अनुक्रम
बीमा का अर्थ
बीमा दो पक्षों के बीच एक ऐसा प्रसंविदा है जिससे एक पक्ष जो बीमा करता है उसे बीमाकर्ता (Insurance) कहते हैं, दूसरे पक्ष जो बीमा करवाता है वह बीमादार या बीमित व्यक्ति कहते है। लाभकारी (Benificiary) को जो एक निश्चय प्रतिफल देता है उसे प्रीमियम (Premium) कहते है के बदले में उल्लिखित आकस्मिक घटना जिसके प्रति बीमा है के घटित होने पर एक निश्चिम रकम (Insurance) के भुगतान का वचन देता है। पैटरसन, र्इ डब्ल्यू के अनुसार – “बीमा दो पक्षकारो के बीच एक संविदा है जिसके अन्तर्गत एक पक्षकार एक निश्चित प्रतिफल के बदले दूसरे पक्षकारो की विशिष्ट जोखिमों को ग्रहण करता है और उसे भविष्य में किसी उल्लिखित घटना के होने पर एक रकम देने का या क्षतिपूर्ति का वचन देता है।” मैगी डी0 एच के अनुसार – “बीमा के अन्तर्गत बीमाकर्ता द्वारा एक निश्चित घटना के घटित होने पर होने वाले हानि को प्रीमियम के प्रतिफल में भुगतान करने का वादा करता है।”
बीमा के प्रकार
बीमा की विषय वस्तु अथवा प्रकृति के आधार पर बीमा को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है 1. जीवन बीमा 2. अग्नि बीमा 3. सामुद्रिक बीमा 4.अन्य प्रकार के बीमा ।
1. जीवन बीमा
मानव जीवन अनिश्चितताओं से भरा होता है। जीवन यापन के लिए मनुष्य को अनेक क्रियाएं करनी होती है, जिनमें कदम-कदम पर जोखिम होते हैं। किसी दुर्घटना या बीमारी से असमय मृत्यु हो सकती है। ऐसी स्थिति में मृतक के परिवार को वित्तीय कठिनार्इयों का सामना करना पडता है। इसी प्रकार बुढा़पे मे व्यक्ति के पास आराम से जीवन-यापन करने, चिकित्सा कराने के लिए पर्याप्त धन नहीं होता है। अपने बच्चों के विवाह या उसे उच्च शिक्षा दिलवाने के लिए बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता होती है। जीवन बीमा के द्वारा हमें भविष्य की इन परिस्थितियों से सुरक्षा प्राप्त हो सकती है। इसमें बीमाकार एक निश्चित राशि बीमित व्यक्ति की मृत्यु अथवा एक निश्चित अवधि की समाप्ति पर देने का वचन देता है। इसके बदले मे बीमाकार (बीमा कंपनी) किश्तों में एक निश्चित प्रीमियम राशि लेता है. अब क्योकिं बीमित जोखिम का घटित होना सुनिश्चित है। अत: बीमित व्यक्ति को बीमा राशि देर-सबेर प्राप्त होना भी सुनिश्चित है. बीमित व्यक्ति अपने को सुरक्षित महसूस करता है अत: जीवन बीमा को जीवन आश्वासन भी कहा जाता है।
जीवन बीमा जीवन की अनिश्चितता से सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रारंभ किया गया था। लेकिन धीरे-धीरे इसके क्षेत्र को स्वास्थ्य बीमा, विकलांगता बीमा, पैंशन योजना आदि तक बढ़ा दिया गया है। मूल रूप से जीवन बीमा पालिसियां दो प्रकार की होती हैं। क. आजीवन बीमा पालिसी एवं ख. बंदोबस्ती बीमा पालिसी. आजीवन बीमा-पालिसी में प्रीमियम की राशि का भुगतान बीमित को आजीवन अथवा एक निश्चित अवधि के लिए नियमित रूप से करना होता है. बीमा राशि बीमित के उतराधिकारियों को उसकी मृत्यु के पश्चात देय होती है। यह पालिसी ऐसे व्यक्ति द्वारा ली जाती है जो अपनी मृत्यु के पश्चात अपने पर आश्रित व्यक्तियों को वित्तीय सहायता पहुंचाना चाहता है। दूसरी ओर बंदोबस्ती बीमा पालिसी एक निश्चित अवधि के लिए होती है अर्थात् बीमित व्यक्ति द्वारा एक निश्चित आयु को प्राप्त करने अथवा उस आयु को प्राप्ति करने से पूर्व उसकी मृत्यु की स्थिति में, बीमा कंपनी द्वारा बीमा राशि का भुगतान किया जाता हैं। आजीवन और बंदोबस्ती पालिसियों के अतिरिक्त कर्इ अन्य पालिसियाँ भी शुरू की गर्इ। जिनका उद्देश्य ग्राहकों को राशि निवेश हेतु प्रोत्साहन देना है। जोखिमों से सुरक्षा और बचत का लाभ साथ-साथ मिलने से इनका महत्व और भी बढ़ जाता है। कुछ पालिसियों का संक्षिप्त विवरण-
1. संयुक्त जीवन बीमा पालिसी-
2. धनवापसी (Money Back) पालिसी-
3. पेंशन योजना-
4. यूनिट योजनाएं-
5. सामूहिक बीमा-
2. अग्नि बीमा
आग से होने वाली हानियों से सुरक्षा प्राप्त करने अग्नि बीमा कराया जाता है। अग्नि बीमा एक ऐसा अनुबंध है जिसमें बीमाकार प्रीमियम के बदले में अग्नि से होने वाली हानि की राशि या क्षतिपूर्ति करने का वचन देता है। अग्नि बीमा सामान्यत: एक वर्ष के लिए किया जाता है। इसका हर वर्ष नवीनीकरण भी कराया जा सकता है।
अग्नि से होने वाली हानि का भुगतान दो शर्तों के पूरा होने पर ही किया जाता है।
- आग वास्तव में लगी हो, एवं
- आग जानबूझ नहीं लगार्इ गर्इ हो बल्कि दुर्घटनावश लगी हो. यहाँ आग लगने का कारण महत्व नहीं रखता।
अग्नि बीमा अनुबंध क्षतिपूर्ति का अनुबंध है अर्थात बीमित सम्पत्ति की कीमत, अग्नि से क्षति अथवा पालिसी की राशि तीनों में से जो भी कम हो, से अधिक राशि का दावा नहीं कर सकता। अग्नि से हानि अथवा क्षति में हानि को कम करने के लिए की गर्इ कोशिशों से होने वाली हानि अथवा क्षति भी सम्मिलित होती है।
3. सामुद्रिक बीमा
आज सामुद्रिक व्यापार काफी बढ़ गया है, साथ ही साथ इसके खतरे भी बढ़ गये है। सामुद्रिक बीमा एक ऐसा अनुबंध है जिसमें बीमा कंपनी जहाज अथवा जहाजी माल को समुदी्र यात्रा के दरम्यान होने वाले जोखिम से क्षति की पूि र्त का आवश्वासन देती है।
समुद्री यात्रा के मध्य जहाज को विभिन्न प्रकार का जोखिम होता है, तुफान, चट्टान या किसी अन्य जहाज से टकरा जाना आदि। सामुद्रिक हानियां तीन प्रकार की हो सकती हैं 1. जहाज को हानि 2. जहाजी माल की हानि एवं 3. माल भाड़े की हानि. इन हानियों का पृथक-पृथक बीमा किया जाता है। जहाज के बीमा को हल बीमा, माल के बीमा को माल बीमा (कार्गो) और भाडे़ के बीमे को भाडा बीमा कहते हैं।
अग्नि बीमा और समुद्री बीमा, सामान्य बीमे के अंतर्गत आते है. सामान्य बीमा का राष्ट्रीयकरण 13 मर्इ 1971 को किया गया।
4. अन्य प्रकार के बीमा
साधारण बीमा कंपनियां कर्इ अन्य जोखिमों का बीमा का बीमा करती हैं जिनमें से कुछ बीमा पालिसियों का संक्षिप्त विवरण है :
1. मोर वाहन बीमा-
2. स्वास्थ्य बीमा-
3. फसल का बीमा-
4. रोकड़ का बीमा-
5. पशुओ का बीमा –
6. राजेश्वरी महिला कल्याण बीमा योजना-
7. अमत्र्य शिक्षा योजना बीमा पालिसी-
8. चोरी से क्षति का बीमा-
9. विश्वसनीयता का बीमा-
बीमा का महत्व
- जोखिम से सुरक्षा- बीमा व्यवसाय को विभिन्न जोखिमों से सुरक्षा प्रदान करता है। यह सुरक्षा बीमित को हानि की पूर्ति के लिए प्रावधान के रूप में होती है।
- जोखिम का अनेक लोगों में विभाजन-बीमा जोखिम को आपस में बांटने में सहायता प्रदान करता है. व्यवहार में बड़ी संख्या में लोग प्रीमियम देकर बीमा करवाते हैं। इससे बीमाकोष तैयार हो जाता है। इस कोष का उपयोग उन लोगों की क्षतिपूि र्त के लिए किया जाता है जिनको वास्तव में यह हानि होती है। इस प्रकार से हानि को बड़ी संख्या में लोगों में बाँट दिया जाता हैं।
- ऋण लेने मे सहायक- बैंक एवं वित्तीय संस्थाएं सामान्य: ऋण देने से पहले उन वस्तुओं एवं सम्पत्तियों का बीमा कराने पर जोर देते हैं जिनकी जमानत पर वह ऋण दे रहे हैं। इस प्रकार से बीमा वित्तीय संस्थानों से ऋण एवं अग्रिम प्राप्त करने को सुगम बनाता हैं।
- विभिन्न श्रम कानूनो के अंतर्गत देनदारी से सुरक्षा- बीमा व्यवसायी को कर्मचारियों के साथ दुर्घटना होने पर जिसके कारण गंभीर चोट, विकलांगता अथवा बीमारी हो जाने पर तथा प्रसूति आदि की स्थिति में क्षतिपूर्ति संबंधी भुगतान के समय सुरक्षा प्रदान करता है।
- आर्थिक विकास में योगदान- बीमा कपं नियों के पास जमा धन को विभिन्न प्रकार की प्रतिभूितयों एवं परियोजनाओं में निवेश किया जाता है जो दश्े ा के आर्थिक विकास में योगदान देता है।
- रोजगार के अवसरों की उपलब्धता- बीमा कंपनियां बड़ी संख्या में लोगों को नियमित रोजगार देती हैं। कर्इ लोग बीमा एजेन्ट के रूप में कार्य कर अपनी जीविका अर्जित करते हैं।
- सामाजिक सुरक्षा- जीवन बीमा बुढ़ापे एवं समय से पूर्व मृत्यु के जोखिम से सुरक्षा प्रदान करता है. इसके साथ साथ कर्मचारियों को कर्मचारी राज्य बीमा योजना के माध्यम से जिसमें दुर्घटना बीमा भी सम्मिलित है, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करता हैं।
बीमा का कार्य
बीमा के कार्यो के दो भागो में विभक्त किया जा सकता है – (1) प्राथमिक कार्य (2) द्वितीयक कार्य ।
1. प्राथमिक कार्य –
- निश्चितता प्रदान करना:- बीमा हानि की अनिश्चतता के हानि के पूर्ति की निश्चितता प्रदान करता है। व्यक्ति हानि के प्रति कुशल नियोजन करके निश्चिंत हो सकता है परन्तु इस कृत्य में बहुत से बाधायें उत्पन्न हो सकती है। बीमा हानि की कठिनाइयों को दूर करके हानि के प्रति निश्चितता प्रदान करता है। जोखिम हानि की अनिश्चिता है जिसमें हानि का कब होगी, कैसे होगी कितनी होगी इस सबका पता नही रहता यदि जोखिम हो गयी तो व्यक्ति को और उससे पूर्व वह व्यक्ति हानि के प्रति चिन्तित रहता हैं, लेकिन बीमा से इस प्रकार की चिंता समाप्त हो जाती है। व्यक्ति निश्चिय हो जाता है इसके लिये व्यक्ति को बहुत थोडी प्रीमियम देनी होती है जो हानि का बहुत छोटा भाग होता है।
- सुरक्षा प्रदान करना:-बीमा का मुख्य कार्य संभाव्य हानि से सुरक्षा प्रदान करना है क्योकि मानव जीवन जोखिम पूर्ण है। विभिन्न जोखिमो के कारण या अनिश्चित रहता है कि भविष्य की आपदाओ से कब तथा कितना हानि भुगतनी पड़ेगी। इस प्रकार मनुष्य को असुरक्षा का अनुभव होता है वह सुरक्षा चाहता है। सुरक्षा तभी मिल सकती है जब जोखिमों के अनिश्तिता से मुक्ति मिले । बीमा इस अनिश्चितता से मुक्ति देकर सुरक्षा प्रदान करता है ।
- जोखिम (हानि) का वितरण:-बीमा का मुख्य कार्य जोखिमों से होने वाले हानि का विभाजन है। आपदा या जोखिम को बाँटा नहीं जा सकता है परन्तु उन से होने वाली हानियों को उन व्यक्तियों में बाँटा जा सकता है जो हानियों से सुरक्षित होना चाहते है। प्राचीनकाल में हानियों का विभाजन जोखिमों के समय किया जाता था। परन्तु बीमा संविदा मेंं उन हानियों का भुगतान बाद में किया जाता था। जिसके लिये सीमित व्यक्तियों से उनसे हानि का अंश प्रीमियम के रूप में पहले से लिया जाता था। प्रीमियम की गणना हानि की संभावना के अनुसार होगी।
2. द्वितीयक कार्य –
सुरक्षा की व्यवस्था द्वारा बीमा व्यवसायिक कार्यकलाप में ऐसे अनेक सुविधायें अवसर एवं लाभ प्रदान करता है जो इस प्रकार महत्वपूर्ण है ।
- हानि के रोकना- बीमा हानि को स्वयं नही रोकता है, बल्कि ऐसे व्यक्तियों एवं संस्थाओ को साथ देता है जो हानि को रोकने के लिये कार्य कर रहे है। यदि हानि में कमी हो जायेगी तो हानि रूक जायेगी। बीमाकर्ता कम भुगतान करेगा। इस प्रकार उसे हानि नही सहनी पड़ेगी। हानि की कमी से प्रीमियम दर में कमी की जा सकती है इस प्रकार बीमा के विकाश से सहायता मिल सकता है।
- पूँजी की पूर्ति-बीमा समाज को पूंजी की आपुर्ति करता है बीमा के पर्याप्त रकम प्रीमियम के रूप में आती है जिससे विनियोजित करके उत्पादन में वृद्धि की जाती है और समाज को पूँजी की कमी को पूरा किया जाता है। भारत जैसे राष्ट्र में जहाँ पूँजीे की अपर्याप्तता है बीमा के इस कार्य का विशेष महत्व है बीमा द्वारा पूजी का संचय दो प्रकार से किया जा सकता है- (1)बीमा के अभाव में प्रत्येक व्यक्ति, व्यवसायी या संस्था हानियों को पूरा करने के लिये कुछ संचय रखते है जिसका उपभोग नही करते। (2) बीमा पूंजी का संचय करता है।
- वित्तीय स्थिरता प्रदान- करना बीमा का महत्वपूर्ण योगदान यह है कि इसके कारण शुद्ध जोखिमों द्वारा अस्थिरता नही आने पाती। यदि बीमा की सुविधा उपलब्ध न हो तब अग्निकांड, दुर्घटना चोरी, दंगा, और इसी प्रकार अन्य उपद्रवो के कारण बड़ें पैमाने पर चलने वाले कारबार या उद्योग का अपूरणीय हानि पहुँच सकती है। यदि बीमा है तो ऐसी हानि की पूर्ति की व्यवस्था हो जाती है, और व्यवसाय एवं उद्योग में तथा समाज मे स्थिरता सुनिश्चितता की जा सकती है।
बीमा की उपयोगिता
(क) बीमा सुरक्षा दाप्रन करता है-
(ख) बीमा व्यक्ति को चिन्ता से मुक्त करता है-
सुरक्षा मनुष्य का मुख्य प्ररेक है। यदि व्यक्ति का भविष्य जोखिम से असुरक्षित है तो उसे हमेशा चिन्ता लगी रहती है और कार्य करने में मन नही लगता परन्तु हानि के प्रति सुरक्षा रहने पर व्यक्ति उस से चिन्ता मुक्त हो जाता है। क्योकि वह समझाता है कि जोखिम उसके परिवार को कोर्इ हानि नहीं देगा क्योकि हानि का भुगतान बीमा द्वारा कर दिया जाता है। यह हानि सम्पत्ति, जीवन और दायित्व के सम्बन्ध में हो सकती है। जिसके लिये बीमा विभिन्न स्वरूपों में मौजूद है। जोखिम से सुरक्षा न रहने पर मनुष्य को चिनता, हतोत्साह, मानसिक कमजोरी आदि रहती है।
(ग) बीमा बन्धक सम्पत्ति में सुरक्षित करता है –
