अनुक्रम
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस के कारण
शरीर की गलत मुद्रा अपनाकर कार्य करने से रीढ की उपरोक्त कशेरुकाओं पर नकारात्मक प्रभाव पडता है तथा यह रोग उत्पन्न होता है। इसी प्रकार लम्बे समय तक झुककर बैठने से भी यह रोग उत्प्पन्न होता है। टेढे-मेढे होकर सोने, अधिक गहरे व लचीले गद्दों पर सोने एवं सोते समय मोटे तकिये को सिराहने के रुप में प्रयोग करने की आदत भी इस रोग को जन्म देती है। सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग के कुछ प्रमुख एवं महत्वपूर्ण कारण इस प्रकार है-
- सोने में मोटा तकिया अथवा अधिक मोटे फोम के गद्दों का प्रयोग करना (Older Age) : बिना तकिया के प्रयोग किए हुए सीधे तक्त पर सोने से रीढ एवं मस्तिष्क से निकलने वाली तंत्रिकाएं अपनी सही स्थिति में रहती हैं किन्तु इसके विपरित सोने में अधिक मोटे तकिया का प्रयोग करने तथा मोटे, गहरे फोम अथवा डनलफ के गद्दों का प्रयोग करने से रीढ की कशेरुकाओं की स्थिति पर नकारात्मक प्रभाव पडता है, इसके साथ साथ मस्तिष्क से निकलने वाली तंत्रिकाएं पर भी कशेरुकाओं का अतिरिक्त दबाव पडने लगता है। इससे प्रारम्भ में गर्दन दर्द एवं सिर दर्द प्रारम्भ होता है जो आगे चलकर रोग का रुप ग्रहण कर लेता है।
- गलत शारीरिक मुद्राएं ( Wrong body Postuer) : मानव शरीर र्इश्वर की एक ऐसी अद्भुत कृति है जो आज भी वैज्ञानिकों की समझ से परे है। इसके अतिरिक्त संसार के अन्य प्राणियों से भिन्न दो पैरों पर खडे होकर चलने एवं कार्य करने की विलक्षण प्रतिभा भी परमात्मा ने मनुष्य को ही प्रदान की है। वैज्ञानिक अथक प्रयासों के बाद भी आज तक मानव शरीर के जैसा नमूना नही बना पाएं हैं। इस शरीर को सही प्रकार प्रयोग करने अर्थात इसके द्वारा कार्य करने से यह लम्बे समय तक कार्य करने में सक्ष्म बना रहता है किन्तु इस शरीर को गलत मुद्रा में रखकर कार्य करने से इसमें विकार अर्थात रोग उत्पन्न होने लगते है। सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की उत्पत्ति में भी शरीर की गलत मुद्राएं एक महत्वपूर्ण कारण हैं। झुककर बैठने, झुककर खडा रहने, कमर झुकाकर पढने, टी0वी0 देखने अथवा कम्पयूटर आदि पर कार्य करने से एवं कन्धें के सहारे मोबार्इल फोन रखकर लम्बे समय तक बात करने के कारण सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग रोग उत्पन्न होता है। गलत मुद्रा में सिर पर अधिक वजन उठाकर चलने अथवा एक हाथ से अधिक वजन उठाने का रीढ की कशेरुकाओं पर दुष्प्रभाव पडता है और इस रोग की संभावना बढ जाती है। प्रतिदिन काफी अधिक समय तक लेटकर टी0बी0 देखने अथवा पत्र-पत्रिकाओं को पढने से भी जन्म लेता है। इस प्रकार शरीर की गलत मुद्राएं इस रोग की उत्पत्ति के महत्वपूर्ण कारण हैं।
- अनियमित दिनचर्या ( Inactive or Sedentory life style) : रात्रि में देर तक जागना, सुबह देरी तक सोने की अनियमित दिनचर्या से शरीर की अस्थियों (रीढ की कशेरुकाओं ) में कडापन आता है। इसके अतिरिक्त असमय पर पोषक तत्वों से विहीन आहार करने से भी रीढ एवं शरीर की तंत्रिकाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है जिससे इस रोग के उत्पन्न होने की संभावना बढती है। दिनचर्या में श्रम का पूर्ण अभाव अथवा एक स्थान पर अधिक समय तक एक मुद्रा में बैठकर कार्य करने से भी इस रोग की संम्भावना बढ जाती है।
