अनुक्रम
मौलिक अधिकार का अर्थ एवं महत्व –
मौलिक अधिकार वे अधिकार होते है जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक एवं आवश्यक होने के कारण संविधान के द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते है। मौलिक अधिकार के महत्व के संबंध में डॉ. अम्बेडकर का यह कथन उल्लेखनीय है- ‘‘यदि मुझसे कोर्इ प्रश्न पूछे कि संविधान का वह कौन सा अनुच्छेद है जिसके बिना संविधान शुन्यप्राय हो जायेगा तो इस अनुच्छेद 32 को छोड़कर मैं किसी और अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं कर सकता यह संविधान की हृदय एवं आत्मा है।’’ श्री ए.एन.पालकीपाल ने कहा है- ‘‘मौलिक अधिकार राज्य के निरंकुश स्वरूप से साधारण नागरिकों की रक्षा करने वाला कवच है।’’ न्यायाधीश के. सुब्बाराव के अनुसार – ‘‘परम्परागत प्राकृतिक अधिकारों का दूसरा नाम मौलिक अधिकार है।’’
मौलिक अधिकार की विशेषताएँ –
1. राष्ट्रीय आंदोलन के भावना के अनुकूल –
2. सर्वाधिक विस्तृत एवं व्यापक अधिकार –
3. व्यावहारिकता पर आधारित –
4. अधिकारों के दो रूप –
5. मौलिक अधिकार असीमित नहीं –
6. सरकार की निरंकुशतापर अंकुश –
7. राज्य के सामान्य कानूनों से ऊपर –
8. न्यायालय द्वारा संरक्षण –
9. भारतीय नागरिकों तथा विदेशियों में अंतर –
मौलिक अधिकार के प्रकार –
भारत संविधान में सात मौलिक अधिकार वर्णित थे। यद्यपि वर्ष 1976 में 44वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक अधिकारों की सूची में से संपत्ति का अधिकार हटा दिया गया था। तब से यह एक कानूनी अधिकार बन गया है। अब कुल छ: मौलिक अधिकार है।
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)
- स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)
- शोषण के विरूद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)
- सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
1. समानता का अधिकार –
भारतीय समाज के व्याप्त असमानताओं एवं विषमताओं को दूर करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में समानता के अधिकार का उल्लेख किया गया है।
- विधि के समक्ष समानता – अनुच्छेद 14 के अनुसार ‘‘भारत राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समानता से वंचित नहीं किया जावेगा। आशय कानून की दृष्टि से सब नागरिक समान है।
- सामाजिक समानता – अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य किसी नगरिक के विरूध धर्म वंश जाति लिंग जन्म स्थान आदि के आधार पर नागरिकों के प्रति जीवन के किसी क्षेत्र में पक्षपात नहीं किया जावेगा।
- अवसर की समानता – अनुच्छेद 16 की व्यवस्था के अनुसार राज्य की नौकरियों के लिए सभी को समान अवसर प्राप्त होंगे।
- अस्पृश्यता का अंत –अनुच्छेद 17 के अनुसार अस्पृश्यता का अंत कर दिया गया है। किसी भी दृष्टि में अस्पृश्यता का आचरण करना कानून दृष्टि में अपराध एवं दण्डनीय होगा।
- उपाधियों का अंत –अनुच्छेद 18 के अनुसार ‘‘सेना अथवा शिक्षा संबंधी उपाधियों के अलावा राज्य अन्य कोर्इ उपाधियाँ प्रदान नहीं कर सकता।
समानता के अधिकार के अपवाद –
- सामाजिक समानता में सबको समान मानते हुए भी राज्य स्त्रियों तथा बच्चों को विशेष सुविधाएं प्रदान कर सकता है और इसी प्रकार राज्य सामाजिक तथा शिक्षा की दृष्टि से पिछडे़ वर्गों, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष नियम बना सकता है।
- सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए कुछ स्थान सुरक्षित कर दिये गये हैं तथा राज्य द्वारा जन्म-स्थान एवं निवास-स्थान तथा आयु संबंधी योग्यता का निर्धारण किया जा सकता है।
