अनुक्रम
- पूँजीकरण – पूंजी का आवश्यक मात्रा का अनुमान लगाना।
- पूँजी संरचना – पूंजी संरचना से अभिप्राय स्वामिगत तथा ग्रहीत निधि उधार कोषों के मिश्रण से है। एक अनुकूल पूंजी संरचना वह होती है जिसमें ऋण एवं समता का अनुपात ऐसा होता है जिससे कि समता अंशों के मूल्य तथा अंश धारकों की धनराशि बढ़ती है।
- पूँजी का प्रबन्ध – यह देखना कि पूंजी का लाभप्रद एवं उचित ढ़ंग से प्रयोग हो रहा है।
डेविंग की वित्तीय नियोजन की उपरोक्त धारणा काफी उचित है, परन्तु यह वित्तीय नियोजन स्वभाव व कार्य-क्षेत्र को स्पष्ट नहीं करती हैं। इस सम्बन्ध में वाकर एवं बॉघन की परिभाषा अधिक उपयुक्त है।
वित्तीय नियोजन की परिभाषा
गयी हैं-
सम्बन्धित हैं, जिसमें संस्था के वित्तीय लक्ष्यों का निर्धारण, वित्तीय नीतियों का
निर्माण एवं अनुगमन तथा वित्तीय कार्य विधियों का विकास सम्मिलित है।
लक्ष्यों अथवा उद्देश्यों के निर्धारण तथा उपलब्ध विभिन्न विकल्पों में से सर्वोत्तम
विकल्प का चयन करने तथा उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए नीतियों एवं कार्यक्रमों के
निर्धारण से है।“
व्यवसाय को हमेशा ही अपने वायदों को पूरा करने के योग्य होना चाहिए। इसके
अतिरिक्त, व्यवसाय को स्थिर नहीं रखा जा सकता। किसी भी प्रतिस्पर्धी क्षेत्र में
नये उत्पादों के बाजार में लाने के लिए एवं विस्तार करने के लिए व्यवसाय में
सुधार लाना आवश्यक होता है। अनुभव यह बताता है कि व्यवसाय स्थिर नहीं रह
सकता, व्यवसाय की प्रवृति आगे की ओर बढ़ने की या पीछे की ओर हटने की
होती है, स्थिर रहने की नहीं। यदि व्यवसाय का विस्तार किया जाना है, तो
पर्याप्त वित्तीय साधनों की आवश्यकता होगी।“
पहलू हैं, यह न केवल निगम के पूंजी ढांचे की ओर इशारा करता है, अपितु यह
निगम द्वारा अपनायी गयी अथवा अपनायी जाने वाली वित्तीय नीतियों को भी स्पष्ट
करता है।“
किये जा रहे व्यवसाय के प्रारम्भिक सम्पत्ति संगठन, वैधानिक संचालन व्ययों,
स्थायी एवं कार्यशील पूंजी की व्यवस्था, वर्तमान समय में आवश्यक पूंजी का उचित
अनुमान लगाकर उसकी व्यवस्था करने तथा उसको प्राप्त करने के यथासम्भव
स्रोतों के सही विश्लेषण से हैं।“
नियोजन के प्रमुख उद्देश्य
वित्तीय नियोजन के प्रमुख उद्देश्य है :-
- सही समय पर कोषों की आवश्यकता अनुसार उपलब्धता को सुनिश्चित करना।
- यह देखना कि फर्म अनावश्यक रूप से संसाधनों (कोषों) में वृद्धि न करें।
- वित्तीय नियोजन वित्त कार्य को सही तरीके से करने के लिए नीतियाँ एवं कार्य विधियाँ प्रदान करता है।
- वित्त व्यवस्था की लागत न्यूनतम संभव स्तर पर रखी जाती है और दुर्लभ वित्तीय वित्तीय संसाधनों का विवेकसम्मत उपयोग किया जाता है।
- वित्तीय नियोजन वित्तीय नियंत्रण का आधार है। प्रबन्ध् यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि कोषों का उपयोग वित्तीय योजनाओं के अनुरूप हो।
- वित्तीय नियोजन कोषों में अंत: प्रवाह और बर्हिगमन के बीच एक संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है तथा वर्षभर पर्याप्त नकदी की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है।
वित्तीय नियोजन के प्रकार
वित्तीय नियोजन तीन प्रकार का होता है –
- अल्पकालीन वित्तीय नियोजन
- मध्यकालीन वित्तीय नियोजन
- दीर्घकालीन वित्तीय नियोजन
1. अल्पकालीन वित्तीय नियोजन – सामान्यता एक व्यवसाय मे एक वर्ष की अवधि के लिए जो वित्तीय
योजना बनाई जाती है, वह अल्पकालीन वित्तीय योजना कहलाती है। अल्पकालीन वित्तीय योजनाएँ
मध्यकालीन तथा दीर्घकालीन योजनाओं का ही भाग होती हैं अल्पकालीन वित्तीय योजना में प्रमुख
रूप से कार्यशील पूँजी के प्रबन्ध की योजना बनाई जाती है तथा उसकी विभिन्न अल्पकालीन साधनों
से वित्तीय व्यवस्था करने का कार्य किया जाता है। विभिन्न प्रकार के बजट एवं प्रक्षेपित लाभ-हानि
विवरण, कोषों की प्राप्ति एवं उपयोग का विवरण तथा चिट्ठा बनाये जाते हैं।
लिए जो वित्तीय योजना बनाई जाती है, उसे मध्यकालीन वित्तीय नियोजन कहते हैं। मध्यकालीन
वित्तीय योजना सम्पतियों के प्रतिस्थापन, रख-रखाव, शोध एवं विकास कार्यो को चलाने, अल्पकालीन
उत्पादन कार्यों की व्यवस्था करने तथ बढ़ी हुई कार्यशील पूँजी की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा
करने के लिए बनायी जाती है।
वित्तीय योजना दीर्घकालीन वित्तीय योजना कहलाती है। दीर्घकालीन वित्तीय योजना विस्तृत दृष्टिकोण
पर आधारित योजना होती है जिसमें संस्था के सामने आने वाली दीर्घकालीन समस्याओं के समाधान
हेतु कार्य किया जाता है। इस योजना में संस्था के दीर्घकालीन वित्तीय लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु पूँजी
की मात्रा, पूँजी ढाँचे, स्थायी सम्पत्तियों के प्रतिस्थापन, विकास एवं विस्तार हेतु अतिरिक्त पूँजी प्राप्त
करने आदि को शामिल किया जाता है।
एक श्रेष्ठ वित्तीय नियोजन की विशेषताएं
किसी भी व्यवसाय का भविष्य एवं उसकी सफलता बहुत बड़ी सीमा तक उसकी वित्तीय योजना पर
निर्भर करती है। अत: एक व्यवसाय की वित्तीय योजना बहुत अधिक सावधानीपूर्वक तैयार की जानी चाहिए।
एक श्रेष्ठ वित्तीय योजना में विशेषताएँ होती है।
होनी चाहिए जिससे विनियोक्ता विनियोग के लिए सहज ही आकर्षित हो सकें। बहुत अधिक प्रकार की
प्रतिभाव नहीं होनी चाहिए अन्यथा व्यवसाय का पूँजी ढाँचा जटिल हो जावेगा। व्यवसाय की वित्तीय योजना
होनी चाहिए जिससे वर्तमान में ही नहीं बल्कि भविश्य में भी व्यवसाय की आवश्यकताओं के अनुसार प्राप्त
वित्त प्राप्त किया जा सके।
व्यवसाय की वित्तीय आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन किया जा सके। व्यवसाय की वित्तीय योजना इस
प्रकार निर्मित की जानी चाहिए जिससे कम लाभ के समय व्यवसाय पर स्थायी भार अधिक न हो। व्यवसाय
की वित्तीय योजना मे समता अंश, पूर्वाधिकार अंश तथा ऋण पत्र का सन्तुलित भाग होना चाहिए तथा उसमें
परिवर्तन करने की पर्याप्त व्यवस्था होनी चाहिए।
आवश्यकताओं का ही नहीं बल्कि भविष्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखा गया हो। व्यवसाय की स्थायी
तथा कार्यशील दोनों ही प्रकार की आवश्यकताओ की पूर्ति का ध्यान रखा जाना चाहिए। व्यवसाय की वित्तीय
योजना अधिक दूरदश्र्ाी होनी चाहिए। प्रवर्तकों को उपक्रम की अल्पकालीन एवं दीघ्रकालीन आवश्यकताओं का
अनुमान लगाने के लिए पूर्वानुमानों का प्रयोग करना चाहिए।
तरलता उपलब्ध रहे। अनेक बार तरलता के अभाव में व्यवसाय अपनी देनदारियों का समय पर भुगतान नहीं
करना है जिसका उसकी ख्याति तथा स्थायित्व पर बुरा प्रभाव पड़ता है तथा अनेक बार व्यवसाय की सधन
करना पड़ता है।
साधनों का श्रये उपयोग कर सके। स्थायी तथा कायर्श् ाील पूँजी के मध्य उचित सम्बन्ध होना चाहिए।
व्यवसाय के पन्ू जीकरण तथा अतिपूँजीकरण की स्थिति नहीं होनी चाहिए।
चाहिए। भविय में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान लगा कर उनके लिए वित्त की पर्याप्त व्यवस्था की
जानी चाहिए।
उसका विनियोग करने में कम से कम व्यय हो। पूँजी निर्गमन के विभिन्न खर्चे जैसे – अभिगोपन, कमीशन,
दलाली, बट्टा छपाई, इत्यादि कम से कम होने चाहिए।
होना चाहिए। इससे संस्था की योजना व कार्यों में उनका विश्वास बढ़ता है जो फर्म के लिए मनोवैज्ञानिक
रूप से लाभदायक होता है।
लागू किया जा सके तथा उसके लाभ संस्था को प्राप्त हो।
नियन्त्रण बाहरी लोगों के हाथों में जाने से रोक लगे तथा नियन्त्रण बनाये रखने के लिए यह भी आवश्यक है
कि अंश पूँजी छितरी हुई हो।
कम जोखिम – वित्तीय योजना इस तरह बनाई जानी चाहिए कि संस्था की जोखिम लगातार कम होती
जाए।
वित्तीय नियोजन को प्रभावित करने वाले घटक
वित्तीय आयोजन का उद्देश्य पूंजी ढांचा का निर्धारण, पूंजी की आवश्यकता
का निर्धाराण एवं पूंजी के प्रबन्ध तक सीमित होता है। इन उद्देश्यों की पूर्ति हेतु
विभिन्न योजनायें बनाई जाती हैं। इन योजनाओं को विभिन्न प्रकार के घटक
अलग-अलग रूप से प्रभावित करते हैं। संक्षेप में, इन तत्वों का विश्लेषण
निम्नानुसार हैः
(1) व्यवसाय की प्रकृति- व्यवसाय की प्रकृति वित्तीय नियोजन को प्रभावी रूप
से प्रभावित करती है। व्यवसाय की प्रकृति यदि निर्माणी है, तो ऐसे व्यवसायों में
अधिक दीर्घकालिक पूंजी विनियोग की आवश्यकता होगी एवं उसी को ध्यान में
रखकर पूंजी संरचना का नियोजन किया जायेगा। यदि व्यवासय की प्रकृति मौसमी
है, तो उस निश्चित मौसम में ही अधिक वित्त की आवश्यकता होगी एवं सीजन के
पश्चात् कम पूंजी की आवश्यकता होगी। अतः व्यवसाय की प्रकृति नियोजन को
प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
(2) व्यवसाय की आय- व्यवसाय की आय भी वित्तीय नियोजन को प्रभावित
करती है। व्यवसाय की आय नियमित एवं निश्चित होने की दशा में कम वित्तीय
संसाधनों से भी कुशलतापूर्वक कार्य सम्पादित किया जा सकता है। यदि व्यवसाय
की आय अनियमित एवं अनिश्चित है, तो अधिक वित्तीय संसाधनों की आवश्यकता
परिलक्षित होती है।
(3) जोखिम की मात्रा- व्यवसाय में जोखिम की मात्रा की संस्था की पूंजी
संरचना पर अपना प्रभाव डालती है। व्यवसाय में जोखिम तत्व अधिक होने पर
ऋणदाता वर्ग उस संस्था विशेष में पूंजी विनियोग करने से डरते हैं, अतः इन