- अत्यधिक श्रम एवं विश्राम का अभाव ( More hard work without taking rest) : अत्यधिक शारीरिक श्रम करने से रीढ की कशेरुकाओं में कडापन बढता है तथा बीच में विश्राम नही करने के कारण रीढ के आकार में विकृति उत्पन्न होने लगती है जो आगे चलकर सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग को जन्म देता है।
- रीढ में झटका अथवा चोट लगना (Jerk or injury of spine) : चलते समय ठोकर लगने के कारण अथवा गाडी में सफर करते समय रीढ में अचानक झटका लगने के कारण भी यह रोग उत्पन्न होता है। किसी कार्य करते समय बार बार रीढ में चोट लगने के कारण भी सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग पैदा होता है।
- काम का अधिक बोझ एवं तनाव (Work load and Stress) : काम का अधिक बोझ एवं तनाव इस रोग की उत्पत्ति के महत्वपूर्ण कारण हैं। अधिक काम का बोझ, अधिक समय तक की लम्बी ड्रार्इविंग से यह रोग जन्म लेता है। इसके अतिक्ति मानसिक तनाव से भी यह रोग बढता है।
- र्दुव्यसन ( bad habbits) : धूम्रपान करने की आदत अथवा एल्कोहल सेवन करने से अस्थियों पर नकारात्मक प्रभाव पडता है, जिसके कारण इस रोग की संम्भावना बढ जाती है। अधिक समय तक धूम्रपान हड्डियों को कमजोर बनाता है जिसके कारण कमर दर्द एवं सर्वाइकल दर्द की संभावना बढ जाती है। इसी प्रकार तम्बाकू, गुटका, पान मसाले के सेवन से भी यह रोग उत्पन्न होता है।
- बढती उम्र (Age Factor) : मानव शरीर एक प्रकार का उपकरण ही है जिस पर समय का प्रभाव पडना स्वाभाविक ही है। जिस प्रकार लगातार कार्य करते रहने से पुराना होकर उपकरण कमजोर हो जाता है, ठीक उसी प्रकार लगातार कार्य करते रहने के कारण इस शरीर रुपी उपकरण में भी विकृतियां उत्पन्न होती हैं। इन विकृतियों में ही एक विकृति सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग है जिसमें रीढ की अस्थियों के जोडों के मध्य उपस्थित गद्दियां घिस जाती हैं और गर्दन में ऐठन व दर्द उत्पन्न होने लगता है इसीलिए 40 वर्ष की आयु के उपरान्त इस रोग की संभावना बढ जाती है।
- यौगिक क्रिया नही करने के कारण ( No Practice of Yoga) : यौगिक क्रियाएं जैसे “ाट्कर्म, आसन, मुद्रा-बंध, प्राणायाम एवं ध्यान आदि नही करने के कारण शरीर में एक और जहां वात, पित्त एवं कफ दोंषों की विषमता बढती है वहीं दूसरी और शरीर की अस्थियों अर्थात रीढ की कशेरुकाओं में भी कडापन आता है। इसके साथ साथ रीढ की कशेरुकाओं की चाल (Movement) कम होता है। रीढ की इन कशेरुकाओं में लचीलापन के स्थान पर कडापन होने एवं चाल कम के कारण सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग उत्पन्न होता है।
- अनुवांशिक एवं जन्मजात कारण (Genetic or Heritable Factor) : परिवार के अन्य सदस्यों के सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग से ग्रस्त होने पर आगे की पीढी में भी रोग की संभावना अधिक हो जाती है। इसके साथ साथ जन्मजात कारक अथवा सिण्ड्रोम (Down Syndrome, Cerebral palsy, Congenital fused spine) भी सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग को उत्पन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
