अनुक्रम
सांख्य दर्शन के अनुसार प्रकृति और पुरुष दो मूल तत्व हैं और प्रकृति की 23 विकृतियाँ हैं और इस प्रकार कुल
25 तत्व हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार तत्वों की संख्या बताने के कारण ही इस दर्शन को सांख्य दर्शन कहा जाता
है। अन्य विद्वानों के अनुसार सांख्य का अर्थ है-विवेक ज्ञान, प्रकृति-पुरुष के भेद का ज्ञान और चूंकि सांख्य
प्रकृति-पुरुष के भेद को स्पष्ट करता है इसलिए इसे सांख्य कहा जाता है।
सांख्य दर्शन की तत्व मीमांसा
सांख्य द्वैतवादी दर्शन है। इसके अनुसार दो मूल तत्व हैं-एक प्रकृति और दूसरा पुरुष, और यह सृष्टि इन्हीं दो
तत्वों के योग से बनी है। सांख्य के अनुसार यह प्रकृति सत्, रज और तम, इन तीनों गुणों का समुच्चय है और
पदार्थजन्य संसार का उपादान कारण है। और पुरुष परम चेतन तत्व का पर्याय है, परम आत्मा का पर्याय है,
इसका कोई स्वरूप नहीं होता, यह निर्गुण है। सांख्य संसार के प्रत्येक जीव में एक स्वतंत्र पुरुष (आत्मा) की
सत्ता मानता है। इसके अनुसार प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि और अनंत हैं।
प्रकृति केवल जड़ है, बिना पुरुष (चेतन तत्व) के इसमें कोई क्रिया नहीं हो सकती और दूसरी ओर पुरुष केवल
चेतन हैं, बिना जड़ माध्यम के वह क्रिया नहीं कर सकता, अतः सृष्टि की रचना के लिए प्रकृति और पुरुष
का संयोग आवश्यक है। सांख्य के अनुसार प्रकृति एवं पुरुष दोनों की सत्ता स्वयंसिद्ध है।
है इसलिए उसकी सत्ता निर्विवाद है, और मनुष्य का यह कथन कि ‘मैं हूँ’ पुरुष की सत्ता का द्योतक है।
ने प्रकृति और पुरुष के बीच 23 अन्य तत्वों की खोज की है और इस प्रकार उसके अनुसार तत्वों की कुल संख्या
25 है। सांख्य दर्शन के 25 तत्व ये हैं-
- प्रकृति–प्रकृति अथवा प्रधान अथवा अव्यक्त -01
- विकृति-हाथ, पैर, वाणी, गुदा, और जनेंद्रिय आँख, कान, नाक, जिह्ना और त्वचा, मन तथा पृथ्वी, जल, वायु और आकाश, अग्नि। -16
- प्रकृति-विकृति-अहंकार, महत् (बुद्धि), शब्द, तन्मात्र स्पर्श तन्मात्र, रूप तन्मात्र, रस तन्मात्र और गंध नोट तन्मात्र। -07
- न प्रकृति न विकृति-पुरुष (आत्मा) -01
कारण में पहले से ही निहित होता है। यह सृष्टि भी प्रकृति में पहले से निहित थी, तभी तो इसकी उत्पत्ति संभव
हुई। प्रकृति कारण है और सृष्टि इसका कार्य। कारण के कार्य रूप में परिवर्तित होने का नाम उत्पत्ति है और
कार्य के पुनः कारण के रूप में परिव£तत होने का नाम विनाश है।
योग से सर्वप्रथम महत् की उत्पत्ति हुई। सांख्य में महत् का अर्थ है-ब्रह्मांड बुद्धि।
ये वेद एवं उपनिषदों के हिरण्यगर्भ का पर्याय जान पड़ता है। इसके बाद महत् से अहंकार की उत्पत्ति हुई अहंकार
ब्रह्मांड की विभिन्नता का आधार है, आत्मभाव का जन्मदाता है। अहंकार और सत् के योग से मनस्
और पाँच ज्ञानेन्द्रियों एवं पाँच कर्मेन्द्रियों की उत्पत्ति होती है, अहंकार और रजस् के योग से पाँच महाभूतों (पृथ्वी,
जल, तेज, वायु और आकाश) की उत्पत्ति होती है और अहंकार और तमस् के योग से पाँच तन्मात्राओं (रस,
सुगंध, स्पर्श, ध्वनि और दृश्य) की उत्पत्ति होती है।
भोग और मुक्ति के विषय में सांख्य मत अन्य वैदिक मतों से भिन्न है। इसके अनुसार पुरुष और प्रकृति के योग
से जीव (शरीर + जीवात्मा) की उत्पत्ति ही भोग का प्रारंभ है और पुरुष के प्रकृति से अलग होने का नाम मुक्ति
है, मोक्ष है। सांख्य के अनुसार मोक्ष की स्थिति में परमानंद प्राप्त होता है। इसका स्पष्टीकरण है कि न तो प्रकृति
