अनुक्रम
बाजार विभक्तीकरण वह क्रिया है जिसके द्वारा बाजार को विभिन्न खण्डों में
बांटाा जाता है। बाजार खण्ड कुल बाजार का ऐसा भाग या हिस्सा है जिससे प्रत्येक
ग्राहक के क्रय-व्यवहार में एक समापन या समानता पायी जाती है। इस प्रकार
बाजार विभक्तीकरण का उद्देश्य विभिन्न क्रेताओं के बीच जो अन्तर पाये जाते है उनका
पता लगाना है। यह अन्तर वस्तुओं के चुनाव को प्रभावित करते है। अतः उनके चुनाव
के अनुसार ही एक विक्रेता द्वारा विपणन विधियां अपनायी जाती है।
लेकिन बहुत सी विशेषताएं एकसमान जैसे होती है। क्रेता जिस प्रकार के होंगे उनका
क्रय करने का ढंग भी उसी प्रकार का होगा। बाजार विभक्तीकरण का मुख्य उद्देश्य
क्रेताओं के क्रय-व्यवहार का ही पता लगाना है जिससे कि विक्रेता के द्वारा उन्ही के
अनुरूप विपणन के ढंगों को अपनाया जा सकें।
बाजार विभक्तिकरण का अर्थ
ताकि प्रत्येक भाग के लिए एक समुचित विपणन कार्यक्रम एवं व्यूहरचना बनाई जा सके। इसके लिए बाजार के ग्राहकों की विशेषताओं, आवश्यकताओं, व्यवहार आदि के अनुसार समूह बनाये जाते है तथा प्रत्येक समूह की
विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए अलग विपणन कार्यक्रम एवं व्यूहरचना तैयार की जाती है।
बाजार विभक्तिकरण की परिभाषा
बाजार विभक्तिकरण की विशेषताएँ
- बाजार विभक्तिकरण एक नवीन अवधारणा है।
- विभिन्न प्रकार के ग्राहकों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए विभिन्न आकृति एवं किस्म की वस्तुओं
का उत्पादन किया जाता है। - बाजार विभक्तिकरण किसी बाजार को छोटे-छोटे भागों में बांटने की रीति-नीति है।
- बाजार विभक्तिकरण विभिन्न आधारों पर किया जाता है, जैसे – ग्राहकों की आयु, आय, शिक्षा, लिंग आदि।
- बाजार विभक्तिकरण में वर्तमान एवं भावी ग्राहकों को उनकी आवश्यकताओं, रूचियों एवं पसन्द के आधार
पर समजातीय समूहों में विभाजित किया जाता है। - बाजार विभक्तिकरण एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा बाजार को विभिन्न भागों में बांटा जाता है।
बाजार विभक्तिकरण की मान्यताएँ
- बाजार विभक्तिकरण की प्रथम मान्यता यह है कि बाजार में विभिन्न प्रकार के या विषम ग्राहक विद्यमान होते
है। - इन विभिन्न प्रकार के ग्राहकों के पृथक-पृथक समूह बनाये जा सकते है।
- विभिन्न प्रकार के अलग-अलग ग्राहकों के लिए पृथक-पृथक विपणन मिश्रण एवं व्यूह रचनाओं का निर्माण
किया जा सकता है।
बाजार विभक्तिकरण के उद्देश्य
- समान प्रकार के ग्राहक जिनकी विशेषताएँ एवं आवश्यकताएँ एक प्रकार की है, समूह बनाना।
- प्रत्येक समूह के ग्राहक की रूचि, पसन्द एवं आवश्यकता की जानकारी करना।
- संस्था के लिए सर्वश्रेष्ठ ग्राहक वर्ग की जानकारी करना।
- संभावित ग्राहकों को वास्तविकता में बदलना।
- संस्था की विपणन नीतियों, कार्यक्रमों को ग्राहकोन्मुखी बनाना।
- असन्तुष्ट ग्राहक वर्ग की जानकारी कर उन्हें सन्तुष्ट करना।
- प्रत्येक बाजार खण्ड के लिए अलग विपणन व्यूहरचना तैयार करना।
- विपणन अवधारणा को व्यवहार में लाना।
- सर्वोतम बाजार क्षैत्रों का चयन करना एवं उनका विकास करना।
बाजार विभक्तिकरण का महत्व
बाजार विभक्तिकरण एक संस्था की कार्य प्रणाली में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। बाजार विभक्तिकरण
से एक संस्था अच्छे उत्पाद प्रस्तुत कर सकती है तथा सर्वोतम वितरण एवं संचार की व्यवस्था कर सकती है।
