अनुक्रम
समष्टि शब्द के मूल (Origin) को जान लेने से ही हम इसके अर्थ को जान सकते हैं। यह शब्द ग्रीक के मैक्रोस
(Macros) शब्द से लिया गया है जिसका उस भाषा में अर्थ बड़ा (Large) है। अतः समष्टि अर्थशास्त्र से
अभिप्राय व्यापक स्तर पर संपूर्ण अर्थव्यवस्था का विश्लेषण करना है।
समष्टि अर्थशास्त्र विशिष्ट इकाइयों का अध्ययन करके, संपूर्ण अर्थव्यवस्था के कुल योगों का अध्ययन करता है। अत: इसे कुल योग संबंधी अथवा सामूहिक अर्थशास्त्र भी कहते है।
समष्टि अर्थशास्त्र
समष्टि अर्थशास्त्र की परिभाषा
प्रो. बोल्डिंग के अनुसार- “समष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत मात्राओं का अध्ययन नहीं किया जाता है, अपितु इन मात्राओं के योग का अध्ययन किया जाता है। इसका संबंध व्यक्तिगत आय से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आय से होता है व्यक्तिगत कीमतों से नहीं, बल्कि सामान्य कीमत-स्तर से होता है तथा व्यक्तिगत उत्पादन से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादन से होता है।’’
प्रो. कीन्स के अनुसार- “राष्ट्रीय तथा विश्वव्यापी आर्थिक समस्याओं का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र के अंतर्गत किया जाना चाहिए।” इस प्रकार समष्टि अर्थशास्त्र में अर्थव्यवस्था का अध्ययन समग्र रूप से किया जाता है। उदाहरण के लिए, कुल राष्ट्रीय आय, कुल माँग , कुल पूर्ति कुल बचत, कुल विनियोग, पूर्ण रोजगार इत्यादि।
Macroeconomics concerns with such variables as the aggregate volume of the output of an economy, with the extent to which its resources are employed, with the size of national income and with the general price level.”–Ackley Gardner
समष्टि अर्थशास्त्र का महत्व
समष्टि अर्थशास्त्र की उपयोगिता को निम्न बिंदुओं के रूप में स्पष्ट किया जा सकता है-
आधुनिक अथर्व्यवस्था अत्यतं जटिल है, क्योकि अनेक आर्थिक तत्व एक-दूसरे
पर आश्रित रहते है। अत: समष्टि अर्थशास्त्र विश्लेषण की सहायता से पूर्ण रोजगार,
व्यापार चक्र आदि जटिल समस्याओं का अध्ययन हो जाता है।
सरकार का प्रमुख कार्य कुल रोजगार, कुल आय, सामान्य कीमत-स्तर,
व्यापार के सामान्य-स्तर आदि पर नियंत्रण करना होता है। अत: समष्टि अर्थशास्त्र
सरकार को आर्थिक नीतियों में सहायता पहुँचाता है।
व्यष्टि आर्थिक विश्लेषण में समष्टि अर्थशास्त्र बहुत सहायक है। जैसे- एक
उत्पादक अपने उत्पादन के संबंध में निर्णय लेते समय कुल उत्पादन के व्यवहार से
प्रभावित होता है।
आर्थिक विकास का अध्ययन समष्टि अर्थशास्त्र का महत्वपूर्ण विषय है।
समष्टि आर्थिक विश्लेषण के आधार पर ही अर्थव्यवस्था के आर्थिक विकास के
संसाधनों एवं क्षमताओं का मूल्यांकन किया जाता है। राष्ट्रीय आय, उत्पादन एवं
रोजगार के स्तर में वृद्धि करने की योजनाएं बनायी व क्रियान्वित की जाती है।
व्यष्टिगत और समष्टि अर्थशास्त्र
अर्थ – अर्थशास्त्र के दो भाग हैं- व्यष्टिगत और समष्टिगत। व्यष्टि का अर्थ
होता है ‘छोटा’। अत: जब कोई अध्ययन या समस्या अर्थव्यवस्था के एक लघु भाग