- संविधान में उपाधियों की व्यवस्था न होते हुए भी देश में सन् 1950 से भारत रत्न, पद्म विभूषण और पद्म श्री आदि उपधियां भारत सरकार द्वारा प्रदान की जाती हैं। सन् 1977 में जनता पार्टी के सत्तारूढ़ होने पर इन उपाधियों का अंत कर दिया गया है और साथ ही उपाधि प्राप्त व्यक्तियों द्वारा उपाधियों का प्रयोग को प्रतिबन्धित भी कर दिया गया था, परंतु 24 जनवरी 1980 से इंद्रिरा काँग्रेस द्वारा भारत रत्न तथा अन्य उपाधियों एवं अलंकरणों को पुन: प्रारंभ कर दिया गया था।
2. स्वतंत्रता का अधिकार –
स्वतंत्रता एक सच्चे लोकतत्र की आधारभूत स्तंभ होती है। संविधान के अनुच्छेद 19 से 22 तक इन अधिकारों का उल्लेख है।
- विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता –अनुच्छेद 19 के अनुसार भारत के प्रत्येक नागरिक को भाषण लेखन एवं अन्य प्रकार से अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार है।
- शांतिपूर्व एवं नि:शस्त्र सभा करने की स्वतंत्रता – अनुच्छेद 19 के अनुसार प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से बिना हथियारों के सभा या सम्मेलन आयोजित करने का अधिकार है।
- समुदाय और संघ बनाने की स्वतंत्रता –भारतीय संविधान द्वारा नागरिकों को समुदाय और संघ बनाने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है।
- भ्रमण की स्वतंत्रता – प्रत्येक भारतीय को को संपूर्ण भारत में बिना किसी रोकटोक के भ्रमण करने तथा निवास की स्वतंत्रता है।
- अपराध के दोष सिद्ध के विषय में संरक्षण की स्वतंत्रता- संविधान के अनुच्छेद 20 अनुसार कोर्इ भी व्यक्ति अपराध के लिए तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि वह किसी ऐसे कानून का उल्लंधन न करे जो अपराध के समय लागू था और वह उससे अधिक दण्ड का पात्र न होगा।
- जीवन और शरीर रक्षण की स्वतंत्रता – संविधान के अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को अपने प्राण या शारीरिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया को छोड़कर अन्य किसी से वंचित नहीं किया जा सकता।
- बंदीकरण से संरक्षण की स्वतंत्रता – संविधान के अनुच्छेद 22 के द्वारा बंदी बनाये जाने वाले व्यक्ति को कुछ संवैधानिक अधिकार प्रदान किये गये है। इसके अनुसार कोर्इ भी व्यक्ति को बंदी बनाये जाने के कारण बतायें बिना गिरफ्तार या हिरासत में नहीं लिया जा सकता है। उसे यह अधिकार है कि वह अपनी पसंद के वकील की राय ले सकता है, मुकदमा लड़ सकता है। अभियुक्त को 24 घण्टें के अंदर निकटत्म दण्डाधिकारी के सामने प्रस्तुत किया जाना होता है।
स्वतंत्रता के अधिकार के अपवाद –
- स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है। राष्ट्रीय हित और सार्वजनिक हित की दृष्टि से संसद कोर्इ भी नियम बनाकर स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित कर सकती है।
- सिक्खों को उनके धर्म के अनुसर कटार धारण करने सभा या सम्मेलन आयोजित करने का अधिकार दिया गया है।
- कोर्इ भी नागरिक ऐसे समुदाय या संघ का संगठन नहीं कर सकता, जिसका उद्देश्य राज्य के कार्य में बाधा उत्पन्न करना हो
- अनुच्छेद 22 के द्वारा प्रदान किये गये अधिकार शत्रु-देश के निवासियों पर लागू नहीं होते।
3. शोषण के विरूद्ध अधिकार –
- मनुष्यों का क्रय-विक्रय निषेध –संविधान के अनुच्छेद 32 (1) के अनुसार मनुष्यों, स्त्रियों और बच्चों के क्रय-विक्रय को घोर अपराध और दण्डनीय माना गया है।
- बेगार का निषेध – संविधान के अनुच्छेद 24 के अनुसार, 14 वर्ष से कम आयु वाले बालकों को कारखानों अथवा खानों में कठोर श्रम के कार्यों के लिए नौकरी में नहीं रखा जा सकेगा।
