अनुक्रम
क्रीमिया युद्ध के कारण
1. नेपोलियन की महत्वाकांक्षा-
2. नेपोलियन एवं निकोलस का द्वेष-
3. निकोलस की स्वार्थपूर्ण योजना-
4. तुर्की की निर्बलता-
5. पवित्र स्थानों के लिए झगड़े-
6. रूस के संरक्षण की अस्वी ति-
7. रूस का मॉलडेविया व वैलेसिया पर अधिकार-
8. तुर्की द्वारा मॉलडेविया व बैलेसिया की माँग-
युद्ध की प्रमुख घटनायें
क्रीमिया के युद्ध की घटनाओं को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है -1. 1853 से 1854 र्इ. तक, जब युद्ध में केवल रूस और तुर्की थे। 2. 1854 र्इ. से 1856 र्इ. तक, जब युद्ध में अन्य देश भी सम्मिलित हो गये।
1. प्रथम भाग (1853 से 1854 र्इ. तक)
23 अक्टूबर, 1853 से 28 मार्च, 1854 र्इ. तक केवल तुर्की और रूस में युद्ध हुआ। युद्ध की घोषणा करने के बाद तुर्की ने डेन्यूब नदी के तट पर स्थित रूसी सेनाओं पर आक्रमण कर दिया। 30 नवम्बर, 1853 र्इ. को तुर्की का एक जहाजी बेड़ा बातूम की ओर जा रहा था तब रूस के एक जहाजी बडे ने उससे युद्ध करके उसके सब मनुष्यों का पूर्ण विनाश कर दिया।
2. अन्य देशों का युद्ध में प्रवेश
सिनोप में तुर्की बेड़े के विनाश के समय इंग्लैण्ड और फ्रांस का सम्मिलित बेड़ा कुस्तुनतुनिया में था। रूस द्वारा तुर्की बेड़े का विनाश फ्रासं ओर इंग्लैण्ड को युद्ध की चनु ातै ी जान पड़ी। इन दोनों देशों में सिनीप में की गर्इ तुर्कियों की सामूि हक हत्या से बड़ा राष्े ा फैला। अत: दाने ों देशांे के सम्मिलित बडे को काला सागर में प्रवेश करने की आज्ञा दी गर्इ। आस्ट्रिया ने उनको सभी प्रकार की सहायता देने का आश्वासन दिया। फलस्वरूप फ्रांस और इंग्लैण्ड ने 27 फरवरी, 1854 र्इ. को रूस से मॉलडेबिया और वैलेसिया खाली करने के लिए कहा। रूस द्वारा इस माँग को अस्वीकार किये जाने पर 27 और 28 मार्च; 1854 को इन देशांे ने रूस के विरूद्ध घाेि “ात कर दिया।
3. द्वितीय भाग (1854-1856 र्इ. तक)
अपने विरूद्ध यूरोप के शक्तिशाली देशों को युद्ध के लिये तैयार देखकर रूस ने मॉलडेविया और बैलेसिया के प्रदेशों को खाली कर दिया। इस प्रकार युद्ध और उसकी घोषणा का उद्देश्य पूर्ण हो गया, पर फिर भी युद्ध हुआ। ब्रिटिश सेना, लार्ड रेगलन और फ्रांसीसी सेना, मार्शल सन्े ट एरेनॉड की अधीनता में 14 सितम्बर, 1854 की क्रीमिया पहुँची दोनों देशों की सम्मिलित सेनाओं ने ‘आल्मा के युद्ध’ में रूसी सेना को परास्त किया। इसके बाद बेलाक्लावा में रूस के विरूद्ध युद्ध हुआ। शीत ऋतु होने के बाद कारण मित्र राष्ट्रों के सैनिकों को अकथनीय कष्ट झेलने पड़े। उनमें 9 हजार शीत के कारण और 13 हजार विभिé रोगों से मर गये। अंतत: मित्र राष्ट्रों ने रूस पर विजय प्राप्त की। उनकी इस विजय ने रूस को बिल्कुल नि:शक्त कर दिया। अत: उसने 20 मार्च, 1856 र्इ. को ‘पेरिस की संधि’ स्वीकार कर ली।
4. पेरिस की संधि
1856 की पेरिस की संधि की प्रमुख धारायें निम्नांकित थीं –
- रूस और तुर्की द्वारा एक दूसरे के जीते गये प्रदेशों को वापिस कर दिया जाय।
- रूस के सेबस्टोपोल के दुर्ग को पुन: निर्माण करने की आज्ञान दी जाय।
- डारडेनेल्स में तुर्की के अलावा और किसी देश के युद्ध पोतों को प्रवेश करने की आज्ञा न दी जाय। इसके विपरीत, सब राष्ट्रों के व्यापारिक जहाजों को उसमें प्रवेश करने का अधिकार दिया जाय।