के अभाव में पुरुष भोग कर सकता है और न पुरुष के अभाव में प्रकृति भोग कर सकती है। तब भोग से छुटकारा
पाने के लिए पुरुष को प्रकृति से अलग करना आवश्यक है।
पुनर्जन्म के विषय में सांख्य उपनिषद् दर्शन से सहमत है। इसके अनुसार हमारे सारे अनुभव सूक्ष्म शरीर पर
एकत्रित होते हैं और सूक्ष्म शरीर अंतःकरण (मन, बुद्धि और अहंकार) और पाँच तन्मात्राओं (रस, सुगंध, स्पर्श,
ध्वनि और दृश्य) का योग है। यही सुख-दुःख का अनुभव करता है और यही अनुभवों को संचित करता है। यह
अग्नि से जलता नहीं और पानी से गलता नहीं और जब तक अनुभव शून्य (कर्मफल शून्य) नहीं होता एक स्थूल
शरीर से दूसरे स्थूल शरीर में प्रवेश करता रहता है। इसी को पुनर्जन्म कहते हैं। इस प्रकार पुनर्जन्म सूक्ष्म शरीर
का होता है, आत्मा का नहीं। आत्मा तो पुरुष है, जन्म-मरण के बंधन से मुक्त है।
सांख्य दर्शन की ज्ञान एवं तर्क मीमांसा
सांख्य दर्शन ने ज्ञान को दो भागों में बाँटा है-एक पदार्थ ज्ञान, इसे वह यथार्थ ज्ञान कहता है और दूसरा
प्रकृति-पुरुष के भेद का ज्ञान, इसे वह विवेक ज्ञान कहता है। सांख्य के अनुसार हमें पदार्थों का ज्ञान इंद्रियों
द्वारा होता है। इंद्रियों से यह ज्ञान मन, मन से अहंकार, अहंकार से बुद्धि और बुद्धि से पुरुष को प्राप्त होता है।
दूसरी ओर सांख्य यह मानता है कि पुरुष बुद्धि को प्रकाशित करता है, बुद्धि अहंकार को जागृत करती है, अहंकार
मन को क्रियाशील करता है और मन इंद्रियों को क्रियाशील करता है, और उसके और वस्तु के बीच संसर्ग
स्थापित करता है। सांख्य का स्पष्टीकरण है कि इंद्रियाँ, मन, अहंकार और बुद्धि, ये सब प्रकृति से निर्मित हैं,
अतः ये जड़ हैं, और जड़ में ज्ञान का उदय नहीं हो सकता। दूसरी ओर पुरुष केवल चेतन तत्व है, बिना जड़
प्रकृति के माध्यम के वह भी ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रकृति (जड़) और पुरुष
नोट (चेतन) दोनों का संयोग आवश्यक होता है। सांख्य की पदार्थ ज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया को हम निम्नांकित
रेखाचित्र द्वारा स्पष्ट कर सकते हैं-
ज्ञान के लिए ये तीनों प्रमाण (साधन) आवश्यक होते हैं। परंतु पुरुष तत्व का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हमें शब्दों
पर ही निर्भर रहना होता है। शब्द द्वारा प्राप्त पुरुष तत्व के ज्ञान की अनुभूति के लिए सांख्य योग साधन मार्ग
का समर्थन करता है।
सांख्य दर्शन की मूल्य एवं आचार मीमांसा
सांख्य दर्शन का आरंभ दुःखत्राय-आध्यात्मिक ;आत्मा, मन और शरीर संबंधीद्ध, आधिभौतिक (बाह्य जगत संबंधी)
और आधिदैविक (ग्रह एवं दैवीय प्रकोप संबंधी) की सार्वभौमिकता की स्वीकृति से होता है। सांख्य के अनुसार
इस दुःख से छुटकारे का नाम ही मुक्ति अथवा मोक्ष है। इस संदर्भ में पहला प्रश्न है कि सुख-दुःख का भोक्ता
कौन है? सांख्य का उत्तर है-पुरुष और प्रकृति के योग से उत्पन्न शरीर, मन और जीवात्मा। दूसरा प्रश्न है
कि दुःखत्राय से छुटकारा वैफसे मिले? सांख्य के अनुसार दुःखत्राय का मुख्य कारण अज्ञान है। यह अज्ञान क्या
है? जब पुरुष बुद्धि के कार्य को अपना कार्य बना लेता है अर्थात् प्रकृति के सत, रज और तम गुणों
की अनुभूति करने लगता है तो इसे अज्ञान कहते हैं, इसी कारण वह सुख-दुःख का भोक्ता हो जाता है अन्यथा
वह तो निर्गुण है, उसे सुख-दुःख की अनुभूति नहीं होनी चाहिए।
बुद्धि, अहंकार मन और इंद्रियों के कार्यों को अपना कार्य न समझना ही ज्ञान है। इस ज्ञान की स्थिति में ही मनुष्य