शोषण के विरूद्ध अधिकार का अपवाद –
4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार –
- धार्मिक आचरण एवं प्रचार की स्वतंत्रता – संविधान के अनुच्छेद 25 के अनुसारप्रत्येक व्यक्ति को अपने अत:करण की मान्यता के अनुसार किसी भी धमर् को अबाध रूप में मानने, उपासना करने आरै उसका प्रचार करने की पूर्ण स्वतंतत्रता है।
- धार्मिक कार्यों के प्रबन्ध की स्वतंत्रता –संविधान के अनुच्छदे 26 के द्वारा सभी धमोर्ं के अनुयायियों को धार्मिक और दानदात्री संस्थाओं की स्थापना औ उनके संचालन धार्मिक मामलों का प्रबंध, धार्मिक संस्थाओं द्वारा चल एवं अचल संपत्ति अर्जित करने राज्य के कानूनों के अनुसार प्रबंध करने की स्वतंत्रता प्रदान की गर्इ है।
- धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता – संविधान के अनुच्छदे 26 के द्वारा सभी धमोर्ं के अनुयायियों को धामिर्क और दानदात्री सस्ं थाओं की स्थापना और उनके संचालन, धार्मिक मामलों का प्रबंध, धार्मिक संस्थाओं द्वारा चल एवं अचल संपत्ति अर्जित करके राज्य के कानूनों के अनुसार प्रबध करने की स्वतंत्रता प्रदान की गयी है।
- व्यक्तिगत शिक्षण-संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा देने की स्वतंत्रता – संविधान के अनुच्छेद 28 की व्यवस्था के अनुसार किसी राजकीय (राज्य निधि से पूर्णत: पोषित) शिक्षण संस्था में किसी धर्म की शिक्षा नहीं दी जा सकती है।
धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अपवाद –
5. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार –
- अल्पसंख्याकों के हितों का संरक्षण – अनुच्छेद 29 के अनुसार अल्पसंख्याकों को अपनी भाषा लिपि या संस्कृति को सुरक्षित रखने का पूर्ण अधिकार है।
- अल्पसंख्याकों को अपनी शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन का अधिकार –अनुच्छेद 30 के अनुसार धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रूचि के अनुसार शिक्षण संस्थाओं की स्थापना और उनके प्रशासन का अधिकार है। यह अधिकार अल्पसंख्याकों को उनकी संस्कृति तथा भाष के संरक्षण हेतु राज्य से मिल रहे सहयोग को सुनिश्चित करता है।
6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार –
- बन्दी प्रत्यक्षीकरण लेख –व्यक्तिगत स्वतंत्रता हेतु यह लेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। लैटिन भाषा के हैबियस कार्पस का अर्थ है- ‘सशरीर उपस्थिति’। इस लेख के द्वारा न्यायालय बन्दी बनाये गये व्यक्ति की प्रार्थना पर अपने समक्ष उपस्थिति करने तथा उसे बन्दी बनाने का कारण बताये जाने का आदेश दे सकता है। यदि न्यायालय के विचार में संबंधित व्यक्ति को बन्दी बनाये जाने के पर्याप्त कारण नहीं है या उसे कानून के विरूद्ध बन्दी बनाया गया है तो न्यायालय उस व्यक्ति को तुरंत रिहा (मुक्त) करने का आदेश दे सकता। व्यक्तिगत स्वतंत्रता के लिए यह लेख सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
- परमादेश लेख – इस लेख अर्थ है- ‘हम आज्ञा देते हैं’। जब कोर्इ सरकारी विभाग या अधिकारी अपने सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन नहीं कर रहा है, जिसके परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन होता है। तो न्यायालय इस लेख के द्वारा उस विभाग या अधिकारी को कर्तव्य पालन हेतु आदेश दे सकता है।
