अनुक्रम
- जटिल मानसिक अवस्था है जिसमें शारीरिक व मानसिक पक्षों का समावेश होता है।
- किसी व्यक्ति, वस्तु एवं स्थिति के सम्बन्ध में सुख-दुख की अनुभूति कम या अधिक मात्रा में होती है।
- संवेग की अवस्था में आंगिक प्रक्रियाओं जैसे नाड़ी, श्वसन, ग्रन्थिस्त्रावों का एक विसरित उद्दीपन होता है।
- व्यक्ति की चिन्तन एवं तर्क शक्ति क्षीण हो जाती है।
- व्यक्ति आवेगी बल का अनुभव करता है।
संवेगो के विकास के सन्दर्भ में दो मत है-
- संवेग जन्मजात होते है इस मत को मानने वालो में वके विन तथा हांलिगवर्थ आदि है। हांलिगवर्थ का मानना है कि प्राथमिक संवेग जन्मजात होते है। वाटसन ने बाताया कि जन्म के समय बच्चे में तीन प्राथमिक संवेग भय, क्रोध व प्रेम होते है।
- संवेग अर्जित किए जाते है – कुछ मनोवैज्ञनिको का मत है कि संवेग विकास एवं वृद्धि की प्रक्रिया के दौरान प्राप्त किए जाते है। इस सम्बन्ध में हुए प्रयोग स्पष्ट करते है कि जन्म के समय संवेग निश्चित रूप से विद्यमान नही होते है। बाद में धीरे-धीरे बच्चा ऐसी निश्चित प्रतिक्रियाएँ करता है जिससे ज्ञात होता है कि उसे सुखद व दुखद अनुभूति हो रही है।
सवंगो की विशेषताएँ
- संवेगात्मक अनुभव किसी मूल प्रवृति या जैविकीय उत्तेजना से जुड़े होते है।
- सामान्यत: संवेग प्रत्यक्षीकरण का उत्पाद होते हैं।
- प्रत्येक संवेगात्मक अनुभव के दौरान प्राणी में अनेक शारीरिक परिवर्तन होते है।
- संवेग किसी स्थूल वस्तु या परिस्थिति के प्रति अभिव्यक्त किए जाते है।
- प्रत्येक जीवित प्राणी में संवेग होते है।
- विकास के सभी स्तरों में संवेग होते है और बच्चे व बूड़ो में उत्पन्न किए जा सकते है
- एक ही संवेग को अनेक प्रकार के उतेजनाओं (वस्तुओं या परिस्थितियों) से उत्पन्न किया जा सकता है
- संवेग शीघ्रता से उत्पन्न होते है और धीरे-धीरे समाप्त होते है।
बच्चो के सवंगो की विशेषताएँ
- बच्चों के संवेग थोडे़ समय के लिए होते है बच्चे अपने संवेगो की अभिव्यक्ति बाहरी व्यवहार द्वारा तुरन्त कर देते है जब कि बड़े होने पर बाहरी व्यवहार पर सामाजिक नियन्त्रण होता है।
- बच्चों के संवेग तीव्र होते है। बच्चे डर, क्रोध व खुशी आदि की अभिव्यक्ति अत्यधिक तीव्रता से करते है।
- बच्चों के संवेग अस्थिर होते है। बच्चों के संवेगो में शीघ्रता से बदलाव होता है उदाहरणार्थ अभी लड़ाई और थोड़ी ही देर में तुरन्त दोस्ती कर लेते है।
- बच्चों के संवेग बार-बार दिखायी देते है क्योकि वे अपने संवेगों को छिपाने में असमर्थ होते है। बच्चे दिन में अनेक बार गुस्सा करते है या खुश होते है।
- बच्चों की संवेगात्मक प्रतिक्रिया में भिन्नता पायी जाती है एक ही संवेग की अवस्था में प्रत्येक बच्चा अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है-
उदाहरणार्थ :- अजनबी के सामने एक बच्चा भाग जाएगा व दूसरा रोने लगेगा।
बच्चों में पाये जाने वाले संवेगात्मक ढंग
डर –प्रथम वर्ष के अन्त के पहले ही डर से सम्बन्धित उत्तेजनाएॅ बच्चे पर प्रभाव डालने लगती है। समय के साथ-साथ उन वस्तुओं की संख्या बढती जाती है जो बच्चे को डराती है। मानसिक विकास के साथ-साथ वह इस योग्य होता है कि उन वस्तुओं और व्यक्तियों को पहचान सके जो उसे डराती हैं। डर चाहे तार्किक हो या अतार्किक इसकी जड़ बच्चों के अनुभवों में होती है। छोटा बच्चा सामान्यत: जोर की आवाज, अजनबी – लोग, -जगह, -वस्तुएँ, अंधेरी जगह व अकेले रहने से डरते है। यह डर अवस्था के साथ-साथ कम हो जाता है। डर के प्रति बच्चे की प्रतिक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी शारीरिक व मानसिक दशा क्या है। यदि बच्चा थका हुआ है तो ऐसी स्थितिया डर को और बढ़ाती है। Boston ने अपने अध्ययनों में पाया कि बुद्धिमान बच्चे डर अधिक प्रदर्शित करते है क्योंकि वे खतरे की सम्भावनाओं को समझते है। डर तब उपयोगी होता है जब यह खतरे से सावधान करता है।
1. क्रोध –
2. ईर्ष्या –
- गुस्सा करना:- यह दो पक्रार से पक्रट किया जाता है –
- प्रत्यक्ष रूप से जिससे ईष्र्या होती है उसके रास्ते में मिल जाने पर उस पर प्रहार करना
- अप्रत्यक्ष रूप से जिससे ईर्ष्या होती है उसकी अनुपस्थिति में उसके बस्ते से उसकी कापी या किताब चुराना लेना।