इस प्रकार उपरोक्त दस महत्वपूर्ण कारणों में से किसी एक अथवा अधिक के कारण शरीर सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग से ग्रस्त हो जाता हैै किन्तु अब यह प्रश्न आता है कि यह कैसे पहचाना जाए कि यह व्यक्ति सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग से ग्रस्त है ? अथवा दूसरे शब्दों में इस रोग से ग्रस्त होने पर शरीर में क्या क्या लक्षण प्रकट होते हैं ? अत: अब हम सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग के लक्षणों एवं आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में होने वाली जाँचों ( Diagnosis) पर विचार करते हैं –
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग के लक्षण
शोध अनुसन्धान में यह तथ्य स्पष्ट होता है कि सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग से ग्रस्त रोगियों की संख्या महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक होती है अर्थात यह रोग महिलाओं की तुलना में पुरुषों में अधिक पाया जाता है जिसके शरीर में लक्षण प्रकट होते हैं –
- गर्दन में त्रीव वेदना एवं जकडन के साथ गर्दन का जाम हो जाना : गर्दन में त्रीव वेदना एवं जकडन के साथ गर्दन का जाम होना इस रोग का वह मूल लक्षण है जिसके आधार पर इस रोग जाना एवं पहचाना जाता है। रोग से ग्रस्त रोगी की गर्दन में ऐसी त्रीव वेदना होती है जिस पर दर्दनिवारक दवार्इयों का प्रयोग प्रभावहीन सिद्ध होता है। इसके साथ साथ गर्दन में जकडन गंभीर रुप धारण करने लगती है जिस कारण गर्दन का दायें और बांए घूमना बंद सा हो जाता है। रोगी व्यक्ति गर्दन को पूर्ण रुप से सीधी रखने पर ही कुछ आराम की अनुभूति करता है और इसीलिए वह अपनी गर्दन को असामान्य रुप से सीधी अवस्था में रखने का प्रयास करता है। सोने के उपरान्त रोगी के गर्दन में जकडन और अधिक बढ जाती है।
- इन्द्रिय बोध कम होना : सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग मस्तिष्क से आने वाली तन्त्रिकाओं पर दबाव आ जाता है जिसके कारण रोगी को इन्द्रिय ज्ञान अथवा इन्द्रिय ज्ञान कम हो जाता है। इसके साथ साथ तंत्रिकाओं में कमजोरी तथा सनसनी होना भी इस रोग के लक्षण हैं। इस रोग से ग्रस्त रोगी को हाथ से लिखनें में भी कठिनार्इ का अनुभव होने लगता है।
- कन्धों में दर्द और जकडन के साथ हाथों व अंगुलियों में सुन्नपन होना : बिना कोर्इ चोट लगे कन्धों एवं हाथों में दर्द एवं भारीपन होना सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग के लक्षण हैं। इस रोग में कन्धों में दर्द एवं जकडन हाथों की और बढने लगती है। यदि रोगावस्था लम्बे समय तक बनी रहें तो हाथों में जकडन बढती हुर्इ की अंगुलियों में सुन्नपन आने लगता है।
- कमर दर्द के साथ आगे को झुकने में त्रीव दर्द होना : सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को कमर में दर्द रहता है और आगे की और झुकने में यह दर्द बढने लगता है। आगे की और झुककर कार्य करने अथवा गलत मुद्रा में कार्य करने यह दर्द और अधिक त्रीव और असहनीय हो जाता है।
- आंखों के सामने अंधेरा छाते हुए चक्कर आना एवं सिर दर्द रहना : चूंकि इस रोग में मस्तिष्क से आने वाली नाडी पर दबाव आ जाता है जिसके कारण रोगी की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगता है और रोगी को चक्कर आने लगते हैं। इस रोग में रोगी के सिर में दर्द रहना प्रारम्भ हो जाता है