से संबधित होती है तो ऐसे अध्ययन का विषय व्यष्टिगत अर्थशास्त्र होता है। समष्टि
का अर्थ है ‘बडा़’। जब कोई अध्ययन समूची अर्थव्यवस्था या अर्थव्यवस्था से
संबधित समुच्चयों के बारे में होता है तो ऐसे अध्ययन का विषय समष्टिगत अर्थशास्त्र
होता है।
आइए, एक उदाहरण की सहायता से इन दोनों में अंतर को अच्छी तरह से
समझें। मानवीय शरीर में विभिन्न अंग और कोशिकाएं होती है। इनमें से प्रत्येक की
महत्वपूर्ण भूमिका होती है और इनके कार्यों में पारस्परिक संबधं भी होता है। जब हम
किसी एक कोशिका या अगं का अध्ययन करते है। तो इसे व्यष्टि अध्ययन कहते है।
ऐसे अध्ययनों से हमें मानवीय शरीर की प्रक्रिया और कार्य प्रणाली को समझने में
सहायता मिलती है। पूरे मानव शरीर के अध्ययन को समष्टि अध्ययन कहेंगे। इस
प्रकार उत्पादन, उपभागे और निवेश अर्थव्यवस्था की मुख्य प्रक्रियाएं है।
प्रत्येक प्रक्रिया में हजारों व्यक्ति और संस्थाएं व्यस्त है। इन्हें आर्थिक एजटें कहते
है। और उनके समूहों को परिवार, फर्म आदि कहते है। इन एजेटों की आर्थिक
क्रियाओं और व्यवहारों का व्यक्तिगत या सामूहिक अध्ययन और इनके पारस्परिक
संबंधों का अध्ययन व्यष्टिगत अर्थशास्त्र के अध्ययन का विषय क्षेत्र कहलाएगा।
दूसरी और पूरी अर्थव्यवस्था से संबधित समस्याओं और उससे संबधित समुच्चयों का
अध्ययन समष्टिगत अर्थशास्त्र के अध्ययन का विषय क्षेत्र कहलाएगा।
अर्थशास्त्र और समष्टिगत अर्थशास्त्र दोनों एक-दूसरे से अलग
नहीं है। बल्कि इनमें पारस्परिक संबध है। सभी व्यष्टिगत आर्थिक अध्ययन, समष्टिगत
चरों को समझने और समष्टिगत विश्लेषण करने में सहायक होते है। ऐसे अध्ययन
आर्थिक नीतियों और कायर्क्र मों को बनाने में भी सहायक होते है।
आइए, कुछ उदाहरणों की सहायता से इनके पारस्परिक संबध को समझे।
यदि हम एक वस्तु की कीमत निर्धारण की प्रक्रिया और इसमें क्रेताओं और विक्रेताओं
की भूमिका को जानते हैं तो इससे हमें अथव्यवस्था में सामान्य कीमत स्तर में होने
वाले परिवर्तनों का विश्लेषण करने में सहायता मिलेगी। एक वस्तु की कीमत
निधार्रण की प्रक्रिया और इसमें क्रेताओं और विक्रेताओं की भूमिका का अध्ययन
व्यष्टिगत आर्थिक अध्ययन है, जबकि अर्थव्यवस्था में सामान्य कीमत स्तर का
अध्ययन समष्टिगत आर्थिक अध्ययन है।
प्रगति का मूल्यांकन करना चाहते हैं तो हमें अर्थव्यवस्था के प्रत्येक क्षेत्र के कार्य के
बारे में जानकारी प्राप्त करनी होगी और प्रत्येक क्षेत्र के कार्य की जानकारी के लिए,
उस क्षेत्र की उत्पादन इकाइयों की प्रगति के बारे में व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से
जानकारी प्राप्त करनी होगी। उत्पादन इकाइयों के प्रत्येक समूह या प्रत्येक क्षेत्र का
अध्ययन व्यष्टिगत आर्थिक अध्ययन है जबकि पूरी अर्थव्यवस्था की प्रगति का
अध्ययन समष्टिगत आर्थिक अध्ययन है। अत: व्यष्टिगत और समष्टिगत अर्थशास्त्र,
अर्थशास्त्र के दो पारस्परिक संबधित भाग है।
व्यष्टि और समष्टि अर्थशास्त्र में
अंतर
| अंतर का आधार | व्यष्टि अर्थशास्त्र | समष्टि अर्थशास्त्र |
