अनुक्रम
- प्रो. वाल्टर क्र्रासे :-किसी देश का भुगतान संतुलन उनके निवासियों तथा शेष विश्व के निवासियों के बीच दी हुर्इ अवधि में पूर्ण किये गये समस्त आर्थिक लेन देन का एक व्यवस्थित विवरण या लेखा है।
- अंतराष्ट्रिया मुद्रा कोष :- भुगतान संतुलन एक निश्चित समय अवधि में संबंधित देश के निवासियों के बीच समस्त आर्थिक लेनदेन का क्रमबद्ध विवरण होता है।
- फिण्डल बर्गर :- किसी देश का भुगतान संतुलन उस देश के नागरिको तथा शेष विश्व के नागरिको के बीच एक निश्चित समयावधि में होने वाले समस्त आर्थिक लेनदेन का क्रमबद्ध बेवरा है।
भुगतान शेष के भाग –
भुगतान शेष दो भागों में विभाजित होता है।
1. चालू खाता –
- दृश्य मदें – वस्तुओं का आयात निर्यात।
- अदृश्य मदें – विदेशी पर्यटन, परिवहन, बीमा, विनियोग आय, शासकीय मद, निजी एवं शासकीय हस्तांतरण आय।
2. भुगतान शेष खाता –
| 1990-91 | 1993-94 | |
|---|---|---|
| 1. आयात | 50086 | 78630 |
| 2. निर्यात | 33153 | 71146 |
| 3. व्यापार संतुलन 2-1 | -16193 | -7484 |
| 4. निवल अदृश्य खाता | -435 | 3848 |
| 5. चालू खाता 3+4 | -17368 | -3636 |
| 6. पूंजी खाता निवल | 12898 | 30852 |
| 7. कुल श्शेष 5+6 | -4470 | 27216 |
| 8. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से सौदे निवल | 2177 | 587 |
| 9. विदेशी विनिमय निधि में वृद्धि – या कमी + | 2293 | -27803 |
तालिका 7.2.5 की नौंवी मद भुगतान शेष खाते को संतुलित करने वाली मद है सातवी मद यह दर्शाती है कि 1990-91 में कुल मिलाकर घाटा था। और 1993-93 में अधिशेष था ।
वास्तव में 1990-91 के चालू खाते में 17368 करोड़ रूपये का घाटा था जैसा कि पॉंचवी मद दर्शाती है। छठी मद यह दर्शाती है कि पूंजी के अंतर्गत 12898 करोड़ रूपये का पूंजी का निवल अंतर्वाह था। पांचवी व छठी मदों का योग भुगतान शेष की स्थिति को दर्शाता है जो कि सातवी मद के अंतर्गत दिखार्इ गर्इ है। 1990-91 में कुल घाटा 4470 करोड़ रूपये था। इस घाटे के एक भाग 2177 करोड़ रूपये को अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष से निवल निकासियों द्वारा पूरा किया गया । बाकी घाटे 2293 करोड़ रूपये के कारण देश की विदेशी विनिमय निधि में कमी हो गर्इ । इस प्रकार कुल घाटे को अतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से निकाशी और देश की विदेशी विनिमय निधि से पूरा किया गया।
व्यापार शेष एवं भुगतान शेष में अंतर
| व्यापार शेष | भुगतान शेष |
|---|---|
| 1. आयात निर्यात के दृश्य मदों को ही शामिल किया जाता है। |
1. दृश्य एवं अदृश्य दोनों मदों को शामिल किया जाता है। |
| 2. यह भुगतान संतुलन का एक भाग है। |
2. इसकी धारणा अधिक व्यापक होती है। |
| 3. व्यापार शेष का पक्ष में न होना चिंता का विषय नहीं है। चिंता का विषय है। |
3. भुगतान शेष का पक्ष में न होना |
| 4. व्यापार शेष अनुकुल या प्रतिकूल हो सकता है। है। |
4. भुगतान शेष हमेशा संतुलित रहता |
भुगतान शेष में प्रतिकुलता के कारण –
भारत में भुगतान शेष में प्रतिकूलता के निम्न कारण हैं।
- पेट्रोलियम पदार्थों की आयात में वृद्धि ।
- औद्योगिकरण एवं कृषि विकास में भारी मात्रा में मशीनों की आयात में वृद्धि।
- बढ़ती हुर्इ जनसंख्या ।
- सरकारी व्यय में लगातार वृद्धि ।
- निर्यातों में आशा के अनुरूप वृद्धि का अभाव ।
- सुरक्षा पर भारी धन राशि का व्यय ।
भुगतान शेष को ठीक करने के उपाय –
भुगतान संतुलन की प्रतिकुलता को ठीक करने के लिए निम्न उपाय किये जा सकते हैं।
- निर्यात करों में कमी, उद्योगों को आर्थिक सहायता व विदेशो में अपनी वस्तुओं का प्रचार प्रसार कर निर्यात को प्रोत्साहन करना चाहिए।
- देश में नये नये उद्योग स्थापित कर उत्पादन को बढ़ाना चाहिए और आयात की मात्रा में कमी लाना चाहिए ।
- भुगतान संतुलन को ठीक करने के लिए विनिमय नियंत्रण भी एक रास्ता है।
- विदेशी पर्यटकों को यात्रा के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ।
- विदेशी पूंजी पतियों को देश में पूंजी निवेश के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए ।