अनुक्रम
प्रबंध विचारधारा का उद्गम
जैसा कि हमने देखा अध्ययन को सुव्यवस्थित करने के लिए हम प्रबन्ध के विकास को तीन चरणों में विभक्त करते हैं। आइये अब उन्हें क्रमवार गहरार्इ से समझने का प्रयास करें –
प्राचीन काल में प्रबंध
मानव सभ्यता का विकास तथा प्रबन्ध का विकास लगभग साथ साथ हुआ है। मानव सभ्यता के विकास के साथ ही प्रबन्ध कला लगभग सभी संगठनों में विद्यमान थी। सर्वप्रथम प्रबन्ध विचारधारा का अभ्युदय व्यक्तिगत नेतृत्व के रूप में हुआ। इसका प्रथम उदभव मेसोपोटामिया में पादरियों का समूह था जो प्रबन्ध कौशल व कला के लिए विख्यात था। ये अपने को र्इश्वर का प्रतिनिधि कहते थे और इस नाते वे नेतृत्व एवं नियंत्रण का कार्य करते थे। इन्होंने व्यापारिक क्रियाओं का नियोजन किया।
प्रबन्ध कार्य को सुलभ बनाने के लिए हिसाब किताब हेतु अंक विद्या तथा लिखने के कुछ साधनों का आविष्कार भी किया था। इसी प्रकार धार्मिक पुस्तक बाइबिल में भी प्रबन्ध के संबंध में पता चलता है कि उस युग में भी योग्य व्यक्तियों का चयन और सत्ता के भारार्पण जैसे कुछ सिद्धान्त प्रचलन में थे जो आज विशालकाय औद्योगिक उपक्रमों में बहुत ही उपयोगी सिद्ध हुए। इसी क्रम में प्राचीन साहित्य में सुकरात तथा अन्य लेखकों के संवादों में विशिष्टीकरण एवं अन्य प्रबन्धकीय सिद्धान्तों का उल्लेख मिलता है।
प्राचीन मिस्रवासियों की प्रबन्ध कुशलता एवं इंजीनियरिंग का अन्दाजा विश्व विख्यात पिरामिडों को देखने से लग जाता है। इसी प्रकार यूनान, रोम व ग्रीक आदि देशों की प्राचीन सुन्दर इमारतें भी इस तथ्य को सिद्ध करती हैं कि उस समय भी श्रमिकों को निर्देशित करने के लिए प्रबन्धक उपस्थित थे। हमारे देश भारत में कौटिल्य द्वारा रचित प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘अर्थशास्त्र‘ जिसकी रचना आज से लगभग 2000 वर्ष पूर्व हुर्इ थी, में राजनीतिक अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं के साथ साथ सार्वजनिक प्रबन्ध के विभिन्न समस्याओं और उनके समाधान पर भी प्रकाश डाला गया है।
उपर्युक्त व्याख्या से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस संबंध में कोर्इ मतभेद नहीं है कि प्राचीन काल में प्रबंधकीय सिद्धान्तों के लिए जो शब्दावली प्रयोग में लायी जाती थी वह वर्तमान शब्दावली से बिल्कुल भिन्न थी परन्तु यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि प्रबन्ध के कुछ मूलभूत सिद्धान्तों का प्रतिपादन पहले ही हो चुका था।
मध्यकाल में प्रबंध
औद्योगिक विकास की मध्य यात्रा प्रबंध विकास का आदि काल कहा जाता है। यह आत्मनिर्भरता का समय था। अधिकांश जनसंख्या ग्रामीण थी जिनकी आवश्यकताओं की पूर्ति गांवों में ही हो जाया करती थी अर्थात व्यापार सीमित था। मध्य युग में औद्योगिक उत्पादन विधियॉं अत्यन्त सरल थीं और जिनके प्रयोग से ज्ञान के लिए विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं थी। विद्वानों ने माना, मध्यकाल में कारीगर, मजदूर, निरीक्षक, पूंजीपति, व्यापारी तथा दुकानदार सभी कुछ था। शिल्पकार पर ही कारखाना तथा परिवार के सदस्य कारखाने में काम करने वाले कारीगर होते थे। जो कुछ भी उत्पन्न होता था उसका या तो स्वयं उपभोग कर लिया करते थे अथवा यदि कुछ शेष बचता था, तो वह निकटवर्ती लोगों को तुरंत बेच दिया जाता था इस प्रकार उपभोक्ता (क्रेता) और उत्पादक में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता था। संक्षेप में एक ही व्यक्ति प्रशासक, संगठनकर्ता, व प्रबंधक कहलाता था। जिससे प्रतिस्पर्द्धा की भावना नहीं होती थी। इस प्रकार व्यापारिक गतिविधियों को पुत्र अपने पिता के साथ कार्य करके सीख लेता था। इस प्रकार यह पैतृक ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहता था।
आधुनिक काल में प्रबन्ध
यूरोप के विभिन्न देशों में हुर्इ औद्योगिक क्रान्ति ने व्यापारिक क्षेत्र के सामाजिक संरचना में गंभीर परिवर्तन किए तथा संगठन के विकास तथा विकेन्द्रीयकरण को प्रोत्साहन मिला। नये आविष्कार, अधिक उत्पादन, श्रम विभाजन, विशिष्टीकरण आदि के विकास से नर्इ प्रबन्धकीय समस्याओं को आधार मिला। इसी समय एडम स्मिथ ने 1776 में अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘Wealth of Nations’ में कुछ समान्य प्रबन्धकीय समस्याओं को रखा तथा कुछ सिद्धान्तों का सूत्रपात किया। एडम स्मिथ के कार्यों को आगे बढ़ाते हुए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणित के प्रो. चाल्र्स बैवेज ने अपने लेख ‘On the Economy of Machinery and Manufactures’ में उत्पादन प्रबन्ध के अनेक सिद्धान्तों की विस्तार से व्याख्या की।
20वीं शताब्दी के आरम्भ से ही वैज्ञानिक प्रबन्ध का सूत्रपात हुआ जो बाद में आधुनिक प्रबन्ध का आधार स्रोत बना तथा प्रबन्ध को एक पेशे के रूप में मान्यता दिलार्इ। वर्तमान प्रतियोगात्मक युग में प्रबन्ध विज्ञान का विकास चार अवस्थाओं में हुआ है। यथा-
- प्रबन्ध की वैज्ञानिक प्रणाली-जिसके प्रणेता एफ.डब्ल्यू. टेलर थे।
- प्रबन्ध की क्रियात्मक प्रणाली जिसके प्रणेता हेनरी फेयोल थे।
- प्रबन्ध दर्शन को भी हेनरी फेयोल ने ही सबके सामने रखा।
- प्रबन्ध का मानवीय दृष्टिकोण जिसे जार्ज एल्टन मेयो ने प्रतिपादित किया।
आधुनिक व्यवसाय की सबसे प्रमुख घटना व्यावसायिक संगठन के प्रमुख स्कंघ कम्पनी प्रारूप का रहा जिसके अन्तर्गत मुख्यत: तीन बातों का खुलासा हुआ –
- पूंजी विनियोजन से अनेक कर्मचारियों व विशाल संयंत्रों की सहायता से बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो गया।
- उद्योगों का वर्गीकरण तीन भागों में हुआ –
- पूंजी निवेशक
- प्रबन्ध
- कर्मचारी
- संयोजन की प्रवृत्ति के कारण औद्योगिक इकाइयों का आकार भी बढ़ा।
आवश्यकताओं के परिणामस्वरूप संबंधित औद्योगिक इकार्इ का संचालन पेशेवर प्रबन्ध के द्वारा सम्भव हो सका। इस प्रकार आधुनिक प्रबन्ध औद्योगिक इकाइयों को निर्देशित करने वाली विधा के रूप में प्रकट हुआ। जिससे लाखों करोड़ों लोगों को रोजगार के अवसर मिले तथा अर्थव्यवस्थाओं को भी आगे विकास करने का समुचित आधार प्राप्त हुआ।
विभिन्न सम्प्रदायों के प्रेरक तत्व
प्रबन्धकीय इतिहास में विभिन्न सम्प्रदायों को प्रेरित करने वाले कुछ तत्व निम्नलिखित हैं, जिनका चयन हमारे ज्ञान को निश्चित ही सुव्यवस्थित करेगा।
- औद्योगिक क्रान्ति – 1765 से 1785 के मध्य यूरोप के विभिन्न देशों में होने वाली औद्योगिक क्रान्ति ने सामाजिक ढॉंचे में भारी परिवर्तन किये। इस क्रान्ति ने श्रमिकों के ज्ञान एवं कौशल को मशीनों एवं यंत्रों में हस्तान्तरित कर दिया गया। इसके साथ ही साथ आविष्कार, श्रम-विभाजन, विशिष्टीकरण, प्रमापीकरण, श्रम-प्रबन्ध, बड़े पैमाने पर उत्पादन का विकास आदि भी हुआ। परिणामत: विभिन्न प्रकार की समस्यायें उत्पन्न हुर्इ जिनका समाधान करने के लिए प्रबन्धकीय विचारधारा का उदय हुआ।
- विश्वव्यापी मन्दी – प्रथम, द्वितीय विश्व युद्ध की नकारात्मक परिणामें से उत्पन्न होने वाली विश्व-व्यापी मंदी से उद्योगपतियों को कम से कम लागत पर उपलब्ध साधनों का अधिकतम विदोहन किस प्रकार किये जाये यह सोचने के लिए विवश किया जिसके परिणामस्वरूप प्रबन्धकीय विचारधारा को प्रश्रय मिला।
- श्रमसंघों की स्थापना – औद्योगिक क्रान्ति के समय से श्रमिकों में भी अधिकारों के प्रति चेतना का संचार हुआ जिससे श्रम संघों की स्थापना हुर्इ। इससे श्रम समस्याओं में तीव्र वृद्धि हुर्इ और इनका निवारण करने के योग्य प्रबन्धकों की आवश्यकता महसूस हुर्इ।
- श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण – औद्योगिक क्षेत्र में श्रम विभाजन एवं विशिष्टीकरण के कुशल संचालन हेतु प्रबन्धकों की आवश्यकता हुर्इ जिससे भी प्रबन्धकीय विचारधारा को प्रोत्साहन मिला।
- औद्योगिक संघर्ष – श्रमिकों एवं पूंजीपतियों को एक दूसरे के प्रति विरोधी विचारधाराओं के परिणामस्वरूप औद्योगिक झगड़ों को निपटाने के लिए कुशल प्रबन्धकों की आवश्यकता ने भी प्रबन्धकीय क्रान्ति को बल दिया।
- संगठन का लोकतांत्रिक प्रबन्ध – अधिकांश बड़ी औद्योगिक इकाइयों का संगठन संयुक्त पूंजी स्कन्ध कम्पनियों के रूप में हुआ जिनका प्रबन्ध लोकतंत्र के सिद्धान्तों के आधार पर होता है अर्थात इनमें अंशधारियों के द्वारा चुने गये प्रतिनिधि कम्पनी का प्रबन्ध करते हैं और इनमें पेशेवर प्रबन्धक नियुक्त किये जाते हैं जिसके कारण कम्पनी का स्वामित्व एवं प्रबन्ध अलग अलग होता है। अत: व्यावसायिक स्वामित्व से कम्पनी प्रारूप के विकसित होने के परिणामस्वरूप प्रबंधकीय सोच का स्वागत हुआ।
- प्रबंधकीय कार्यों की कठिन प्रकृति – औद्योगिक इकाइयों के प्रत्येक क्षेत्र में प्रबन्धकीय कार्यों का अपना योगदान होता है जिसके परिणामस्वरूप प्रबन्धकीय विचारधारा को बल मिला।
- प्रबन्ध के सामाजिक उत्तरदायित्व – प्रबन्ध के स्वामियों के प्रति, कर्मचारियों और ग्राहकों के प्रति अथवा उपभोक्ताओं के प्रति, पूर्तिकर्ताओं के प्रति, समाज के प्रति, सरकार के प्रति और जन्म राष्ट्रों के प्रति विभिन्न सामाजिक उत्तरदायित्व ने प्रबन्धकीय क्रान्ति को प्रेरित किया।
- प्रबंध का पेशेवर होना – जब से प्रबध को एक पेशे के रूप में अपनाया गया है तभी से व्यावसायिक क्षेत्र में प्रबंध का महत्व बढ़ गया है। आज प्रबन्ध उद्योगों में पेशे के समान बन गया है।
भारत में प्रबंधकीय विचारधारा का विकास
भारत में प्रबंधकीय विचारधारा अपने शैशवकाल में है। यहॉं इसका इतिहास अधिक प्राचीन नहीं है। यहॉं स्वतंत्रता से पूर्व औद्योगिक विकास की स्थिति असंतोषजनक थी। स्वतंत्रता के पश्चात हमारे देश में आर्थिक नियोजन के आधार पर देश का आर्थिक एवं औद्योगिक विकास किया गया। प्रथम पंचवष्र्ाीय योजना में औद्योगिक विकास की गति को तीव्र किया तथा निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र में यह महसूस किया गया कि औद्योगिक उपक्रमों के सफल संचालन के लिए पेशेवर प्रबन्धकों की आवश्यकता है। प्रबन्धकीय प्रशिक्षण की दिशा में हमारे देश में विगत वर्षों से जो प्रयास हुए हैं, आइये उनको समझने का प्रयास करें-
2. अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद –
1949 में भारत सरकार द्वारा अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की स्थापना की। इस परिषद के सुझाव पर औद्योगिक एवं व्यावसायिक प्रशासन उपसमिति की स्थापना हुर्इ जिसने जून 1953 में अपने प्रतिवेदन में अन्य बातों के अतिरिक्त तीन प्रमुख सिफारिशें की थी –
- अखिल भारतीय प्रबंन्ध तकनीकी संस्थान की स्थापना
- एक प्रशासकीय कर्मचारी कालेज की स्थापना की जाये,
- राष्ट्रीय प्रबन्ध संस्थानों की स्थापना की जाये। इन सुझावों के आधार पर सरकार ने 1953 में, अखिल भारतीय प्रबन्ध तकनीकी अध्ययन मण्डल की स्थापन की, जिसमें, उद्योग, व्यापार, विश्वविद्यालयों, तकनीकी संस्थान, पेशेवर संगठनों एवं सरकार के प्रतिनिधि सम्मिलित थे। इस मण्डल का प्रमुख कार्य देश में प्रबन्धकीय शिक्षा तथा प्रशिक्षण का प्रसार करना था।
2. अखिल भारतीय प्रबन्धकीय संस्स्थान –
भारत सरकार ने अखिल भारतीय प्रबन्ध तकनीकी अध्ययन मण्डल की सिफारिश के आधार पर प्रन्धकीय शिक्षा में शोध कार्य हेतु तथा निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक उपक्रमों को प्रशिक्षित प्रबन्धक उपलब्ध करने के उद्देश्य से अहमदाबाद और कलकत्ता में शिक्षण कार्य के लिए संस्थान स्थापित किये।
3. स्नातकोत्तर प्रशिक्षण की स्थापना –
भारत सरकार ने अखिल भारतीय प्रबन्ध तरनीकी अध्ययन मण्डल की सिफारिशों के आधार पर औद्योगिक प्रबन्ध तथा इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर प्रशिक्षण देने की व्यवस्था निम्न संस्थाओं में की है –
- इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ बिजनेस मैनेजमेंट, अहमदाबाद
- इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी, खड़गपुर
- इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल वेलफेयर एण्ड बिजनेस मैनेजमेंट, कोलकता
- इण्डियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बंगलौर
- विक्टोरिया जुबली टेक्नीकल इंस्टीट्यूट, मुम्बर्इ
- जमनालाल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंन्ट, मुम्बर्इ,
- बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलाजी, पिलानी,
- मोतीलाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च एण्ड बिजनेस मैनेजमेंट, इलाहाबाद
- प्रशासकीय कर्मचारी कालेज, हैदराबाद, आदि ।
4. कालेज एवं विश्वविद्यालयों में प्रबन्धकीय शिक्षा की व्यवस्था –
विभिन्न कालेज और विश्वविद्यालयों में व्यवसाय प्रशासन एवं प्रबंधन की उच्च शिक्षा एवं शोध की व्यवस्था हुर्इ जिनमें व्यवसाय प्रशासन विभाग की स्थापना की गर्इ विश्वविद्यालय, जौनपुर विश्वविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय बम्बर्इ विश्वविद्यालय, मद्रास विश्वविद्यालय के नाम उल्लेखनीय हैं।
5. विशिष्ट पहलुअुओंं के लिए शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थान –
प्रबन्धकीय शिक्षण एवं प्रशिक्षण में अनेक पेशेवर संगठन अपनी भूमिका निभा रहे हैं, जिनमें –
- इंस्टीट्यूट ऑफ कास्ट एण्ड वक्र्स एकाउन्टेंट्स कोलकता,
- इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड एकाउन्टेंट्स, मुम्बर्इ,
- इंस्टीट्यूट ऑफ पर्सनल मैनेजमेंट, कोलकता,
- इंस्टीट्यूट ऑफ प्रोडक्शन इन्जीनियरिंग, मुम्बर्इ
- इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्सटाइल रिसर्च एसोसियेशन अहमदाबाद आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
6. लघु उद्योग संगठन –
भारत सरकार द्वारा 1955 में लघु उद्योग संगठन की स्थापना हुर्इ। यह संगठन ‘लघु उद्योग सेवा संस्थान’ एवं ‘विस्तार केन्द्रों के द्वारा प्रबन्धकीय शिक्षा की व्यवस्था सुनिश्चित करता है। यह संस्था लघु उद्योंग कारखानों को तकनीकी प्रशिक्षण सुविधायें प्रदान करने, विदेशी विशेषज्ञों को आमंत्रित करने और भारतीय व्यक्तियों को प्रशिक्षण के लिए विदेशों में भेजने से संबंधित कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
7. औद्योगिक प्रबन्ध संघ –
भारत सरकार ने अपने मंत्रालयों के अधीन स्थापित सार्वजनिक उपक्रमों में उच्च प्रबंधकीय पदों पर नियुक्ति के लिए नवम्बर 1957 में ‘औद्योगिक प्रबंध संघ’ की स्थापना की इस संघ में सुयोग्य प्रबन्धक ही रखे जाते हैं।
8. राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद –
भारत सरकार ने वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन फरवरी 1958 में भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अधीन फरवरी 1958 में राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद की स्थापना की। इस परिषद ने देश में उत्पादकता एवं प्रबन्धकीय प्रशिक्षण को प्रारम्भ करने, विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
9. निजी उद्योगपतियों द्वारा प्रबन्धकीय प्रशिक्षण की व्यवस्था –
उद्योगपतियों ने अपने संस्थानों में ही प्रबन्धकीय प्रशिक्षण प्रदान करने की व्यवस्था की हुर्इ है जिनमें टाटा, बिड़ला, जे.के., अम्बानी, बजाज आदि के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। वर्तमान समय में भारत में छोटे-बड़े सभी स्तर के उद्योग स्थापित हैं जिनमें निजी, सहकारी, सार्वजनिक तथा संयुक्त स्वामित्व के उद्योग शामिल हैं। प्रबन्ध की विक्तिायों और तकनीकी परिवर्तनों के कारण प्रबन्धकीय क्रान्ति का सभी पैमाने की इकाइयों में समान महत्व हैं। विशेषकर बड़े पैमाने के निजी एवं सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों में प्रबंध व्यवस्था में तीव्र गति से हो रहे परिवर्तन भारत में प्रबन्धकीय क्रान्ति के स्पष्ट प्रमाण हैं। भारत सरकार ने स्वतंत्रता के बाद प्रबन्ध के विकास में पर्याप्त रूचि ली हैं
प्रबंध का रूढ़िवादी सम्प्रदाय
यद्यपि प्रबन्धकीय विज्ञान का सुव्यवस्थित प्रादुर्भाव अभी कुछ ही वर्षों पूर्व हो सका है। किन्तु प्रबन्ध की समस्यायें तथा इनका समाधान मानव आदिकाल से निरन्तर करता चला आया है। हर युग में मानवीय प्रबंधकों ने तत्कालीन संगठनों की समस्याओं के निराकरण का मार्ग ढॅूढा। इस प्रकार प्रबन्ध के कर्इ विचारकों को शामिल कर एक विचारधारा का जन्म हुआ, जिसे रूढ़िवादी विचारधारा कहकर सम्बोधित किया गया।
प्राय: रूढ़िवादिता का अर्थ पुराने समय से चले आ रहे नियमों या परम्पराओं से होता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि कोर्इ चीज स्थार्इ या समयबद्ध है या उसे छोड़ देना चाहिए। हम अपने अध्ययन की सुविधा के लिये इस विचारधारा के अन्तर्गत तीन महान प्रबन्ध विद्वानों को समझने का प्रयास करेंगे यथा अधिकार तंत्र या दफ्तरशाही, वैज्ञानिक प्रबन्ध तथा प्रशासनिक प्रबन्ध।
(क) रूढ़िवादी विचारधारा के अन्तर्गत सर्वप्रथम हम मैक्स वेबर के अधिकार तंत्र या दफ्तरशाही संगठन से जुड़े विचारों को जानेंगे अपने अधिकार तंत्र का ढॉंचा वेबर ने एक प्रतिक्रिया के रूप में निर्मित किया था। औद्योगिक क्रान्ति के बाद प्रबन्धकों के व्यवहार में कर्मचारियों के दमन भार्इ-भतीजावाद, निदयता, मनमानी तथा व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति जैसे निमर्म बुराइयॉं पैदा हो गर्इ थीं और इन्हीं के विरोध में अधिकार तंत्रीय संगठन संरचना का सुझाव वेबर ने रखा था। उनका विश्वास था कि अधिकार तंत्रीय ढांचा मानवीय तथा यांत्रिक शक्तियों के उचित समन्वय का अचूक शस्त्र बनेगा जिससे संगठनात्मक क्रियाओं का और अधिक कुशलता से सम्पन्न किया जा सकेगा। आपके द्वारा अधिकार तंत्र या दफ्तरशाही संगठन के सुव्यवस्थित रूप के लिए अग्रलिखित सूत्र दिये गये।
- कार्यों का सुव्यवस्थित विभाजन,
- कार्य में अनिश्चितता को दूर करने तथा उनके पूर्वानुमान करने के लिए सुनिश्चत नियमों का निर्धारण
- अधिकार एवं दायित्वों के सम्बंधों की स्थापना हेतु अधिकारों की एक सुपरिभाषित क्रमिक श्रृंखला,
- अधीनस्थों से व्यवहार करते समय अधिकारियों को निरपेक्ष रहना,
- लिखित नियम एवं निर्णय तथा संदर्भों के लिए एक विस्तृत फाइलिंग व्यवस्था,
- पदाधिकारियों के लिए निर्धारित योग्यताएं,
- रोजगार के चयन या पदोन्नति केवल गुण या तकनीकी क्षमता के आधार पर तथा
- जीवनपर्यन्त के लिए रोजगार तथा मनमाने ढंग से सेवामुक्ति से सुरक्षा।
दफ्तरशाही के गुण
- सुनिश्चितता
- तीव्रता,
- स्पष्टता,
- फाइलों का ज्ञान,
- निरन्तरता,
- विवेकपूर्णता,
- एकता,
- कड़ी अधीनस्थता,
- टकराव की कमी तथा
- सामग्री एवं श्रम लागतों की कमी।
आलोचना – यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि अधिकार तंत्र को वर्तमान में अकुशलता, अलोचपूर्णता, भ्रष्टाचार, लालफीताशाही आदि नकारात्मक विचारों के साथ जोड़ा जाता है। आलोचकों के अनुसार यह इसे यूरोपीय विपत्ति, भीमकाय जानवर तथा अदृश्य पिशाच जैसी संज्ञान प्रदान की है। संक्षेप में अधिकार तंत्रीय संगठनों के दोष होते हैं –
- नियमों की आलोचपूर्णता
- अधीनस्थों से अव्यक्तिगत संबंध,
- पहल और निर्णय में स्वतंत्रता का अभाव तथा नियमों का आधिपत्य,
- विलम्ब तथा लाला फीताशाही,
- बर्बादीपूर्ण प्रबंध,
- भ्रष्टाचार तथा,
- पक्षपात ।
इन बुराइयों के उपरान्त भी संगठन का मूल ढॉंचा अधिकार तंत्र पर ही आधारित होता है अर्थात प्रबंध के ऐसे कोर्इ सिद्धान्त या नियम नहीं बने थे, जिनको प्रबंधक पढ़ सके और उनका अपने वास्तविक जीवन में प्रयोग कर सकें। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में प्रबन्ध के इस परम्परागत दृष्टिकोण में अन्तर आया, वैज्ञानिक प्रबन्ध के लिए प्रयास हुए और अन्त में ‘‘वैज्ञानिक प्रबन्ध’’ की संज्ञा उन प्रयासों को दी गर्इ।
वैज्ञानिक प्रबन्ध
चाल्र्स बैवेज का योगदान
फ्रेडरिक विन्सले टेलर
- कार्य का मापदण्ड निर्धारित करने, उचित मजदूरी की दर को निश्चित करने तथा कार्य को श्रेष्ठतम विधि से करने के लिए वैज्ञानिक विधियों का विकास तथा प्रयोग करना।
- अधिकतम कुशलता प्राप्त करने के लिए श्रमिकों का वैज्ञानिक विधि से चयन तथा उनको कार्य पर लगाना तथा उनके प्रशिक्षण एवं विकास की व्यवस्था करना।
- अधिकारियों तथा श्रमिकों के बीच स्पष्ट आधार पर कार्य विभाजन तथा उत्तरदायित्व को निर्धारित करना।
- नियोजन कार्यों तथा उपकार्यों के अनुसार कार्य निष्पादित कराने के हेतु श्रमिकों के बीच सहयोग तथा मधुर संबंधों की स्थापना करना।
वैज्ञानिक प्रबंध को सफलीभूत करने के लिए बहुत सी तकनीकों का विकास किया गया। इन सभी को मिलाजुलाकर नर्इ विचारधारा के तंत्र के लिए निम्नलिखित तकनीकों को अपनाया गया –
- किसी कार्य की विभिन्न प्रक्रियाओं को पूरा करने में लगने वाले समय का मापन तथा विश्लेषण का अध्ययन, प्रक्रियाओं का प्रमापीकरण और उचित मजदूरी का निर्धारण करना।
- किसी कार्य को निष्पादित करने में की जाने वाली गति का अध्ययन जिससे कार्य की जाने वाली गति को रोका जा सके तथा कार्य निष्पादित करने का एक सर्वश्रेष्ठ तरीका निर्धारित किया जा सके।
- उपकरण यंत्रों व मशीनों का प्रमापीकरण तथा कार्य करने की दशाओं में सुधार।
- कुशल व अकुशल श्रमिकों की मजदूरी की भिन्न दरें तथा प्रेरणात्मक मजदूरी दर को अपनाना।
- कार्यात्मक फोरमैनी को अपनाना जिसमें मशीन की गति, सामूहिक कार्य, रिपेयर्स, कराने आदि के लिए पृथक पृथक फोरमैनों की नियुक्ति की जानी चाहिए।
टेलर ने वैज्ञानिक प्रबंध के अपने विचारों को व्यवस्थित रूप से व्यक्त किया है। प्रबंध व्यवहार के क्षेत्र में उनका प्रमुख योगदान पहलुओं से संबंध रखता है:-
- प्रबन्ध की समस्याओं को हल करने के लिए पूछताछ, अवलोकन और प्रयोग करने के लिए वैज्ञानिक विधियों को अपनाना।
- नियोजन कार्य को उसकी निष्पत्ति से पृथक रखना जिससे श्रमिक अपनी सर्वश्रेष्ठता का प्रदर्शन कर अपनी जीविका अर्जित कर सके।
- प्रबंध का उद्देश्य उद्योगपति की अधिकतम खुशहाली के साथ श्रमिकों की अधिकतम भलार्इ होनी चाहिए। वैज्ञानिक प्रबंध के लाभ को प्राप्त करने हेतु श्रमिकों और प्रबंधकों में संपूर्ण मानसिक क्रान्ति की आवश्यकता है। साथ ही ये लाभ आपसी सम्बंधों में मधुरता तथा सहयोग से प्राप्त होना चाहिए व्यक्तिवाद तथा मनमुटाव से नहीं।
गुण –
वैज्ञानिक प्रबंध का प्रमुख लाभ शक्ति के प्रत्येक औंस का संरक्षण तथा उचित प्रयोग करना है। फिर, विशिष्टकरण और श्रम विभाजन ने एक दूसरी औद्योगिक क्रान्ति उत्पन्न कर दी है। कार्यों को अधिक कुशल एवं विवेकपूर्ण रीति से निष्पादित करने के लिए समय तथा गति की तकनीकें महत्वपूर्ण उपकरण हैं। संक्षेप में वैज्ञानिक प्रबंध उपक्रम की समस्याओं का हल निकालने के लिए केवल एक विवेकपूर्ण विधि ही नहीं है वरन् यह प्रबंधन के व्यावहारिक पक्ष को भी सुविधाजनक बनाता है।
सीमाएॅं
वैज्ञानिक प्रबंध की अपनी सीमाएं भी हैं तथा कर्इ आधारों पर इसकी आलोचना भी की गर्इ है। कुछ आलोचकों का कहना है कि वैज्ञानिक प्रबंध तकनीकी अर्थ में ही श्रमिकों की कार्यकुशलता से संबंधित है तथा यह उत्पादन के महत्व पर ही बल देता है। श्रमिक आरम्भ से कामचोर होते हैं। प्रबंधकों की उन पर कड़ी निगरानी की आवश्यकता है तथा प्रबंधकों को अपना अधिकार इस संबंध में प्रयोग करना चाहिए। इन मान्यताओं पर यह सिद्धान्त आधारित है। यह भी कहा जाता है कि श्रमिकों को केवल मुद्रा से ही अभिप्रेरित किया जा सकता है।कार्य के वातावरण के सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर कोर्इ विचार नहीं किया जाता। अन्य आलोचकों ने इसे अवैज्ञानिक, असमाजिक, मनोवैज्ञानिक रूप से अनुचित तथा प्रजातंत्रीय विरोधी बताया है। यह अवैज्ञानिक हैं, क्योंकि श्रमिकों की क्षमता तथा मजदूरी मापन की कोर्इ उचित तथा विश्वसनीय विधि नहीं है। यह असमाजिक है क्योंकि श्रिमेकों को आर्थिक उपकरणों के रूप में व्यवहार किया जाता है यह मनोवैज्ञानिक रूप में अनुचित है क्योंकि एक श्रमिक को दूसरे के साथ अधिक उत्पादन करने तथा अधिक कमाने के लिए, अस्वस्थ प्रतियोगिता करनी पड़ती है। यह प्रजातंत्रीय विरोधी है क्योंकि यह श्रमिकों की स्वाधीनता को कम करती है। श्रमिक संघ इसका विरोध करते, क्योंकि यह प्रबंध को तानाशाही बनाती है कर्मचारियों के कार्य का भार बढ़ाती है तथा उनके रोजगार के अवसरों पर विपरीत प्रभाव डालती है।
रूढ़िवादी सम्प्रदाय के प्रमुख विचार को मेंसर हेनरी फेयोल का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। प्रबन्धक के क्षेत्र में आप द्वारा किये गये योगदान को प्रबन्ध के प्रशासकीय सिद्धान्तों के नाम से जाना जाता है। जब श्री फेयोल फ्रांस की एक कोयले की कम्पनी में बतौर निदेशक कार्यरत थे तभी उन्होंने प्रबन्धन प्रक्रिया का सुव्यवस्थित विश्लेषण प्रस्तुत किया था। आपके अनुसार किसी भी संगठन में समस्त व्यापारिक प्रक्रियाओं को छ: भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है तथा ये परस्पर एक दूसरे पर निर्भर रहती है ये है, तकनीकी, व्यापारिक, वित्तीय सुरक्षा, लेखाकार्य तथा प्रशासनिक कार्य।
आपके अनुसार प्रबंधन प्रक्रिया सार्वभौमिक है तथा इस प्रक्रिया में निम्नलिखित पॉंच विशेषताएं होती हैं, यथा – पूर्वनुमान, नियोजन, व्यवस्थापन, आदेश, समन्वय तथा नियंत्रण। इसके साथ साथ अपने 14 सिद्धान्तों का एक सैट भी प्रतिपादित किया। ये सिद्धान्त प्रबंधन प्रक्रिया का प्रयोग करने में पथ प्रदर्शक बनते हैं ।आप इन सिद्धान्तों का इकार्इ संख्या 3 में विस्तृत रूप में अध्ययन करेंगे।
प्रभावी प्रबंधन के लिए आवश्यक गुण तथा योग्यताएं उपक्रम के विभिन्न स्तरों के प्रबंधकीय पदों पर निर्भर करती है। फेयॉल के अनुसार प्रशासनिक गुण प्रबंधकों के उच्चस्तरीय स्तर पर अनिवार्य है जबकि तकनीकी गुण नीचे के स्तर का कार्य करने वाले पदों के प्रबंधकों के लिए आवश्यक है। उनका यह भी विश्वास था कि जीवन के प्रत्येक मोड़ पर व्यक्तियों के लिए प्रबंधकीय प्रशिक्षण अनिवार्य है। उन्होंने ही पहली बार प्रबंध क्षेत्र में औपचारिक शिक्षा तथा प्रशिक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। संक्षेप में फेयॉल का विश्लेषण साधनों का एक सैट (अर्थात नियोजन, व्यवस्था, आदेश, समन्वय तथा नियंत्रण) प्रबंधक प्रक्रिया को चलाने तथा मार्गदर्शन के लिए (जैसे प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप देने के लिए सिद्धान्त) प्रदान करता है।
प्रबंध का प्रशासनिक सिद्धान्त एवं प्रबंध की कार्यात्मक विचारधारा फेयॉल द्वारा रखी गर्इ नींव पर ही विकसित हुए हैं। उन्होंने प्रंबंध प्रक्रिया का विश्लेषण करने के लिए एक अवधारणात्मक ढांचा बनाकर दिया। साथ ही, उन्होंने प्रबंध को एक पृथक स्वतंत्र इकार्इ का सम्मान देकर उसका विश्लेषण किया। ज्ञान के समूह के रूप में प्रबंध को अत्यधिक लाभ फैयॉल द्वारा प्रबंधकीय गुणों का विश्लेषण कर उन्हें सार्वभौमिकता प्रदान करने तथा उसके सामान्य प्रबंध के सिद्धान्तों से ही मिला। यद्यपि कुछ आलोचकों ने इसे असंगत अथवा पारस्परिक विरोधी, अस्पष्ट तथा प्रबंधकों का पक्ष लेने वाला सिद्धान्त बताया है, फिर भी यह सिद्धान्त सम्पूर्ण विश्व में प्रबंध शास्त्र की शिक्षा तथा व्यवहार में अपना महत्वपूर्ण प्रभाव रखता है।
रूढ़िव़वादी विचारधाराओं की आलोचनाएं
इसमें संदेह नहीं कि रूढ़िवादी विचारधारा ने प्रबन्धशास्त्र के विकास से सराहनीय योगदान किया है, फिर भी इनकी आलोचनाएं निम्न आधार पर की जा सकती हैं :-
- रूढ़िवादी प्रबन्ध सिद्धान्त एवं अवधारणाएं व्यक्तिगत अनुभव तथा सीमित अवलोकन पर आधारित है। इनमें प्रयोग साक्ष्यों का अभाव है। इनका सत्यापन, नियंत्रित कथन कहना ही अधिक उचित है। वैज्ञानिक कहना नहीं।
- बहुत से रूढ़िवादी सिद्धान्तों को या तो स्पष्ट रूप से परिभाषित ही नही किया जा सकता है। दूसरे शब्द में अल्पज्ञता, अति साधारणीयता और अवास्तविकता के शिकार हैं।’’ अत: यह भी प्रहार किया कि इन्हें कहावत से अधिक नहीं समझना भूल होगी उनकी तुलना लोकोक्ति या लोक साहित्य से की जा सकती है।
- रूढ़िवादी प्रबन्धशास्त्रियों ने बन्द प्रणाली मान्यताओं के आधार पर सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया और संगठन पर पर्यावरणीय घटकों के प्रभावों पर विचार नहीं किया। जबकि हर संगठन आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक वातावरण से प्रभावित होता है। प्रक्रिया प्रभाव पड़ता है।
- रूढ़िवादी प्रबन्धशास्त्रियों ने यह माना कि संगठन गतिहीन और अपरिवर्तनीय होते हैं जब कि वास्तव में वे गतिशील एवं परिवर्तनशील होते हैं तथा निरन्तर समायोजन की आवश्यकता महसूस होती है। अत: इनका केवल ऐतिहासिक महत्व रह जाता है।
- रूढ़िवादी प्रबन्धशास्त्रियों ने श्रमिकों को केवल जीवित संयत्र ही समझा जिन्हें प्रेरणाओं के माध्यम से संचालित किया जा सकता है। लेकिन मानवीय व्यवहार बड़ा ही विषम है, यह आर्थिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक तथा अन्य कारकों में प्रभावित होता है। श्रमिक प्राय: अपने किसी वर्ग के सदस्य के रूप में व्यवहार करते हैं। उनकी क्षमता और विवेक उनकी शारीरिक क्षमता से निर्धारित नहीं होते बल्कि उनके सामाजिक मूल्यों से होते हैं इसीलिए गैर आर्थिक कारक और उनके व्यवहार के निर्धारण में महत्वपूर्ण होते है।
- प्रशासनिक विचारधारा के प्रबन्धशास्त्रियों का यह मत है कि प्रबन्ध के कार्य, सिद्धान्त एवं अवधारणाएं सभी संगठनों पर लागू होती है तर्कसंगत प्राप्ति नही होता।
प्रबंध का नवरूढ़ि वादी सम्प्रदाय
रूढ़िवादी सम्प्रदाय की ही उपज है नवरूढ़ि वादी सम्प्रदाय। इस सम्प्रदाय में अग्रलिखित प्रबन्ध विद्वानों को शामिल किया जाता है :- एल्टन, मेयो, मेरी पार्कर फोलेट, सी.आर्इ. वर्नाड, तुगलस एम.सी. ग्रेगर तथा आर.लाइकर्ट। मूलत: ये सभी समाजशास्त्री थे तथा इन्होंने वैज्ञानिक प्रबन्ध एवं प्रशासनिक प्रबंध के सिद्धान्तों की व्याख्या समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से की और पाया कि इन सिद्धान्तों के परिणाम अच्छे नहीं हैं क्योंकि इनमें कार्य की वास्तविक दशाओं की अवहेलना ओर मानवीय तथा सामाजिक कारकों के प्रभाव एवं महत्व की घोर उपेक्षा की गर्इ है। नव रूढ़िवादी सम्प्रदाय के विचारकों को हम दो भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं। (क) मानवीय सम्बन्धों के विचारक (ख) व्यवहारिक विज्ञान के विचारक आइये इन्हें क्रमश: समझने का प्रयास करें।
मानवीय सम्बन्धी के विचारक
प्रबन्ध में मानवीय दृष्टिकोण का प्रतिपादन एल्टन मेयो तथा उनके सहयोगी जान ड्यवे, डब्ल्यू. एफ. ह्वाइटे तथा कुर्ट लेविन ने किया। एल्टन मेयो हावर्ड विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र प्राचार्य थे और उन्होंने वेस्टर्न एलेक्ट्रिक कम्पनी के होथेर्ने कारखाने में विभिन्न प्रयोगों द्वारा अपने इन विचारों का प्रतिपादन टेलर तथा अन्य रूढ़िवादी प्रबन्ध शास्त्रियों ने व्यवस्था, विवेकपूर्णता, कार्य विभाजन, विशिष्टीकरण और अधिकार सम्बन्धों पर आधारित औपचारिक संगठन ढांचे पर विशेष जोर दिया था तथा श्रमिकों को केवल एक आर्थिक साधन माना था। मानवीय सम्बन्ध दृष्टिकोण के प्रबन्ध शास्त्रियों ने इस समरूप आर्थिक दर्शन को चुनौती दी। उन्होंने निश्चित नियमों, व्यवस्था, विवेकपूवर्णता और अधिकार तंत्र पर आधारित औपचारिक संगठन ढांचे पर कड़ा प्रहार किया। और अनौपचारिक प्रजातांत्रिक तथा सहभागी संगठन ढांचे का समर्थन किया जिसमें श्रमिकों के मनोबल, सृजनात्मकता तथा संतोष वृद्धि पर विशेष ध्यान दिया गया।
यह विचार धारणा पर आधारित थी कि आधुनिक व्यवस्था एक सामाजिक तंत्र है जिसमें सामाजिक वातावरण और पारस्परिक संबंध कर्मचारियों के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। यह इस बात पर बल देता है कि अधिकारियों तथा अधीनस्थों के अधिकार दायित्व संबंध कर्मचारियों की सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक संतुष्टि से संबंष्टिात होना चाहिए। कर्मचारियों को प्रसन्न रखकर ही एक उपक्रम उनका पूर्ण सहयोग प्राप्त कर सकता है तथा इस प्रकार उनकी कार्यक्षमता में वृद्धि लाता है। प्रबन्ध को कार्यरत सामाजिक समूहों के विकास को प्रोत्साहित करना चाहिए तथा कर्मचारियों के विचारों को मुक्त रूप से व्यक्त करने का अवसर प्रदान करना चाहिए। प्रबन्धकों को प्रजातांत्रिक नेतृत्व के महत्व को स्वीकार कर लेना चाहिए जिससे सम्प्रेषण मुक्त रूप से प्रवाहित हो सकेगा और अधीनस्थ निर्णयन में भाग ले सकेंगे।
ऐलटन मायो तथा उनके साथियों द्वारा किए गये बहुत से प्रयोगात्मक अध् ययनों के परिणाम स्वरूप प्रबंध में मानव संबंध विचारधारा का विकास हुआ। ये अध्ययन यू.एस.ए. में होथोर्न स्थित वेस्टर्न इलेक्ट्रिक प्लांट में किये गये थे। होथोर्न अध्ययन का उद्देश्य श्रमिकों की उत्पादकता तथा कार्य निश्पत्ति को प्रभावित करने वाले कारकों को ढूॅंढ निकालना था। ये निष्कर्ष इस प्रकार थे।
- कार्यस्थल का नैसर्गिक वातावरण कार्यक्षमता पर कोर्इ विशेष प्रभाव नहीं डालता।
- श्रमिकों तथा उनकी कार्य टोली का कार्य के प्रति अनुकूल व्यवहार कार्यक्षमता को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण कारक है।
- श्रमिकों की सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने से श्रमिकों के मनोबल तथा कार्यक्षमता पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है।
- श्रमिकों गु्रप जो सामाजिक पारस्परिक प्रभाव तथा सामान्य हित पर आधारित होते हैं, श्रमिकों के कार्य निष्पादन पर गहरा प्रभाव डालते हैं।
- केवल आर्थिक पारितोषण श्रमिकों को प्रभावित नहीं कर पाता। कार्य सुरक्षा, अधिकारियों द्वारा प्रशंसा, सम्बन्धित विषयों पर विचार व्यक्त करना आदि कारक अभिप्रेरित करने के अधिक महत्वपूर्ण कारक है।
मानवीय सम्बन्ध दृष्टिकोण का मूल्यांकन
- मानवीय सम्बन्ध विचारधारा के अधिकांश निष्कर्षों का कोर्इ वैज्ञानिक आधार नहीं है। वे संकीर्णता के शिकार हैं क्योंकि वे व्यापक और नियंत्रित प्रयोगों के ऊपर आधारित नहीं हैं।
- मानवीय सम्बन्धों की विचारधारा के निष्कर्षों का सोचने का आधार बहुत संकीर्ण है क्योंकि वे केवल मानवीय सम्बन्ध और अनौपचारिक व्यक्ति समूह पर ही बल देते हैं और संगठन के ढांचे एवं तकनीकी पक्ष को भूल जाते हैं। उन्होंने कार्य संतोष के आर्थिक घटकों की भी उपेक्षा की है। उन्होंने केवल निम्न स्तर पर कार्यरत श्रमिकों के व्यवहार पर ही अपना ध्यान केन्द्रित रखा है और उच्च प्रबन्धक के व्यवहार के सम्बन्धों में कोर्इ मार्गदर्शन नहीं दिया है।
- प्रयोगों में ऐसा कोर्इ प्रमाण कर्मचारियों की उत्पादकता, कार्य संतोष और प्रसन्नता में सम्बन्ध को प्रस्तुत नहीं करता है जिससे उनके दृष्टिकोण में विश्वास किया जा सके।
- समूह निर्णय कुछ निश्चित परिस्थितियों में अच्छे हो सकते हैं किन्तु यह झगड़ों, उत्तरदायित्व के हस्तान्तरण, प्रबन्धक के पद की अवहेलना तथा अनिर्णयन जैसी जोखिमों से भरा हुआ है और नकारात्मक है।
- मानवीय सम्बन्ध से जुड़े प्रबन्धशास्त्री संगठन विरोध को सदैव एक सामाजिक हानि की दृष्टि से तथा सहयोग को सामाजिक गुणता की दृष्टि से देखते हैं, फलस्वरूप वें संगठन में समूह की एकता पर जोर देते हैं और विरोध को कम करने की बात करते हैं लेकिन संगठन का स्वस्थ रहना विरोध से सर्वथा मुक्ति में नहीं बल्कि विरोधों के सामन्जस्य और उनकी रचनात्मक शक्ति के रूप में उपयोग में निहित हैं।
- यह सिद्धान्त व्यक्ति विरोधी है। यह दृष्टिकोण प्रबन्धक के अधिकार के महत्व को कम करता है उसे पहल करने से रोकता है और उसका मनोबल गिराता है। अन्य सदस्य भी व्यक्तिगत पहल और रूचि में कमी कर देते हैं और अपने व्यक्तित्व को समूह में खो बैठते हैं।
व्यावहारिक विज्ञान के विचारक
- यह अन्तरविषयी विज्ञान है जिसमें विभिन्न सामाजिक विज्ञानों के ज्ञान का समन्वय होता है।
- यह प्रयोगात्मक विज्ञान है जिसमें शोध द्वारा संगठन की विभिन्न समस्याओं का निदान होता है।
- यह आदर्श विज्ञान है जो केवल कारक परिणाम सम्बन्ध को प्रदर्शित करता है मार्ग दर्शन करता है कि सफलता के क्या उपाय कर सकता है।
- यह व्यक्ति प्रधान है अत: व्यक्तियों के विचारों, भावनाओं, आवश्यकताओं और प्रेरणाओं पर विशेष बल देता है और मानवीय मूल्यों को स्वीकार करता है।
- यह लक्ष्य प्रधान विज्ञान भी है। यह संगठन के विरोधों को मानवता प्रदान करता है तथा व्यक्तियों एवं संगठनों दोनों की संतुष्टि के लिए अन्र्तविरोधी लक्ष्यों में सामन्जस्य स्थान के लिए सुझााव देता है।
- यह प्रणाली अवधारणा प्रधान है तथा यह सभी कारकों का विश्लेषण करती है जिनका प्रभाव संगठन की कार्यकुशलता पर पड़ता है।
मानव सम्बन्धी विचारधारा जहॉं प्रसन्न श्रमिक को अधिक उत्पादक माना जाता है वहीं यह विचारधारा लक्ष्य एवं कुशलता की प्राप्ति का एक प्रमुख माध्यम मात्र ही है। व्यावहारिक विज्ञान को हम तीन बिन्दुओं के माध्यम से और गहनता से समझ सकते हैं।
प्रबंध का आधुनिक सम्प्रदाय
प्रणालीगत विचारधारा
- प्रत्येक प्रणाली के अन्तर्गत अनेक उपप्रणालियॉं होती हैं ।
- प्रत्येक प्रणाली के ऊपर अन्य बड़ी प्रणालियां हो सकती हैं।
- प्रत्येक उपप्रणाली अन्र्तसम्बन्धित होती है।
- प्रत्येक प्रणाली लक्ष्य से उन्मुख होती है तथा समस्त उपप्रणालियॉं उसे सुव्यवस्थित रूप से पाने में सहयोग करती हैं।
- सभी प्रणालियों को दो भागों में वर्गीकृत किया जा सकता है। खुली प्रणाली व बन्द प्रणाली।
- बन्द प्रणाली अपने वातावरण से कोर्इ सम्बन्ध नहीं रखती अर्थात वह तो प्रभावित होती है और न ही प्रभावित करती है। इसके विपरीत खुली प्रणाली प्रभावित होती है और प्रभावित भी करती है।
- समस्त प्रणालियों में साधन व उत्पादन दोनों होते हैं।
- खुली प्रणाली में प्रतिपुष्टि निरन्तर चलती रहती है। जिससे समय समय पर आवश्यक समायोजन एवं संशोधन चलता रहता है।
उपरोक्त विवेचन के पश्चात हम कह सकते हैं कि इस विचारधारा की दृष्टि में प्रबंध भी एक प्रणाली है तथा इसकी प्रकृति खुली है। अत: प्रबन्ध को अपने संगठन की सफलता के लिए एक एकीकृत प्रणाली समझना चाहिए। प्रबन्ध रूपी प्रणाली के निरन्तर प्रवाह के लिए पांच प्रमुख कारक आवश्यक होते हैं, यथा संसाधन,रूपान्तरण सम्प्रेषण व्यवस्था, उत्पादन तथा प्रतिपुष्टि। इस प्रकार प्रबन्ध रूपी प्रणाली की विशेषताएं हो सकती हैं आइये इसे क्रमवार समझने का प्रयास करें।
- यह विचारधारा सम्पूर्ण संगठन को एक इकार्इ मानती है।
- चूॅंकि प्रबन्ध की प्रकृति खुली है अत: इसमें परिस्थितिनुकूल परिवर्तन सम्भव है
- परिस्थितिनुकूल परिवर्तनों के कारण इसे एक गतिशील प्रक्रिया में इस बात का ध्यान रखना चाहिए।
- प्रत्येक प्रबन्धक को संगठन को एक इकार्इ के रूप में देखना चाहिए न कि उसका विभागीकरण कर अलग अलग इकाइयों में।
- प्रबन्धकों को सदैव बहु विषयक दृष्टि अपनानी चाहिए। क्योकि संगठन एक बहु आयामी बहुस्तरीय तथा अनेक तत्वों के सम्मिश्रण से निर्मित प्रणाली है।
- इस विचारधारा के मतानुसार संगठन एक समन्वित व एकीकृत इकार्इ होती है अत: सभी विभागों के समन्वित प्रयासों से ही सफलता मिलती है।
- उत्पादकता में वृद्धि तभी सम्भव है जब संगठनात्मक सभी उपप्रणालियों समन्वित रूप से सम्पूर्ण संगठन की सफलता के लिए मिलकर कार्य करें।
प्रबन्ध की इन प्रक्रियात्मक विशेषताओं के पश्चात आइये इसके कुछ लाभों का भी समझने का प्रयास करें –
- यह संगठनात्मक प्रयासों को एकीकृत करता है।
- यह प्रबंधकों को उपक्रम को समग्र रूप में देखने का अवसर प्रदान करता है। समग्र रूप में उपक्रम अपने विभिन्न भागों के योग से भी बड़ा होता है।
- यह विचारधारा संगठन को एक खुला तंत्र मानकर चलती है।फिर उपतंत्रों के बीच पारस्परिक प्रभाव भी गतिशील होते हैं।
- आधुनिक विचारधारा बहुस्तरों तथा बहुआयाम पर आधारित है अर्थात इसमें सूक्ष्म तथा दोनों ही पहलुओं पर विचार किया जाता है। यह देश के औद्योगिक कार्यों पर सूक्ष्म रूप से विचार करती है तथा इनका आन्तरिक इकाइयों पर बहुत रूप से विचार करती है।
- यह तंत्र पद्धति बहुचरों पर आधारित है क्योंकि एक घटना बहुत से कारकों का परिणाम हो सकती है जो एक दूसरे से जुड़े हुए तथा परस्पर निर्भर रहते हों।
- परिष्करण प्रक्रिया उपक्रम को अपने हिस्सों का पर्यावरण में परिवर्तन के अनुसार फिर से व्यवस्थित करने का अवसर प्रदान करती है।
इस प्रणाली की आकर्षक अपील के कारण वर्तमान युग में इसकी विशेष मान्यता है। यह व्यवसायिक निर्णयन प्रक्रिया में क्रान्ति ला रही है। इससे विस्तृत सूचनाएं आसानी से सुलभ हो जाती हैं जिनके कारण निर्णय लेने में सुविधा होती है। किन्तु इसकी कुछ सीमायें भी हैं वास्तव में यह व्यवस्था प्रणाली के सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत नहीं कर पाता है। यह एक संगठन विशेष के उपतंत्रों का संबंध पर्यावरण से किस प्रकार रहता है स्पष्ट नहीं कर पाता है। अत: इसे अव्यवहारिक माना जाता है। अत: यह प्रबन्ध की किसी तकनीकी को स्पष्ट नहीं करती है।
प्रासंगिकता की विचारधारा
आधुनिक प्रबंध
- औद्योगिक सत्ता का उपकरण हो जाना,
- वित्तीय प्रभुत्व का विस्तार
- स्वार्थपूर्ण कुप्रबन्ध,
- जनता के हितों का शोषण ,
- श्रमिकों का शोषण आदि।
इन दोषों के कारण ही भारत में 3 अप्रैल, 1970 से प्रबन्ध अभिकर्ता प्रणाली को एक विशेष अधिनियम पारित करके पूर्ण रूप से समाप्त कर दिया गया था।