|---|---|---|
| 1. विषय-सामग्री | व्यष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत आर्थिक इकाइयों का अध्ययन किया जाता है। |
समष्टि अर्थशास्त्र में संपूर्ण अर्थव्यवस्था का एक समग्र इकाई के रूप में अध्ययन किया जाता है। |
| 2. तेजी और मंदी | व्यष्टि अर्थशास्त्र में व्यक्तिगत फर्म, उद्योग या व्यापारिक इकाई में तेजी व मंदी की विवेचना होती है। |
समष्टि अर्थशास्त्र के द्वारा संपूर्ण आर्थिक मंदी का तथा आर्थिक तेजी का स्पष्टीकरण किया जाता है। |
| 3. सहायता | उपभोक्ता या फर्म को सर्वोत्तम बिंदु तक पहुंचाने में व्यष्टि अर्थशास्त्र सहायता पहुँचाता है। |
संपूर्ण अर्थव्यवस्था को सर्वोत्तम बिंदु तक पहुँचाने में समष्टि अर्थशास्त्र विशेष सहायक होता है। |
| 4. सीमा | व्यष्ठि अर्थशास्त्र का क्षेत्र सीमान्त विश्लेषण आदि पर आधारित नियमों तक सीमित है। |
समष्टि अर्थशास्त्र का क्षेत्र राष्ट्रीय आय, पूर्ण रोजगार, राजस्व आदि संपूर्ण अर्थव्यवस्था से संबंधित समस्याओं के विश्लेषण से व्यापक है। |
समष्टि-अर्थशास्त्र में हम क्या अध्ययन करते हैं?
कौन-कौन सी आर्थिक समस्याएँ तथा मुद्दे समष्टि-अर्थशास्त्र में सम्मिलित किए जाते हैं। इनके ज्ञान विषय-सामग्री
को जानने के लिए जरूरी है। विस्तृत रूप में समष्टि अर्थशास्त्र के अध्ययन क्षेत्र में निम्नलिखित को सम्मिलित किया
जाता है-
1. राष्ट्रीय आय का सिद्धांत – समष्टि-अर्थशास्त्र में राष्ट्रीय आय की विभिन्न
अवधारणाओं, इसके विभिन्न तत्त्वों, इसे मापने की विधियों तथा सामाजिक लेख का अध्ययन किया जाता है।
2. रोजगार का सिद्धांत – समष्टि-अर्थशास्त्र में रोजगार तथा बेरोजगारी से संबंधित
समस्याओं का भी अध्ययन किया जाता है। इसमें रोजगार के स्तर को निर्धारित करने वाले विभिन्न तत्त्वों,
जैसे-प्रभावपूर्ण माँग, कुल पूर्ति, कुल उपभोग, कुल निवेश, कुल बचत आदि का अध्ययन किया जाता है।
पर काफी प्रभाव पड़ता है। समष्टि-अर्थशास्त्र में मुद्रा के कार्यों तथा उससे संबंधित सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता
है। बैंक प्रणाली तथा अन्य वित्तीय संस्थाओं का भी इस संदर्भ में अध्ययन किया जाता है।
4. सामान्य कीमत स्तर का सिद्धांत – सामान्य कीमत स्तर में होने वाले
परिवर्तनों का अध्ययन समष्टि-अर्थशास्त्र की मुख्य समस्या है। इस संदर्भ में मुद्रा स्फीति (अथवा कीमतों में होने
वाली सामान्य वृद्धिद्ध तथा मुद्रा विस्फीति ;अथवा कीमतों में होने वाली सामान्य कमी) की समस्याएँ प्रमुख हैं।
5. आर्थिक संवृद्धि का सिद्धांत –समष्टि अर्थशास्त्र में आर्थिक संवृद्धि
अर्थात् प्रति व्यक्ति वास्तविक आय में होने वाली वृद्धि से संबंधित समस्याओं का अध्ययन किया जाता है।
अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं की संवृद्धि संबंधी समस्या का विशेष रूप से अध्ययन किया जाता है। सरकार की
मौद्रिक तथा वित्तीय नीतियों का भी इसमें अध्ययन किया जाता है।
6. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का सिद्धांत –समष्टि-अर्थशास्त्र में विभिन्न देशों
के बीच होने वाले व्यापार का भी अध्ययन किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का सिद्धांत, तटकर संरक्षण आदि समष्टि-अर्थशास्त्र के अति महत्त्वपूर्ण विषय हैं।
समष्टि अर्थशास्त्र की मुख्य समस्याएँ
संबंधी समस्याओं का आगे उल्लेख किया गया है जिससे यह स्पष्ट होता है कि समष्टि-अर्थशास्त्र का अध्ययन एक
विशिष्ट शाखा के रूप में आवश्यक होता है।
की अर्थव्यवस्थाओं के भूमण्डलीय एकीकरण के इस युग में, संवृद्धि तथा विकास समष्टि-अर्थशास्त्र के
अध्ययन का केंद्र बन गए हैं। अर्थव्यवस्थाओं की निरंतर संवृद्धि आवश्यक है और यह संवृद्धि (वस्तुओं तथा सेवाओं
के प्रवाह के रूप में) आम जनता के बढ़ रहे जीवन-स्तर के रूप में दृष्टिगोचर होनी चाहिए अथवा जीवन की
गुणवत्ता में समूचा सुधार होना चाहिए। संवृद्धि को विकास में रूपान्तरित किया जाना चाहिए। इसका अर्थ यह है कि
धनी तथा निर्धन के बीच पाई जाने वाली खाई का अंतर समय के साथ-साथ कम होना चाहिए।
तथा विकास की समस्या, का निकट भूतकाल में, महत्व बहुत बढ़ गया है। आर्थिक संवृद्धि की प्राप्ति (i) पर्यावरण
के पतन तथा (ii) प्राकृतिक संसाधनों (विशेषकर गैर-नवीनीकरण संसाधनों) के अत्यधिक शोषण द्वारा नहीं होनी
चाहिए क्योंकि इसमें भावी पीढि़यों की उत्पादन क्षमता के कम हो जाने का भय है। इस संदर्भ में ही अर्थशास्त्री
फ्धारणीय विकास की बात करते हैं और यही आज की समष्टि-अर्थशास्त्र की
उभरती हुई समस्या है।
समष्टि-अर्थशास्त्र संबंधी नीतियों का निर्माण करें जिनसे सुसंगत आर्थिक संवृद्धि (वस्तुओं तथा सेवाओं की बढ़ रही
उपलब्धता के रूप में) तथा सामाजिक न्याय (अर्थात् धन तथा आय के समान बंटवारे के रूप में) सुनिश्चित हो
तथा न तो पर्यावरण का पतन हो और न भावी-पीढि़यों की उत्पादान क्षमता में किसी प्रकार की कमी हो।
गई थीं। वस्तुओं तथा सेवाओं की माँग कम हो गई थी। परिणामस्वरूप, व्यापारिक लाभों में भारी गिरावट आई तथा
बड़े पैमाने पर निवेश की मात्रा में कटौती हुई तथा बेरोजगारी फैल गई। यदि उत्पादन के क्षेत्र में कार्यशील जनसंख्या
के बहुत बड़े प्रतिशत को बेरोजगारी का सामना करना पड़े तो यह एक ऐसी समस्या बन जाती है जिसका समाधान
समूची अर्थव्यवस्था के स्तर पर करना आवश्यक हो जाता है। यह समष्टि-अर्थशास्त्र की एक प्रमुख समस्या है।
जैसे विकसित देशों के लिए भी गंभीर बनी हुई है। विकसित तथा अल्पविकसित देशों में केवल बेरोजगारी की प्रकृति
में ही अंतर पाया जाता है। अल्पविकसित देशों में इनकी प्रकृति दीर्घकालिक होती है और इसका कारण
उत्पादन क्षमता में कमी का होना है। इसके विपरीत, विकसित देशों में इसकी प्रकृति चक्रीय होती है
जिसका कारण वस्तुओं तथा सेवाओं की माँग में होने वाली कमी है। फिर भी, समष्टि-अर्थशास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण
समस्या बेरोजगारी है और इसका संबंध संसार की सभी अर्थव्यवस्थाओं से है।
निम्नतम स्थिति को पहुँच जाती है तब इसे अत्यधिक मंदी की स्थिति कहा जाता है। जब इसमें सुधार
होने लगता है तब इसे पुनरुत्थान की स्थिति कहा जाता है और जब यह अपनी चरम सीमा तक पहुँच
