मानवधिकार क्या है ?

मानवाधिकारों के बारे में इस मूलभूत तथ्य को याद रखना होगा कि ये किसी राजा या किसी संप्रभू द्वारा दिया गया उपहार या पुरस्कार नहीं है बल्कि वे अधिकार हैं जो मानव अस्तित्व में समाहित रहते है। । मानवाधिकार से जुड़े किसी भी कानून का उद्देश्य उसकी पहचान करना, उसके प्रयोग को नियमित करना तथा उससे जुडे मामलों को लागू करवाना होता है। मानवधिकार में गौरव पूर्ण मानव अस्तित्व के सभी पक्षों को शामिल किया गया है ताकि सभी मानव जाति के परिवार का समान हिस्सा बनें। मनुष्य की गरिमा ही मानवधिकारों का सार है ।

मानवाधिकारों की मूलभूत अवधारणा- 

मानवाधिकारों का वर्गीकरण निम्नानुसार किया जा सकता है-

  1. संस्थापित या शास़्त्रीय के अतं र्गत नागरिकों और राजनीतिक अधिकारो को शमिल किया जाता है और प्राय: वह व्यक्ति को प्रभावित करने वाली राज्य की शक्तियों को सीमित करती है । 
  2. मानवाधिकारों में हुर्इ बढोत्तरी से एक नया सरोकार उत्पन्न हो गया है कि इससे कुछ अधिकार समाप्त हो जायेगे। कुछ अधिकार इतने महत्व के है। कि उन्हें राष्ट्रीय व अन्र्राष्ट्रीय नीतियों में प्रथामिकता दी जानी चाहिए। इनमें व्यक्तिगत गरिमा और मौलिक आवश्यकता से जुडे़ सारे अधिकार सम्मिलित होते हैं।
  3. सभी मानवाधिकारों का सबंध व्यक्ति से होता है। परन्तु इनमें से कुछ का प्रयोग केवल समूहो द्वारा किया जा सकता है । 
  4. यह वर्गीकरण स्पष्टत: एतिहासिक विकास के अनुरूप है। पथ््राम नागरिक एवं राजनैतिक दूसरा सामाजिक आर्थिक और सांस्कृति तीसरा एकात्मकता नामक अधिकार है जिसमें शांति, विकास खाद्य एवं स्वच्छ पर्यावरण सम्मिलित है। मानवधिकारो मूलत: परिवर्तनात्मक होते हैं। 

मानवाधिकार की विशेषता – 

सभी प्रकार के मानवधिकारों में कुछ समान विशेषताए होती है। मानवाधिकारों की अवधारणा के आधार पर निम्न विशेषताएँ है-

  1. स्वयं गरिमापूर्ण मानव जीवन जीने और अन्यों को उनके अधिकारो दिलाने का प्रयास करने का सबको अधिकार है। जाति, वंश, धर्म रंग, लिंग, के आधार पर किसी को इनसे वंचित नहीं किया जा सकता ।
  2. मानवाधिकार सार्वभौमिक है अत: सभी देशों के लोगों को बिना किसी भदे -भाव के सभी को समान अधिकार प्राप्त है। सभी विकसीत व विकासशील देशों को इन अधिकारों को अपने अपने नागरिकों को देना सुनिश्चित करना है । 
  3. मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुए हैं अत: सभी अपनी-अपनी संस्कृति, परम्परा, धार्मिक, राजनैतिक विचारधारा, प्रतिष्ठा इत्यादि का सम्मान करते हुए समान अवसर एवं व्यवहार के अधिकारी है।। संभव है कि कुछ वर्ग विशेष जैसे-महिला बच्चे विकलांगों आदि के लिए समान अवसर पैदा करने कुछ अतिरिक्त कार्य भी सरकारों को करना पडे़। 
  4. मानव स्वतत्रं व्यक्ति और राज्य के सबंधो से संबद्धं होते है परिणाम स्वरूप सरकार को ऐसे समाज का निर्माण करना चाहिए, जिससे प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों का स्वतंत्रता पूर्वक उपयोग कर आनंद उठा सके । 
  5. ये अधिकार मानव की गरिमा एवं व्यक्ति के विकास के लिए आधारभतू हैं जीवन का अधिकार, दासता से मुक्ति, उत्पीड़न से स्वतंत्रता का अधिकार सभी मूल भूत अधिकार हैं। 
  6. मानवाधिकार देशों को ऐसी स्थिंतियां उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी मानते हैं जिनसे इन अधिकारों के प्रोत्साहन, संरक्षण एवं आदर का वातावरण बनें 