- आत्मीकरण करना:- जिससे ईर्ष्या होती है उससे बच्चा आत्मीकरण कर लेते है।
- अधिक प्यार मिलने वाले से स्वयं को अलग करना
- दमन:- बच्चा अपनी भावनाओं को यह कहते हएु दबा देता है कि मैं परवाह नही करता
- मार्गान्तीकरण- यदि बच्चा पढने में तजे बच्चे से ईष्र्या करता है तो वह खेल में स्वयं को आगे कर लेता है।
3. हर्ष, सन्तोष एवं सुख-
ये तीनो सुखद संवेग है। इनमें मात्रा का अन्तर है। ये निश्चयात्मक संवेग है। क्योकि व्यक्ति उस परिस्थिति को स्वीकार करता है जो इस संवेग को उत्पन्न करती है। छोटे बच्चों में ये संवेग शारीरिक कष्ट न होने पर देखा जाता है। बडे बच्चों को सन्तोष व हर्ष तब होता है जब उन्हे सफलता मिलती है, दूसरें से प्रशंसा मिलती है व दूसरो से उच्चता या श्रेष्ठता का अनुभव होता है।
4. स्नेह –
5. उत्सुकता या कौतुहल-
किशोर में पाये जाने वाले संवेगात्मक व्यवहार
1. डर-
किशोर सामाजिक परिस्थितियों, अपरिचित व्यक्तियों एवं नर्इ स्थिति में जाने से डरते है। डर की अभिव्यक्ति में लिंग भेद पाया जाता है । क्योकि लड़के व लड़कियों के मूल्यों में अन्तर होता है। लड़किया व्यक्तिगत सुरक्षा को विशेष महत्व देती है इसलिए अपरिचित के सामने डरती है जबकि लड़कों में ऐसा नही पाया जाता। डर पर सामाजिक – आर्थिक स्तर का भी प्रभाव पड़ता है।
2. चिन्ता-
3. दुश्चिन्ता-
4. क्रोध-
5. ईर्ष्या-
6. जलन की भावना –
7. नाराज होना-
8. जिज्ञासा/उत्सुकुकता-
9. स्नेह-
10. दु:ख-
11. खुशी-
संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले कारक
- परिपक्वता – व्यक्ति के विकास पर संवेगात्मक विकास निर्भर करता है विशेष रूप से स्नायु तन्त्र के विकास पर। यदि Frontal Lobe को हटा दिया जाए तो संवेगों में स्थिरता नही रहती है।
- स्वास्थ्य और शारीरिक विकास – बच्चे के स्वास्थ्य, शारीरिक विकास एवं संवेगात्मक विकास में धनात्मक सहसम्बन्ध होता है। स्वास्थ्य में गिरावट से संवेगात्मक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
- बुद्धि – Hurlock ने अध्ययनों में पाया कि सामान्य व कम बुद्धि के लोगों में अपने संवेगों पर नियन्त्रण कम होता है। चूंकि बुद्धिमान व्यक्ति के पास चिन्तन व तर्क की योग्यता होती है इसलिए संवेगों पर नियन्त्रण कर लेते है।
- सीखना – व्यक्ति समाज व संस्कृति द्वारा मान्य ढंग से संवेगों को व्यक्त करना सीखता है। उदाहरण के लिए नीग्रों के डर को व्यक्त करने का तरीका भारतीयों से भिन्न प्रकार का होता है। बच्चे संवेगात्मक व्यवहार को दो प्रकार से सीखते है –
- अनुबन्धन द्वारा – Watson us Albert नामक बच्चे पर प्रयोग किया। यह बच्चा खरगोश से बहुत प्यार करता था और उसके साथ खेलता था। Watson ने इस बच्चे को खरगोश से डरना सिखाया। अत: जब कभी बच्चा खरगोश के साथ खेलता था तो वे जोर की आवाज (जो डरावनी थी) करते थे। इससे बच्चा डरने लगा। ध ाीरे-धीरे बच्चा खरगोश से डरने लगा। बाद में वह सफेद फर वाली सभी चीजों से डरना सीख गया
- अनुकरण – यदि माता-पिता चिन्तित रहते है तो बच्चे चिन्तित रहना सीख जाते है। इसी प्रकार माता-पिता शान्त तो बच्चे भी शान्त होते है। Turner ने पाया कि शिक्षकों के संवेगात्मक व्यवहार का प्रभाव छात्रों पर पड़ता है।
- विद्यालयी वातावरण – शिक्षकों का अपने व्यवसाय एवं छात्रों के प्रति मनोवृत्ति, विद्यालय अनुशासन, विद्यालय में अकादमिक सुविधाए, भौतिक सुविधाए, शिक्षण विधि, पाठ्य सहगामी क्रियाएं आदि का बच्चे के संवेगात्मक विकास पर प्रभाव पड़ता है। उदाहरण के लिए यदि विद्यालय में अत्यन्त कठोर अनुशासन होता है या अनुशासन विहीन विद्यालय दोनों का बच्चे के संवेगात्मक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
- संगी-साथी – संवेगात्मक व्यवहार अनुकरण द्वारा सीखे जाते है। साथ ही कहावत है- संगत का असर पड़ता है। अत: बच्चों के संवेगात्मक विकास पर मित्रों, संगी साथियों व सह पाठियों के व्यवहार का प्रभाव पड़ता है।
- परिवारिक वातावरण – माता-पिता व बच्चे के मध्य सम्बन्ध, बच्चे का जन्म क्रम, लड़का व लड़की, परिवार का आकार, परिवार का सामाजिक आर्थिक स्तर, अनुशासन, माता-पिता का बच्चे के प्रति मनोवृत्ति, आदि बच्चे के संवेगात्मक विकास को प्रभावित करते है।