मंत्र योग क्या है ?

शास्त्रों के अनुसार अनेक प्रकार के योग बताए गये हैं, इन सभी योग की साधना सबसे सरल और सुगम है। मंत्र योग की साधना कोर्इ श्रद्धा पूर्वक व निर्भयता पूर्वक कर सकता है। श्रद्धापूर्वक की गयी साधना से शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर अभीष्ट की प्राप्ति की जा सकती है। अपने लक्ष्य को मंत्र योग द्वारा …

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हठयोग क्या है ?

सामान्य रूप से हठयोग का अर्थ व्यक्ति जिदपूर्वक हठपूर्वक किए जाने वाले अभ्यास से लेता है अर्थात किसी अभ्यास को जबरदस्ती करने के अर्थ में हठयोग जिदपूर्वक जबरदस्ती की जाने वाली क्रिया है। हठयोग शब्द पर अगर विचार करें तो दो शब्द हमारे सामने आते है ह और ठ।    ह का अर्थ है- हकार अर्थात …

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ज्ञानयोग क्या है ?

यदि हम इस तथ्य पर विचार करें कि यह ज्ञानयोग वस्तुत: है क्या? तो हम कह सकते हैं कि यह ध्यानात्मक सफलता की एक ऐसी प्रक्रिया है, जो हमे अपनी आन्तरिक प्रकृति के अत्यधिक पास लाकर हमारी आत्मिक ऊर्जा का हमें भान कराती है अर्थात स्वयं में छिपी हुर्इ अनंत संभावनाओं का साक्षात्कार कर ब्रह्मा में …

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भक्तियोग क्या है ?

जिज्ञासु पाठको भक्ति शब्द से आप निश्चित परिचित होंगे। आपने-अपने घर के मन्दिर में, उपासना गृहों में तीर्थो में, लोगों को पूजा पाठ करते देखा होगा। भारतीय चिन्तन में ज्ञान तथा कर्म के साथ भक्ति को कैवल्य प्राप्ति का साधन माना है। आपको कुछ प्रश्न अवश्य उत्तर जानने के लिए प्रेरित कर रहे होंगे जैसे भक्ति …

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कर्मयोग क्या है ?

कर्म शब्द कृ धातु से बनता है। कृ धातु में ‘मन’ प्रत्यय लगने से कर्म शब्द की उत्पत्ति होती है। कर्म का अर्थ है क्रिया, व्यापार, भाग्य आदि। हम कह सकते हैं कि जिस कर्म में कर्ता की क्रिया का फल निहित होता है वही कर्म है। कर्म करना मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। तथा कर्म …

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अष्टांग योग क्या है ?

अष्टांग योग महर्षि पतंजलि द्वारा रचित व प्रयोगात्मक सिद्धान्तों पर आधारित योग के परम लक्ष्य की प्राप्ति हेतु एक साधना पद्धति है। महर्षि पतंजलि से भी पूर्व योग का सैद्धान्तिक एवं क्रियात्मक पक्ष विभिन्न ग्रंथों में उपलब्ध था परन्तु उसका स्वरूप बिखरा हुआ था। बिखरे हुए योग के ज्ञान को सूत्र में एक करने का कार्य …

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आयुर्वेद में योग

आयुर्वेद और योग दोनों ही अत्यन्त प्राचीन विद्यायें हैं। दोनों का विकास और प्रयोग समान उद्देश्य के लिए एक ही काल में मनुष्य मात्र के दु:खों को दूर करने के लिए हुआ। आयुर्वेद का शाब्दिक अर्थ जीवन का विज्ञान है। इसे एक बहु उद्देश्यीय विज्ञान के रूप में विकसित किया गया है। योग के अनुसार पुरुषार्थ …

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वेदान्त दर्शन का परिचय एवं योग

वेदान्त दर्शन का परिचय-  वेद के अन्तिम भाग को वेदान्त की संज्ञा से सुषोभित किया गया है जिसने उपनिषदों के विस्तृत स्वरूप कों एक अनुशासित ढंग से संजोया गया है महर्षि व्यास ने वेदान्त दर्शन में इसी प्रकार वेदों एंव उपनिषदो से सारगभित विद्या के स्वरूप को सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया है वेदान्त के सूत्रों …

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सांख्य दर्शन का परिचय एवं योग

सांख्य दर्शन परिचय-  सॉख्य दर्शन के प्रणेता कपिल है यहॉ पर सांख्य शब्द अथवा ज्ञान के अर्थ में लिया गया है सांख्य दर्शन में प्रकृति पुरूष सृष्टि क्रम बन्धनों व मोक्ष कार्य कारण सिद्धान्त का सविस्तार वर्णन किया गया है इसका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है। 1. प्रकृति-  साख्य दर्शन में प्रकृति को त्रिगुण को …

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जैन दर्शन में योग का स्वरूप

जैन दर्शन में योग का स्वरूप  भारतवर्ष में जिस समय बौद्ध दर्शन का विकास हो रहा था उसी समय जैन दर्शन भी विकसित हो रहा था। दोनों दर्शन छठी शताब्दी में विकसित होने के कारण समकालीन दर्शन कहे जा सकते हैं। जैन मत के विकास और प्रचार का श्रेय अन्तिम तीर्थंकर महावीर को दिया जाता है। …

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