सकती है तथा लक्ष्य बाजार के लिए उसका समुचित मूल्य निर्धारित कर सकती है। संस्था सर्वोत्तम वितरण एवं
संचार माध्यमों का चयन कर सकती है तथा अपने प्रतिस्पर्धियों की तस्वीर को अधिक स्पष्ट रूप से देख सकती
है।”
की जानकारी कर सकता है ऐसा बाजार खण्डों के तुलनात्मक अध्ययन द्वारा किया जा सकता है। जिस बाजार
खण्ड में तुलनात्मक रूप से अच्छे विपणन अवसर विद्यमान होते हैं, उस खण्ड में विपणन प्रबन्धक अपना विपणन
कार्य प्रभावी तरीके से कर सकता है।
विपणनकर्त्ता के सामने सभी बाजारों की स्थिति स्पष्ट रूप से आ जाती है ओर इनमें से सर्वोत्तम लक्ष्य बाजार का
चयन कोई कठिन कार्य नहीं होता है। इस प्रकार एक विपणन प्रबन्धक सर्वोत्तम लक्ष्य बाजार का चयन कर उस
बाजार के अनुरूप अपना विपणन कार्यक्रम तैयार कर सकता है।
आवश्यकता की जानकारी आसानी से हो जाती है। विपणनकर्त्ता ग्राहकों की पसंद एवं आवश्यकता को ध्यान में
रखते हुए विपणन कार्यक्रम एवं व्यूह रचनाओं का निर्धारण कर सकता है। ग्राहकों की आवश्यकता एवं रूचि को
ध्यान में रखकर बनाये गये विपणन कार्यक्रम अधिक सफल होते हैं।
होती है। किस बाजार खण्ड के लिए किस प्रकार के मध्यस्थ उपयुक्त रहेंगे इस बात का पता लगाकर मध्यस्थों का
चयन किया जा सकता है। इस प्रकार बाजार विभक्तिकरण से विशेष आवश्यकता वाले मध्यस्थों का चयन संभव है।
आय, जीवन-स्तर, व्यवसाय आदि के बारे में जानकारी प्राप्त की जा सकती है तथा इस जानकारी के आधार पर
उत्पाद का मूल्य निर्धारण किया जा सकता है। उपभोक्ताओं की आय को ध्यान में रखते हुए बाजार विभक्तिकरण
द्वारा विभेदकारी मूल्य निर्धारण भी किया जा सकता है।
अलाभकारी विपणन खण्डों की जानकारी कर सकता है तथा उन विपणन खण्डों पर ज्यादा ध्यान दे
सकता है जो उसके लिए लाभप्रद हो। इस प्रकार सम्पूर्ण विपणन प्रयास लाभकारी विपणन खण्डों
पर केन्द्रित किये जा सकते हैं।
7. प्रतिस्पर्धा में विजय प्राप्त करना – बाजार विभक्तिकरण द्वारा प्रत्येक बाजार खण्ड में स्थित प्रतियोगी संस्था
के उत्पादों के बारे में जानकारी प्राप्त हो जाती है। प्रतियोगी संस्था के उत्पाद की किस्म मूल्य, विपणन माध्यम
आदि की जानकारी कर प्रभावकारी विपणन व्यूह रचनाएँ बनाई जा सकती है जो प्रतिस्पर्धा में विजय दिलाने में
सहायक होगी।
बाजार में विपणन कार्य का संचालन नहीं कर सकता है। अत: कुछ उपयुक्त बाजार खण्डों का चयन कर लिया
जाता है, तथा उन बाजार खण्डों में अधिक प्रभावी तरीके से विपणन कार्यों का संचालन किया जा सकता है।
पर केन्द्रित करना पसन्द करती है जिनको सन्तुष्ट करने की अधिक संभावना होती है।’’
ग्राहकों में विपणन कार्य करती थी वे आज बाजार विभक्तिकरण कर छोटे-छोटे बाजार खण्डों में अपनी पहुंच बना
रही है।
होते है। इन ग्राहकों की आय, आयु, जीवनस्तर, व्यवसाय एवं पैशा आदि में प्रयाप्त अन्तर होता है। इस अन्तर को
ध्यान में रखते हुए ग्राहक के स्तर के अनुरूप संवर्द्वनात्मक प्रयास किये जा सकते हैं।
हो सकता है क्योंकि संवर्द्धनात्मक सन्देश तथा उसको प्रस्तुत करने हेतु माध्यमों का चयन बाजार खण्ड को केन्द्र
बिन्दु मान कर किया जा सकता है।”
बाजार खण्ड में असन्तुष्ट ग्राहकों की जानकारी कर सकता है और यह पता लगा सकता है कि ग्राहक किन कारणों
से असन्तुष्ट हैं। ग्रहको की असन्तुष्टि के कारणों का पता लगाने के बाद उनको सन्तुष्ट करने के प्रयास किये जा
सकते है।
बाजार विभक्तिकरण के आधार
