इतिहास की अवधारणा, स्वरूप, विषय क्षेत्र, अध्ययन का महत्व

‘हिस्ट्री’ (History) शब्द की उत्पत्ति ग्रीक शब्द ‘हिस्टोरिया’ (Historia) से हुर्इ है जिसका अर्थ ‘खोजना या जानना’ है। यह शब्द अतीत की घटनाओं की ओर संकेत करता है। ‘हिस्ट्री’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग ग्रीक लेखक हेरोडोटस ने किया था। इसीलिए उसे ‘इतिहास का पिता’ कहा जाता है। हिस्ट्री का भारतीय शब्द ‘इतिहास’ है। इतिहास शब्द ‘इति+ह+हास’ …

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ध्यान का अर्थ एवं परिभाषा

जब धारणाभ्यासी देश-विशेष में मन को लगाते हुए मन को ध्येय के विषय पर स्थिर कर लेता है तो उसे ध्यान कहते हैं। यह समाधि-सिद्धि के पूर्व की अवस्था है। ध्यान अष्टांग योग का सातवाँ अंग है। पहले के छ: अंग ध्यान की तैयारी के रूप में किए जाते हैं। ध्यान से आत्मसाक्षात्कार होता है। ध्यान …

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आयुर्वेद में योग

आयुर्वेद और योग दोनों ही अत्यन्त प्राचीन विद्यायें हैं। दोनों का विकास और प्रयोग समान उद्देश्य के लिए एक ही काल में मनुष्य मात्र के दु:खों को दूर करने के लिए हुआ। आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ जीवन का विज्ञान है। इसे एक बहु उद्देश्यीय विज्ञान के रूप में विकसित किया गया है। योग के अनुसार पुरुषार्थ …

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उपनिषद का अर्थ, रचनाकाल एवं संख्या

उपनिषद का अर्थ उपनिषद् शब्द ‘उप’ एवं ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक सद् (सदृलृ) धातु में ‘क्विप्’ प्रत्यय लगकर बनता है, जिसका अर्थ होता है ‘समीप में बैठना’ अर्थात् गुरु के समीप बैठकर ज्ञान प्राप्त करना। धातुपाठ में सद् (सद्लृ) धातु के तीन अर्थ निर्दिष्ट हैं – विशरण, (विनाश होना), गति (प्रगति), अवसादन (शिथिल होना)। इस प्रकार जो …

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धारणा का अर्थ, परिभाषा एवं प्रकार

धारणा का अर्थ धारणा मन की एकाग्रता है, एक बिन्दु, एक वस्तु या एक स्थान पर मन की सजगता को अविचल बनाए रखने की क्षमता है। ‘‘योग में धारणा का अर्थ होता है मन को किसी एक बिन्दु पर लगाए रखना, टिकाए रखना। किसी एक बिन्दु पर मन को लगाए रखना ही धारणा है। धारणा शब्द …

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वेदान्त दर्शन का परिचय एवं योग

वेदान्त दर्शन का परिचय-  वेद के अन्तिम भाग को वेदान्त की संज्ञा से सुषोभित किया गया है जिसने उपनिषदों के विस्तृत स्वरूप कों एक अनुशासित ढंग से संजोया गया है महर्षि व्यास ने वेदान्त दर्शन में इसी प्रकार वेदों एंव उपनिषदो से सारगभित विद्या के स्वरूप को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया है वेदान्त के सूत्रों …

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सामवेद का अर्थ, स्वरूप, शाखाएं

अथर्ववेद के अनेक स्थलों पर साम की विशिष्ट स्तुति ही नहीं की गर्इ है, प्रत्युत परमात्मभूत ‘उच्छिष्ट’ (परब्रह्म) तथा ‘स्कम्भ’ से इसके आविर्भाव का भी उल्लेख किया गया मिलता है। एक ऋषि पूछ रहा है जिस स्कम्भ के साम लोभ हैं वह स्कम्भ कौन सा है? दूसरे मन्त्र में ऋक् साथ साम का भी आविर्भाव ‘उच्छिकष्ट’ …

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प्रत्याहार क्या है ?

प्रत्याहार दो शब्दों ‘प्रति’ और ‘आहार’ से मिलकर बना है। ‘प्रति’ का अर्थ है विपरीत अर्थात इन्द्रियों के जो अपने विषय हैं उनको उनके विषय या आहार के विपरीत कर देना प्रत्याहार है। इंद्रियॉं विषयी हैं, ये विषय को ग्रहण करती हैं। ये विषय हैं- पंच तन्मात्राएँ। चेतना ज्ञान प्राप्त करना चाहती हैं और चित्त उसका …

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सांख्य दर्शन का परिचय एवं योग

सांख्य दर्शन परिचय-  सॉख्य दर्शन के प्रणेता कपिल है यहॉ पर सांख्य शब्द अथवा ज्ञान के अर्थ में लिया गया है सांख्य दर्शन में प्रकृति पुरूष सृष्टि क्रम बन्धनों व मोक्ष कार्य कारण सिद्धान्त का सविस्तार वर्णन किया गया है इसका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है। 1. प्रकृति-  साख्य दर्शन में प्रकृति को त्रिगुण को …

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यजुर्वेद की शाखाएं, एवं भेद

यजुर्वेद की शाखाएं काण्यसंहिता-  शुक्ल यजुर्वेद की प्रधान शाखायें माध्यन्दिन तथा काण्व है। काण्व शाखा का प्रचार आज कल महाराष्ट्र प्रान् तमें ही है और माध्यन्दिन शाखा का उतर भारत में, परन्तु प्राचीन काल में काण्य शाखा का अपना प्रदेश उत्तर भारत ही था, क्योंकि एक मन्त्र में (11/11) कुरु तथा पच्चालदेशीय राजा का निर्देश संहिता …

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