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जल ही जीवन हैं। यह बात पूर्ण रूप से सत्य हैं। पृथ्वी के अतिरिक्त अन्य ग्रहों में किसी भी जगह सिर्फ जल का न होना ही वहां का सूनापन हैं। जल का उपयोग पीने के अतिरिक्त कृषि करने, सिंचार्इ करने, कारखानों, जल व़िद्युत निर्माण आदि कार्यो में होता हैं। जल की इसी उपयोगिता एवं महत्व को संसाधन के रूप देखते हुये ‘नेशनल वाटर रिसोर्स कौंसिल’’ ने नेशनल वाटर पॉलिसी को 19 सितम्बर सन् 1987 में अपनाया।
भारत के जल स्त्रोत-
इस भारतीय उपमहाद्वीप में जल प्राप्ति स्त्रोतों को दो भागों में बांटा गया हैं।
1. धरातलीय जल (पृष्ठीय जल)-
धरातल पर पृष्टीय जल का मुख्य स्त्रोत वर्षा हैं। वर्षा का लगभग 20 प््रतिशत भाग वाष्पित होकर वायुमंडल में विलीन हो जाता हैं। वर्षा जल नदी, नालों, एवं जलाषयों में निरंतर पूर्ति करते हैं। अनुमानत: देश में कुल जल संसाधन 16.7 करोड़ हेक्टेयर मीटर हैं। केवल 6.6 करोड़ हेक्टेयर जल का उपयोग किया जाता हैं। अधिकांषत: जल बहकर नदियों के माध्यम से सागर में मिल जाते हैं। इसीलिये आवश्यकतानुसार अत्याधिक जलभंडारण करने की आवश्यकता हैं। छोटे-बड़े सभी प्रकार के बांध बनाना अनिवार्य हो गया हैं। क्योंकि भविष्य में वर्षा की कमी दिन प्रतिदिन चिंता का विशय हैं। भारत में सिंचार्इ के साधन पर्याप्त नहीं हैं। अब हमारा ध्यान पर्यावरण बचाओं, वृक्षारोपण करो एवं जलाशयों का निर्माण होना चाहियें।
2. भूमिंगत जल-
भारत में वर्षा का जल रिस कर भूमिगत होता रहता हैं। जल रिसाव की प्रक्रिया पष्ठीय जल से भी होती हैं। इन दोनों ही माध्यमों से भूमि के नीचे विशाल मात्रा में पानी इकट्ठा हो जाता हैं। इसे भूमिगत जल या भौम जल कहते हैं। कुए, पाताल तोड़ कुए, ट्यूबवेल, हैण्डपम्प, भूमिगत जल प्राप्ति के साधन हैं। जिन मैदानी भागों में अत्याधिक वर्षा होती हैं। उन भागों में भूमिगत जल की मात्रा ज्यादा हैं। न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों में भूमिगत जल की मात्रा कम हैं। अत: भूमिगत जल का वितरण सर्वत्र समान नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक भूमिगत जल लगभग 90 प्रतिशत विद्यमान हैं। भारत में भूमिगत जल का इतना अधिक उपयोग हो रहा हैं कि सरकार को नल कूप खुदार्इ एवं द्वितीय फसल के लिये रोक लगानी पड़ रही हैं। भूमिगत जल के विकास की विशेष आवश्यकता हैंं।
भूमिगत जल संसाधन की समस्यायें-
- वर्षा की कमी,
- शुद्ध पेय जल का अभाव,
- जल का दुरूपयोग
- बाढ़ग्रस्त क्षेत्र
- जल प्रदूषण
- सूखाग्रस्त क्षेत्र
- भूस्खलन वाले क्षेत्र आदि।
भारत की प्रमुख नदियों पर बहुउद्देशीय परियोजनायें-
- सतलज नदी पर नांगल बांध बनाया गया। यह भारत का सबसे अधिक ऊँचा बांध हैं।
- दामोदर नदी घाटी परियोजना (पश्चिम बंगाल में)
- कोसी नदी परियोजना (बिहार)।
- महानदी में दो बड़े बांध हैं- अ. हीराकुंड बांध (उड़ीसा में), एव गगंरेल बांध (छत्तीसगढ़ में )।
- तुंगभद्रा परियोजना (आंध्र, कर्नाटक)
- कृष्णा नदी में नार्गाजुन सागर बांध ( आंध्रप्रदेश )
- चम्बल नदी में चम्बल परियोजना ( मध्यप्रदेश एवं राजस्थान)।
- रिहंद परियोजना ( मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश )।
जल संसाधन की समस्यायें –
- वर्षा की कमी- भारत वर्श के पश्चिमी भाग खासकर थार के रेगिस्तान तथा वृष्टि छाया वाले प्रदेश में वर्षा की कमी के कारण जल की समस्या बनी रहती हैं।
- शुद्ध पेय जल का अभाव-बढ़ती जनसंख्या एंव शहरीकरण के कारण आज हमारे लिये शुद्ध व मीठें पेयजल का अभाव हैं। ग्रामीण तालाबो में मछली पालन ने जल को हरा कर दिया हैं।
- जल का दुरूपयोग-सिंचार्इ के जल का नदी में चले जाना, नलों का खुलारहना, भूमिगत जल प्राप्ति की होड़ आदि ने भविष्य को खतरे में डाल दिया हैं।
- बाढ़ग्रस्त क्षेत्र- हमारे द्वारा पर्यावरण से छेड़छाड़ करने के परिणाम स्वरूप नदियों में बाढ़ आना स्वाभाविक हैं।
- जल प्रदूषण-कारखानों का गंदा पानी, शहरों के नालियों का गंदा जल एवं अनेक प्रकार के कचरा से जल जल प्रदूषण बढ़ रहा हैं।
- सूखाग्रस्त क्षेत्र- अनेक स्थानों पर वर्षा न होने पर आकाल पड़ जाते हैं।
जल संरक्षण के उपाय –
- बांध एंव जलाशयों का निर्माण करना।
- जल शुद्धिकरण संयंत्रों की स्थापना करना।
- वृक्षारोपण करना।
- जल संसाधन के प्रति जागरूकता पैदा करना आदि।
- आधुनिक सिंचार्इ पद्धति का प्रयोग करना चाहियें।