बीमा बन्धक सम्पत्ति को सुरक्षित रखता है व्यक्ति की मृत्यु से बंधक पर रखी गयी सम्पत्ति ऋणदाता की हो जाती है, और परिवार को कष्ट होता है। दूसरी ओर ऋणदाता ऋण देने के पहले सम्पत्ति को बीमित करने के लिये बल देता है क्योकि सम्पत्ति के नष्ट होने पर क्षति पहुँचने, चोरी होने आदि के कारण बन्धक ऋण का भुगतान प्राप्त करना संभव नही रहता है। और ग्रहणदाता को हानि होती है। यदि सम्पत्तियों का बीमा होता, तो क्षतिग्रस्त सम्पत्ति के होने से चोरी आदि हो जाने पर ऋण का भुगतान ऋणदाता को बीमा होने के कारण बंधक सम्पत्ति का दिया जाता है।
(घ) बीमा सहायक के रूप में कार्य करता है-
(ड़) बीमा बचत को प्रोत्साहित करता है एवं लाभकारी विनियोग में सहायक है-
जीवन बीमा बचत एवं सुरक्षा दोनो प्रदान करता है जबकि अन्य बीमा में केवल सुरक्षा सन्निहित रहती है। जीवन बीमा में बचत एवं विनियोग का लाभ मिलता है। बचत करके व्यक्ति वृद्धावस्था की कठिनार्इयों सें सुरक्षित हो जाता है यदि मृत्यु आकस्मिक हो भी जाती है तो इसमें सहायता मिलता है। क्योकि उस दशा में एक निश्चित रकम का भुगतान कर दिया जाता है और इसके साथ ही साथ अन्य लाभ भी प्राप्त होते हैै क्योकि बीमित रकम का भुगतान केवल एक निश्चत समय एवं घटना के घटित होने पर ही किया जाता है। जीवन बीमा के बीमित रकम के साथ ही साथ बोनस का भी भुगतान होता है क्योकि बीमाकारी अपने एकत्रितकोष को विनियोजित करता रहता है और प्राप्त हुयी आय से खर्चे और संचय निकालकर शेष रकम बीमापत्र धारी दे देता है। बीमा सुरक्षा के साथ साथ लाभकारी विनियोग का भी कार्य करती है।
1. व्यवसायिक उपयोगिता
(क) व्यक्तिगत हानियों की अनिश्चितता कम हो जाती है –
बीमा अनेक जोखिमों से होने वाली हानि को पूरा करता है जिनके लिये बीमा की सुविधाये प्रदान की जाती है। व्यवसायिक जगत में अत्यधिक मानवीय और भौतिक सम्पत्ति का उपयोग किया जाता है और थोड़ी सी चूक के कारण अरबो की सम्पत्ति क्षणभर में नष्ट हो जाती है। इन जोखिमों से निजात पाने के लिये व्यसायिक जगत में बीमा भी अवश्यकता एवं भूमिका महत्वपूर्ण होती है। क्येाकि बीमा से इस हानियों को पूरा किया जाता है और ऐसी अनिश्चिता को दूर किया जात है और भुगतान किया जाता है जिससे व्यापार वृद्धि में सहायता मिलती है।
(ख) बीमा से व्यवसायिक दक्षता में वृद्धि और साख में वृद्धि होती है –
बीमा होने से व्यवसायी हानियों के प्रति स्वतन्त्र हो जाते है और मन लगाकर कार्य करते है। व्यवासाय में संलग्न व्यक्ति सम्पत्ति आदि के बारे बीमा रहने पर चिंता नही करते क्येाकि बीमा द्वारा पूर्णक्षति की पूर्ति कर दी जाती है। जिससे व्यसासय की निरन्तरता बनी रहती है। बीमा रखने पर साख में वृद्धि हो जाती है, क्योकि ऋणदाता यह समझते है कि यदि ऋणी की मृत्यु या बन्धक पर रखी गयी सम्पत्ति नष्ट हो जाने पर खो जाने, पर भी उन्हे भुगतान बीमा के माध्यम से किया जायेगा इसलिये बीमा होने से साख में और अधिक वृद्धि हो सकती है।
(ग) महत्वपूर्ण कर्मचारी की बीमा एवं कर्मचारी कल्याण की सुविधा:-
अधिक महत्वपूर्ण कर्मचारी वह है जिसके जीवित रहने पर व्यापार को लाभ-हानि को तुरन्त पूरा न किया जा सके। महत्वपूर्ण कर्मचारी का बीमा करा लेने पर उसकी मृत्यु पर व्यवसाय बन्द होने या हानि होने की संभावना समाप्त हो जाती है। कर्मचारी के मृत्यु पर उनके परिवार को कुछ रकम देनी पड़ती है, जिसके लिये बीमा खरीदार उन्हे भुगतान किया जा सकता है। कर्मचारियों के निवास स्थान आदि के प्रबन्ध के लिये बीमा से ऋण भी मिल जाता है।