- प्रतिषेध लेख –इस लेख का अर्थ – ‘रोकना या मना करना।’ यहा आज्ञा पत्र उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों द्वारा अपने अधीनस्थ न्यायालय को किसी मुकदमे की कार्यवाही को स्थगित करने के लिए निर्गत किया जाता है। इसके द्वारा उन्हें यह आदेश दिया जाता है कि वे उन मुकदमों की सुनवार्इ न कीजिए जो उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर हों। प्रतिषेध ओदश केवल न्यायिक पा्र धिकारियों के विरूद्ध ही जारी किये जा सकते हैं, प्रशासनिक कर्मचारियों के विरूद्ध नहीं।
- उत्प्रेषण लेख – इस लेख का अर्थ है पूर्णतया सूचित करना। इस आज्ञा पत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय को और उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय को किसी मुकदमे को सभी सूचनाओं के साथ उच्च न्यायालय में भेजने की सूचना देते हैं। प्राय: इसका प्रयोग उस समय किया जाता है, जब कोर्इ मुकदामा उस न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर होता है और न्याय के प्राकृतिक सिद्धांतों का दुरूपयोग होने की संभावना होती है। इसके अतिरिक्त उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालयों से किसी मुकदमे के विषय में सूचनाएं भी लेख के आधार पर मांग सकता है।
- अधिकार-पृच्छा लेख –इस लेख का अर्थ है- ‘किस अधिकार से?’ जब कोइ व्यक्ति सार्वजनिक पद को अवैधानिक तरीके से जब जबरदस्ती प्राप्त कर लेता है तो न्यायलय इस लेख द्वारा उसके विरूद्ध पद को खाली कर देने का आदेश निर्गत कर सकता है। इस आदेश द्वारा न्यायालय, संबंधित व्यक्ति से यह पूछता है कि वह किस अधिकार से इस पद पर कार्य कर रहा है? जब तक इस प्रश्न का सम्यक् एवं संतोषजनक उत्तर संबंधित व्यक्ति द्वारा नहीं दिया जाता, तब तक वह उस पद का कार्य नहीं कर सकता।
मौलिक अधिकारों का स्थगन –
- स्वतंत्रताओं का स्थगन – भारतीय राष्ट्रपति संविधान की धारा 352 के अनुसार, जब में सकंटकाल की घोषणा करता है तो अनुच्छेद 19 में वर्णित सभी स्वतंत्रतायें जैसे विचार- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सभा व सम्मेलन की स्वतंत्रता, संघ बनाने व भ्रमण की स्वतंत्रता तथा निवास की स्वतंत्रता आदि हो जाती है।
- संवैधानिक उपचारों के अधिकार का स्थगत – आपातकालीन स्थिति में अनुच्छेद 359 के अनुसार, ‘‘संवैधानिक उपचारों के अधिकार को भी स्थगित या निलंबित किया जा सकता है।
- मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए हस्तक्षेप –अनुच्छेद 15(1), 4 अनुच्छेद 19(6) में मौलिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए राज्य हस्तक्षेप कर सकती है।
- संविधान में संशोधन – संसद संविधान में संशोधन करके मौलिक अधिकारों को निलम्बित कर सकती है, किन्तु संविधान के मूल ढांचे को नष्ट नहीं कर सकती।
अत: स्पष्ट है कि संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये गये मौलिक अधिकार असीमित नहीं है इन अधिकारों की कुछ सीमाएं है तथा उन्हें विशेष परिस्थितियों में स्थगित भी किया जा सकता है।
मौलिक अधिकारों का मूल्यांकन –
- व्यावहारिकता पर आधारित – मौलिक अधिकारों की व्यवस्था, व्यावहारिकता एवं वास्तविकता पर आधारित है।
- अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों का कल्याण –मौलिक अधिकारों द्वारा अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के हितों के संरक्षण को विशेष महत्व प्रदान किया गया है।
- लोकतंत्र की सफलता का आधार – मौलिक अधिकारों के अभाव में लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। स्वतंत्रता और समानता लोकतंत्रीय व्यवस्था के दो आधारभूत स़िद्धांत होते हैं, इसीलिए हमारे मौलिक अधिकारों में इन दोनों सिद्धांतों को स्थान दिया गया है।