सुख-दुःख के अनुभव से अलग हो सकता है। इसकी प्राप्ति के लिए सांख्य योग साधन मार्ग (यम, नियम, आसन,
प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) को आवश्यक मानता है। यम का अर्थ है-मन, वचन और कर्म
का संयम। इसके लिए योग सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य व्रत के पालन को आवश्यक मानता
है। योग के अनुसार नियम भी पाँच हैं यथा-शौच, संतोष तप, स्वाध्याय और प्राणिधान। सांख्य दर्शन मोक्ष के
इच्छुक को इन सब को अपने आचरण में उतारने का उपदेश देता है। इन नैतिक महाव्रतों एवं नियमों का पालन
करने से ही मनुष्य अपनी इंद्रियों को वश में कर सकता है, अपने मन को निर्मल कर सकता है और योग साधना
के अन्य छह पदों-आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का अनुसरण कर सकता है।
सांख्य दर्शन के मूल सिद्धांत
रूप में क्रमबद्ध करना चाहें तो निम्नलिखित रूप में कर सकते हैं-
योग से नि£मत है। उसका तर्क है कि प्रकृति केवल जड़ तत्व है, बिना चेतन के संयोग के उसमें क्रिया
नहीं हो सकती और बिना क्रिया के सृष्टि की रचना नहीं हो सकती। दूसरी ओर पुरुष केवल चेतन तत्व
है, बिना जड़ तत्व की सहायता के वह क्रिया नहीं कर सकता और क्रिया के अभाव में सृष्टि की रचना
नहीं हो सकती। अतः सृष्टि की रचना के लिए प्रकृति-पुरुष का संयोग आवश्यक है।
अनंत मानता है और सत्य मानता है, परंतु प्रकृति को वह जड़ और पुरुष को चेतन मानता है, प्रकृति को
त्रिगुणात्मिका और पुरुष को निर्गुण मानता है। सांख्य के अनुसार सृष्टि रचना की दृष्टि से प्रकृति और पुरुष
दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।
वह उसे ब्रह्म का अंश नहीं मानता, उसे अपने में मूल तत्व मानता है। सांख्य प्रत्येक प्राणी में एक स्वतंत्र आत्मा की सत्ता स्वीकार करता है, वह अनेकात्मवादी दर्शन है।
रचना भी प्रकृति-पुरुष के संयोग से होना निश्चित है। कपिल के अनुसार मनुष्य का स्थूल शरीर
माता-पिता के रज-वीर्य से और सूक्ष्म शरीर अंतःकरण और पाँच तन्मात्राओं के योग से बनता है।
उसके सूक्ष्म शरीर पर जन्म-जन्म के अनुभव संचित होते हैं और यही एक जन्म से दूसरे जन्म में प्रवेश
करता है। सांख्य के अनुसार मनुष्य का स्थूल और सूक्ष्म शरीर जड़ हैं और उनमें निहित चेतन तत्व पुरुष
है। सांख्य मनुष्य जीवन को सप्रयोजन मानता है।
प्रकृति एवं पुरुष का योग होता है और उसका विकास इन्हीं दो तत्वों पर निर्भर करता है। सांख्य की दृष्टि
से मानव विकास की तीन दिशाएँ होती हैं-शारीरिक, मानसिक और अध्यात्मिक।
दुःखत्राय से छुटकारा पाना है। इसे ही वह मुक्ति कहता है। दुःखत्राय क्यों होता है? जब पुरुष अपने
वास्तविक स्वरूप को भूलकर अपने को बुद्धि समझ बैठता है तब उसे दुःख की अनुभूति होती है अन्यथा
तो वह इन सबसे अलग है। जब मनुष्य अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचान लेता है तब वह
दुःखत्राय से छुटकारा पा जाता है, मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य इसी जीवन में दुःखत्राय के अनुभव से मुक्त
हो जाता है, उसे सांख्य में जीवन्मुक्त कहते हैं और जो शरीर के नाश होने पर दुःखत्राय के अनुभव से
मुक्त होता है उसे विदेह मुक्त कहते हैं।
प्रकृति-पुरुष के भेद को जानना आवश्यक होता है। उसी स्थिति में पुरुष अपने आप को प्रकृति से अलग
कर सुख-दुःख से अलग हो सकता है, कर्मपफल भोग से मुक्त हो सकता है।
साधन मार्ग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि) को आवश्यक मानता
है।
