अनुक्रम
संरक्षण कहलाता है। इसके माध्यम से न केवल उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों एवं
उत्तरदायित्व के बारे में शिक्षित किया जाता है अपितु उनकी शिकायतों का निवारण
भी किया जाता है।
मान लीजिए आप किसी दुकान पर खाना पकाने का तेल खरीदने गये। दुकानदार आपसे
कहता है कि तेल बंद टीन या डिब्बे में उपलब्ध है। आप आश्वस्त होना चाहते हैं कि तेल
मिलावटी तो नहीं है, अर्थात् उसमें कोई घटिया हानिकारक तेल तो नहीं मिलाया गया। अब
दुकानदार आपको लेबल पर उत्पाद का नाम दिखायेगा और कहेगा कि यह जानी-मानी
कम्पनी है, जो कभी भी अशुद्ध और घटिया चीजों की आपूर्ति नहीं करती। आप उस तेल
का प्रयोग करते हैं और उसे ‘खाकर बीमार पड़ जाते हैं। अब क्या आप दुकानदार के पास
जाकर तेल को लौटा सकते हैं? नहीं, अब वह खुले टिन में थोड़ा-बहुत इस्तेमाल हो चुका
तेल वापस नहीं लेगा।
से हुई होगी। तो अब आप यही कर सकते हैं कि आगे उस लेबल का तेल इस्तेमाल करना
बंद कर दें। लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि दूसरे ब्रांड के तेलों के साथ फिर यही
समस्या आपके सामने नहीं आएगी?
उपभोक्ता संरक्षण का अर्थ
उपभोक्ताओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करने तथा उन्हें कानूनी संरक्षण प्रदान करने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 बनाया गया था। इसके अनुसार उपभोक्ता की परिभाषा निम्नलिखित है:-
- कोई भी व्यक्ति जो प्रतिफल के बदले माल को क्रय करता है, इसमें क्रेता की स्वीकृति से माल का उपयोगकर्त्ता भी शामिल है, परन्तु इसमें ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं है जो माल को पुन: विक्रय के लिए खरीदता है।
- कोई भी व्यक्ति जो प्रतिफल के बदले सेवा को किराये पर लेता है। इसमें सेवाओं का लाभग्राही भी शामिल है, परन्तु इसमें ऐसा व्यक्ति शामिल नहीं है जो सेवा को वाणिज्यक उद्देश्य से प्राप्त करता है।
उपभोक्ता के अधिकार
उपभोक्ता संरक्षण की आवश्यकता
व्यवसाय में अपनाये जाने वाले गलत ओर अनुचित तरीके तथा उनसे बचने में आम
उपभोक्ताओं की लाचारी के कारण ही उपभोक्ताओं के हितों को सुरक्षित करने के उपायों की
आवश्यकता पड़ती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि सेवाओं में कमी या खराब वस्तु की वजह
से होने वाले नुकसान या हानि से स्वयं को बचाना, एक उपभोक्ता का मूलभूत अधिकार है।
लेकिन इसके बावजूद अज्ञानता या जागरूकता के अभाव के कारण उपभोक्ता अपने अधिकारों
का इस्तेमाल नहीं कर पाते।
में उपलब्ध एक वस्तु के विभिन्न प्रकारों में से अच्छी किस्म की वस्तु चुनने का अधिकार
है, लेकिन हम भ्रामक विज्ञापनों की वजह से सही चुनाव करने में असफल होते हैं और
हल्की गुणवत्ता वाली चीजें खरीद लेते हैं।
कुछ परिस्थितियों में तो हम बिल्कुल लाचार हो जाते हैं, जैसे किसी उत्पाद की गुणवत्ता की
पुष्टि करने में हम अपने आपको असमर्थ पाते हैं। चालाक दुकानदार अपनी लच्छेदार बातों
से हमें आसानी से ठग सकता है। यदि दवा की गोलियों की पट्टठ्ठी पर उसकी एक्सपायरी डेट
ठीक से पढ़ी नहीं जा रही है तो हम इतनी जल्दी में होते हैं कि दुकानदार जो कहता है उसे
मान लेते हैं। अब अगर उस दवा का असर नहीं होता है तो हम पिफर डॉक्टर के पास जाते
हैं और उनसे कोई दूसरी दवा लिखने का अनुरोध् करते हैं। हम बिल्कुल भूल जाते हैं कि
जो दवा हमने खरीदी थी, शायद उसका वांछित असर इसलिए नहीं हुआ क्योंकि हमें वह दवा
दी गयी थी जिसका असर समाप्त हो चुका था।
कई बार तो ऐसा होता है कि हम अपनी ही कुछ निराधर मान्यताओं की वजह से ठगे जाते
हैं। जैसे हममें से कई लोगों का विश्वास होता है कि ऊंची कीमत का मतलब है बेहतर
गुणवत्ता और ऐसे में अगर विक्रेता ने किसी उत्पाद की गुणवत्ता के अच्छी होने की
सिपफारिश कर दी तो हम उसके लिए ऊंची से ऊंची कीमत चुकाने की भी परवाह नहीं
करते। इसके अलावा यह भी एक आम धरणा है कि आयातित वस्तुओं की गुणवत्ता बेहतर
होगी ही। तो अगर किसी उत्पाद पर कोई भी लेबल या निशान लगा हो जो इसे विदेश में
निर्मित बताए तो हम उत्पादन या निर्माण स्थल की कोई पुष्टि किये बिना ही इसे ऊंची
कीमत पर खरीद लेते हैं।