व्यवसायों को समता अंशधारियों की पूंजी पर ही अधिक निर्भर रहता पड़ता है।
जब ऋणदाता वर्ग निश्चित हो जाता है कि अमुक व्यवाय में विनियोजित पूंजी के
डूबने का कोई भय नहीं है,वहां पर उस व्यवसाय की पूंजी संरचना में ऋण
पत्रधारी वर्ग का भी सक्रिय योगदान रहता है।
(4) विस्तार की योजनाएँ- व्यवसाय के विस्तार एवं विकास हेतु नवीन वित्त
पूर्ति की आवश्यकता परिलक्षित होती है। वित्तीय नियोजन में नवीन वित्त पूर्ति के
प्रभावों का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने के उपरान्त ही वित्त पूर्ति के उपलब्ध
साधनों में से किसी एक विकल्प का चुनाव किया जाता है।
(5) व्यवसाय की स्थिति एवं आकार- व्यवसाय के आकार एवं उसकी स्थिति
(प्रतिष्ठा) पर पूंजी संरचना निर्भर करती है। सामान्यतः बड़े (वृहद्) आकार वाले
व्यवसायों में अधिक पूंजी की आवश्यकता प्रतीत होती है तथा ऐसे व्यवसायों में
‘दीर्घकालीन वित्त’ की अधिक आवश्यकता होती है। व्यवसाय की अच्छी साख
(स्थिति/प्रतिष्ठा) होने पर व्यवसाय के प्रबन्धकों को पूंजी एकत्र करने में कोई
अधिक कठिनाई नहीं होती है। अतः व्यवसाय की स्थिति, उसकी प्रतिष्ठा एवं
उसका आकार भी वित्तीय नियोजन को प्रभावित करता है।
(6) सरकारी हस्तक्षेप- वित्तीय नियोजन करते समय सरकारी हस्तक्षेप को भी
ध्यान में रखना पड़ता है। पूंजी संरचना के स्वरूप का निर्धारण सरकार द्वारा
निश्चित किये गये नियमों, उपनियमों, बनाये गये कानूनों एवं वैज्ञानिक
औपचारिकाओं के अनुपालन के पश्चात् ही तय हो पाता है। उदाहरण के लिए,
यदि संस्था का प्रबन्धक वर्ग अधिक ऋणपूंजी निर्गमित करना चाहता है, तो इस
सम्बन्ध में स्वामित्व पूंजी एवं ऋणपूंजी के मध्य केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित
अनुपात को अवश्य ही ध्यान में रखना होगा। किसी भी परिस्थिति में सरकार एवं
कम्पनी अधिनियम, 2013 (अद्यतन) के अन्तर्गत निर्धारित मानकों का उल्लंघन नहीं
किया जा सकता है।
(7) प्रबन्धकों का दृष्टिकोण– प्रबन्धकों का दृष्टिकोण/उनका मत भी पूंजी
संरचना को प्रभावित करता है। प्रबन्धकों का दृष्टिकोण यदि व्यवसाय को अपने
हाथों में केन्द्रित करके रखना है, तो समता पर व्यापार की नीति का अनुपालन
किया जायेगा। इसमें ऋणपूंजी की तुलना में समता अंश पूंजी का निर्गमन कम
किया जाता है। इसी प्रकार यदि प्रबन्धकों का मत आर्थिक शक्ति का केन्द्रीयकरण
नहीं है, तो पूंजी संरचना में स्वामी पूंजी का अनुपात बढ़ जायेगा।
(8) वैकल्पिक विकल्प- वित्त पूर्ति हेतु प्रबन्धकों के समक्ष विभिन्न विकल्पों की
एक श्रृंखला होती है। इन विकल्पों का लाभदायकता के आधार पर परीक्षण किया
जायेगा तथा पूंजी के संग्रह हेतु केवल उन विकल्पों को प्राथमिकता प्रदान की
जायेगी, जो संस्था की लाभदायकता में निरन्तर वृद्धि करेंगे।
(9) करारोपण की नीति- वित्तीय नियोजन को सरकार की करारोपण नीति भी
प्रभावित करती है। करारोपण नीति के अन्तर्गत व्यक्तिगत कर एवं निगम कर
दोनों को ही सम्मिलित किया जाता है। करारोपण नीति के कठोर होने की स्थिति
में पूंजी विनियोग हतोत्साहित होती है। उदाहरण के लिए, यदि लाभांश आय पर
