प्रबंध के सिद्धांत की प्रकृति एवं महत्व

प्रबंध के सिद्धांत प्रबंध के सिद्धांत आधारभूत सत्य का कथन होते हैं जो प्रबंधकीय निर्णय एवं कार्यों हेतु मार्गदर्शन करते हैं। ये उन घटनाओं के अवलोकन एवं विश्लेषण के आधार पर बनाये जाते हैं निका प्रबंधकों द्वारा वास्तविक कार्य व्यवहार में सामना किया जाता है। ये मानवीय व्यवहारों से सम्बन्धित होते हैं अत: ये विज्ञान के …

Read more

उपभोग फलन किसे कहते हैं? उपभोग प्रवृत्ति को प्रभावित करने वाले तत्वों की व्याख्या

किसी अर्थव्यवस्था में उपभोग पर किये जाने वाले कुल व्यय को उपभोग व्यय कहा जाता है। कुल आय में से लोग अपनी आवश्यकताओं की प्रत्यक्ष सन्तुश्टि के लिए वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने के लिए जो राशि खर्च करते है उसे कुल उपभोग व्यय या उपभोग कहते है। उपभोग और आय में पाए जाने वाले सम्बन्ध …

Read more

कीन्स के रोजगार सिद्धांत की व्याख्या। इस सिद्धांत की क्या आलोचनाएं है?

कीन्स ने अपने रोजगार सिद्धांत को अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘The General Theory of Employment, Interest and Money (1936) में प्रतिपादित किया है। कीन्स के अनुसार पूर्ण रोजगार की स्थिति एक पूंजीवादी विकसित अर्थव्यवस्था की सामान्य नहीं स्थिति है। वास्तव में, प्रत्येक अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी पाई जाती है। कीन्स के अनुसार बेरोजगारी का मुख्य कारण प्रभावपूर्ण मांग …

Read more

रोजगार का परम्परावादी सिद्धांत का अर्थ, परिभाषा, मान्यताएं, आलोचनाएं

रोजगार का परंपरावादी सिद्धांत के अनुसार पूर्ण रोजगार एक ऐसी स्थिति है जिसमें उन सब लोगों को रोजगार मिल जाता है जो प्रचलित मजदूरी पर काम करने को तैयार हैं। यह अर्थव्यवस्था की एक ऐसी स्थिति है जिसमें अनैच्छिक बेरोजगारी नहीं पाई जाती। रोजगार का परंपरावादी सिद्धांत का अर्थ व परिभाषा रोजगार का परंपरावादी सिद्धांत विभिन्न …

Read more

से का बाजार नियम क्या है? ‘से’ के बाजार नियम की मान्यताएं और आलोचना

जे.बी। से ने अपनी पुस्तक ‘ट्रेट डी एकनोमिक पोल्टिक’ (Traite d’ Economic Politique) में बाजार सम्बन्धी जिस संक्षिप्त नियम का प्रतिपादन किया उसी नियम को ‘से’ के बाजार नियम कहा जाता है। ‘से’ के बाजार नियम के अनुसार, “पूर्ति अपनी मांग का स्वयं निर्माण करती है।” (Supply creates its own demand.) ‘से’ के अनुसार जिस अनुपात …

Read more

सार्वजनिक व्यय क्या है सार्वजनिक व्यय के महत्वपूर्ण सिद्धांत क्या है?

सार्वजनिक व्यय सार्वजनिक प्राधिकरणों अर्थात् केंन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा स्थानीय निकायों द्वारा किए जाने वाले उस व्यय से है जिन्हें वे लोगों की उन सामूहिक आवश्यकताओं की संतुष्टि हेतु करते हैं, जिन्हें लोग व्यक्तिगत रूप से संतुष्टि नहीं कर सकते। ये व्यय नागरिकों की सुरक्षा तथा उनके कल्याण को प्रोत्साहित करने के लिए होते हैं। …

Read more

अधिकतम सामाजिक लाभ के सिद्धांत की आलोचनात्मक व्याख्या

आधुनिक राज्य कल्याणकारी राज्य है जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों का अधिकतम कल्याण करना है। सरकार की राजकोशीय व बजटीय गतिविधियां संपूर्ण अर्थव्यवस्था को बहुत प्रभावित करती है। इसलिए सार्वजनिक वित्त लगाते समय सार्वजनिक वित्त के कार्यों के लिए कुछ ऐसे कारक स्थापित किए जाए जिससे अधिकतम सामाजिक कल्याण प्राप्त किया जा सके। इसी कारण इस सिद्धांत …

Read more

सार्वजनिक वित्त क्या है? सार्वजनिक वित्त के क्षेत्र तथा प्रकृति का वर्णन

सार्वजनिक वित्त सरकार के आय व व्यय का विस्तृत अध्ययन है। इसके द्वारा राज्य द्वारा अर्जित आय तथा सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा किए गए व्यय का लेखा जोखा प्रस्तुत किया जाता है। सरकार के आय व व्यय को सीमान्त समन्वय के द्वारा नियमित किया जाता है ताकि अधिकतम जनहित प्राप्त किया जा सके। सार्वजनिक वित्त से अभिप्राय …

Read more

अर्थव्यवस्था पर सार्वजनिक ऋण के प्रभावों की विवेचना

जिस प्रकार सार्वजनिक व्यय तथा करारोपण के आर्थिक प्रभाव होते हैं, उसी प्रकार सार्वजनिक ऋण के प्रभाव भी उपभोग, उत्पादन, वितरण तथा आर्थिक व्यवस्था पर पड़ते हैं। ये प्रभाव ऋण के आकार, अवधि, प्रकार व शर्तों पर निर्भर करते हैं। आसानी से प्राप्त होने वाले या सुलभ ऋण (Soft Loans) के प्रभाव कठोर ऋण (Hard Loans) …

Read more

सार्वजनिक ऋण के प्रकार या वर्गीकरण

वर्तमान समय में सरकार के आर्थिक और विकास सम्बन्धी कार्य पहले से काफी अधिक हो गये है। इन कार्यों में वृद्धि होने के कारण सार्वजनिक व्यय में भी काफी अधिक वृद्धि हुई  है। इसके लिए सरकार को कई  साधनों से धन प्राप्त करना अर्थात् ऋण लेना पड़ता है। सरकार द्वारा लिये गये इस ऋण को ही …

Read more