मानवधिकारो के विकास की प्रमुख घटनाएं- 

प्राचीन यूरोपीय चार्टर में मैंग्नाकार्टा (1215) यूटे्रण्ट संघ (1779) ब्रिटिश अधिकार बिल (1689) में मौलिक स्वतंत्रता की बात कही गर्इ है। 18वीं, 19वीं शताब्दी के अधिकारों को शास्त्रीय अधिकार कहा जा सकता है जो व्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित थे तथा जिन्हें कर्इ राष्ट्रीय संविधान में दर्ज किया गया था। आज कल रोजगार, शिक्षा स्वास्थ्य और कल्याण श्रम इत्यादि नर्इ-नर्इ श्रेणियां होते जा रही हैं।

मानवाधिकारों से संबंधित महत्वपूर्ण तिथियां- 

  1. 1215 में मैग्नाकार्टा 
  2. 1776 में अमरीकी स्वतंत्रता का घोषणा पत्र तथा अधिकार पत्र 
  3. 1987 में संयुक्त राज्य अमरीका के संविधान 
  4. 1789 में मनुष्य के अधिकारों की फ्रांसीसी घोषणा 
  5. 1946 में संयुक्त राष्ट्र का मानव अधिकारों के आयेग का गठन 
  6. 1948 सार्वभौमिक मानवाधिकारों का घोषणा पत्र 
  7. 1949 की जेनेवा सन्धि 
  8. 1950 का मानवाधिकारों तथा मौलिक स्वतंत्रताओं के सरं क्षण हेतु यूरोपीय सन्धि 
  9. 1961 का यूरोपीय सामाजिक घोषणा पत्र 
  10. 1966 का आार्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय संधि, नागरिक एंव राजनीतिक अधिकारों की अंतर्राष्ट्रीय संधि, नागरिक एवं राजनीतिक, अधिकारो से जुडी ऐच्छिक संधि । 
  11. 1993 में मानवधिकारों के विश्व सम्मेलन में पारित वियना घोषणा पत्र और कार्रवार्इ का कार्यक्रम। 

सार्वभौम मानवाधिकारों की संस्कृति का प्रत्यक्ष उदय नैतिक पग्रति को दर्शाता है और यह आधुनिक राजनैतिक और आर्थिक खैये से मानवीय गारिमा के लिए उत्पन्न खतरों का प्रभावशाली उत्तर है।’’ हम सब समान मानव है।’’ के विचार को आज स्वीकृति प्राप्त है। पूरा विश्व एक परिवार है या वशुघैव कुटुम्बकम् की भावना भारत में बहुत प्राचीन है।

भारतीय भारतीय संविधान में मानवाधिकार –

मानवाधिकार भारत के लिए नया नहीं है हम जान चुके हैं। भारतीय संविधान में व्यक्ति के मौलिक अधिकार एवं उसके हनन होने पर न्यायालय का फैसला देने का कानूनी अधिकार दिया गया है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग- 

1993 में मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम लागू किया गया जिसमें मानव अधिकारों तथा उससे जुड़े मामलों की बेहतर रक्षा के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग एवं राज्य मानवाधिकार आयोग के गठन का प्रावधान था। अपने निर्माण के काल से ही यह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सर्वोच्य न्यायालय की पूरक संस्था के रूप में अपना कार्य कर रहा है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग राज्य के दाइत्व की प्रकृति एवं क्षेत्र के विषय में भी संज्ञान ले कर अपने दाइत्व को बाखुबी निभा रही है ।

आयोग की टिप्पणी थी 

यह राज्य का प्राथमिक और अनिवार्य दायित्व है कि वह अपने सभी लोगों के जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा के अधिकार की रक्षा करे। राज्य की यह भी जिम्मवारी है कि वह सुनिश्चित करे कि ऐसे अधिकारों का उल्लंघन जानबूंझ कर, अथवा लापरवाही से न होने पाए। मानवाधिकारों की न्यायोचितता का यह स्पष्ट और उभरता हुआ सिद्धान्त है कि राज्य न केवल अपने लिए काम करने वाले लोगों के कृत्यों के प्रति उत्तरदायी है अपितु राज्य उन सब लोगों के कृत्यों के लिए भी उत्तरदायी है जो उसके क्षेत्र में रहते हैं। राज्य उस निष्क्रियता के लिए भी उत्तरदायी है जो मानवाधिकार के उल्लंघन को सुविधाजनक बनाती है ।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकारी तंत्र तथा आतंकवादी समूहों द्वारा किए मानवधिकार उल्लंघन के अनेक मामलों की जाचं की है। मानवाधिकार आयोग किसी मामले की शियकत की जांच के दौरान केन्द्र सरकार से अथवा किसी भी राज्य सरकार से सुचनाएॅ अथवा रिपोर्ट अथवा किसी अधिकारी, प्राधिकरण सहायक (अधीनस्थ) से एक निश्चित समय में मांग कर सकता है। जांच के बाद यदि आयोग इस नतीजे पर पहुंचता है कि अधिकारों का हनन हुआ है तो वह निम्नलिखित कदम उठा सकता है-