पैकेटों में बिकने वाले तैयार खाद्य पदार्थ जैसे आलू के चिप्स सेहत के लिए अच्छे नहीं होते।
लेकिन बच्चे इन चीजों को खरीदते हैं, क्योंकि ये स्वादिष्ट होते हैं। शीतल पेय के कुछ ब्रांड
युवाओं के बीच कापफी लोकप्रिय हैं क्योंकि टेलीविजन पर नजर आने वाले इनके विज्ञापनों
में नामी गिरामी पिफल्मी कलाकार होते हैं और उनकी कही गई बातों का उनके ऊपर कापफी
प्रभाव होता है। अब तो ऐसा लगता है हम एक स्वादिष्ट पेय के रूप में चीनी और नमक
के साथ ताजे नींबू पानी का स्वाद और महत्व बिल्कुल भूल ही गये हैं।
कई वस्तुओं के निर्माता प्राय: पैकिंग पर गुणवत्ता का स्तरीय प्रामाणिकता का मानक जैसा चिन्ह लगा देते हैं, जो कि कड़ी जांच परख के बाद ही लगाया जाने वाला प्रमाणिक
चिन्ह होता है। इसी तरह यदि पैक किया सामान इस पर अंकित वजन से कम होता है तो
खरीदने से पहले हमेशा इसमें वजन की पुष्टि कर पाना बहुत कठिन होता है। कभी-कभी
तो तोलने की मशीनें भी त्राुटिपूर्ण होती है।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि उपभोक्ताओं को, वस्तुओं के त्राुटिपूर्ण होने या सेवा में कमी
होने की स्थिति के उपचार के रूप में अपने लिए सुलभ उपायों की सही जानकारी तक नहीं
होती।
अब आप अच्छी तरह समझ सकते हैं कि उपभोक्ताओं को ऐसी अनुचित व्यापारिक
गतिविधियों से बचाने के उपाय करना क्यों आवश्यक है, जिनसे उनका आर्थिक नुकसान तो
होता ही है, वे उनके स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक हो सकती है।
उपभोक्ताओं के दायित्व/जिम्मेदारी
(3) उपभोक्ता को शिकायत अवश्य दर्ज करवानी चाहिए:- प्राप्त की गई किसी वस्तु अथवा सेवा में कमी निकलने पर उपभोक्ता को उपयुक्त फोरम में अपनी शिकायत अवश्य दर्ज करवानी चाहिए।
उपभोक्ता की शिकायतों को निपटाने की प्रक्रिया
जैसा कि पहले बताया जा चुका है, कोई व्यक्तिगत उपभोक्ता या उपभोक्ताओं का संघ
अपनी शिकायतें दर्ज करा सकता है। शिकायतें उस जिले फोरम में दर्ज करायी जा सकती
है जहां यह मामला हुआ या जहां विरोधी पक्ष रहता है या राज्य सरकार या केन्द्र शासित
प्रदेश की सरकार द्वारा अधिसूचित राज्य आयोग के समक्ष, अथवा नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय
आयोग के समक्ष दर्ज कराई जा सकती है। शिकायत दर्ज कराने का बहुत कम शुल्क है।
शिकायत, शिकायत कर्ता द्वारा या व्यक्तिगत रूप से उसके अधिकृत एजेंट द्वारा दर्ज करायी
जा सकती है या डाक से भेजी जा सकती है। निम्नलिखित सूचनाओं के साथ शिकायत की
पांच प्रतियां जमा कराई जानी चाहिए।
- शिकायत कर्ता का नाम, पता और विवरण।
- विरोधी पक्ष या पक्षों का नाम, पता और विवरण।
- शिकायत से सम्बंध्ति तथ्य और यह जानकारी, कि मामला कब और कहां हुआ।
- शिकायत दर्ज आरोपों के समर्थन में दस्तावेज, यदि कोई हो तो (जैसे कैशमेमो,
रसीद वगैरह) - यह ब्यौरा कि शिकायत कर्ता किस तरह की राहत चाहता है।
शिकायत पर शिकायत कर्ता या उसके अधिकृत प्रतिनिधि(एजेंट) के हस्ताक्षर होने चाहिए।
यह जिला पफोरम, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष को संबोधित होनी चाहिए। कोई
भी शिकायत, मामला उठाने की तारीख से दो वर्ष की अवधि के भीतर दायर की जानी
चाहिए।
यदि इसमें देर होती है और सम्बंध्ति फोरम या आयोग इसे क्षम्य मान लेता है तो विलम्ब
का कारण रिकार्ड किया जाना चाहिये।
जहां तक संभव हो शिकायतों पर विरोधी पक्ष द्वारा नोटिस ग्रहण करने के तीन महीने के भीतर
फैसला कर दिया जाना चाहिए। उन मामलों में जहां उत्पादों की, प्रयोगशाला में जांच या
विश्लेषण की व्यवस्था हो, निपटान की समय सीमा पांच महीने की होती है।
फोरम या आयोग, शिकायतों की प्रकृति, उपभोक्ता द्वारा मांगी गयी राहत और मामले के
तथ्यों के अनुरूप, इनमें से एक या एक से अधिक राहतों का आदेश दे सकता
है।
- वस्तुओं में त्रुटि/सेवाओं में कमी को दूर करना।
- वस्तुओं के बदले दूसरी वस्तु देना, सेवाओं को बहाल करना।
- वस्तु के लिए चुकायी गयी कीमत या सेवाओं के लिए चुकायी गयी अतिरिक्त शुल्क
की वापसी।
उपभोक्ताओं की समस्याओं का स्वरूप
1. मिलावट : बेची जा रही वस्तु में उससे घटिया क्वालिटी की चीज मिला देना। इस तरह की मिलावट अनाज, मसालों, चाय की पत्ती, खाद्य तेलों और पेट्रोल में की जाती है।