बाजार विभक्तिकरण विभिन्न आधारों पर किया जा सकता है तथा इन आधारों में समय के
साथ-साथ परिवर्तन होते रहते है और बाजार विभाजन के नये आधार तैयार होते रहते है। विभिन्न विद्वानों की राय
को ध्यान में रखते हुए बाजार विभक्तिकरण के आधार बताये जा सकते है :-
भौगोलिक आधार पर विभक्तिकरण से आशय बाजार क्षेत्र को भौगोलिक इकाइयों जैसे
देश, राज्य, नगर या गाँव में विभजित करना है। भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर भी यह विभाजन किया जा
सकता है। जैसे कि गर्म एवं ठण्डे प्रदेश, जलवायु, पहाड़, मैदानी इलाके, पठार आदि।
जलवायु में काफी अन्तर पाया जाता है। जो स्थान समुद्र के किनारे बसे है जैसे कि मुम्बई यहाँ ठण्डे पेय पदार्थ पूरे
साल बेचे जा सकते हैं जबकि उत्तरी भारत के शहरों में सिर्फ ग्रीष्म ऋतु में ही ठण्डे पेय पदार्थों की मांग रहती है।
ग्रामीण एवं शहरी बाजारों की विशेषताओं में काफी अन्तर रहता है।
हुए विपणन कार्य करना चाहिए क्योंकि शहरी क्षेत्रों में जिन उत्पादों का विपणन किया जाता है यह जरूरी नहीं है
कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी उन उत्पादों की बिक्री हो।
है तो उसे जनांकिकी आधार पर विभाजन करना कहते हैं। प्रमुख जनसंख्या सम्बंधी घटक है
- आयु वर्ग – किसी उत्पाद के प्रति उपभोक्ता की पसन्दगी एवं नापसन्दगी उम्र के अनुसार बदलती रहती है।
बचपन में जो उत्पाद पसन्द होते हैं बड़े होने पर उनका महत्व समाप्त हो जाता है। विपणन प्रबंधक को आयु वर्ग
को ध्यान रखते हुए विपणन कार्य करना चाहिए। - आय – एक व्यक्ति की आय उसकी क्रय करने की शक्ति को निर्धारित करती है आय के अनुसार उपभोक्ता
का विभाजन उच्च आय वर्ग, मध्यम आय वर्ग तथा निम्न आय वर्ग में किया जा सकता है। - शिक्षा – शिक्षा के आधार पर अलग अलग उपभोक्ता के वर्ग बनाये जा सकते है। उदाहरण के लिए शिक्षित,
अशिक्षित एवं कमपढ़े लिखे व्यक्ति। - लिंग – बाजार विभक्तिकरण ग्राहकों के लिंग के आधार पर भी किया जा सकता है। महिलाओं एवं पुरूषों के
लिए अलग अलग प्रकार के उत्पादों की आवश्यकता होती है अत: विपणन प्रयास भी अलग-अलग प्रकार के करने
की आवश्यकता होती है। - व्यवसाय – बाजार में विभक्तिकरण ग्राहकों के व्यवसाय धन्धे के आधार पर भी किया जा सकता है। इनको
पैशेवर व्यक्ति, नौकरीपेशा, व्यवसायी आदि आधारों में बांटकर इनके लिए अलग विपणन कार्यक्रम निर्धारित किये जा
सकते है। - जीवन-चक्र अवस्था – एक समान आयुवर्ग के व्यक्तियों की जीवन-चक्र अवस्था अलग-अलग हो सकती है।
एक समान आयु वर्ग के ग्राहक कुंवारे, शादीशुदा, विधुर, तलाकशुदा आदि हो सकते है। यह भिन्नता उनकी क्रय
वरीयता एवं उनकी आवश्यकताओं में अन्तर पैदा करती है।
3. बाजार विभक्तिकरण के मनोवैज्ञानिक आधार –
ग्राहकों की मनोदशा या उनकी मनोवैज्ञानिक विशेषताएं ग्राहकों में अंतर उत्पन्न करती
है। ग्राहक की ये विशेषताएं उनके व्यक्तिव के कारण होती है। कुछ लोग बहुत खर्चीले होते है जबकि कुछ लोग
धन खर्च करना पसंद नही करते है, कुछ स्वभाव से साहसी होते है तो कुछ लोग भीरू प्रवृति के होते है। ग्राहकों
की जीवन-शैली या उनके जीवन जीने का ढंग उनकी आवश्यकताओं, क्रय वरीयताओं को निर्धारित करती है। अत:
विपणनकर्ता जीवन-शैली के आधार पर भी उपभोक्ताओं का विभाजन करते हैं।
भी उनकी पसन्द, नापसन्द एवं क्रय वरीयताओं का निर्धारित करता है।