जाती है, तब इसे तेजी की स्थिति कहा जाता है। मंदी अथवा अत्यधिक मंदी निम्न लाभ की स्थिति होती
है। इस स्थिति में सीमान्त फर्में बंद होने लगती हैं, निवेश की मात्रा में भारी कमी हो जाती है
तथा बेरोजगारी भयंकर रूप धारण कर लेती है। इसके विपरीत, तेजी की स्थिति बढ़ रहे लाभों की स्थिति होती है
जिसमें निवेश की मात्रा तथा उत्पादन के साधनों की माँग निरंतर बढ़ती जाती है।
व्यावसायिक चक्र किसी एक विशेष फर्म अथवा एक विशेष व्यावसायिक क्रिया तक ही सीमित नहीं रहते। यह एक
समष्टि घटना है जो देश की सभी उत्पादन इकाइयों को अपने घेरे में ले लेती है। वास्तव में, कभी-कभी यह एक
भूमण्डलीय घटना बन जाती है, जैसी 1930 के दशक की महामंदी। यह ध्यान देने योग्य
बात है कि समष्टि-अर्थशास्त्र की एक पृथक अध्ययन की शाखा के रूप में उत्पत्ति का श्रेय 1930 के दशक की
अत्यधिक मंदी को जाता है। इस अवधि के दौरान, विश्व की पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाओं,
विशेषकर यू.के., में घोर बेरोजगारी पाई गई थी। यू.के. की अर्थव्यवस्था में बेरोशगारी की दर 25% पहुँच गई थी।
ऐसे समय में ही विश्व के महान अर्थशास्त्री लाॅर्ड केन्श ने आय तथा रोजगार सिद्धांत तथा समग्र माँग में कमी के कारण उत्पन्न बेरोजगारी की
समस्या के भूमण्डलीय उपचार का प्रतिपादन किया था।
वास्तव में, एक अर्थव्यवस्था का चक्रीय चलन स्वयं में एक बड़ी समष्टि-अर्थशास्त्र संबंधी समस्या है, जिसका
समाधान न केवल उत्पादकों अपितु सरकार को भी ढूंढना होता है। उत्पादकों को एक ऐसी रणनीति अपनानी होती
है जिसके द्वारा मंदी तथा तेजी की स्थितियों का सामना किया जा सके। सरकार को ऐसी नीतियों का निर्माण करना
होता है जिनसे व्यावसायिक चक्रों के प्रभाव को न्यूनतम किया जा सके तथा आर्थिक संवृद्धि के स्थिर मार्ग को
सुनिश्चित बनाया जा सके।
औसत कीमत) में एक निश्चित समय अवधि में निरंतर बढ़ने की प्रवृत्ति पाई जाती है। फलस्वरूप मुद्रा का मूल्य
घटता है और लोगों की वास्तविक क्रय-शक्ति कम हो जाती है। यह भी एक अन्य समष्टि-अर्थशास्त्र संबंधी समस्या
है जिसे समझना तथा जिसका समाधान करना बहुत आवश्यक है।
का समूचा स्तर प्रेरित होता है। मुद्रा स्फीति कभी-कभी दौड़ती मुद्रा स्फीति अथवा
अति मुद्रा स्फीति का रूप धारण कर लेती है। अति मुद्रा स्फीति की स्थिति में, उत्पादन के
साधन महंगे हो जाते हैं। निवेश की ब्याज-लागत में विशेषकर भारी वृद्धि की प्रवृत्ति पायी जाती है। फलस्वरूप
उत्पादन की लागत में बहुत वृद्धि हो जाती है तथा व्यावसायिक प्रतियोगितात्मक कमी होने लगती है, विशेषकर विश्व के बाजारों में। जब माँग में घटने तथा उत्पादन-लागत में बढ़ने की प्रवृत्ति पाई
जाती है तब उत्पादन की क्रिया में स्पष्ट रुकावट उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में अर्थव्यवस्था तेजी से मंदी तथा
महामंदी की ओर बढ़ती है।
आम आदमी मुद्रा स्फीति के कारण गंभीर रूप से पीडि़त होता है। उसकी क्रय-शक्ति घटती है और सरकार के प्रति