2. सामाजिक उपयोगिता
(क) समाज की मानवीय एवं भौतिक सम्पित्त की सुरक्षा-
समाज की मानवीय एवं भौतिक सम्पित्त की सुरक्षा जीवन बीमा एवं सम्पित्त्ा बीमा से ही सकती है। जीवन बीमा में यह संभावना रहती है कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति अपने भविष्य को जोखिम के प्रति स्वतन्त्र रखते हैं, क्योंकि उसके भौतिक सम्पित्त का बीमा रहने पर सम्पित्त्ा की सुरक्षा आदि रहती है। यदि वह नष्ट होती है तो हानि का पूर्ण भुगतान बीमा द्वारा किया जायेगा। बीमा होने से कृषि, उद्योग, व्यापार, यातायात आदि में प्रगति होती है, और मानवीय एवं भौतिक सम्पित्त्ा को सुरक्षा प्राप्त होती है।
(ख) राष्ट्र प्रगति मे सहायक एवं मुद्रा प्रसार में कमी-
राष्ट्र प्रगति में बीमा का महत्वपूर्ण योगदान रहता है क्योकि बीमा के माध्यम से देश की सम्पत्ति सुरक्षित रहती है, और विनियोग के लिये पर्याप्त रकम मिल जाती है। बीमा मुद्रा प्रसार में कमी दो प्रकार की होती है-
- प्रीमियम की रकम एकत्रित करके मुद्रापूर्ति में कमी पूरा करता है। राष्ट्र में मुद्रा की मात्रा कम हों जाने से मुद्रा प्रसार में कमी आ जाती हैै उसको भी पूरा करता है।
- एकत्रित प्रीमियम को विनियोजित करके उत्पादन में वृद्धि की जा सकती हैं बीमा के समाजिक लाभ के तरीके महत्वपूर्ण है। क्योकि बीमा समाज के व्यवस्थित अस्थिरता से मुक्ति दिलाता है, और साथ ही साथ जीवन स्तर भी स्थिरता को बढ़ाता है और पूॅजी निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है ।
बीमा के सिद्धांत
सभी बीमों के बीमा अनुबन्ध कुछ स्थापित सिद्धांतों पर निर्भर करते है। इनका संक्षिप्त विवरण नीचे दिया गया है-
(1) पूर्ण सद्विश्वास का सिद्धांत-
बीमा अनुबंध पारस्परिक विश्वास का अनुबंध है। बीमाकर एवं बीमित दोनों पक्षों को बीमा की विषय वस्तु से सम्बन्धित सभी आवश्यक सूचनाओं को उजागर कर देना चाहिए। उदाहरण के लिए, जीवन बीमा में प्रस्तावक को (बीमा करवाने में इच्छुक व्यक्ति) अपने स्वास्थ्य, आदतों, व्यक्तिगत इतिहास, पारिवारिक इतिहास आदि की सूचना को र्इमानदारी से उजागर कर देना चाहिए। यदि महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाया गया है तो अनुबंध वैध नहीं होगा, क्योंकि बीमा की विषय वस्तु से सम्बन्धित तथ्यों के आधार पर ही जोखिम का मूल्यांकन किया जा सकता है।
(2) बीमोचित स्वार्थ का सिद्धांत-
(3) क्षतिपूर्ति का सिद्धांत-
क्षतिपूर्ति के सिद्धांत से अभिप्राय है कि बीमित को बीमे की घटना के घटित होने पर बीमा अनुबंध से कोर्इ लाभ कमाने की छूट नहीं है। क्षति की पूर्ति का भुगतान वास्तविक हानि अथवा बीमा की राशि, जो भी कम हो, का किया जाता है। आइए, इसे एक उदाहरण से समझें। माना कि एक व्यक्ति ने अपने मकान का 20 लाख रूपये का बीमा कराया है। आग से क्षति पर उसे मरम्मत के लिए मकान पर 5 लाख रूपया खर्च करना पड़ा तो वह बीमाकर से केवल 5 लाख रूपये का दावा ही कर सकता है, न कि बीमा की कुल राशि का।