- गर्दन दर्द के कारण अनिन्द्रा उत्पन्न होना : सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को प्रतिक्षण गर्दन में त्रीव वेदना रहती है जिसके कारण अनिन्द्रा रोग उत्पन्न हो जाता है। गर्दन दर्द के कारण रोग से पिडित व्यक्ति शारीरिक श्रम करने में असमर्थ हो जाता है तथा अधिक समय तक बिस्तर में लेटे रहने से उसे बैचेनी और अनिन्द्रा दोनों ही मानसिक व्याधियां घेर लेती हैं।
यद्यपि उपरोक्त लक्षणों के आधार पर भी सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की पहचान की जा सकती है किन्तु आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इस रोग की जॉच निम्न परीक्षणों के आधार पर की जाती है-
- गर्दन का X- ray : इसमें गर्दन पर X- ray : डाली जाती है जिसके द्वारा गर्दन की कशेरुकाओं की स्थिति स्पष्ट की जाती है। कशेरुकाओं में उभरे हुए उकसान स्पोन्डिलाइटिस रोग को प्रर्दशित करतें हैं।
- M.R.I. ( Magnetic Resonance Imaging): X- तंल की तुलना में M.R.I. के द्वारा रोग की स्थिति अधिक स्पष्ट हो जाती है। इस प्रविधि में कशेरुकाओं की स्थिति एवं तंत्रिकाओं की स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाती है तथा यह भी पता चल जाता है कि नाडियों पर दबाव पड रहा है अथवा नही।
- E.M.G. ( Electromyelography): E.M.G. के द्वारा यह स्पष्ट किया जाता है कि तंत्रिकाओं अथवा नाडियों को कितनी हानि पहुॅची है।
- C.T. Scan: कम्प्यूटराइज टोमोग्राफी स्केन द्वारा गर्दन की छवि लेकर रोग को स्पष्ट किया जाता है।
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग सें सम्बन्धित उपरोक्त तथ्यों को जानने एवं समझाने के बाद अब आपके मन में निष्चित ही इस रोग की चिकित्सा को जानने की जिज्ञासा अवश्य ही उत्पन्न हुर्इ होगी। इस रोग में प्राय: रोगी दर्दनिवारक दवार्इयों का सेवन करता है किन्तु रोगी के दर्द में इन दवार्इयों से कोर्इ प्रभाव नही पडता है अपितु इस रोग में वैकल्पिक चिकित्सा द्वारा रोगी का चिरकालिक अथवा स्थार्इ लाभ प्राप्त होता है अत: अब सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की वैकल्पिक चिकित्सा पर विचार करते हैं –
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस की वैकल्पिक चिकित्सा
1. सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की योग चिकित्सा
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग में योग चिकित्सा अत्यन्त प्रभावी सिद्ध होती है। इसमें यौगिक क्रियाओं जैसे षट्कर्म, आसन, मुद्रा बन्ध, प्रत्याहार, प्राणायाम, ध्यान एवं समाधि के द्वारा रोग का उपचार किया जाता है। सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की योग चिकित्सा इस प्रकार है –
- षट्कर्म का प्रभाव : यद्यपि षट्कर्मों की छह क्रियाओं का इस रोग पर प्रत्यक्ष प्रभाव नही पडता है किन्तु धौति, बस्ति, नेति, नौली, त्राटक एवं कपालभाति नामक षट्कर्मों का रोग की स्थिति एवं रोगी की क्षमतानुसार अभ्यास कराने से रोगी के शरीर का शोधन अवश्य होता है। जिसके परिणाम स्वरुप शरीर में हल्कापन आता है और रोग की त्रीवता कम होती है।
