अनुक्रम
ठोस के गुण
1. विघुती्य गुण –
ठोसों में विघुती्य गुण, इलेक्ट्रॉनों या धन छिद्रों की गति के द्वारा अथवा आयनों की गति के द्वारा होता है।धन छिद्रों या इलेक्ट्रॉनों की गति को इलेक्ट्रॉनिक चालकता (Electrical conductivity) तथा आयनों की गति को आयनिक चालकता (Ionec conductivity) कहते है। आयनों अथवा घनात्मक छिद्रो में चालकता इलेक्ट्रॉनिक दोश के कारण होती है। इलेक्ट्रॉनों से चालन को n- चालन तथा धन छिद्रों में से चालन को P चालन कहतें है। शुद्ध आयनिक ठोस जहाँ चालन केवल आयनों की गति द्वारा होता है विघुत् उदासीन होते है, इनमें से गलित या विलयन अवस्था में ही विघुत् प्रवाहित हो सकती है। विघुत् चालकता के आधार पर ठोस तीन प्रकार के होते हैं-
- सुचालक (Conductor)- इनमें विघुत्धारा का अधिकतम प्रवाह हो सकता है। इनकी चालकता 108 ओम.1 सेमी.1 कोटि की होती है। उदाहरण- धातुएँ (जैसे- Al,Cu,Ag) विघुत्-अपघट्य, (जैसे- NaCl, H2SO4)
- कुचालक (Non-Conductor)- इनमें प्रायोगिक रूप से विघुत् का प्रवाह नहीं होता है तथा इनकी विघुत चालकता 10-23 ओम.1 सेमी.1 कोटि की होती है। उदाहरण- अधातु में (जैसे-P,S) विघुत् अन अपघट्य (जैसे- यूरिया, सुक्रोज)
- अर्द्धचालक (Semiconductor)- सामान्य ताप पर किसी अर्द्धचालक की विघुत् चालकता, सुचालक व कुचालक के मध्य (10-9 से 102 ओम 10.1 सेमी-1 कोटि) की होती है। पूरमशून्य ताप पर ये पूर्ण कुचालक होते है, परन्तु कमरे के ताप पर कुछ विघुत् धारा प्रवाहित कर सकते है। उदाहरण- Si, Ge आदि।
- अर्द्धचालकों की चालकता उनमें उपस्थित अशुद्धियों अथवा क्रिस्टल जालक में दोश के कारण होता है।
- ताप में वृद्धि से इनकी चालकता बढ़ती है, जबकि धातुओं की चालकता घटती है।
- अर्द्धचालकों के गुण, अशुद्धि की प्रकृति के आधार पर परिवर्तित होते है। अर्द्धचाजलक, ट्राँजिस्टरों में तथा प्रसारणीय मानकों में प्रकाश विघुत्ीय यंत्रो (Photoelectric devices) के रूप में प्रयुक्त होते है।
- मर्करी, Hg (4 K)
- Y Ba2 Cu3 O7 (90k)
- Tl2 Ca2 Ba2 Cu3O10 (125K)
- इलेक्ट्रॉनिक्स में।
- Power transmission में।
- शक्तिशाली चुबंकों के निर्माण में।
- बिना पटरियों की चलने वाली रेलगाड़ियाँ बनाने में।
2. चुंबकीय गुण –
- अनुचुम्बकीय पदार्थ (Paramagnetic Substance)- पे पदार्थ, जो बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं, अनुचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थों के परमाणु, अणुओं या आयनों में आयुग्मित इलेक्टॉन उपस्थित होते हैं । चुम्बकीय क्षेत्र से हटा लेने पर इनका चुंबकत्व समाप्त हो जाता है । उदाहरण- Ti24,Cu2+ आदि।
- प्रतिचुम्बकीय पदार्थ (Diamagnetic Substance)- वे पदार्थ, जो बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र से प्रतिकर्शित होते हैं, प्रतिचुम्बकीय पदार्थ कहलाते हैं। इन पदार्थो के परमाणु, अणु या आयनों में सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते है। इन दोनों इलेक्ट्रॉनो का चुम्बकीय आघूर्ण एक-दूसरे के प्रभाव को निरस्ता कर देता है। उदाहरण- NaCl, TiO2 , V2O5 आदि।
- लौह चुम्बकिय प्रदार्थ (ferromagnetic substance)- वे प्रदार्थ जो ब्राहा्र चुम्बकीय क्षेत्र द्धारा तेजी से आकर्शित होते है लौह चुम्बकीय प्रदार्थ कहलाते है इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉनो की संख्या अधिक तथा संरेखन (Alignment) एक ही दिशा में होता है। चुम्बकीय क्षेत्र से हटा लेने पर भी ये चुम्कत्व दर्शाते रहते है। उदाहरण- Fe, Ni, Co आदि ।