प्रत्येक व्यक्ति का जीवन मूल्य उसकी आवश्यकताओं एवं क्रय वरीयताओं का निर्धारण करता है। एक
व्यक्ति के अनेक जीवन मूल्य हो सकते है जैसे जीवन में आनन्द, अपनत्व, संतोष, मधुर सम्बंध बनाना, सुरक्षा की
भावना आदि। ग्राहकों में विद्यमान ये सभी जीवन मूल्य उसकी आवश्यकताओं का निर्धारण करते हैं।
होगा तो इसे लाभ आधार पर बाजार पर विभक्तिकरण कहेंगे। विपणन प्रबंधक को इसके आधार पर विपणन निर्णय
लेने चाहिए। जैसे एक उपभोक्ता किसी विशेष ब्रान्ड की चाय के साथ दिये जाने वाले उपहार की वजह से उस
ब्रान्ड को पसन्द करता है। इस प्रकार विपणन प्रबंधक को उपभोक्ता के किसी लाभ के प्रति विशेष झुकाव को ध्यान
में रखते हुए विपणन कार्य करना चाहिए।
वाले उत्पादों की और आंख उठा कर भी नही देखते जबकि कुछ ग्राहक अधिक मूल्य का ब्रान्डेड उत्पाद पसन्द
खरीदना करते हैं। कुछ उपभोक्ता वस्तु की किस्म पर ज्यादा ध्यान देने वाले होते है। अत: एक
उत्पादक/विपणनकर्त्ता को इन बातों का ध्यान रखते हुए विपणन प्रयास करने चाहिए ताकि उसे अधिक सफलता
प्राप्त हो सके।
के लिए जन्मदिन, शादी की वर्षगांठ, वेलैन्टाइन्स डे, आदि अवसरो पर ही कुछ उपभोक्ता द्वारा क्रय निर्णय लिये
जाते हैं। कुछ लोगों दीपावली, धनतेरस, आदि दिनों पर किसी उत्पाद को क्रय करने का निर्णय लेते है।
किसी विशेष ब्रान्ड के लिए पूर्ण सर्मपित होते है जबकि कुछ उपभोक्ताओं की निष्ठा बदलती रहती है। कुछ लोग
ऐसे भी होते है जिनकी किसी भी ब्रान्ड के प्रति कोई निष्ठा नही होती है।
प्रभावी बाजार विभक्तिकरण के आवश्यक तत्व
बाजार विभक्तिकरण सभी संस्थाओं द्वारा किये जा सकते है किन्तु सभी बाजार विभक्तिकरण प्रभावी नही हो
पाते है। अत: बाजार विभक्तिकरण को प्रभावी बनाने के लिए कुछ विशेष बातों पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है
जो है:-
विभक्तिकरण के लिए घटकों का मापन योग्य होना चाहिए। उदाहरण के लिए उपभोक्ता की आय का मापन किया
जा सकता है लेकिन उसके मनोवैज्ञानिक घटकों का मापन संभव नहीं है।
खर्च पर बाजार खण्डों तक पहुंच सके। वितरण माध्यमों तथा विज्ञापन एवं विक्रय संवर्द्धन के साधनों की पहुंच भी
बाजार खण्डो तक सुगमता पूर्वक हो जानी चाहिए।
न दिया जा सके न इतना छोटा होना चाहिए कि विपणन प्रयास संस्था के लिए लाभ का सौदा न हो। अत: बाजार
खण्डों का आकार उचित होना चाहिए।
अलग एवं पहचानने योग्य होना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होगा तो बाजार विभक्तिकरण प्रभावशील नहीं हो पायेगे
तथा बाजार विभक्तिकरण का कोई अर्थ भी नहीं रहेगा।
विपणन कार्यक्रम बनाना और उसकों क्रियान्वित करना संभव होना चाहिए। यदि किसी कारणवश विपणन कार्यक्रम
को क्रियान्वित करना संभव नही हो तो बाजार विभक्तिकरण का कोई अर्थ नही होगा।
अल्पकालीन है तो इनके लिए बनाया गया विपणन कार्यक्रम भी अल्पकालिक होने के कारण अधिक खर्चीला होगा।
अत: बाजार खण्ड ऐसे होने चाहिए कि उनके लिए लम्बे समय तक प्रभावी रहने वाला विपणन कार्यक्रम बनाया जा
सके।
मितव्ययतापूर्ण तरीके से संचालित किया जा सके। बाजार खण्डों का निर्माण करते समय यह ध्यान रखना चाहिए
कि बाजार खण्ड न बहुत बडे़ हो और न ही बहुत छोटे हो अन्यथा बाजार खण्ड का मितव्ययतापूर्ण तरीके से
संचालन संभव नहीं होगा।
खण्डों का लाभदायी होना। अत: विपणन प्रबंधक द्वारा इस प्रकार के बाजार खण्डो का निर्माण किया जाना चाहिए
जो लाभदायी हो।