- आसन का प्रभाव : सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग अस्थि संस्थान से जुडा रोग है जिसे दूर करने में आसनों का अभ्यास एक महत्वपूर्ण भूमिका का वहन करता है। इस रोग से ग्रस्त रोगी को आसनों का अभ्यास बहुत धीरे धीरे एवं अत्यन्त सावधानीपूर्वक कराना चाहिए। विशेष रुप से रोगावस्था मे गर्दन को आगे की और झुकाने वाले अभ्यासों (Foreward bending) को पूर्णतया निषेध रखना चाहिए इसके अतिरिक्त रोग की त्रीव अवस्था में रोगी को कठिन आसनों के स्थान पर हल्के सुक्ष्म अभ्यास ही कराने चाहिए। सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को सन्धि संचालन के सुक्ष्म अभ्यासों से प्रारम्भ कराते हुए धीरे धीरे आसनों का अभ्यास कराना चाहिए। रोगी को प्रमुख रुप से गर्दन एवं कन्धों व हाथों को गतिशील बनाने वाले सन्धि संचालन के सुक्ष्म अभ्यासों पर विशेष ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। रोगी को यह अभ्यास नियमित रुप से प्रात: और सांयकाल दोनों समय कराने से रोग में लाभ प्राप्त होता है। रोग की त्रीवता कम होने पर रोगी को आसनों के क्रम पर लाते हुए अभ्यासों से ही करना चाहिए। रोगी को सर्पासन, भुजँगासन, मकारासन, मरकटासन, शलभासन, धनुरासन, मत्स्यासन, उष्ट्रासन, अर्द्धचन्द्रासन एवं शवासन आदि इस प्रकार के आसनों का अभ्यास कराना चाहिए जिनसे मेरुदण्ड में लचीलापन उत्पन्न हो। रोगी को नियमित रुप से मरकटासन के अलग अलग प्रकारों का अभ्यास रोगी को नियमित रुप से कराने से रोग में लाभ मिलता है। इन आसनों के साथ साथ प्रत्येक आसन में शवासन एवं योग निन्द्रा का अभ्यास कराने से भी रोग में लाभ प्राप्त होता है।
- मुद्रा एवं बन्ध का प्रभाव : मुद्राओं एवं बन्धों का अभ्यास कराने से रोगी के शरीर में प्राण तत्व का विस्तार होता है एवं अस्थियां व माँसपेशियां मजबूत बनती हैं। अत: रोगी को उसकी स्थितिनुसार बन्धों एवं काकी, शाम्भवी व महामुद्राओं आदि मुद्राओं का अभ्यास कराना चाहिए।
- प्रत्याहार का प्रभाव : इन्द्रिय संयम के साथ साथ अनुशासन पालन करने से रोग समूल नष्ट होता है। प्रत्याहार पालन के अन्र्तगत रोगी अपनी इन्द्रियों पर संयम करते हुए खानपान एवं बुरी आदतों पर नियंत्रण करता है जिससे रोग स्वत: ही ठीक होने लगता है।
- प्राणायाम का प्रभाव : रोगी को नाडी शोधन, अनुलोम विलोम, उज्जायी एवं भ्रामरी आदि प्राणायामों का नियमित अभ्यास कराने से लाभ मिलता है। प्राणायाम का अभ्यास कराने से मेरुदण्ड एवं अन्य सम्बन्धित नाडियों में प्राण तत्व का विस्तार होता है जिससे रोग दूर होता है।
- ध्यान एवं समाधि का प्रभाव : ध्यान एवं समाधि के अन्र्तगत रोगी अपने मन से नकारात्मक विचारों एवं भावों को दूर करता हुआ सकारात्मक विचारों एवं भावों का चिन्तन करता है जिसका रोग पर सीधा प्रभाव पडता है। सर्मपण भाव, दृढ इच्छाशक्ति एवं शुभ संकल्पों को धारण से रोगी की आन्तरिक प्रतिरोधक क्षमता एवं जीवनी शक्ति तेजी से विकसित होती है जिससे यह रोग समूल नष्ट होता है।
इस प्रकार योग चिकित्सा के द्वारा सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग का दुष्प्रभावरहित उपचार किया जाता है। इसके साथ साथ प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा भी इस रोग भी इस रोग में प्रभावी रुप से कार्य करती है। सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की प्राकृतिक चिकित्सा इस प्रकार है –
2. सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की प्राकृतिक चिकित्सा
प्राकृतिक चिकित्सा में मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तत्व का प्रयोग निम्न लिखित रुप से करने से रोगी को लाभ प्राप्त होता है-
- मिट्टी तत्व चिकित्सा : रोगी को पेट के साथ साथ गीली मिट्टी की पट्टी देने से पेट का शोधन होता हैं। जिससे शरीर में वात दोष शान्त होता है एवं वात व्याधियां दूर होती हैं। इस रोग में रीढ पर गर्म मिट्टी की पट्टी का प्रयोग करने से दर्द में आराम मिलता है।
- जल तत्व चिकित्सा : सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग में जल तत्व का प्रयोग विशेष लाभ प्रदान करता है। रोग की त्रीवावस्था में गर्म जल से सिकार्इ (रबर की बोतल में गर्म जल भरकर) करने से रोगी को दर्द में शीघ्र लाभ मिलता है। रोगी को सम्पूर्ण शरीर का भाप स्नान देने के अतिरिक्त नियमित रुप से स्थानीय भाप (कमर एवं कन्धों पर) रोग में स्थार्इ लाभ प्राप्त होता है। इस रोग में गर्म बाह स्नान (Hot Arm Bath) भी लाभकारी प्रभाव रखता है। रोगी को वात दोष का शमन करने वाले औषध गुणों से युक्त द्रव्यों से एनीमा देने से भी रोग में लाभ मिलता है।
- अग्नि तत्व चिकित्सा : सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को सूर्य स्नान देने से रोग में लाभ मिलता है। इसके साथ साथ नारंगी रंग की बोतल में आवेशित जल का सेवन रोगी को कराने एवं लाल अथवा नारंगी रंग के प्रकाश अस्थियों पर डालने से रोग ठीक होता है।
- वायु तत्व चिकित्सा : सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग अत्यन्त सावधानीपूर्वक हल्के हाथों से मालिश करने से तुरन्त आराम मिलता है किन्तु यहाँ पर अत्यन्त महत्वपूर्ण ध्यान देने का तथ्य यह है कि रोगी को गहरी अथवा अवैज्ञानिक रुप से मालिश करने से रोगी के दर्द तुरन्त बहुत अधिक बढ जाता है।
- आकाश तत्व चिकित्सा : सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को छोटे उपवास अथवा कल्प कराने से रोग में लाभ मिलता है। इसके साथ साथ प्रार्थना एवं सकारात्मक भावों से रोग समूल दूर होता है।
इस प्रकार प्राकृतिक चिकित्सा से सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को लाभ प्राप्त होता है। अब वैकल्पिक चिकित्सा के अन्र्तगत आयुर्वेद चिकित्सा पर विचार करते हैं –
3. सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की आयुर्वेद चिकित्सा
आयुर्वेद शास्त्र में सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को शिलाजीत, चन्द्रप्रभावटी एवं त्रियोदषाम गुग्गुल नामक औषधियों के सेवन का निर्देश दिया जाता है। सामान्य रुप से सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को 1 से 3 ग्राम की मात्रा में पीसी हल्दी का चूर्ण एवं सौंठ समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम नियमित सेवन कराने से दर्द एवं रोग में लाभ प्राप्त होता है।