अधिक करारोपण का प्रावधान कर दिया जाता है, तो समता अंश पूंजी में विनियोग
के स्थान पर विनियोक्तागण ऋणपूंजी में अधिक विनियोग करना श्रेष्ठ समझेंगे,
क्योंकि ऋणपंूजी पर विनियोग के फलस्वरूप उन्हें अधिक कर मुक्त आय प्राप्त
होगी।
(10) ब्याज दर- वित्तीय नियोजन में पूंजी संरचना को ब्याज की दरें भी
प्रभावित करने की क्षमता रखती है। जब ब्याज की दर सामान्यतः ऊंची होती है,
तो प्रबन्धक ऋणपूंजी को अधिक वरीयता प्रदान नहीं करते हैं। ब्याज दर अधिक
होने पर प्रबन्धक वर्ग का झुकाव समता पूंजी एवं पूर्वाधिकार पूंजी की ओर अधिक
होता है जबकि विनियोक्ता वर्ग का झुकाव ऋण पूंजी की ओर होता है।
रखकर ही प्रबन्धक पूंजी संरचना का कलेवर तैयार करते हैं, विनियोक्ताओं का
दृष्टिकोण यदि ऋणपूंजी की ओर अधिक है, तो पूंजी संरचना में ऋणपूंजी का
अनुपात अधिक कर दिया जायेगा। इसी प्रकार यदि इनका मत स्वामिगत पूंजी की
ओर है, तो स्वामित्व पूंजी की मात्रा में वृद्धि कर दी जायेगी।
(12) मुद्रा बाजार की दशाएं– मुद्रा बाजार किसी भी देश की आर्थिक स्थिति
का बैरोमीटर माना जाता है। मुद्रा बाजार की स्थिति का अवलोकन करने के
पश्चात् ही विनियोक्तागण विनियोग सम्बन्धी निर्णय लेते हैं। मुद्रा बाजार की
स्थिति अच्छी होने पर पूंजी विनियोग को बढ़ावा मिलता है। अतः मुद्रा बाजार की
स्थिति भी वित्तीय नियोजन को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
(13) बाजार की स्थिति- व्यापार चक्रों के कारण बाजार में कभी मन्दी का तो
कभी तेजी का दौर चलता रहता है। बाजार में तेजीकाल में पूंजी विनियोग करने
की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। इसके विपरीत मन्दीकाल में पूंजी विनियोग
हतोत्साहित होता है एवं ऋणपूंजी अथवा निश्चित आय वाले पूंजी साधनों में उस
समय अधिक पूंजी विनियोग किया जाता है।
वित्तीय नियोजन का महत्व
‘वित्त’ किसी भी व्यवसाय का जीवन रक्त है। पर्याप्त वित्त के अभाव में
अच्छी-से-अच्छी योजनाएं भी मूर्तरूप धारण नहीं कर सकती है। पर्याप्त वित्त का
होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसका अनुकूलतम उपयोग होना ही व्यवसाय विशेष
की सफलता अथवा असफलता का मार्ग प्रशस्त करता है। अतः वित्तीय नियोजन
किसी भी व्यवसाय की सफलता का मूल बिन्दु होता है। संक्षेप में, इसका महत्व
निम्न प्रकार वर्णित किया जा सकता है-
(1) व्यवसाय की सफलता- व्यवसाय की सफलता उचित वित्तीय नियोजन पर
निर्भर करती है। सुदृढ़ वित्तीय नियोजन में व्यवसाय की वर्तमान एवं भविष्य में
विस्तार की सम्भावनाओं को दृष्टिगत रखकर ही वित्तीय नियोजन किया जाता है।
इस प्रकार व्यवसाय के सफल होने का प्रतिशत बढ़ जाता है।
(2) व्यवसाय की सफलता- व्यवसाय की सफलता उचित वित्तीय नियोजन पर
निर्भर करती है। सुदृढ़ वित्तीय नियोजन में व्यवसाय की वर्तमान एवं भविष्य में
विस्तार की सम्भावनाओं को दृष्टिगत रखकर ही वित्तीय नियोजन किया जाता है।
इस प्रकार व्यवसाय के सफल होने का प्रतिशत बढ़ जाता है।