  1. यदि जांच से पता चलता है कि किसी लोक सेवक द्वारा मानवाधिकारों का उल्लघंन किया गया अथवा अनदेखाी की गर्इ है तो उसके विरूद्ध राज्य सरकार से कार्यवार्इ करने अथवा अभियोजन (इस्तगासा) की अनुशंसा कर करता है । 
  2. उच्चमत न्यायालय या उच्च न्यायालय से दिशा-निदेर्श हेतु सम्पर्क कर सकता है। 
  3. पीड़ित सदस्य या उसके परिवार को अंतरिम राहत प्रदान करने के लिए सरकार तथा प्राधिकरण से सिफारिश कर सकता है ।

यदि मानवाधिकार के पास सशस्त्र बल के किसी सदस्य द्वारा मानवाधिकार के उल्लघंन का मामला आता है तो इसके निपटारे का तरीका कछु अलग होता है। इसके लिए केन्द्र सरकार से रिपोर्ट प्राप्त की जा सकती है और उस पर वह अपनी सस्तुतियां प्रदान कर सकता है। आयोग ने 22 मार्च 2000 की घटना को ध्यान में लिया जिसमें अनंतनाग जिले के एक गांव में सिक्ख समुदय के 35 सदस्यों को सशस्त्र उग्रवादियों द्वारा मार गिराया गया था और इस समाचार को सभी प्रमुख समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया था। मारे गये सभी लोगों की आयु 16-55 वर्ष के मध्य थी। यह घटना 21 मार्च 2000 की रात्रि में घटी थी। बाद में सभी शवों को देखकर एक महिला की भी मृत्यु हो गर्इ थी। इस घटनाा में कम से कम दो परिवारों के सभी पुरूष सदस्य मारे गए थे । यह घटना उस समय हुर्इ थी जब मात्र. कुछ ही घंटों बाद सयं ुक्त राज्य के राष्ट्रपति भारत के दौरे पर पहंचु ने वाले थे। आयोग ने इसे संज्ञान में लिया और उसने मुख्य सचिव और जम्मू व कश्मीर के पुलिस महानिदेशक को नोटिस भेजा था एवं साथ ही सचिव गृहमंत्रालय (भारत सरकार) को विस्तृत रिपोर्ट देने की बात कही था ।

दूसरी घटना 15 अप्रैल 1996 की है। इसमें पुलिस कर्मियों द्वारा 6 नक्सलवादियों की डाल्टगंज (बिहार) के मुरमडाग गांव में हत्या कर दी गर्इ थी। द पीपल युनियन फारॅ सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) ने पलाम् जाकर इस मामले की छानबीन की और पाया कि एक विवाद को निपटाने के लिए एक सशस्त्र दल गांव मे आया था। सूचना पाकर पुलिस मौके पर पहुची और इसने चारों आरे से घेर लिया। बदूंकधारियों ने पुलिस के सामने आत्म समर्पण कर दिया। इसके बाद पुलिस ने उन्हे अलग-अलग दिशाओं में खड़ा करके गोली मार दी। पीयूसीएल कोयह भी पता चला कि पुलिस का यह आरोप था कि इन नक्सलवादियों ने बम और आग्नये अस्त्रों से पुलिस पर हमला किया। इस पर जवाबी गोलाबाजारी में वे छह नक्सवादी मारे गए। जो कि एक झूठी कहानी थी। वे नक्सवादी सादी वर्दी में आए थे किन्तु पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद उन्हें खाकी वस्त्र पहना दिए गए थे जिसमें न कोर्इ छेद थे और न ही कोर्इ गोलियों के निशान थे। उनके शव फेंक दिए गए थे किन्तु लोगों के विरोध के कारण पुलिस गाडी में उनका शव ले जाकर उनका दाह-संस्कार किया गया। पुलिस के साथ-साथ संबंधित थाने की पुलिस भी इस कार्यवाही में शामिल थी। आयोग ने मामले की निष्पक्ष जांच के लिए कसे सीआर्इडी को सौपने की संस्तुती की। इसके लिए चार माह का समय दिया गया। आयोग ने भी विश्वास व्यक्त किया कि दोष सिद्ध होने पर राज्य द्वारा राहत प्रदान की जाएगी।