रोगी को अत्यन्त सावधानीपूर्वक बहुत हल्के हाथों से एवं वैज्ञानिक ढंग से महानारायण तेल से मालिश करने से दर्द में आराम मिलता है। किन्तु रोगी को गहरी अथवा अवैज्ञानिक ढंग से मालिश करने से दर्द तुरन्त एवं तेजी से बढ जाता है। त्रिफला चूर्ण का सेवन कराने से भी सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को लाभ प्राप्त होता है। रोगी को रात्रिकाल में एक चम्मच चूर्ण गुनगुने दूध के साथ अथवा प्रात:काल खाली पेट एक चम्मच चूर्ण गर्म पानी के साथ सेवन कराना चाहिए। रोगी को एलोविरा के जूस का सेवन भी लाभकारी होता है। रोगी को चार चार चम्मच जूस प्रात:-सांय दोनों समय पिलाने से रोग में आराम मिलता है।
4. सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोग की आहार चिकित्सा
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को आहार पर विशेष नियंत्रण रखने की आवश्यक्ता होती है। रोगी को शुद्ध सात्विक हल्का एवं सुपाच्य आहार देने से शरीर की पूरी जीवनी शक्ति रोग को दूर करने में लग जाती है जिससे रोग शीघ्रता से दूर होता है। कैल्शियम की कमी भी अस्थि तंत्र के रोगों का मूल कारण होता है अत: रोगी को कैल्शियम युक्त पदार्थो का अधिक से अधिक सेवन कराना चाहिए। रोगी को निम्न लिखित पथ्य और अपथ्य आहार पर ध्यान देना चाहिए –
- पथ्य आहार – दूध, दही, मठ्ठा, मख्खन, पनीर, अखरोट, बादाम, चना, चौकरयुक्त आटा, सन्तरा, मौसमी, हरी पत्तेदार सब्जियां विशेष रुप से करेला, मौसमी फल सलाद एवं पोषक तत्वों से युक्त पौष्टिक आहार रोगी के लिए पथ्य है। इसके साथ साथ रोगी के लिए बिना फ्रार्इ किया हुआ उबला आहार पथ्य है।
- अपथ्य आहार – नमक, चीनी, चाय, कॉफी, सोफ्ट व कोल्ड डिंक्स जैसे पैप्सी व कोक, एल्कोहल, तला भुना चायनीज फूड, फास्ट फूड, जंक फूड, खट्टी दही, बासी, रुखा एवं पोषक तत्व विहीन भोजन रोगी के लिए अपथ्य है। विशेष रुप से रोगी को खट्टे एवं अम्लीय पदार्थों का सेवन पूर्ण रुप से त्याग देना चाहिए।
इस प्रकार उपरोक्त पथ्य एवं अपथ्य आहार के अनुसार रोगी को आहार कराने से रोग में अत्यन्त सरलता, सहजता एवं शीघ्रतापूर्वक लाभ प्राप्त होता है।
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी के लिए सावधानियां एवं सुझाव
- सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को गर्दन में अधिक दर्द अथवा रोग की गंभीर अवस्था में गर्दन को अधिक से अधिक सीधा एवं स्थिर रखने हेतु गर्दन में बैल्ट का प्रयोग करना चाहिए।
- रोग की त्रीव अवस्था में गर्दन को कम से कम गतिमान करते हुए अधिकतम समय तक गर्दन को सीधा रखकर आराम देना चाहिए।
- सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को कभी भी गर्दन अथवा कमर झुकाकर अधिक देर तक कार्य नही करना चाहिए।
- सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को सोते समय तकिया का प्रयोग पूर्ण रुप से छोड देना चाहिए।
- सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को अपने सभी कार्य सही मुद्रा में करने चाहिए तथा आगे की ओर झुककर करने वाले कार्यों को अधिक समय तक नही करने चाहिए।
- सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को टी0 वी0 अथवा कम्पयूटर का स्थान ऊँचार्इ पर रखना चाहिए।
- सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रोगी को नियमित रुप से प्रात:काल गर्दन के सुक्ष्म अभ्यास अवश्य करने चाहिए। इस प्रकार उपरोक्त सावधानियों को ध्यान में रखने से रोग जल्दी ठीक होता है।