- प्रतिलौहचुम्बकीय प्रदार्थ (antiferromagnetic substance)-जब बराबर संख्या में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन विपरीत दिशामें संरेखित (aligned)होते है तेा उनके चुम्कीय आघूर्ण एक दुसरे को निरस्त कर देते है ऎसे प्रदार्थो को प्रतिलौहचुम्बकीय प्रदार्थ कहते है। उदाहरण- Fe2O3, MnO2, NiO आदि ।
- लघु लौहचुंबकीय प्रदार्थ (ferrimgnetic substance)-जब अयुग्मित इलेक्ट्रॉनो की असमान सख्ं या विपरित दिषामें सरेखित (aaligned)होते है किन्तु परिणामी चुम्बकीय आघूर्ण शून्य नही होता है ऎसे प्रदार्थो केा फैरी चुम्बकीय प्रदार्थ कहते है। उदाहरण- Fe3O4 आदि ।
3. परावैधुत गुण –
- दाब विधुत क्रिस्टल (Piezoelectric Crystal)- ऐसे क्रिस्टल, जिन पर यांत्रिक विद्युत धारा उत्पन्न होती है, उन्हें दाब विद्युत क्रिस्टल तथा उत्पन्न विद्युत, पिजोइलेक्ट्रिसिटी कहलाती है। इस प्रकार के क्रिस्टल यांत्रिक विद्युत ट्रांसड्यूसर की तरह कार्य करते है, जिनका उपयोग रिकार्ड प्लेयरो में किया जाता है जहाँ वे दाब के प्रभाव से विद्युत सिंगनल उत्पन्न करते हैं। उदाहरण- क्वार्टज, रोशेल लवण आदि।
- तापविद्युत् क्रिस्टल (Pyroelectric Crystal)- ऐसे क्रिस्टल जो गरम किये जाने पर क्षीण विद्युत् धारा उत्पन्न करते हैं उन्हें ताप विद्युत् क्रिस्टल तथा उत्पन्न विद्युत्, पायरोइलेक्ट्रिसिटी कहलाती है।
- लौहविद्युत्ता (Antiferroelectricity)- कुछ दाब विद्यतु क्रिस्टलों में विद्युत् क्षेत्र की अनुपस्थिति में भी द्विध्रवों का स्थायी रूप से संरेखण रहता है, किन्तु बाह्य विद्युत् क्षेत्र से द्विध्रवों के दिक्विन्यास को विपरीत दिशा में बदला जा सकता है जिससे ध्रुवण की दिशा भी परिवर्तित हो जाती हैं ।उदाहरण- पोटेशियम
- प्रतिलौहविद्युत्ता (Antiferroelectricity)- इन क्रिस्टलों में द्विध्रुवो का संरेखण एक के बाद एक विपरीत दिशाओं में होता हैं जिससे क्रिस्टल का नेट (Net) द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है। उदाहरण- लैंड जिरकोनेट(PbZrO3)
ठोसों का वर्गीकरण
अवयवी कणों की व्यवस्था के आधार पर ठोस प्रदार्थ को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है-
- क्रिस्टलीय ठोस
- अक्रिस्टलीय ठोस
1. क्रिस्टलीय ठोस-
वे ठोस जिनमें अवयवी कणो (जैसे अणु, परमाणु) का नियमित क्रम होता है क्रिस्टलीय ठोस कहलाते है। क्रिस्टलीय ठोस के निम्न गुण होते है।
- इनकी निश्चित ज्यामिति होती है।
- इन कणो के मध्य यथेष्ठ आकर्षक बल होता है।
- ये बल वाण्डर बल, स्थिर वैधुत आकर्षक बल, सहसंयोजक बन्ध या धात्विक बन्ध होते है।
- इनका गलनांक निश्चित होता है।
- ये विषम देशिक होते है।
उदाहरण- सामान्य लवण, ग्रेफाइट, हीरा, क्वार्ट्ज, कैल्साइट आदि क्रिस्टलीय ठोस के उदाहरण हैं।
2. अक्रिस्टलीय ठोस –
अक्रिस्टलीय ठोस में अवयवी कणों (परमाणुओं, अणुओं अथवा आयनों) की कोर्इ क्रमबध्द संरचना नहीं होती। इनके गुणनिम्नलिखित हैं-
- इनकी कोर्इ निश्चित ज्यामिति नहीं होती।
- यह ठोस समदैषिक (Isotropic) होते हैं। अर्थात् भौतिक गुण सभी दिशाओं में समान होता है।
- इन पदार्थो में कछु सीमा तक सपींडय्ता तथा दृढ़ता भी पार्इ जाती हैं।
- इनका निश्चित गलनांक भी नहीं होता है।
उदाहरण- काँच, सिलिका, प्लास्टिक आदि।
क्रिस्टलीय ठोसों का वर्गीकरण
(क) अवययी कणों के मध्य बन्धों के अनुसार वर्गीकरण –क्रिस्टलीय ठोस में उसके अवयवी कणों के मध्य उपस्थित वन्धों के अनुसार उन्हें चार वर्गो में बाँटा गया है-
- उच्च जालक उर्जा
- दृढ़,
- उच्च गलनांक तथा क्वथनांक,
- सभी धुव्रीय विलायकों में विलेय,
- वाश्प दाब नगण्य,
- ठोस अवस्था में कुचालक तथा विलयन या गलित अवस्था में सुचालक।
उदाहरण- NaCl, NaNO3, Na2SO4 आदि।
- दृढ़ तथा उच्च गलनांक,
- कुचालक (ग्रेफाइट को छोड़कर ),
- सभी विलायकों में अविलेय,
- वाश्प-दाब नगण्य होता है।
उदाहरण- हीरा, ग्रेफाइट, SiO2, SiC आदि।