उसका असंतोष बढ़ता है। सामान्य असंतोष अंततः सामाजिक अशांति का रूप धारण कर लेता है जिसके कारण
सरकार की स्थिरता को खतरा पड़ जाता है। वास्तव में, कीमत-नियंत्रण द्वारा परोपकार करना भारत जैसे देशों के
निर्वाचन घोषणा-पत्रों का एक भाग बन गया है। परिणामस्वरूप, अधिकांश कल्याणकारी राज्यों में मुद्रा स्फीति पर
काबू पाने वाली रणनीतियों को उच्च प्राभमिकता दी जाती है। इस समय सरकारों के लिए उभर रही प्रमुख नीति
समस्या मुद्रा-स्फीति रहित संवृद्धि है।
भागीदारी निवेशक के रूप में धीरे-धीरे कम होती जा रही है। फिर भी, कल्याण संबंधी
क्रियाओं के विस्तार के कारण सरकार के बजट संबंधी खर्चो में वृद्धि होती जा रही है। विशेषकर प्रतिरक्षा, आतंकवाद
का सामना करने तथा न्याय एवं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सरकारी खर्चे में वृद्धि जारी है। सरकारी खर्चे
में वृद्धि का एक अन्य कारण किसानों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता है। यह बात ध्यान देने योग्य
है कि भारत जैसे देशों में सरकारी खर्चे का बहुत बड़ा भाग गैर-विकास क्रियाओं ;में खर्च हो रहा है। इसका अर्थ यह निकलता है कि सरकारी खर्चा वस्तुओं तथा सेवाओं के उपभोग पर अधिक तथा
उनके उत्पादन पर कम हो रहा है।
में निरंतर बढ़ रहा है। सरकार द्वारा लिए गए ट्टणों में जितनी अधिक वृद्धि होती है देश के केंद्रीय बैंक (RBI) की नोट छापने की विवशता उतनी ही अधिक बढ़ जाती है। इसके फलस्वरूप मुद्रा स्फीति रूपी आग
पर तेल छिड़कने का काम पूरा होता है जिसका कुप्रभाव देश की संवृद्धि तथा उसके विकास पर पड़ता है। विकल्प
के रूप में, सरकार आय के साधन बढ़ाने के लिए अधिक कर लगाने का प्रयास कर सकती है। यदि सरकार
द्वारा करदाताओं द्वारा दी गई मुद्रा को उत्पादन की अपेक्षा उपभोग संबंधी क्रियाओं पर खर्च किया जाता है (वह भी
साधारण जनता को खुश करने की नीतियों को बढ़ावा देने हेतु) तो इससे सामाजिक अशांति फैलती है जिससे
राजनैतिक अस्थिरता उत्पन्न होती है तथा देश की समूची आर्थिक क्रिया के लिए खतरा बढ़ता है।
बजट संबंधी घाटा तथा उससे संबंधित राजकोषीय नीति समष्टि-अर्थशास्त्र की एक केंद्रीय समस्या है जिस पर कड़ी
दृष्टि रखना जरूरी है ताकि अर्थव्यवस्था में निवेश के लिए अनुकूल वातावरण बनाया जा सके।
किया जा सके। ब्याज की ऊँची दर का अर्थ है निवेश की ऊँची लागत जो कि विकास प्रक्रिया के लिए हानिकारक
है।
इनके कारण समस्त उत्पादन की लागत बढ़ जाती है तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में उनकी प्रतियोगितात्मकता कम हो जाती है। फलस्वरूप इन देशों के निर्यातों को धक्का पहुँचता है तथा इनकी आयात
क्षमता घटती है जबकि वास्तविकता यह है कि इन देशों की आर्थिक विकास की गति को तीव्र बनाने के लिए
पूँजीगत वस्तुओं के आयात की आवश्यकता होती है।
बहुत बड़ी चुनौती होती है, क्योंकि इससे मुद्रा स्फीति को और अधिक बढ़ावा मिलता है। ये अर्थव्यवस्थाएँ अधिकतर
कृषि प्रधान होती हैं तथा इन पर मौसम का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है, वर्षा न होने के कारण इन अर्थव्यवस्थाओं