(3) पूंजी के साधनों में पर्याप्त समन्वय- वित्तीय नियोजन में पूंजी की
आवश्यकता का पूर्वानुमान लगाने के पश्चात् पूंजी ढांचा निश्चित किया जाता है।
पूंजी ढांचे के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार के पूंजी साधनों का समावेश किया जाता है।
इन पूंजी साधनों की लागत भी भिन्न-भिन्न होती है। इन साधनों के मध्य
सामंजस्य स्थापित करके व्यवसाय को अनावश्यक जोखिम से सुरक्षित करके लाभ
की मात्रा को बढ़ाया जा सकता है।
(4) पर्याप्त तरलता- वित्तीय नियोजन वित्त की आपूर्ति निश्चित करता है। एक
श्रेष्ठ वित्तीय नियोजक के द्वारा व्यवसाय में तरलता रखी जाती है, जिससे कि
व्यवसाय अपनी देनदारियों अथवा आकस्मिक भुगतानों को यथा समय भुगतान
करने में सफल होता है। इससे व्यवसाय की साख एवं शोधन क्षमता पर अनुकूल
प्रभाव पड़ता है।
(5) भावी विकास- व्यवसाय के भावी विकास हेतु वित्तीय नियोजन की
आवश्यकता होती है। वित्तीय नियोजन करते समय केवल वर्तमान आवश्यकताओं
को ही ध्यान में नहीं रखा जाता है, बल्कि इसमें भविष्य हेतु भी पर्याप्त गुंजाइश
रखी जाती है, जिसके फलस्वरूप संस्था के भावी विस्तार एवं विकास योजनाओं
को मूर्त रूप देने में आसानी रहती है।
(6) विनियोजित पूंजी पर उचित प्रत्याय प्राप्ति हेतु- वित्तीयनियोजन पूंजी के
प्रशासन एवं पूंजी के प्रबन्ध के सम्बन्ध में समन्वय एवं अनुकूलतम उपयोग के द्वारा
विनियोजित पूंजी पर उचित प्रत्याय दर प्राप्त की जा सकती है। सम्पतियों के
विनियोजन हेतु पूंजी की मात्रा का निर्धारण भी विनियोजित पूंजी पर उचित प्रत्याय
दर प्राप्त करने में सहायक होता है।
वित्तीय नियोजन की सीमाएं
वित्तीय नियोजन के महत्व को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता है,
लेकिन वित्तीय नियोजन की भी अपनी कुछ सीमाएं हैं, जिनका वर्णन निम्नानुसार
है-
(1) भविष्य पर निर्भर- वित्तीय नियोजन में संस्था हेतु पूंजी की आवश्यकताओं
का अनुमान, पूंजी संरचना का निर्धारण एवं पूंजी के प्रबन्ध के सम्बन्ध में नीतियों
का निर्धारण किया जाता है। यह पूर्वानुमान भविष्य के लिए लगाया जाता है।
पूर्वानुमानों के गलत निर्धारण से अच्छी-से-अच्छी वित्तीय योजना को भी
असफलता का सामना करना पड़ता है।
(2) लोच का अभाव- वित्तीय नियोजन के अन्तर्गत वित्तीय योजना का स्वरूप
निश्चित करने के पश्चात उसमें परिवर्तन की सम्भावना नाममात्र को ही रहती है।
आकस्मिक एवं सामयिक परिवर्तनों के कारण भी वित्तीय योजना में परिवर्तन सम्भव
नहीं होता है। अतः इसमें लोच का अभाव पाया जाता है।
(3) समन्वय का अभाव- वित्तीय नियोजन का कार्य वित्तीय प्रबन्ध के द्वारा
किया जाता है। वित्तीय नियोजन करते समय संस्था के समस्त वित्तीय प्रबन्धकों के
साथ-साथ गैर-वित्तीय अधिकारियों में परस्पर सहयोग, परामर्श एवं समन्वय होना
चाहिए, लेकिन वित्तीय एवं गैर-वित्तीय अधिकारियों में समन्वय स्थापित नहीं हो
पाता है। जिसके फलस्वरूप अच्छी-से-अच्छी योजना भी समन्वय नहीं होने के
कारण अपने उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर पाती है।