डों में हुआ है, जिनके नाम इस प्रकार हैं-  आदि पर्व …

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पुराणों की संख्या कितनी है। पुराणों के नाम

जिस प्रकार समग्र वेदों के मंत्र अपनी मूलावस्था में अविभक्त रूप में एक ही साथ मिले-जुले थे, उसी प्रकार पुराण भी एक बृहत्संहिता के रूप में सम्मिलित थे। वेदों के चतुर्धा वर्गीकरण की भांति पुराणों का भी पंचम वेद के रूप में अलग विभाजन उनकी रचना के बहुत बाद हुआ और पुराण-ग्रंथों का अध्ययन करने पर …

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