में खाद्यान्न की माँग तथा पूर्ति के बीच बहुत अधिक असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। यह असंतुलन मुद्रा स्फीति को
जन्म देता है। मुद्रा स्फीति धीरे-धीरे संपूर्ण आर्थिक क्रिया को अपनी लपेट में ले लेती है। जब सामान्य कीमत स्तर
बढ़ता है, तब ब्याज की दरों का बढ़ना तथा उनके घातक परिणाम निकलना, अनिवार्य बन जाता है।
उपरोक्त खंड में इस बात की चर्चा की गई है कि सरकार का घाटे का बजट तथा इसके परिणामस्वरूप सरकार द्वारा
ट्टण का सहारा लेना समष्टि-अर्थशास्त्र की एक केंद्रीय समस्या बन गयी है। ट्टण के कारण प्रायः अर्थव्यवस्था में
मुद्रा की पूर्ति बढ़ जाती है जो उन अर्थव्यवस्थाओं के लिए मुद्रा स्फीति का तुरंत कारण बनती है जिनकी उत्पादन
क्षमता बहुत कम होती है।
मुद्रा की पूर्ति तथा ब्याज की दरों को नियंत्रण में रखना अल्पविकसित देशों के लिए समष्टि-अर्थशास्त्र संबंधी बहुत
बड़ी चुनौती है क्योंकि ये देश अतिशीघ्र स्फीति कारक दबावों के शिकार बन जाते हैं। इसका यह अर्थ नहीं
है कि मौद्रिक नीति को विकसित देशों में कोई प्रासंगिकता नहीं है। यदि अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाएँ कम उत्पादन
क्षमता तथा उच्च समग्र माँग के कारण स्फीति कारक दबावों के प्रति संवदेनशील हैं, तो विकसित अर्थव्यवस्थाएँ
भी वस्तुओं तथा सेवाओं की कुल पूर्ति की तुलना में कुल माँग की आवर्ती कमी के कारण विस्फीति कारक दबावों के प्रति उतनी ही संवेदनशील हैं।
विस्फीति की स्थिति में निवेश प्रेरणा बहुत कम हो जाती है, भले ही ब्याज की दरें कम होती हैं। ऐसी अर्थव्यवस्थाओं
में मौद्रिक नीति का उद्देश्य मुद्रा की पूर्ति में वृद्धि करना होता है ताकि वस्तुओं तथा सेवाओं की माँग पर किए जाने
वाले खर्च को बढ़ाया जा सके और इस प्रकार माँग में कमी को दूर किया जा सके।
विनिमय दर (अंतर्राष्ट्रीय बाजार में एक देश की करेन्सी का दूसरे देश की करेन्सी में मूल्य) मौद्रिक नीति का एक
और प्रांचल है जिसके द्वारा आर्थिक क्रिया का समस्त स्तर प्रभावित होता है। अनुकूल विनिमय दर,
दूसरे देश की तुलना में अपने देश की करेन्सी के मूल्य में वृद्धि, एक शुभ संकेत नहीं है। उन अर्थव्यवस्थाओं के
लिए जो निर्यात प्रोत्साहन द्वारा अपने विकास की प्रक्रिया को तीव्र बनाना चाहती हैं, यह
निश्चित रूप से ठीक नहीं है। अमेरिकी करेन्सी की तुलना में भारतीय करेन्सी (भारतीय रुपया) के मूल्य में वृद्धि
का अर्थ यह होता है कि अमेरिकी एक डाॅलर से भारतीय बाजार में पहले से कम वस्तुएँ तथा सेवाएँ खरीदी जा
सकेंगी।
क्या आप जानते हैं समष्टि-अर्थशास्त्र में मुद्रा के कार्यों तथा उससे संबंधित सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है।
समष्टि अर्थशास्त्र की सीमाएँ
किसी भी अन्य विषय की भाँति समष्टि-अर्थशास्त्र की भी सीमाएँ होती हैं। इस संबंध में निम्नलिखित टिप्पणी ध्यान
देने योग्य हैं-
1. रचना का तर्क दोष –समष्टि-अर्थशास्त्र के अनेक निष्कर्ष व्यक्तिगत