आयोग ने 27 जनवरी 1999 को इंडियन एक्सप्रसे में छपी इस घटनपा को संज्ञान में लिया था जिसका शीर्षक था: बिहार: पुरानी कहानी नए अपराधी और उच्च जाति की रणबीर सेना ने जहानाबाद में 21 दलितों को मौत के घाट सुलाया। ‘‘खबर के अनुसार, अगड़ी जातियों की रणवीर सेना, जो आधुनिक शस्त्रों से लैस थी ने 21 लोगों को मार गिराया जिनमें 5 महिलाएं और 6 बच्चे थे। यह घटना 25 जनवरी 1999 की है। यह घटना जहानाबाद जिले के मेहदिंया थाने के अंतर्गत रूख सागर विद्या गांव की है। पीडित़ों में 7 दलित थे एवं शेष पिछड़ी जातियों के थे। अखबार में छपी खबर को संज्ञान में लेते हुए आयोग ने अपराधियों की धर पकड़ करने को कहा, ताकि वहा ऐसी घटना की पुनरावृित्त न हो सके । आयोग ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह पीड़ितों की सहायता करे तथा भुक्त भोगी परिवारों को सुरक्षा प्रदान करे ।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग किसी सामान्य न्यायालय की तरह न तो कोर्इ फैसला सुनाता है और न ही न्यायालय के फैसले की भांति इसकी सस्ंतुतियां मानने को बाध्य होना पड़ता है। आयोग की संस्तुतियां जनता में खुब प्रचारित होती है और सामाजिक एंव राजनीतिक रूप में अपना विशिष्ट प्रभाव छोड़ती है। आयोग का टाडा के विस्द्ध छेड़ा गया अभियान एक उल्लेखनीय कदम है। यह एक अस्थार्इ कानून है जो 23 मर्इ 1995 को समाप्त हो गया। टाडा के समाप्त होने पर सरकार द्वारा किसी वैकल्पिक कानून को सदन में पारित नहीं किया गया।

गैर सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं की भूमिका (NGOs) –

मानवाधिकारों का प्रभाव किसी राष्ट्र की संप्रभुता की अवराधारणाओं मे एक बदलाव लाया है। वर्तमान में कोर्इ भी देश अपने नागरिकों को घरेलु सरोकारों से परेशान नही कर सकता। नवीन अवधारणाओं से मुक्त मानवाधिकारों के भूमण्डलीकरण ने विश्व को एक भूण्डलीय गांव बना दिया है। इसके परिणाम स्वरूप मानवाधिकार के मामले अब वैश्विक सरोकारों से जु़ड़ गए है।। स्वैच्छित संस्थाएं जिन्हें गैर सरकारी संस्थाएं भी कहा जाता है, को विश्वव्यापी समर्थन प्राप्त है और ये पूरे विश्व के प्रत्येक समाज में मानवाधिकारों को समर्थन एंव प्रोत्साहन दे रहे है।

एमनेस्टी इटंरनेशलय और हयूमन राइटस् वाच एंव पीपुल्स यूनियन फारॅ सिविल लिबर्टीज जैसी गैर सरकारी संस्थाओं के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किए गए कार्य जैसे- पूर्व यूगोस्लाविया (कोसावो, बोस्निया आदि) रंवांडा पूर्वी तिमोर, सिएरालियोन, सूड़ान और भारत में गुजरात एंव ऐसे अनेक उदाहरण है, जहां उपर्युक्त संस्थाओं ने उल्लेखनीय कार्य किए है। इन संस्थाओं के क्रियाकलापों के बीच 1946 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा स्थापित मानवाधिकार आयोग तालमेल करता है। गैर-सरकारी संस्थाओं के उपर्युक्त क्रियाकलापों के परिणामास्वरूप अब राज्यों के लिए वैधानिक जैसे मानवाधिकार सीमित, बाल समिति, महिला समिति, जातिसमिति, भेदभाव हटाने की समिति आदि) के सामने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना आवश्यक हो गया है।

लगभग आधी शताब्दी पूर्व यह अनुभव करना सोच से परे था कि प्रभुतासंपन्न राष्ट्र अपनी आंतरिक रिपोर्ट को किसी अतं रार्ष्ट्रीय सस्ंथा के सामने रखकर यह बताए कि उसने अपने नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया है, और अंतर्राष्ट्रीय संस्था के सदस्य उसके व्यवहार पर चर्चा करें । किन्तु आज मानवाधिकरों की अवधारणा की शक्ति का यह रूप हमारे समक्ष उपस्थित है। मानवाधिकारों के सरंक्षण एंव सवंर्धन के लिए गैर-सरकारी संस्थाओं की भूमिका निर्विवाद है। उसका प्रभाव स्पष्ट दिखार्इ देता है। मानवाधिकारों के मूल एजेन्सियों के साथ सरकारी या गैर सरकारी सस्ं थाओं के जडु ऩें से भारत में मानवाधिकर आंदोलन काफी सक्रिया है। मानवधिकारों के संरक्षण के रास्ते में गरीबी सबसे बडी बाधा है।

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