- रूस और तुर्की को काला सागर में जहाजी बेड़ा रखने की आज्ञा न दी जाय।
- मॉलडेविया, वैलेसिया और सर्बिया को तुर्की के सुल्तान के नाम मात्र के संरक्षण में पूर्ण रूप से स्वतंत्र कर दिया जाय।
- डेन्यबू नदी में सभी देशों के जहाजों की चलने की अनुमति दी जाय।
- तुर्की और आस्ट्रिया को श्ब्वदबमतज व िम्नतवचमश् का सदस्य बनाया जाय।
- फ्रांस और इंग्लैण्ड द्वारा भविष्य में नार्वे और स्वीडन की रूस के आक्रमण से रक्षा की जाय।
- रूस को तुर्क के यूनानी र्इसाइयों पर किसी प्रकार का संरक्षण न दिया जाय। 10. तुर्की के सुल्तान द्वारा अपनी र्इसार्इ प्रजा की दशा में सुधार किया जाय।
युद्ध के परिणाम
क्रीमिया के युद्ध के परिणाम एवं प्रभाव निम्नलिखित हैं।
1. फ्रांस एवं इंग्लैण्ड की भिéता
इस युद्ध का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि इंग्लैण्ड और फ्रांस में मित्रता स्थापित हो गयी। नेपोलियन तृतीय महत्वकांक्षी होने के कारण युद्ध की खोज कर रहा था और इंग्लैण्ड नेपोलियन बाने ापार्ट के समय जसै ा युद्ध नहीं चाहता था। अत: दाने ों देशांे में मित्रता हो जाने से स्पष्ट रूप से नेपोलियन तृतीय की महत्वाकाक्षा पर अंकुश लग गया और यूरोप उस शक्तिशाली सम्राट के युद्धों द्वारा किये जाने वाले विनाश से बच गया।
नेपोलियन तृतीय जानता था कि इंग्लैण्ड और तुर्की को एक साथ ही अपना शत्रु बना लेना उसके लिये हितकर नहीं होगा। अत: वह इंग्लैण्ड की मित्रता का अत्यधिक इच्छुक था। पामस्र्टन भी समझता था कि फ्रांस से मित्रता करके रूस की साम्राज्य प्रसार की इच्छा को रोका जा सकता था। इन परिस्थितियों के कारण फ्रांस और इंग्लैण्ड-दोनों ने एक-दूसरे की ओर मित्रता का हाथ बढ़ाया और वे मैत्री के अटूट संबंध में आबद्ध हुए।
2. सैनिक संगठन की कमियाँ
क्रीमिया के युद्ध ने ब्रिटिश सेना के संबंध में दो तथ्यों को स्पष्ट किया। प्रथम तथ्य यह था कि उसके सैनिक वीर, साहसी एवं कर्त्तव्य पराण थे। दूसरी यह कि उसके सेनापति पूर्णरूप से अयोग्य थे, उनमें सैनिक संगठन और संचालन की क्षमता नहीं थी और वे सैनिकों के लिये भोजन तथा औषधि का प्रबंध नहीं कर सकते थे। ऐसा न कर सकने के कारण अंग्रेज सैनिक भूख और बीमारी से मर गये। इन मरने वाले याग्े य सैनिकों के स्थान पर इंग्लैण्ड से भजे े जाने वाले अनुभवहीन सैनिक, ‘रेडान के युद्ध’ में विजय प्राप्त नहीं कर सके, जिससे इंग्लैण्ड के सैनिक सम्मान को बहुत ठेस पहुँची और जो यश उसने ऐल्मा और इंकरमेन की विजयों द्वारा प्राप्त किया था, नष्ट हो गया।
3. सेना सुधार
क्रीमिया के युद्ध की अव्यवस्था ने इंग्लैण्ड के सभी नागरिकों और प्रशसं कों का ध्यान सेना सुधार की ओर आकषिर्त किया। वाटरलू के युद्ध के बाद उन्होने अपनी सेना को पूर्णत: विस्मतृ कर दिया था और उनका प्रयास केवल यह था कि सेना पर कम व्यय किया जाये। सेना के प्रति अपनी उदासीनता का परिणाम उन्होंने क्रीमिया युद्ध में देखा। उन्होंने देखा कि वैलिंगटन की जिस सेना ने नेपोलियन महान को परास्त किया था, उसमें पहले जैसी याग्े यता नहीं थी। अत: देश के काने े-काने े से सेनापतियों की आलाचे ना की गर्इ तथा सैनिक सुधार की माँग की गर्इ।