इकाइयों के सरल सम्मिश्रण पर आधारित हैं। जो तथ्य व्यक्ति के लिए तर्कपूर्ण एवं ठीक होते हैं, यह जरूरी
नहीं कि वो संपूर्ण अर्थव्यवस्था के लिए भी तर्कपूर्ण एवं ठीक हो। निःसंदेह, बचन करना एक व्यक्ति के लिए
सद्गुण है यदि प्रत्येक व्यक्ति बचत करने लगेगा तो कुल माँग कम हो जाएगी जिससे निवेश के
लिए कोई प्रेरणा नहीं होगी तथा राष्ट्रीय आय में कमी हो जाएगी। अंततः इसके परिणामस्वरूप राष्ट्रीय बचत भी
घटेगी, न कि बढ़ेगी।
अत्यधिक सामान्यीकरण की प्रवृत्ति जिसके कारण व्यक्तिगत अनुभवों को संपूर्ण
अर्थव्यवस्था पर लागू किया जाता है, उचित नहीं है।
2. विजातीय इकाइयां –समुच्चयों के अध्ययन क्षेत्र में अनेक विजातीय इकाइयाँ
सम्मिलित होती हैं। इन इकाइयों को विभिन्न प्रकार से मापा जाता है। इन इकाइयों को समरूप संख्याओं अथवा
समजातीय माप के रूप में व्यक्त करना संभव नहीं होता है। इसे निम्नलिखित उदाहरण द्वारा समझाया है-
भले ही हम मुद्रा का उपयोग एक सांझे भाजक के रूप में करें, मौद्रिक मूल्य इनके उपयोग मूल्य का सही माप नहीं है।
3. स्वयं समुच्चय की अपेक्षा समुच्चय की रचना अथवा ढांचा अधिक महत्त्वपूर्ण है – समष्टि-अर्थशास्त्र में
समुच्चय का अध्ययन किया जाता है वास्तव में किसी प्रणाली को स्वयं समुच्चय की अपेक्षा समुच्चय की रचना
या उसका ढाँचा अधिक प्रभावित करता है। मान लीजिए, सन् 2006 तथा सन् 2007 में कीमत स्तर स्थिर रहता है, इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि सन् 2007 में कीमतों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। संभव है कि सन् 2007
में कीमतों में कोई कमी हुई हो तथा औद्योगिक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि। फलस्वरूप, सामान्य कीमत-स्तर स्थिर
बना रहा हो। अतः समस्याओं को ठीक ढंग से समझने के लिए, समुच्चय के ढाँचे का अध्ययन उतना ही जरूरी
है जितना स्वयं समुच्चय का। समष्टि-अर्थशास्त्र में प्रांचलों के संरचनात्मक विश्लेषण को कभी-कभार ही बराबर का महत्व दिया जाता है।
4. समुच्चयों के विभिन्न प्रभाव –समष्टि-अर्थशास्त्र की एक अन्य सीमा
यह है कि अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों पर एक समुच्चय के विभिन्न प्रभावों का अध्ययन नहीं किया जाता। समष्टि
प्रांचलों अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों पर एक समान प्रभाव नहीं पड़ता। उदाहरण के
लिए, कीमत स्तर में होने वाली वृद्धि का व्यापारियों तथा उद्योगपतियों पर लाभदायक प्रभाव पड़ता है वेतन
भोगियों को हानि उठानी पड़ती है। समष्टि अर्थशास्त्र में ऐसे प्रतिनिधिक समूह के अध्ययन का अति संक्षिप्त उल्लेख ही पाया जाता है
संक्षेप में, सामूहिक विश्लेषण पर ध्यान केंद्रित करते हुए समष्टि-अर्थशास्त्र प्रायः ऐसे व्यष्टि प्रांचलों के महत्व की
अवहेलना करता है जो कि विषय-वस्तु के मूलभूत तत्त्व होते हैं।
- Mavroeconomics: Mohan Srivastava, DND Publications, 2010
- Mavroeconomics: S.W. Chavrabarti, Himalaya Publishing House, 2010
- Mavroeconomics: Theory and Policy: H.L. Ahuja, S.Chand Publisher, 2010